U.P Board Class 10 Hindi 801 (HF) Question Paper 2024

U.P Board Class 10 Hindi 801 (HF) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2024
हिन्दी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट  पूर्णांक: 70

निर्देश:

i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।

iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।

iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।

v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।

vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।

vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।

viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।

खण्ड – ‘अ’ बहुविकल्पीय प्रश्न

(वस्तुनिष्ठ) प्रश्न

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रसिद्ध हैं-

(A) कहानी-लेखन के लिए
(B) उपन्यास-लेखन के लिए
(C) आलोचना-साहित्य के लिए
(D) नाटक-लेखन के लिए

Ans. (C) आलोचना-साहित्य के लिए

2. ‘गोदान’ उपन्यास के लेखक हैं-

(A) यशपाल
(B) प्रेमचन्द
(C) मोहन राकेश
(D) धर्मवीर भारती

Ans. (B) प्रेमचन्द

3. ‘नीड़ का निर्माण फिर’ के रचनाकार हैं-

(A) हरिवंश राय ‘बच्चन’
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(C) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(D) रामविलास शर्मा

Ans. (A) हरिवंश राय ‘बच्चन’

4. ‘झूठा सच’ उपन्यास के लेखक हैं-

(A) यशपाल
(B) कमलेश्वर
(C) रांगेय राघव
(D) चतुरसेन शास्त्री

Ans. (A) यशपाल

5. छायावाद की मुख्य प्रवृत्ति है-

(A) आश्रयदाताओं की प्रशंसा
(B) रीतिग्रन्थों का निर्माण
(C) श्रृंगार और प्रेम बेदना
(D) भक्ति-भावना

Ans. (C) श्रृंगार और प्रेम बेदना

6. ‘कलम का सिपाही’ जीवनी है-

(A) जयशंकर प्रसाद की
(B) प्रेमचन्द की
(C) मोहन राकेश की
(D) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की

Ans. (B) प्रेमचन्द की

7. ‘घनानन्द’ किस काव्यधारा के कवि हैं ?

(A) रीतिबद्ध
(B) रीतिसिद्ध
(C) रीतिमुक्त
(D) आधुनिक काल

Ans. (C) रीतिमुक्त

8. ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादक हैं-

(A) मोहन राकेश
(B) प्रेमचन्द
(C) धर्मबीर भारती
(D) गुलाब राय

Ans. (B) प्रेमचन्द

9. ‘जहाज का पंछी’ कृति की विधा है-

(A) नाटक
(B) कहानी
(C) उपन्यास
(D) निबन्ध संग्रह

Ans. (B) कहानी

10. ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन वर्ष है-

(A) 1942 ई०
(B) 1953 ई०
(C) 1943 ई०
(D) 1940 ई०

Ans. (C) 1943 ई०

11. ‘निर्वेद’ स्थायी भाव है-

(A) हास्य रस का
(B) करुण रस का
(C) शान्त रस का
(D) अद्भुत रस का

Ans. (C) शान्त रस का

12. ‘पीपर पात सरिस मन डोला’ में अलंकार है-

(A) श्लेष अलंकार
(B) उपमा अलंकार
(C) उत्प्रेक्षा अलंकार
(D) रूपक अलंकार

Ans. (B) उपमा अलंकार

13. ‘रोला’ छन्द में कुल चरण होते हैं-

(A) दो
(B) चार
(C) तीन
(D) पाँच

Ans. (B) चार

14. ‘आगमन’ में किस उपसर्ग का प्रयोग हुआ है ?

(A) ‘वि’
(B) ‘अक’
(C) ‘मान’
(D) ‘आ’

Ans. (D) ‘आ’

15. ‘भलाई’ में प्रत्यय है-

(A) भला
(B) ई
(C) आई
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) आई

16. ‘नीलाम्बर’ में कौन-सा समास है ?

(A) द्वन्द्व
(B) द्विगु
(C) कर्मधारय
(D) बहुव्रीहि

Ans. (C) कर्मधारय

17. ‘आम’ का तत्सम है-

(A) आम्ब
(B) आम्र
(C) अम्बु
(D) अम्म

Ans. (B) आम्र

18. ‘कर्तृवाच्य’ में प्रधानता होती है-

(A) कर्ता की
(B) कर्म की
(C) भाव की
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A) कर्ता की

19. ‘ताभ्यः’ शब्द में वचन और विभक्ति है-

(A) षष्ठी विभक्ति, एकवचन
(B) सप्तमी विभक्ति, द्विवचन
(C) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
(D) चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन

Ans. (D) चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन

20. निम्नलिखित में सर्वनाम है-

(A) काला
(B) घोड़ा
(C) बह
(D) लड़का

Ans. (C) बह

खण्ड ‘ब’

वर्णनात्मक प्रश्न

1. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

बुद्ध के इस जन्म की घटनाएँ तो इन चित्रित कथाओं में हैं ही, उनके पिछले जन्मों की कथाओं का भी इसमें चित्रण हुआ है। पिछले जन्म की ये कथाएँ ‘जातक’ कहलाती हैं। उनकी संख्या 555 है और इनका संग्रह ‘जातक’ नाम से प्रसिद्ध है, जिनका बौद्धों में बड़ा मान है। इन्हीं जातक कथाओं में अनेक अजंता के चित्रों में विस्तार के साथ लिख दी गयी हैं। इन पिछले जन्मों में बुद्ध ने गज, कपि, मृग आदि के रूप में विविध योनियों में जन्म लिया था और संसार के कल्याण के लिए दया और त्याग का आदर्श स्थापित करते, वे बलिदान हो गये थे।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
सन्दर्भ : उपर्युक्त गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित उस गद्य-पाठ से लिया गया है, जिसमें भगवान बुद्ध के जीवन तथा उनके पूर्व जन्मों से सम्बन्धित जातक कथाओं का वर्णन किया गया है। इसमें लेखक ने यह बताया है कि बुद्ध के वर्तमान जन्म के साथ-साथ उनके पूर्व जन्मों की कथाएँ भी चित्रित की गई हैं, जिन्हें ‘जातक कथाएँ’ कहा जाता है तथा जिनका बौद्ध धर्म में अत्यधिक महत्व है।

(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों का वर्णन किया है। लेखक के अनुसार बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों में हाथी (गज), बंदर (कपि), हिरण (मृग) आदि के रूप में विभिन्न योनियों में जन्म लिया। इन सभी जन्मों में उन्होंने अपने स्वार्थ का त्याग करके दूसरों के हित के लिए कार्य किया। वे सदैव दया, करुणा और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करते रहे। संसार के कल्याण के लिए उन्होंने अनेक बार अपना जीवन तक बलिदान कर दिया। इस प्रकार जातक कथाएँ बुद्ध के महान त्याग, करुणा और परोपकार की भावना को प्रकट करती हैं।

(iii) ‘जातक’ कथाएँ किन्हें कहते हैं ?
Ans.
भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों से सम्बन्धित कथाओं को ‘जातक कथाएँ’ कहा जाता है। इन कथाओं में बुद्ध के विभिन्न योनियों में जन्म लेकर दया, करुणा, त्याग और परोपकार का आदर्श प्रस्तुत करने का वर्णन मिलता है।

अथवा

रोहतास-दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गंभीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उभड़ रहा था। मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी का बरसात लिए, वह सुख के कंटक-शयन में विकल थी। वह रोहतास दुर्गपति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असंभव था, परंतु, वह विधवा थी । हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है तब उसकी विडंबना का अन्त कहाँ था ?

