चक्रवात, प्रतिचक्रवात इसकी उत्पत्ति विभिन्न प्रकार की वायुराशियों के ....
...मिश्रण के फलस्वरूप वायु की तीव्र गति से ऊपर उठकर बवंडर का रूप ग्रहण करने से होती है।
केन्द्र में कम दाब की स्थापना होने पर बाहर की ओर दाब बढ़ता जाता है।
इस अवस्था में हवाएँ बाहर से भीतर की ओर चलती हैं, इसे ही 'चक्रवात' कहा जाता है।
चक्रवात में वायु चलने की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के विपरीत एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की दिशा में होती है।
जब केन्द्र में दाब अधिक होता है तो केन्द्र से हवाएँ बाहर की ओर चलती हैं, इसे प्रतिचक्रवात कहा जाता है।
इसमें वाताग्र का अभाव होता है।
प्रतिचक्रवात में वायु की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के अनुकूल तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के उल्टी होती है।
चक्रवात में हवा केन्द्र की तरफ आती है और ऊपर उठकर ठंडी होती है & वर्षा कराती है, जबकि प्रतिचक्रवात में मौसम साफ होता है।