U.P Board Class 10 Hindi 801 (HE) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।
सत्र – 2024
हिन्दी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांक: 70
निर्देश:
i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।
iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।
iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।
v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।
vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।
vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।
viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।
खण्ड – ‘अ’ बहुविकल्पीय प्रश्न
(वस्तुनिष्ठ) प्रश्न
1. ‘रक्षाबन्धन’ नाटक के नाटककार हैं-
(A) उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’
(B) हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
(C) रामकुमार वर्मा
(D) चतुरसेन शास्त्री
Ans. (C) रामकुमार वर्मा
2. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना है-
(A) संस्कृति के चार अध्याय
(B) साहित्य और कला
(C) अनन्त आकाश
(D) इन्द्रजाल
Ans. (A) संस्कृति के चार अध्याय
3. ‘राग दरबारी’ रचना के उपन्यासकार हैं-
(A) कमलेश्वर
(B) श्रीलाल शुक्ल
(C) अज्ञेय
(D) नरेश मेहता
Ans. (B) श्रीलाल शुक्ल
4. ‘शुक्ल युग’ के अन्य नाम कौन से हैं?
(A) प्रसाद युग
(B) प्रेमचन्द युग
(C) छायावाद युग
(D) इनमें से सभी
Ans. (B) प्रेमचन्द युग
5. ‘विष्णु प्रभाकर’ किस युग के कहानीकार हैं ?
(A) भारतेन्दु युग
(B) छायावादी युग
(C) द्विवेदी युग
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (D) इनमें से कोई नहीं
6. ‘भाव विलास’ के रचनाकार हैं-
(A) केशवदास
(B) देव
(C) पद्माकर
(D) मतिराम
Ans. (A) केशवदास
7. प्रयोगवादी काव्य की विशेषता है-
(A) चित्रमयी कल्पना की प्रधानता
(B) रूढ़ियों के प्रति विद्रोह
(C) प्राकृतिक वर्णन
(D) आश्रयदाताओं की प्रशंसा
Ans. (B) रूढ़ियों के प्रति विद्रोह
8. काव्य की प्रवृत्ति एवं रचना शैली के आधार पर रीतिकाल की कितनी धाराएँ स्वीकार की गयी हैं ?
(A) 1
(B) 5
(C) 3
(D) 6
Ans. (C) 3
9. ‘जौहर’ काव्य के रचनाकार हैं-
(A) श्याम नारायण पाण्डे
(B) रामनरेश त्रिपाठी
(C) सुमित्रानन्दन पन्त
(D) धर्मवीर भारती
Ans. (A) श्याम नारायण पाण्डे
10. ‘चिदम्बरा’ के रचनाकार हैं-
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
C) सुमित्रानन्दन पन्त
(D) महादेवी वर्मा
Ans. (D) महादेवी वर्मा
11. पुनि-पुनि मुनि उकसहि अकुलाहीं ।
देखि दसा हर-गन मुसकाहीं ।।
उपर्युक्त पंक्तियों में प्रयुक्त रस है –
(A) वीर रस
(B) हास्य रस
(C) करुण रस
(D) वात्सल्य रस
Ans. (B) हास्य रस
12. “आहुति-सी गिर पड़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी” ।
उपर्युक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?
(A) अनुप्रास अलंकार
(B) उपमा अलंकार
(C) श्लेष अलंकार
(D) रूपक अलंकार
Ans. (B) उपमा अलंकार
13. ‘दोहा’ छन्द का ठीक उल्टा छन्द कौन-सा है ?
(A) चौपाई
(B) रोला
(C) सोरठा
(D) बरवै
Ans. (C) सोरठा
14. ‘अनुरूप’ शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है-
(A) अ
(B) अन
(C) अनु
(D) रूप
Ans. (B) अन
15. ‘राम-कृष्ण’ में कौन-सा समास है ?