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
सन्दर्भ : उपर्युक्त गद्यांश आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास ‘सोमनाथ’ से लिया गया है। इसमें लेखिका ने रोहतास दुर्ग में रहने वाली युवती ममता की दयनीय मानसिक स्थिति का चित्रण किया है। वह सम्पन्न परिवार की पुत्री होते हुए भी विधवा होने के कारण आन्तरिक पीड़ा, वेदना और सामाजिक उपेक्षा से ग्रस्त है। इस गद्यांश के माध्यम से तत्कालीन समाज में हिन्दू विधवा की करुण दशा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

(ii) रेखांकित अंशं की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
व्याख्या : प्रस्तुत पंक्ति में लेखक ने तत्कालीन समाज में हिन्दू विधवा की अत्यन्त दयनीय स्थिति को उजागर किया है। लेखक का भाव यह है कि हिन्दू समाज में विधवा को सबसे तुच्छ और सहारे से वंचित प्राणी माना जाता था। उसके पास धन, परिवार और सम्मान होते हुए भी समाज उसे सुखपूर्वक जीवन जीने का अधिकार नहीं देता था। वह हर प्रकार के सुख से वंचित, निरन्तर अपमान और पीड़ा सहने को विवश रहती थी। इसलिए ऐसी स्थिति में उसकी जीवन-वेदना और दुर्भाग्य का कोई अन्त नहीं था।

(iii) गद्यांश के आधार पर संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी कौन है ?
Ans.
गद्यांश के आधार पर हिन्दू विधवा को संसार में सबसे तुच्छ और निराश्रय प्राणी बताया गया है।

2. दिये गये पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों का उत्तर दीजिए:

सुनि सुन्दर बैन सुधारस साने
सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन, दै सैन, तिन्हें,
समुझाइ कछू मुसकाइ चलीं ।
तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै
अवलोकति लोचन लाहु अली ।
अनुराग-तड़ाग में भानु उर्दै
विगर्सी मनु मंजुल कंज कली ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
सन्दर्भ : उपर्युक्त पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ से उद्धृत है। इस पद्यांश में कवि ने सीता (जानकी) की चतुराई, सौम्यता और मनोहर भाव-भंगिमा का वर्णन किया है। इसमें सीता जी के मधुर वचनों, तिरछी दृष्टि और मुस्कान के माध्यम से उनके सौन्दर्य तथा प्रेमभाव की सरस अभिव्यक्ति की गई है, जिसे देखकर उपस्थित सभी जन मुग्ध हो जाते हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने जानकी (सीता) के स्वभाव, सौन्दर्य और चतुराई का मनोहारी चित्रण किया है। सीता जी के वचन अत्यन्त मधुर, रसपूर्ण और शुद्ध हैं। उन्हें सुनकर यह स्पष्ट हो जाता है कि जानकी बहुत समझदार और विवेकशील हैं। वे तिरछी दृष्टि डालकर, संकेत से अपनी बात समझा देती हैं और हल्की मुस्कान के साथ वहाँ से चली जाती हैं। कवि ने इन पंक्तियों में सीता जी की लज्जा, सौम्यता, बुद्धिमत्ता और आकर्षक भाव-भंगिमा को सुंदर ढंग से व्यक्त किया है।

(iii) ‘अनुराग-तड़ाग’ तथा ‘मनु मंजुल कंज कली’ में कौन-सा अंलकार है ?
Ans.
इन दोनों पदों में रूपक अलंकार है।

अथवा

सच्चा प्रेम वही है जिसकी
तृप्ति आत्मबलि पर हो निर्भर ।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है,
करो प्रेम पर प्राण निछावर ।।
देश प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है,
अमल असीम त्याग से विलसित ।
आत्मा के विकास से जिसमें
मनुष्यता होती है विकसित ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए ।
Ans.
शीर्षक एवं कवि का नाम :

  • शीर्षक – देश-प्रेम
  • कविसोहनलाल द्विवेदी

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में कवि त्याग के महत्व को स्पष्ट करते हुए देश-प्रेम की महानता का वर्णन करता है। कवि के अनुसार त्याग के बिना प्रेम निर्जीव और अर्थहीन होता है। सच्चा प्रेम वही है जिसमें अपने प्राणों तक का बलिदान करने की भावना हो। कवि आगे कहता है कि देश-प्रेम एक पवित्र क्षेत्र है, जो निर्मल और असीम त्याग से शोभायमान होता है। अर्थात् राष्ट्र के प्रति प्रेम तभी सार्थक है जब उसमें निःस्वार्थ त्याग और समर्पण की भावना निहित हो।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में किसके प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात कही गयी है ?
Ans.
प्रस्तुत पद्यांश में देश (राष्ट्र) के प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात कही गयी है।

3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:

वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते । अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानश्च वर्द्धयति । अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः। न केवलं भारतीयाः अपितु वैदेशिकाः गीर्णाणवाण्या अध्ययनाय अत्र आगच्छन्ति, निःशुल्कं च विद्यां गृह्णन्ति । अत्र हिन्दूविश्वविद्यालयः, संस्कृत विश्वविद्यालयः, काशी विद्यापीठं इत्येते त्रयः विश्वविद्यालयाः सन्ति, येषु नवीनानां प्राचीनानाञ्च ज्ञानविज्ञानविषयाणाम् अध्ययनं प्रचलितः ।
Ans.
वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर में विद्या का दिव्य प्रकाश प्रकाशित होता आ रहा है। आज भी यहाँ संस्कृत भाषा की धारा निरन्तर प्रवाहित हो रही है और लोगों के ज्ञान में वृद्धि कर रही है। यहाँ अनेक महान आचार्य और श्रेष्ठ विद्वान वैदिक साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में संलग्न हैं। न केवल भारतीय, बल्कि विदेशी लोग भी गूढ़ और गम्भीर वाणी (संस्कृत) के अध्ययन के लिए यहाँ आते हैं और निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं। यहाँ हिन्दू विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ—ये तीन विश्वविद्यालय हैं, जिनमें प्राचीन और नवीन ज्ञान-विज्ञान के विषयों का अध्ययन प्रचलित है।

अथवा

‘विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव’ इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते । अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति। तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यते । अतः सर्वेषां मतानां समवायः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृते सन्देशः ।

Ans. “संसार का सृष्टिकर्ता ईश्वर एक ही हैं” – यह भारतीय संस्कृति की मूल भावना है। विभिन्न मतावलंबी लोग अपने-अपने नामों से उसी एक ईश्वर की पूजा करते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा मसीह, अल्लाह आदि सभी नाम केवल एक ही परमात्मा के हैं। लोग उन्हें अपने गुरुओं के रूप में मानते हैं। अतः हमारे संस्कृतियों का संदेश है कि सभी मतों का सम्मान और समन्वय होना चाहिए।

4. दिए गए संस्कृत पद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:

बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः ।
उभयत्र समो वीरः वीर भावो हि वीरता ।।
Ans.
सन्दर्भ: यह श्लोक महाभारत या सामान्य वीरता-संबंधी संस्कृत साहित्य से लिया गया है। इसमें वीर के चरित्र और उसकी मानसिकता पर बल दिया गया है। लेखक बताना चाहता है कि वीरता केवल सफलता या पराजय में नहीं, बल्कि वीर के मनोबल और साहस में निहित है।

हिन्दी अनुवाद: बंधन हो या मृत्यु, विजय हो या पराजय – इन सभी परिस्थितियों में वीर समान रहता है। वीर की मानसिकता ही असली वीरता है। अर्थात्, वीरता का वास्तविक मूल्य परिणाम में नहीं, बल्कि वीर के साहस और दृढ़ मन में निहित है।

अथवा

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ।।
Ans.
सन्दर्भ: यह श्लोक संस्कृत नैतिक ग्रंथों से लिया गया है, जिसमें मित्रता की परिभाषा और मित्र की विशिष्टताएँ बताई गई हैं। इसमें बताया गया है कि वास्तविक मित्र वही है जो अलग-अलग परिस्थितियों में आपका साथ दे।

हिन्दी अनुवाद:

  1. यात्रा में जो व्यक्ति आपका साथ देता है, वह मित्र है।
  2. घर में जो पत्नी आपके साथ सहयोग करती है, वह मित्र है।
  3. रोगी का उपचार करने वाला चिकित्सक मित्र है।
  4. जो व्यक्ति दान देता है, वह मित्र है।
  5. मृत्यु के समय जो आपके साथ खड़ा हो, वही सच्चा मित्र है।

अर्थ: सच्चा मित्र वही है जो जीवन की सभी परिस्थितियों—यात्रा, घर, रोग, दान, मृत्यु—में आपका साथ निभाए। केवल शब्दों या दिखावे के लिए मित्रता नहीं होती, बल्कि कर्म और सहारे में मित्रता की पहचान होती है।

5. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए :

(क) (i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य का नायक एक उच्च आदर्शों वाला, साहसी और धर्मपरायण व्यक्ति है। उसका व्यक्तित्व साहस, त्याग, परोपकार और नैतिकता का प्रतीक है। नायक न केवल अपने व्यक्तिगत हित और सुख के लिए कार्य नहीं करता, बल्कि वह समाज और जनता के कल्याण के लिए हमेशा तत्पर रहता है। कठिन परिस्थितियों में भी वह डर और असमर्थता को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। उसकी बुद्धि, विवेक और साहस उसे संकटों और दुर्गम परिस्थितियों से बाहर निकालते हैं। नायक का चरित्र हमें यह संदेश देता है कि सच्ची वीरता और महानता केवल शारीरिक बल में नहीं, बल्कि धैर्य, दृढ़ संकल्प, नैतिकता और उच्च आदर्शों में निहित होती है।

नायक का जीवन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वह अन्याय, दमन और बुराइयों के खिलाफ लड़ता है और लोगों को स्वतंत्रता, न्याय और नैतिकता की ओर प्रेरित करता है। उसकी यही विशेषताएँ उसे खण्डकाव्य का मूल केंद्र और आदर्श नायक बनाती हैं।

(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans.
चतुर्थ सर्ग में नायक की यात्रा और संघर्ष की घटनाएँ प्रमुख रूप से प्रस्तुत की गई हैं। इस सर्ग में नायक अपने साहस, बुद्धि और त्याग के माध्यम से समाज में व्याप्त अन्याय और कष्टों से मुक्ति दिलाने का प्रयास करता है। सर्ग में दर्शाया गया है कि कैसे नायक कठिन परिस्थितियों और दुर्गम मार्गों का सामना करता है, और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संकल्पबद्ध और धैर्यवान रहता है।

इस सर्ग में नायक के चरित्र की असली वीरता प्रकट होती है। वह न केवल व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त नहीं है, बल्कि अपने प्रयासों के माध्यम से अन्य लोगों के कल्याण और समाज में सुधार लाने के लिए निरंतर संघर्ष करता है। यहाँ यह भी दिखाया गया है कि नायक त्याग, परिश्रम और साहस के बल पर हर संकट का सामना कर सकता है।

चतुर्थ सर्ग का मूल संदेश यह है कि सच्चा नायक वही है जो अपने कर्म, धैर्य और परोपकार से समाज में सुधार और मुक्ति लाने का प्रयास करता है, न कि केवल अपने लाभ और सम्मान के लिए कार्य करता है। यह सर्ग पाठकों में साहस, त्याग और नैतिकता की भावना जागृत करता है।

(ख) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए ।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवन और उनके आदर्शों का सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया गया है। यह खण्डकाव्य उनके बाल्यकाल, शिक्षा, राष्ट्रभक्ति और देश सेवा के प्रति समर्पण की कहानी बताता है।

काव्य की कथावस्तु में बताया गया है कि कैसे नेहरू का मन विद्या, न्याय और मानवता के लिए प्रेरित हुआ। बाल्यकाल से ही उनमें देशभक्ति और समाज सेवा की भावना विकसित हुई। उन्होंने अपने जीवन को शिक्षा और ज्ञान के माध्यम से समाज में सुधार लाने के लिए समर्पित किया। काव्य में उनके व्यक्तित्व की नेतृत्व क्षमता, संघर्ष करने का साहस और नैतिकता के गुणों का विशेष रूप से चित्रण किया गया है।

काव्य में नेहरू की सकारात्मक दृष्टि, विचारशीलता और युवाओं को जागरूक करने का उत्साह भी प्रकट किया गया है। इसके माध्यम से लेखक ने यह संदेश दिया है कि व्यक्ति का जीवन ज्ञान, त्याग और राष्ट्रभक्ति के आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।

(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘जवाहरलाल नेहरू’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
खण्डकाव्य के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व उत्कृष्ट और प्रेरणादायक था। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. देशभक्ति और सेवा भाव: नेहरू ने अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य देश और समाज की सेवा को माना। उन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण और जनता के कल्याण के लिए अथक प्रयास किए।
  2. ज्ञान और शिक्षा के प्रति उत्सुकता: उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का मूल आधार बनाया और समाज में शिक्षा के महत्व को बढ़ावा दिया।
  3. साहस और दृढ़ संकल्प: कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों के समय उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनका साहस और दृढ़ निश्चय उन्हें संघर्षों में विजयी बनाता रहा।
  4. मानवता और नैतिकता: नेहरू का चरित्र निष्पक्षता, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। वे हमेशा समाज और व्यक्तियों के कल्याण के लिए सोचते थे।
  5. नेतृत्व क्षमता: उनका नेतृत्व लोगों को प्रेरित करने वाला और मार्गदर्शक था। वे युवाओं के लिए आदर्श और प्रेरणा स्रोत बने।

सारांश: जवाहरलाल नेहरू का चरित्र ज्ञान, साहस, त्याग, देशभक्ति और मानवता के आदर्शों से परिपूर्ण था। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह संदेश दिया कि एक सच्चा नेता वही है जो अपने कर्म और विचारों से समाज और देश में सुधार लाए।

(ग) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘दौलत’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में दौलत का चरित्र एक साहसी, विवेकशील और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। वह न केवल अपने अधिकारों और प्रतिष्ठा की रक्षा करता है, बल्कि अपने राज्य और प्रजा के कल्याण के लिए भी समर्पित रहता है।

दौलत में धैर्य, साहस और नेतृत्व की क्षमता स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। संकट के समय वह अपने साहस और बुद्धिमत्ता से विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है। उसका व्यक्तित्व सतत आदर्श, नैतिकता और परोपकार की भावना से भरा हुआ है।

इसके अलावा, दौलत का चरित्र हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा शासक वही है जो न्याय, दया और प्रजा की भलाई को सर्वोपरि मानता है, न कि केवल व्यक्तिगत स्वार्थ और भौतिक शक्ति के लिए कार्य करता है।

इस प्रकार, दौलत खण्डकाव्य का मुख्य नायक और प्रेरक चरित्र है, जो वीरता, न्यायप्रियता और उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है।

(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के किसी सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans.
खण्डकाव्य के किसी सर्ग में, दौलत की साहसिक गतिविधियों और संघर्ष को चित्रित किया गया है। इस सर्ग में दर्शाया गया है कि कैसे दौलत अपने राज्य की सुरक्षा और प्रजा के कल्याण के लिए कठिन परिस्थितियों और युद्ध जैसी चुनौतियों का सामना करता है।

सर्ग की घटनाओं में उसके धैर्य, बुद्धिमत्ता और साहस का विशेष महत्व है। कठिन परिस्थितियों में भी वह अपने नैतिक आदर्शों और न्यायप्रिय दृष्टिकोण से काम करता है। इस सर्ग में यह संदेश भी मिलता है कि सच्ची वीरता केवल शारीरिक शक्ति में नहीं, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता, साहस और धर्मनिष्ठा में होती है।

सारांश में कहा जा सकता है कि यह सर्ग दौलत के नायकत्व, साहस और नैतिक चरित्र का परिचायक है और पाठकों को सत्य, न्याय और परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

(घ) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य महाभारत के युधिष्ठिर के धर्म और न्यायप्रिय नेतृत्व पर आधारित है। इस खण्डकाव्य में युधिष्ठिर द्वारा आयोजित प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान और अपने राज्य में न्याय एवं धर्म की स्थापना का वर्णन है। काव्य में दिखाया गया है कि कैसे युधिष्ठिर ने अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए सत्य, न्याय और परोपकार को सर्वोपरि रखा।

साथ ही, काव्य में युधिष्ठिर के धैर्य, विवेक और नैतिक निर्णय के उदाहरण दिए गए हैं, जो उनके व्यक्तित्व की महत्ता और आदर्श नेतृत्व की झलक प्रस्तुत करते हैं। कथावस्तु में यह संदेश मिलता है कि सच्चा राजा वही है जो धर्म, न्याय और परोपकार का पालन करते हुए अपने प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करे।