(A) अव्ययीभाव समास
(B) द्वन्द्व समास
(C) कर्मधारय समास
(D) तत्पुरुष समास
Ans. (B) द्वन्द्व समास
16. वायु, समीर, बयार पर्याय हैं-
(A) सूर्य के
(C) हवा के
(B) तारों के
(D) बादल के
Ans. (C) हवा के
17. ‘तस्मै’ शब्द में विभक्ति एवं वचन है-
(A) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
(B) द्वितीया विभक्ति, बहुवचन
(C) पंचमी विभक्ति, एकवचन
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (A) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
18. संदेहपूर्ण कथन को कहते हैं-
(A) साधारण वाक्य
(B) प्रश्नवाचक वाक्य
(C) संदेहात्मक वाक्य
(D) नकारात्मक वाक्य
Ans. (C) संदेहात्मक वाक्य
19. ‘मैं पत्र लिखूँगा’ वाक्य का कर्मवाच्य में परिवर्तित बाक्य है-
(A) मेरे द्वारा पत्र लिखा जायेगा ।
(B) मुझे पत्र लिखना है।
(C) मैं पत्र लिख रहा है।
(D) मुझे पत्र लिखना था ।
Ans. (A) मेरे द्वारा पत्र लिखा जायेगा ।
20. स्थानवाचक क्रिया विशेषण है-
(A) प्रतिदिन
(B) आसपास
(C) बहुत
(D) स्वयं
Ans. (B) आसपास
खण्ड ‘ब’
वर्णनात्मक प्रश्न
1. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
मानव मन सदा से ही अज्ञात के रहस्यों को खोलने और जानने-समझने को उत्सुक रहा है। जहाँ तक वह नहीं पहुँच सकता था, वहाँ वह कल्पना के पंखों पर उड़कर पहुँचा। उसकी अनगढ़ और अविश्वसनीय कथाएँ उसे सत्य के निकट पहुँचाने में प्रेरणा-शक्ति का काम करती रहीं। अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात 4 अक्टूबर, 1957 को हुआ था, जब सोवियत रूस ने अपना पहला स्पुतनिक छोड़ा । प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का गौरव यूरी गागरिन को प्राप्त हुआ। अन्तरिक्ष युग के आरम्भ के ठीक 11 वर्ष 9 माह 17 दिन बाद चन्द्रतल पर मानव उतर गया।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
Ans. पाठ का नाम: अन्तरिक्ष युग
लेखक का नाम: जयप्रकाश नारायण
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. इस पंक्ति का आशय यह है कि मानव मन की जिज्ञासा अत्यन्त प्रबल रही है। जहाँ उसकी शारीरिक या भौतिक सीमाएँ उसे पहुँचने से रोकती थीं, वहाँ उसने अपनी कल्पना के माध्यम से उन अज्ञात स्थानों और रहस्यों को समझने का प्रयास किया। कल्पना ने मनुष्य को न केवल सोचने की स्वतंत्रता दी, बल्कि विज्ञान और खोजों की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी। इसी कल्पना के बल पर मनुष्य ने अज्ञात को जानने और सत्य के निकट पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया।
(iii) प्रथम अन्तरिक्ष यात्री कौन था ?
Ans. प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन थे।
अथवा
हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जायेगा और आज जो तरुण हैं वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जायेगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं; क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
Ans. पाठ का नाम: प्रगतिशील साहित्य
लेखक का नाम: रामविलास शर्मा
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. इस पंक्ति का आशय यह है कि प्रत्येक युग का साहित्य अपने समय में नवीन और भविष्य का प्रतिनिधि माना जाता है, परन्तु समय के साथ वही साहित्य पुराना होकर अतीत का अंग बन जाता है। जो लोग आज युवा हैं और उस साहित्य के निर्माता या समर्थक हैं, वे आगे चलकर वृद्ध हो जाते हैं और अपने समय के साहित्य को ही गौरवपूर्ण अतीत मानकर उसकी स्मृति में जीते हैं। इस प्रकार साहित्य और दृष्टिकोण दोनों ही समय के साथ बदलते रहते हैं।
(iii) “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
Ans. “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” का तात्पर्य यह है कि जो वस्तु, स्थिति या समय हमसे दूर होता है, वह हमें अधिक अच्छा और आकर्षक लगता है। वास्तविकता में उसके अपने दोष और कठिनाइयाँ होती हैं, परन्तु दूरी के कारण वे दिखाई नहीं देतीं। इसी कारण लोग भविष्य या अतीत के सपनों को सुखद मानते हैं, जबकि वर्तमान की सच्चाई उन्हें साधारण या कष्टदायक लगती है।
2. निम्नलिखित पद्मांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
चरन-कमल बंर्दी हरि राइ ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अन्धे को सब क्रछु दरसाई ।
बहिरौ सुनै गैंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बन्दौँ तिहि पाइ ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
Ans. सन्दर्भ: उपर्युक्त पद्यांश भक्त कवि सूरदास द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भगवान श्रीकृष्ण (हरि) की करुणा और महिमा का वर्णन किया है। कवि के अनुसार प्रभु की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और दीन-हीन व्यक्ति भी महान बन जाता है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. व्याख्या — इन पंक्तियों में कवि सूरदास ने भगवान की असीम करुणा और महिमा का वर्णन किया है। कवि कहता है कि जिनकी कृपा से लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को पार कर लेता है, अंधे को सब कुछ दिखाई देने लगता है, बहिरा सुनने लगता है और गूंगा फिर से बोलने लगता है। निर्धन व्यक्ति भी सम्मान और वैभव प्राप्त कर लेता है। ऐसे करुणामय स्वामी के चरणों में कवि बार-बार नमन करता है।
(iii)”बार-बार बन्दौँ तिहि पाइ।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?