(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘युधिष्ठिर’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. खण्डकाव्य के अनुसार, युधिष्ठिर का व्यक्तित्व धर्मपरायण, न्यायप्रिय और संयमी था। उनके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  1. धर्म और न्याय का पालन: युधिष्ठिर ने हमेशा अपने निर्णयों और कार्यों में धर्म और न्याय का पालन किया। वे अपने राज्य और प्रजा के लिए निष्पक्ष और सत्यनिष्ठ थे।
  2. सहनशीलता और संयम: कठिन परिस्थितियों में भी युधिष्ठिर धैर्य और संयम बनाए रखते थे। वे न केवल अपने स्वार्थ के लिए, बल्कि समाज और प्रजा की भलाई के लिए कार्य करते थे।
  3. परोपकार और निस्वार्थता: युधिष्ठिर अपने निर्णयों और कर्तव्यों में हमेशा निस्वार्थ भाव और परोपकार को प्राथमिकता देते थे।
  4. नेतृत्व क्षमता: उनका नेतृत्व सदैव सत्य, न्याय और धर्म के आदर्शों पर आधारित था। उनकी बुद्धि और विवेकपूर्ण निर्णयों ने उन्हें महाभारत के सबसे आदर्श और प्रेरणादायक पात्रों में से एक बनाया।

सारांश: युधिष्ठिर का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा राजा और नायक वही है जो अपने कर्तव्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलते हुए समाज और प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित हो।

(ङ) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘सुभाष चन्द्र बोस’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाष चन्द्र बोस का व्यक्तित्व एक साहसी, दृढ़ निश्चयी और देशभक्त नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. देशभक्ति और त्याग: सुभाष चन्द्र बोस का जीवन देशभक्ति और समर्पण का प्रतीक था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख और लाभ की परवाह किए बिना स्वतंत्रता संग्राम और देश की सेवा में अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प लिया।
  2. साहस और नेतृत्व: वे कठिन परिस्थितियों और संघर्षपूर्ण समय में भी साहस नहीं खोते थे। उनका नेतृत्व हमेशा युवाओं को प्रेरित करने और राष्ट्र की दिशा बदलने वाला रहा।
  3. दृढ़ निश्चय और संघर्षशीलता: सुभाष चन्द्र बोस ने अपने विचारों और उद्देश्यों के लिए कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने अत्याचार और अन्याय के खिलाफ संघर्ष में अपनी पूरी शक्ति लगाई।
  4. उत्कृष्ट वक्तृत्व और प्रेरणा शक्ति: उनका व्यक्तित्व लोगों को सत्य, स्वतंत्रता और समाज सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता था।

सारांश: सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेता वही है जो निस्वार्थ भाव से अपने देश और समाज के कल्याण के लिए समर्पित हो, साहस और नेतृत्व से प्रेरणा दे, और कठिनाइयों के सामने कभी हार न माने।

(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans. खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में सुभाष चन्द्र बोस का प्रारंभिक जीवन और उनका देशभक्ति से जुड़ाव प्रस्तुत किया गया है। इस सर्ग में दर्शाया गया है कि कैसे उन्होंने बाल्यकाल से ही स्वतंत्रता और समाज सेवा के लिए रुचि विकसित की, और कैसे उनका मन अत्याचार और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित हुआ।

सर्ग में उनके साहस, बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की प्रारंभिक झलकियाँ दिखाई गई हैं। इसके माध्यम से पाठकों को यह संदेश मिलता है कि सच्चा नायक अपने विचारों और कर्मों के माध्यम से समाज और देश में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

सर्ग का मुख्य उद्देश्य पाठकों को देशभक्ति, साहस और निस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देना है, और सुभाष चन्द्र बोस के व्यक्तित्व को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना है।

(च) (i) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans.
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और उसके नायकों की वीरता का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि कैसे देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना ने युवाओं को अपने जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य मातृभूमि की सेवा बनाने के लिए प्रेरित किया।

सर्ग में विशेष रूप से क्रांतिकारियों के साहसिक कार्य, त्याग और संघर्ष को चित्रित किया गया है। कठिन परिस्थितियों में भी वे निर्भीक और दृढ़ निश्चयी बने रहे। इस सर्ग का संदेश यह है कि मातृभूमि के प्रति प्रेम और त्याग ही असली वीरता है, और स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए कठिन संघर्षों का सामना करना आवश्यक है।

(ii) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चन्द्रशेखर आजाद’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र साहस, निडरता और मातृभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  1. देशभक्ति और त्याग: चन्द्रशेखर आजाद का पूरा जीवन स्वतंत्रता संग्राम और भारत माता की सेवा में व्यतीत हुआ। उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और सुरक्षा की परवाह किए बिना देश के लिए समर्पण किया।
  2. साहस और निर्भीकता: वे कठिन परिस्थितियों, दुश्मनों और जेल जैसी चुनौतियों के सामने भी निर्भीक और अडिग रहे। उनका साहस उनके साथियों और आम जनता के लिए प्रेरणा स्रोत बना।
  3. संघर्षशील और प्रेरणादायक नेतृत्व: चन्द्रशेखर आजाद ने युवाओं को सत्य, साहस और देशभक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका नेतृत्व संगठित, दृढ़ और प्रेरक था।
  4. निष्काम भाव और नैतिकता: उन्होंने अपने कार्यों में कभी स्वार्थ नहीं रखा और हमेशा सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हुए देश सेवा को सर्वोपरि माना।

सारांश: चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा वीर वही है जो निस्वार्थ भाव से अपने देश और समाज के लिए समर्पित हो, कठिनाइयों का सामना साहस और धैर्य से करे, और अपने आदर्शों पर अडिग रहे।

(छ) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कृष्ण’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कृष्ण का चरित्र सत्कार्य, बुद्धिमत्ता और धर्मपरायणता का प्रतीक है। उनका व्यक्तित्व अत्यंत दृढ़, दूरदर्शी और नैतिक दृष्टि से प्रेरित है।

  1. धर्म और न्याय की भावना: कृष्ण ने हमेशा सत्य और धर्म का मार्ग अपनाया। उन्होंने अपने निर्णयों और कर्मों के माध्यम से न्याय और धर्म की स्थापना की।
  2. निर्णय लेने में बुद्धिमान: कृष्ण संकटपूर्ण परिस्थितियों में भी सयंम और विवेक से निर्णय लेते थे। उनका मार्गदर्शन युद्ध और जीवन के संघर्षों में सही दिशा दिखाता है।
  3. सहायता और प्रेरणा देने वाला: कृष्ण ने कौरवों और पांडवों के बीच की लड़ाई में सही और न्यायसंगत निर्णय देते हुए सत्य और धर्म के पक्ष में मार्गदर्शन किया। वे मित्र, सलाहकार और मार्गदर्शक के रूप में सभी के लिए प्रेरणा स्रोत थे।
  4. समाज और व्यक्तियों के कल्याण के प्रति समर्पित: उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, धर्म और मानवता के सिद्धांतों को स्थापित करना था।

सारांश: कृष्ण का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेता और मार्गदर्शक वही है जो धर्म, न्याय और समाज के कल्याण के लिए बुद्धि, विवेक और नैतिकता से काम करता है।

(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘द्रौपदी’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
खण्डकाव्य में द्रौपदी का चरित्र साहस, गरिमा और धार्मिकता का प्रतीक है। उनका व्यक्तित्व सशक्त, निडर और न्यायप्रिय है।

  1. साहस और धैर्य: द्रौपदी ने कठिन परिस्थितियों और कौरवों द्वारा अपमान के समय भी धैर्य और साहस बनाए रखा। उन्होंने अपने अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए सत्य और न्याय के मार्ग का पालन किया।
  2. धार्मिक और नैतिक दृष्टि: द्रौपदी का जीवन धर्म, सत्य और न्याय के आदर्शों से प्रेरित था। उन्होंने अपने कर्मों और निर्णयों में हमेशा सत्यनिष्ठा और धार्मिकता का पालन किया।
  3. सशक्त और प्रेरणादायक महिला: खण्डकाव्य में द्रौपदी को सशक्त, आत्मनिर्भर और समाज में न्याय के लिए लड़ने वाली महिला के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरित्र से यह संदेश मिलता है कि सच्ची वीरता और गरिमा केवल पुरुषों में नहीं, बल्कि स्त्री में भी विद्यमान है।
  4. सतत न्याय के प्रति संवेदनशील: द्रौपदी ने अपने और अपने परिवार के कल्याण के लिए न्याय और धर्म के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा।