Ans. “बार-बार बन्दौँ तिहि पाइ।” पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।
अथवा
अगर धीरे चलो
वह तुम्हें छू लेगी
दौड़ों तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान तक भी ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans. सन्दर्भ: उपर्युक्त पद्यांश आधुनिक हिन्दी कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने नदी के प्रतीक के माध्यम से जीवन के सत्य को व्यक्त किया है। कवि बताता है कि यदि जीवन को धैर्य और समझदारी से जिया जाए तो वह हमारे साथ चलता है, परन्तु यदि हम जल्दबाजी करें तो वह हमसे दूर हो जाता है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. इन पंक्तियों का आशय यह है कि जीवन को यदि अत्यधिक जल्दबाज़ी और असंतुलन के साथ जिया जाए, तो उसका वास्तविक आनंद हाथ से निकल जाता है। जीवन नदी की तरह है—यदि उसके साथ तालमेल बनाकर, धैर्य और समझदारी से चला जाए, तो वह हर परिस्थिति में साथ देती है। परन्तु यदि व्यक्ति जल्दबाज़ी करता है और जीवन पर ज़ोर डालता है, तो जीवन की सहजता और सुख उससे दूर हो जाते हैं।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश में ‘नदी’ किसका प्रतीक है ?
Ans. उपर्युक्त पद्यांश में ‘नदी’ जीवन का प्रतीक है।
3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते । अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धाग सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानश्च वर्द्धयति । अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः ।
अलक्षेन्द्रः- भारतं एकं राष्ट्रम् इति तव वचनं विरुद्धम् । इह तावत् राजानः जनाः च परस्परं द्रुह्यन्ति ।
पुरुराजः – तत् सर्वम् अस्माकम् आन्तरिकः विषयः । बाह्यशक्तेः तत्र हस्तक्षेपः असह्यः यवनराज !
पृथग्धर्माः पृथग्भाषाभूषा अपि वयं सर्वे भारतीयाः । विशालम् अस्माकं राष्ट्रम् ।
Ans. सन्दर्भ : उपर्युक्त संस्कृत गद्यांश एक संस्कृत पाठ से लिया गया है। इसमें वाराणसी की प्राचीन विद्या-परम्परा का वर्णन किया गया है तथा भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी अनुवाद : वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर में विद्या का दिव्य प्रकाश प्रकाशित होता रहा है। आज भी यहाँ संस्कृत भाषा की धारा निरन्तर प्रवाहित हो रही है और लोगों के ज्ञान को बढ़ा रही है। यहाँ अनेक श्रेष्ठ आचार्य और महान विद्वान वेदों के अध्ययन तथा अध्यापन में आज भी संलग्न हैं।
अलेक्ज़ेण्डर कहता है— “भारत एक राष्ट्र है”, यह तुम्हारा कथन गलत है, क्योंकि यहाँ राजा और जनता आपस में ही एक-दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं।
पुरुराज उत्तर देता है— यह सब हमारा आन्तरिक विषय है। हे यवनराज! इसमें किसी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप असहनीय है।
भले ही हमारे धर्म, भाषाएँ और वेशभूषाएँ अलग-अलग हों, फिर भी हम सभी भारतीय हैं। हमारा राष्ट्र विशाल है।
4. दिए गए संस्कृत पद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत् ।
विश्वमिस्मन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालिष्यति कः ।।
Ans. सन्दर्भ : उपर्युक्त संस्कृत श्लोक नीति-प्रधान काव्य से लिया गया है। इसमें योग्य व्यक्ति के कर्तव्य और विवेक की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी अनुवाद :
हे हंस! यदि तुम दूध और पानी के भेद (विवेक) में भी आलस्य करोगे, तो फिर इस संसार में अब कुल-मर्यादा और श्रेष्ठ परम्पराओं का पालन कौन करेगा?
अथवा
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ।।
Ans. सन्दर्भ : उपर्युक्त संस्कृत श्लोक नीति-साहित्य से लिया गया है। इसमें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में सच्चे मित्र के स्वरूप को बताया गया है।
हिन्दी अनुवाद :
यात्रा पर जाते हुए व्यक्ति के लिए उसका साथी (सार्थ) मित्र होता है, घर में रहने वाले व्यक्ति के लिए पत्नी मित्र होती है, रोगी के लिए वैद्य मित्र होता है और मृत्यु के समय दान ही सच्चा मित्र होता है।
5. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर दिए गए प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए:
(क)(i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर अंग्रेजी शासन के बर्बर अत्याचारों के विरोध में महात्मा गाँधी द्वारा किये गये जन आन्दोलनों का वर्णन कीजिए ।
Ans. ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में कवि ने अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों और अत्यधिक शोषण का विस्तार से चित्रण किया है। महात्मा गांधी ने इन अन्यायों और शोषण के विरुद्ध अहिंसात्मक और संगठित आंदोलनों का नेतृत्व किया। गांधीजी द्वारा किए गए आंदोलनों में सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह, और असहयोग आंदोलन प्रमुख हैं। इन आंदोलनों के माध्यम से जनता ने अंग्रेज़ों के अन्याय के खिलाफ जागरूकता प्राप्त की और स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाए। कवि ने इन आंदोलनों में भाग लेने वाले लोगों के साहस, त्याग और संघर्ष को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया है।
(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans. इस सर्ग में कवि ने दिखाया है कि कैसे गांधीजी ने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से जनता को संगठित किया। लोग अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने अपने साहस, एकता और दृढ़ निश्चय से अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों को चुनौती दी। इस सर्ग में व्यक्त भावनाएँ, त्याग और संघर्ष की गहराई पाठक को प्रेरित करती हैं और स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को उजागर करती हैं।
(ख) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि ने सम्राट अशोक के जीवन और उनके महान कार्यों का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। कथा में बताया गया है कि प्रारंभ में अशोक एक युद्धप्रिय और कठोर शासक था, जो शक्ति और विजय को सर्वोपरि मानता था। उसने राज्य विस्तार और सत्ता की दृष्टि से कई युद्ध लड़े, जिनमें असंख्य प्राणियों की हानि हुई।
परंतु बाद में अशोक के जीवन में बौद्ध धर्म ने प्रवेश किया और उन्होंने अहिंसा, संयम और धर्म के मार्ग को अपनाया। उन्होंने अपने क्रूर स्वभाव को त्यागकर दयालु और न्यायप्रिय शासक बनने का निर्णय लिया। काव्य में उनके सामाजिक कल्याण कार्य, जैसे गरीबों और असहायों की सहायता, धर्मस्थलों और विश्वविद्यालयों का निर्माण, और प्रजा के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करना, का वर्णन है।
कविता का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा शासक वही है जो धर्म, न्याय और करुणा का पालन करता है, और सत्ता का उपयोग प्रजा के कल्याण के लिए करता है। काव्य में अशोक के परिवर्तन, उनके धर्मपरायणता के मार्ग, और उनके आदर्श शासक होने के गुण को प्रमुखता दी गई है।
(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि ने सम्राट अशोक के किन-किन गुणों का वर्णन किया है ?