सारांश: द्रौपदी का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहस, नैतिकता और गरिमा कभी परिस्थितियों से कमजोर नहीं होती, और व्यक्ति अपने आदर्शों के लिए दृढ़ रहकर भी समाज और धर्म की सेवा कर सकता है।

(ज) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘भरत’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में भरत का चरित्र साहस, कर्तव्यपरायणता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। उनका व्यक्तित्व प्रेरक और आदर्शवादी है।

  1. कर्तव्यपरायण और धर्मनिष्ठ: भरत ने अपने जीवन में कर्तव्य और धर्म को सर्वोपरि रखा। वह हमेशा अपने राज्य, समाज और प्रजा के हित के लिए कर्मशील रहे।
  2. साहस और संघर्षशीलता: उन्होंने संकट और कठिनाइयों में भी साहस नहीं खोया और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ता से प्रयास किया।
  3. न्यायप्रिय और समाजसेवी: भरत अपने निर्णयों और कार्यों में हमेशा न्याय और समानता का पालन करते थे। उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि राज्य और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना था।
  4. नेतृत्व क्षमता: भरत का नेतृत्व दृढ़, निष्ठावान और प्रेरक था। उन्होंने अपने अनुयायियों और प्रजा के लिए आदर्श स्थापित किया।

सारांश: भरत का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेता और वीर वही है जो धर्म, कर्तव्य और समाज सेवा के मार्ग पर अडिग रहे, और कठिन परिस्थितियों में भी साहस और न्याय का पालन करे।

(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के ‘आगमन’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘आगमन’ सर्ग में खण्डकाव्य में भरत के राज्याभिषेक और उनके जीवन की प्रारंभिक घटनाएँ प्रस्तुत की गई हैं। इस सर्ग में दर्शाया गया है कि कैसे भरत अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहकर अपने राज्य की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार होते हैं।

सर्ग की घटनाओं में यह दिखाया गया है कि भरत का आगमन अपने राज्य में न केवल राजसी प्रतिष्ठा, बल्कि समाज और प्रजा के कल्याण के लिए प्रेरक बनता है। उन्होंने न्याय, धर्म और कर्तव्य के आदर्शों को अपनाकर अपने शासन की नींव रखी।

इस सर्ग का संदेश यह है कि सच्चा नेता वही है जो अपने कर्तव्यों और समाज के हित के लिए साहस और निष्ठा से कार्य करे।

(झ) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘लक्ष्मण’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण का चरित्र साहस, निष्ठा और भक्ति का प्रतीक है। उनका व्यक्तित्व संघर्षशील और प्रेरणादायक है।

  1. भाई के प्रति समर्पण: लक्ष्मण ने अपने भाई राम के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्ठा दिखाई। उन्होंने अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को सर्वोपरि रखा।
  2. साहस और निर्भीकता: कठिन परिस्थितियों और शत्रुओं के सामने भी लक्ष्मण निर्भीक और साहसी रहे। उनका साहस युद्ध और संकट के समय अत्यंत प्रभावशाली था।
  3. धैर्य और विवेक: लक्ष्मण संकट और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और बुद्धिमत्ता से काम लेते थे। उनकी सोच हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर आधारित थी।
  4. भक्ति और नैतिकता: लक्ष्मण का चरित्र धर्मपरायण और भक्ति से भरा है। वे केवल युद्ध-कौशल में नहीं, बल्कि मानवीय गुणों और नैतिक मूल्यों में भी उत्कृष्ट हैं।

सारांश: लक्ष्मण का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा वीर केवल शारीरिक बल में नहीं, बल्कि कर्तव्य, भक्ति, निष्ठा और साहस में भी होता है।

(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी सर्ग में राम और लक्ष्मण के युद्ध और संघर्ष का वर्णन है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि कैसे लक्ष्मण अपने साहस और विवेक के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है, और कैसे उनकी निष्ठा और साहस युद्ध के निर्णायक क्षणों में राम और समाज के कल्याण के लिए योगदान देती है।

सर्ग की घटनाओं में लक्ष्मण की साहसिक कार्यवाही, संघर्ष और धर्मनिष्ठा प्रमुख रूप से प्रस्तुत की गई है। यह सर्ग पाठकों को धैर्य, साहस और कर्तव्यपरायणता की सीख देता है।

सारांश संदेश:
इस सर्ग से यह संदेश मिलता है कि सच्चा वीर वही है जो निष्ठा, साहस और धर्म का पालन करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करता है और समाज के हित के लिए संघर्ष करता है।

6. (क) दिए गए लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय लिखते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) जयशंकर प्रसाद
Ans.
जीवन परिचय:
जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को छतरपुर, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, नाटककार और लेखक थे और छायावादी साहित्य के अग्रणी कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को काव्यात्मक सौंदर्य, भावात्मक गहराई और राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया।

प्रसाद ने अपनी शिक्षा बी.ए. और एल.एल.बी. तक पूरी की। उन्हें कविता, नाटक और कहानी सभी क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए जाना गया। उनका लेखन भावुक, दार्शनिक और देशभक्ति से प्रेरित होता था।

वे अपने समय के साहित्यिक आंदोलन छायावाद और भारतीय राष्ट्रीय चेतना के साथ जुड़े रहे। उनकी कविताओं में प्रकृति, मानव मनोभाव और भारतीय संस्कृति का सुंदर चित्रण मिलता है।

प्रमुख रचना:

  • काव्य: कामायनी – यह उनकी सबसे प्रसिद्ध काव्य रचना है, जिसमें मानव जीवन के संघर्ष और भावनाओं का दार्शनिक चित्रण किया गया है।
  • नाटक: अंधायुग – यह महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक है, जो युद्ध और मानवीय संघर्ष का विश्लेषण करता है।

सारांश: जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के महान छायावादी कवि और नाटककार थे। उनके काव्य और नाटकों में भारतीय संस्कृति, मानवीय भाव और दार्शनिक चिंतन की गहराई मिलती है।

(ii) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
Ans.
जीवन परिचय:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 4 मई 1884 को बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के आलोचक, इतिहासकार और शिक्षाविद् थे और आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी आलोचना और साहित्य इतिहास के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया।

शुक्ल जी ने अपनी शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की और वहां से साहित्यिक अध्ययन और आलोचना में महारत हासिल की। वे काव्य, उपन्यास, नाटक और आलोचना सभी में निपुण थे, लेकिन विशेषकर साहित्यिक आलोचना और इतिहास लेखन में उनकी प्रतिष्ठा सर्वोच्च थी।

साहित्यिक दृष्टिकोण:

  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक और तार्किक अध्ययन किया।
  • उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य के विकासक्रम को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।
  • उनके विचारों में साहित्य के उद्देश्य और समाज से उसका संबंध प्रमुखता से दिखाई देता है।

प्रमुख रचना:

  • ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ – यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है, जिसमें प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक हिंदी साहित्य का विस्तारपूर्वक विवरण किया गया है।
  • ‘साहित्य का स्वरूप और उद्देश्य’ – इसमें साहित्य के सिद्धांत और उद्देश्य पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

सारांश: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य के संरक्षक और आलोचक थे। उनके लेखन और विचारों ने हिंदी साहित्य के अध्ययन, आलोचना और इतिहास लेखन को नई दिशा दी और उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का मार्गदर्शक बनाया।

(iii) डॉ० भगवतशरण उपाध्याय ।
Ans.
जीवन परिचय:
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का जन्म 1898 में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक और साहित्यकार थे। उन्हें विशेष रूप से उपन्यास और कहानी लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने लेखन में सामाजिक जीवन, मानवीय संघर्ष और नैतिक मूल्यों को सुंदर रूप से चित्रित किया।

वे भारतीय संस्कृति और समाज के प्रति सजग और संवेदनशील थे। उनके लेखन में देशभक्ति, मानवीय संवेदनाएँ और सामाजिक सुधार प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं।

प्रमुख रचना:

  • ‘वैष्णव जन तो’ – उनके लेखन में भक्ति और नैतिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
  • उपन्यास: माटी की बुनाई – यह उनकी प्रमुख कृति है, जिसमें ग्रामीण जीवन और समाज की वास्तविकता का सजीव चित्रण किया गया है।

सारांश: डॉ. भगवतशरण उपाध्याय हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण कथाकार और समाजसुधारक थे। उनके उपन्यास और लेखन मानव जीवन के संघर्ष, सामाजिक जीवन और नैतिक मूल्यों को समझने में सहायक हैं।

(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) महाकवि सूरदास
Ans.
जीवन परिचय:
महाकवि सूरदास का जन्म लगभग कवि सूरदास 1478 ई० में वाराणसी या प्रतापगढ़ में हुआ था। वे हिंदी साहित्य और भक्ति आंदोलन के अग्रणी कवि थे। सूरदास कान्हा (भगवान कृष्ण) की भक्ति में लीन होकर उन्होंने भक्ति-काव्य की अमूल्य रचनाएँ दीं।

वे दृष्टिहीन (अंधे) थे, फिर भी उनकी दृष्टि अंदरूनी अनुभूति और भावनाओं में बहुत तीव्र थी। उन्होंने भक्ति भाव और प्रेमरस को अपने काव्य में अत्यंत सुंदरता से व्यक्त किया। उनकी रचनाएँ समाज और संस्कृति में सच्ची भक्ति और नैतिक मूल्य का संदेश देती हैं।

साहित्यिक योगदान:

  • सूरदास ने सूरसागर, सूरसप्तक और सूरसिंधु जैसी काव्य रचनाएँ की हैं।
  • उनकी रचनाओं में कृष्ण की बाल लीलाओं, रासलीला और भक्ति भाव का सजीव चित्रण मिलता है।
  • उनकी भाषा सरल, भावपूर्ण और लयबद्ध है, जिससे आम जन तक भक्ति का संदेश पहुँचा।

प्रमुख रचना:

  • सूरसागर – यह उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है, जिसमें भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और भक्ति रस का व्यापक चित्रण है।

सारांश: महाकवि सूरदास भक्ति कवि और समाज सुधारक थे। उनके काव्य में भक्ति, प्रेम और धार्मिकता का अद्भुत समन्वय है। उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य और भक्ति परंपरा में अमूल्य योगदान मानी जाती हैं।

(ii) सुमित्रानन्दन पन्त
Ans.
जीवन परिचय:
सुमित्रानन्दन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड (तब गढ़वाल) में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख आधुनिक कवि और प्रकृति काव्य के प्रतिष्ठित कवि माने जाते हैं। उन्हें ‘पहाड़ी कवि’ भी कहा जाता है क्योंकि उनकी रचनाओं में पहाड़ों की सुंदरता, प्राकृतिक दृश्य और ग्रामीण जीवन की छवियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

पंत जी की रचनाएँ छायावाद और आधुनिकता का मिश्रण हैं। उन्होंने हिंदी कविता में प्रकृति, मानव मन और सामाजिक जीवन को अत्यंत सुन्दर एवं भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और भावनाओं से परिपूर्ण होती है।

साहित्यिक योगदान:

  • उन्होंने कविता संग्रह में अपने समय और वातावरण का जीवंत चित्रण किया।
  • उनके काव्य में प्रकृति प्रेम, मानवता और देशभक्ति के भाव प्रमुख हैं।

प्रमुख रचना:

  • ‘मैं पतंगा’ – यह उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना है, जिसमें मानव मनोभाव और प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर चित्रण किया गया है।
  • अन्य संग्रह: गोमती, पंतसर्ग – इनमें भी उनके भावपूर्ण और संवेदनशील कविताएँ मिलती हैं।

सारांश: सुमित्रानन्दन पंत आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवि थे। उनके काव्य में प्रकृति, भाव और मानवता का गहरा समन्वय दिखाई देता है। वे पाठकों को सौंदर्य और संवेदनशीलता की अनुभूति कराते हैं।

(iii) बिहारी लाल ।
Ans.
जीवन परिचय:
बिहारी लाल का जन्म 1595 ईस्वी में विदिशा, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के काव्य और भक्ति आंदोलन के महान कवि माने जाते हैं। उन्हें विशेष रूप से कीर्तिलाल या बिहारी के नाम से भी जाना जाता है। बिहारी लाल को ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि के रूप में याद किया जाता है।

उनकी रचनाएँ सिंहासन बत्तीसी, भक्ति-काव्य और श्रृंगार रस से युक्त हैं। बिहारी जी ने विशेषकर भक्ति और श्रृंगार रस में उत्कृष्ट काव्यात्मक रचनाएँ दी हैं। उनका लेखन संक्षिप्त, भावपूर्ण और लयबद्ध होता है, जो पाठक को तुरंत आकर्षित कर लेता है।

साहित्यिक योगदान:

  • बिहारी लाल ने हिंदी साहित्य में भक्ति काव्य और श्रृंगार रस की परंपरा को मजबूत किया।
  • उनकी कविताओं में भक्ति भाव, श्रृंगार रस और जीवन के नैतिक संदेश का सुंदर समन्वय है।

प्रमुख रचना:

  • ‘सुग्रीवलीला’ और ‘सातसई’ – ये उनकी सबसे प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं।
    • विशेष रूप से ‘सातसई’ में 700 छंदों में जीवन, प्रेम और भक्ति का सुंदर चित्रण किया गया है।

सारांश: बिहारी लाल ब्रजभाषा के महान कवि थे। उनके काव्य में संक्षिप्तता, भावपूर्णता और नैतिक संदेश का अद्भुत मिश्रण है। वे हिंदी साहित्य में भक्ति और श्रृंगार रस के उत्कृष्ट काव्यकार के रूप में अमर हैं।

7. अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो ।
Ans.
श्लोक:

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

भावार्थ:

  • विद्या (शिक्षा) से विनम्रता आती है।
  • विनम्रता से व्यक्ति योग्य और योग्यतावान बनता है।
  • योग्यता से धन-संपत्ति प्राप्त होती है।
  • धन के माध्यम से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।

संदेश: यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सच्ची शिक्षा केवल ज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि विनम्रता और नैतिक मूल्यों की ओर ले जाती है, जो जीवन में सफलता, सुख और धर्म की प्राप्ति में सहायक होती है।

8. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए:

(i) गृहे सत मित्रं किम् ?
Ans.

गृहे सत् मित्रं तं वदन्ति यः गृहिणः सह सर्वकाले सहायः भवति।  
सः दुःखस्मिन्काले सुखस्मिन्काले च मित्रवत् आचारं करोति।

(ii) चन्द्रशेखरः स्वगृहं किम् अवदत् ?
Ans.

चन्द्रशेखरः स्वगृहं अवदत् यत् सः देशस्य सेवायै सर्वस्वं समर्पयिष्यति।  
सः स्वगृहं त्यक्त्वा धर्ममार्गे निःस्वार्थं कर्म करोति।

(iii) प्रहेलिकायाः उत्तरं किम् आसीत् ?
Ans.

प्रहेलिकायाः उत्तरं आसीत् यत् ‘सत्यं विजयं प्राप्नोति।’  
सः यः मनसा चिन्तयति, तस्य बुद्धिः स्पष्टा भवति।

(iv) वाराणसी केषां संगमस्थली अस्ति ?
Ans.

वाराणस्यां गङ्गा, यमुना च सरितः मिलन्ति।  
एषा संगमस्थली वाराणसी नगरे प्रसिद्धा अस्ति।

9. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :

(i) पर्यावरण संरक्षण के उपाय
Ans.
पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। यह वह प्राकृतिक संरचना है जिसमें हम रहते हैं और जो हमें जीवन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती है। इसमें वायु, जल, मिट्टी, जंगल, नदियाँ, पर्वत, जीव-जंतु और वनस्पतियाँ शामिल हैं। मानव जीवन का प्रत्येक पहलू सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर निर्भर है। परंतु आधुनिक युग में मानव की अंधाधुंध गतिविधियों, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अतिक्रमण के कारण पर्यावरण असंतुलित हो गया है। इसके परिणामस्वरूप प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ और जैविक विविधता में कमी जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं। इसलिए आज पर्यावरण संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है।

पर्यावरण संरक्षण के उपाय:

  1. वृक्षारोपण और वन संरक्षण:
    • वृक्ष वातावरण में ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके हवा को शुद्ध रखते हैं।
    • अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर हम जंगलों का संरक्षण कर सकते हैं, जिससे प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ और मिट्टी का कटाव को रोका जा सकता है।
    • स्कूलों, कॉलेजों और समाज में पेड़ लगाओ अभियान के माध्यम से लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
  2. जल संरक्षण:
    • जल हमारे जीवन का मूल आधार है। जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, तालाबों और नदियों की सफाई, और भूजल पुनर्भरण जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
    • सिंचाई प्रणाली में ड्रिप या स्प्रिंकलर तकनीक अपनाकर जल की बचत की जा सकती है।
    • घरेलू स्तर पर नल बहता न छोड़ें और पानी का बर्बादी रोकें।
  3. प्रदूषण नियंत्रण:
    • वायु प्रदूषण को रोकने के लिए औद्योगिक धुएँ को नियंत्रित करना चाहिए और वाहनों के प्रदूषण पर ध्यान देना चाहिए।
    • जल प्रदूषण रोकने के लिए नदियों में औद्योगिक और घरेलू अपशिष्टों का निष्पादन सही तरीके से करना अनिवार्य है।
    • ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए धूम्रपान, पटाखे और तेज़ संगीत से बचना चाहिए।
  4. कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण (Recycling):
    • घर और सार्वजनिक स्थानों पर कचरे को अलग-अलग करके प्लास्टिक, कागज़ और जैविक कचरा अलग रखना चाहिए।
    • प्लास्टिक और अन्य अपशिष्टों का पुनर्चक्रण करके उसका पुनः उपयोग करना चाहिए।
    • कंपोस्टिंग के माध्यम से जैविक कचरे को खाद में बदलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
  5. ऊर्जा संरक्षण:
    • बिजली और अन्य ऊर्जा स्रोतों का संतुलित और बुद्धिमानी से उपयोग करना चाहिए।
    • नवीनीकृत ऊर्जा जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल ऊर्जा का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए।
    • घर और कार्यालयों में एलईडी बल्ब, ऊर्जा बचत करने वाले उपकरण का प्रयोग करना लाभकारी है।
  6. जैविक विविधता का संरक्षण:
    • वन्य जीवों और पौधों की प्रजातियों को बचाना आवश्यक है।
    • शिकार और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई रोकनी चाहिए।
    • बायोडायवर्सिटी पार्क और संरक्षित क्षेत्र बनाए जा सकते हैं।
  7. सामाजिक जागरूकता:
    • पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    • विद्यालयों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा, कार्यशालाएँ और अभियान आयोजित करने चाहिए।
    • युवाओं और बच्चों को पेड़ लगाना, जल बचाना और कचरा प्रबंधन जैसी आदतें सिखाना चाहिए।

निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। हमें अपने स्तर पर पेड़ लगाना, जल बचाना, कचरा सही तरीके से निपटाना, ऊर्जा का बुद्धिमानी से उपयोग करना और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। यदि हम सभी मिलकर सतत प्रयास करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण में जीवन यापन कर पाएँगी।

(ii) साहित्य और समाज
Ans.
साहित्य मानव जीवन का अभिन्न अंग है। यह न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि समाज के सत्यों, मूल्यों और समस्याओं को समझने और प्रस्तुत करने का भी महत्वपूर्ण साधन है। साहित्य समाज का दर्पण है, जो हमें समाज की अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों दिखाता है। इसी कारण इसे समाज का शिक्षक और मार्गदर्शक भी कहा जा सकता है।

साहित्य का समाज पर प्रभाव:

  1. समाज की चेतना जगाना:
    • साहित्य लोगों में जागरूकता लाता है। यह सामाजिक बुराइयों जैसे अंधविश्वास, भ्रूण हत्या, महिलाओं पर अत्याचार आदि के खिलाफ चेतना पैदा करता है।
    • उदाहरण के लिए, प्रेमचंद की कहानियाँ ग्रामीण जीवन और सामाजिक अन्याय की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं।
  2. मानव मूल्यों का संवर्धन:
    • साहित्य मानव में सद्भावना, करुणा, सहानुभूति और नैतिकता का विकास करता है।
    • रामचरितमानस, महाभारत और तुलसीदास की रचनाएँ हमें आदर्श जीवन और नैतिकता की सीख देती हैं।
  3. सामाजिक सुधार में योगदान:
    • साहित्य समाज में बदलाव और सुधार की प्रेरणा देता है।
    • आधुनिक साहित्य, जैसे कि जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत की कविताएँ, लोगों में राष्ट्रीयता, समाज सेवा और सत्य के प्रति समर्पण की भावना जगाती हैं।
  4. संस्कृति और परंपरा का संरक्षण:
    • साहित्य समाज की संस्कृति, परंपरा और इतिहास को संरक्षित करता है।
    • लोककथाएँ, इतिहास आधारित काव्य और कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों को सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराती हैं।
  5. मनोरंजन और मानसिक विकास:
    • साहित्य केवल ज्ञान देने का साधन नहीं है, बल्कि यह मनोरंजन और मानसिक विकास का माध्यम भी है।
    • यह लोगों को सृजनात्मक, चिंतनशील और संवेदनशील बनाता है।

निष्कर्ष: साहित्य और समाज का संबंध अत्यंत गहरा और अविच्छिन्न है। साहित्य समाज के विचारों, भावनाओं और संस्कारों को प्रभावित करता है और समाज की उन्नति में योगदान देता है। एक समाज तभी सशक्त और प्रगतिशील बन सकता है, जब उसका साहित्य सच्चाई, नैतिकता और संस्कृति के मार्गदर्शन में लिखा जाए।

(iii) मेरी प्रिय पुस्तक
Ans.
पुस्तकें हमारे जीवन का अमूल्य साधन हैं। वे हमें ज्ञान, मनोरंजन और जीवन जीने की कला सिखाती हैं। मेरी प्रिय पुस्तक है “गोदान”, जिसे प्रेमचंद ने लिखा है। यह पुस्तक मेरे लिए इसलिए प्रिय है क्योंकि इसमें सामाजिक जीवन, किसानों की कठिनाइयाँ और मानवीय संवेदनाएँ बड़े ही सजीव और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की गई हैं।

पुस्तक का संक्षिप्त परिचय:
“गोदान” उपन्यास का मुख्य पात्र है होरी, जो एक गरीब किसान है। होरी अपने जीवन में किसानी के संघर्ष, सामाजिक अन्याय और परिवारिक जिम्मेदारियों से जूझता है। कहानी में होरी की पत्नी धनिया, उनकी बेटी गोमती और बेटे मृगया जैसे पात्र हैं, जिनके माध्यम से ग्रामीण समाज की वास्तविकताओं का चित्रण किया गया है।

पुस्तक का महत्व:

  1. सामाजिक यथार्थ:
    • यह उपन्यास किसानों की गरीबी, शोषण और सामाजिक अन्याय को उजागर करता है।
    • हमें यह समझाता है कि किस प्रकार समाज के गरीब लोग कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए भी अपने नैतिक मूल्यों को बनाए रखते हैं।
  2. मानव जीवन का दर्शन:
    • “गोदान” हमें त्याग, संघर्ष और साहस का महत्व सिखाता है।
    • होरी का जीवन यह दिखाता है कि सच्चा धन और खुशी नैतिकता और ईमानदारी में निहित है, ना कि केवल पैसों में।
  3. साहित्यिक दृष्टि:
    • प्रेमचंद की भाषा सरल, प्रभावशाली और मार्मिक है।
    • पात्रों के भाव और संवाद इतने प्रामाणिक हैं कि पाठक खुद उन्हें महसूस कर सकता है।

व्यक्तिगत दृष्टिकोण:
मुझे यह पुस्तक इसलिए भी प्रिय है क्योंकि यह जीवन के संघर्षों, मानव संवेदनाओं और समाज के यथार्थ को समझने का अवसर देती है। यह पुस्तक हमें मानवता, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देती है।

(iv) नारी सशक्तीकरण
Ans.
नारी सशक्तीकरण का अर्थ है महिलाओं को समाज में समान अधिकार, अवसर और स्वतंत्रता प्रदान करना, जिससे वे अपने जीवन में निर्णय लेने, अपने अधिकारों की रक्षा करने और समाज में पूर्ण भागीदारी करने में सक्षम हों। समाज में महिलाओं की स्थिति केवल उनके व्यक्तित्व और योग्यता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और राष्ट्र की उन्नति में उनकी भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।

नारी सशक्तीकरण का महत्व:

  1. समान अवसर:
    • सशक्त नारी को शिक्षा, रोजगार और समाजिक गतिविधियों में समान अवसर मिलते हैं।
    • शिक्षा और आत्मनिर्भरता से महिलाएँ आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र बनती हैं।
  2. समाज में सकारात्मक योगदान:
    • सशक्त महिलाएँ समाज में सकारात्मक बदलाव और विकास लाने में सक्षम होती हैं।
    • वे समानता, न्याय और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर समाज को सुधार सकती हैं।
  3. नैतिक और मानसिक विकास:
    • नारी सशक्तीकरण से महिलाओं में आत्मविश्वास, साहस और नेतृत्व क्षमता बढ़ती है।
    • यह उन्हें परिवार और समाज के निर्णयों में सक्रिय भागीदार बनाता है।

नारी सशक्तीकरण के उपाय:

  1. शिक्षा:
    • महिलाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
    • शिक्षित महिला न केवल अपने परिवार को शिक्षित कर सकती है, बल्कि समाज में बदलाव भी ला सकती है।
  2. आर्थिक स्वतंत्रता:
    • महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर दिए जाने चाहिए।
    • आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला अपने और परिवार के निर्णयों में सशक्त भागीदारी कर सकती है।
  3. समानता और अधिकार:
    • समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए।
    • घरेलू हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
  4. सामाजिक जागरूकता:
    • महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।
    • समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और समान दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए।

निष्कर्ष: नारी सशक्तीकरण केवल महिलाओं का अधिकार नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति की नींव है। यदि महिलाएँ सशक्त होंगी, तो वे स्वयं और समाज दोनों को विकसित करने में योगदान देंगी। समाज तभी सच्चे अर्थों में प्रगतिशील और न्यायपूर्ण होगा, जब हर महिला को समान अवसर, सम्मान और स्वतंत्रता मिले।

(v) विज्ञान की उपयोगिता ।
Ans.
विज्ञान मनुष्य के जीवन को सरल, सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने का माध्यम है। यह ज्ञान का वह क्षेत्र है जो प्राकृतिक घटनाओं और नियमों का अध्ययन करता है और उनका व्यावहारिक उपयोग मानव जीवन में करता है। विज्ञान के बिना आज का आधुनिक समाज और जीवन असंभव है। यह शिक्षा, उद्योग, चिकित्सा, संचार, कृषि और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

विज्ञान की उपयोगिता:

  1. चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र में:
    • विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है।
    • नई दवाइयाँ, टीके, ऑपरेशन तकनीकें और रोग पहचान के उपकरण विकसित हुए हैं।
    • इसके कारण मानव जीवन की लंबाई बढ़ी है और जीवन स्वस्थ हुआ है।
  2. उद्योग और आर्थिक विकास में:
    • विज्ञान ने उद्योगों में नई तकनीक, मशीनरी और उत्पादन प्रक्रिया विकसित की।
    • इससे उत्पादन क्षमता बढ़ी, समय की बचत हुई और रोजगार के अवसर भी बढ़े।
  3. कृषि में उपयोगिता:
    • विज्ञान ने उन्नत बीज, कीटनाशक, सिंचाई तकनीक और आधुनिक खेती के साधन दिए हैं।
    • इसके कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और किसान अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
  4. संचार और सूचना क्षेत्र में:
    • विज्ञान ने इंटरनेट, मोबाइल, कंप्यूटर और उपग्रह संचार विकसित किए हैं।
    • इससे दूर-दराज के क्षेत्रों में भी ज्ञान, सूचना और शिक्षा पहुंचाई जा सकती है।
  5. सुरक्षा और जीवन की सुविधा में:
    • विज्ञान ने जीवन को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाया है।
    • यातायात, निर्माण, ऊर्जा उत्पादन और घरेलू उपकरण विज्ञान की उपलब्धियों का परिणाम हैं।
  6. शिक्षा और अनुसंधान में:
    • विज्ञान ने शिक्षा और अनुसंधान को सरल और प्रभावशाली बनाया है।
    • आधुनिक प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों के माध्यम से नए आविष्कार और नवाचार संभव हुए हैं।

निष्कर्ष: विज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। यह न केवल जीवन को सरल और सुरक्षित बनाता है, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विज्ञान का सही और सकारात्मक उपयोग मानवता को प्रगति, समृद्धि और खुशहाल जीवन की ओर ले जाता है।

10. अपनी विशेष रुचियों का उल्लेख करते हुए अपने मित्र को एक पत्र लिखिए ।
Ans.

सुनित
गाँव/शहर – वाराणसी
दिनांक – 16 जनवरी 2026

प्रति:
मेरे प्रिय मित्र – अमित
गाँव/शहर – लखनऊ

विषय: अपनी विशेष रुचियों के विषय में

प्रिय अमित,

सप्रेम नमस्कार।

आशा है कि तुम स्वस्थ और प्रसन्नचित्त होगे। मैं भी यहाँ स्वस्थ हूँ और पढ़ाई में व्यस्त हूँ। आज मैं तुम्हें अपनी कुछ विशेष रुचियों के बारे में बताना चाहता हूँ।

मुझे सबसे अधिक पढ़ाई और अध्ययन का शौक है। मुझे कहानी, कविता और विज्ञान की पुस्तकें पढ़ना बहुत पसंद है। इसके माध्यम से मुझे ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ जीवन के विभिन्न अनुभव और नैतिक शिक्षाएँ भी मिलती हैं।

मुझे खेलों में भाग लेना भी बहुत प्रिय है। विशेषकर फुटबॉल और क्रिकेट खेलना मुझे अत्यंत आनंद देता है। खेलों से मुझे शारीरिक फिटनेस, टीम भावना और अनुशासन सीखने को मिलता है।

इसके अलावा मुझे संगीत सुनना और गाना बहुत अच्छा लगता है। इससे मुझे मानसिक शांति और सृजनात्मक ऊर्जा मिलती है।

प्रिय मित्र, मेरी यह रुचियाँ मुझे जीवन में उत्साह, अनुशासन और मानसिक विकास देने में सहायक हैं। मुझे विश्वास है कि तुम्हें भी अपनी रुचियों के माध्यम से ज्ञान और आनंद प्राप्त होता होगा।

तुम्हारे पत्र का इंतजार रहेगा। कृपया अपनी विशेष रुचियों और अनुभवों के विषय में मुझे भी लिखो।

सप्रेम मित्र
सुनित

अथवा

रेलवे के महाप्रबन्धक को एक शिकायती पत्र लिखिए जिसमें टिकट निरीक्षक द्वारा किये गये अभद्र व्यवहार का उल्लेख हो ।
Ans.

सुनित
गाँव/शहर – वाराणसी
दिनांक – 16 जनवरी 2026

प्रति:
महाप्रबंधक,
भारतीय रेल
वाराणसी डिवीजन

विषय: टिकट निरीक्षक द्वारा अभद्र व्यवहार के संबंध में शिकायत

मान्यवर,

सादर निवेदन है कि मैं 14 जनवरी 2026 को वाराणसी से लखनऊ जाने वाली ट्रेन संख्या 12345 में यात्रा कर रहा था। मेरी टिकट पूर्णत: वैध और रिजर्वेशन के अनुसार थी।

यात्रा के दौरान, टिकट निरीक्षक श्रीमान/श्रीमती [नाम यदि ज्ञात हो] ने मुझसे अत्यधिक अभद्र व्यवहार किया। उन्होंने बिना किसी कारण के मेरी टिकट पर प्रश्न उठाया और मेरी यात्रा में अन्य यात्रियों के सामने मुझे अपमानित किया। मैंने विनम्रतापूर्वक अपनी वैध टिकट प्रस्तुत की, फिर भी उनका रवैया अत्यधिक कठोर और अनुचित रहा।

यह व्यवहार न केवल मेरी व्यक्तिगत गरिमा का हनन है, बल्कि रेलवे की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करता है। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इस मामले की तत्काल जाँच की जाए और संबंधित अधिकारी/निरीक्षक के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य यात्री के साथ इस प्रकार की समस्या न हो।

आपसे सादर अनुरोध है कि मेरी शिकायत पर यथाशीघ्र संज्ञान लेकर समाधान किया जाए।

धन्यवाद।

सादर,
सुनित
मोबाइल नंबर –

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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