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में अशोक के गुण (विस्तृत वर्णन):
- धैर्यशील और न्यायप्रिय:
अशोक ने अपने राज्य में सभी के लिए न्याय सुनिश्चित किया। वे केवल अपने हित के लिए शासन नहीं करते थे, बल्कि प्रजा के सुख और कल्याण की दिशा में सभी निर्णय लेते थे। - दयालु और करुणामय:
युद्धों की क्रूरता और हिंसा छोड़कर अशोक ने सभी जीवों के प्रति करुणा और सहानुभूति दिखाई। उन्होंने प्रजा और प्राणियों की रक्षा और भलाई को प्राथमिकता दी। - बौद्ध धर्म का पालन:
अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाकर अहिंसा, संयम, सत्य और धर्मपरायणता के आदर्श जीवन का पालन किया। उन्होंने अपने शासन में धर्म और नैतिकता को स्थापित किया। - सामाजिक सुधारक और कल्याणकारी:
अशोक ने गरीबों, निर्धनों और असहायों के कल्याण के लिए अनेक सुधार किए। शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण कर उन्होंने समाज में सुधार लाया। - सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि:
अशोक ने शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा दिया। उन्होंने धर्म और नैतिकता के प्रचार-प्रसार के माध्यम से राष्ट्र की एकता और सामाजिक सौहार्द बढ़ाया। - चरित्रिक परिवर्तन और आदर्श नेतृत्व:
काव्य में यह दिखाया गया है कि शक्ति और विजय से बड़े हैं सत्य, अहिंसा और करुणा। अशोक का जीवन यह संदेश देता है कि महान नेता वही है जो अपनी शक्ति का उपयोग समाज और मानवता के कल्याण में करता है।
(ग) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘दौलत’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘दौलत’ में कवि ने मेवाड़ के नायक और उसके राज्य की समृद्धि का चित्रण किया है। इस सर्ग में बताया गया है कि राजा ने अपने राज्य में संपन्नता, न्याय और सुरक्षा की स्थापना की। प्रजा सुखी और सुरक्षित रहती है, कृषक, व्यापारी और सामान्य जनता अपने कर्तव्यों और कर्मों में मग्न रहते हैं। सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि राजा अपने साम्राज्य की संपत्ति और संसाधनों का न्यायपूर्वक उपयोग करता है, और अपनी सेना और प्रशासन के माध्यम से राज्य की रक्षा करता है। यह सर्ग नायक की राजनीतिक कुशलता और दूरदर्शिता को प्रदर्शित करता है।
(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ का नायक साहसी, न्यायप्रिय और धर्मपरायण है।
- वह कर्तव्यनिष्ठ और प्रजा-हितैषी है।
- अपने राज्य की समृद्धि और सुरक्षा के लिए सभी प्रयास करता है।
- संकट और चुनौतियों में भी वह साहस और धैर्य नहीं खोता।
- अपने निर्णयों में वह न्याय, विवेक और धर्म का पालन करता है।
- नायक का व्यक्तित्व यह दर्शाता है कि सच्चा शासक वही है जो राज्य और प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित हो।
( घ) (i)’अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘आयोजन’ सर्ग का कथानक का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘आयोजन’ सर्ग में कवि ने यह वर्णन किया है कि किस प्रकार श्रीकृष्ण ने अपने मंदिर और पूजा स्थल का भव्य आयोजन किया। इस सर्ग में उत्सव की तैयारी, सजावट, प्रजा का उत्साह और श्रद्धालुओं की भक्ति का चित्रण है। आयोजन में सभी धर्मों और वर्गों के लोग सम्मिलित होते हैं। कवि ने यह भी बताया है कि पूजा के माध्यम से श्रीकृष्ण अपने भक्तों में भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का संचार करते हैं। सर्ग का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि कृष्ण के नेतृत्व और प्रेरणा में सामूहिक प्रयास और भक्ति का सामंजस्य बना रहता है।
(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. श्रीकृष्ण का चरित्र इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विशेषताओं वाला चित्रण प्रस्तुत करता है:
- धार्मिक और भक्ति-प्रिय: वह अपने भक्तों के प्रति करुणामय हैं और भक्ति को सर्वोपरि मानते हैं।
- नेतृत्व गुण: आयोजन और पूजा के समय वह सभी कार्यों का सफल नेतृत्व करते हैं।
- सज्जन और आदर्श व्यक्तित्व: उनकी उपस्थिति से भक्तों में अनुशासन, सामंजस्य और उत्साह उत्पन्न होता है।
- सामाजिक समरसता: वह सभी वर्गों और धर्मों के लोगों को एक साथ जोड़ते हैं।
- संकट में साहसी और दूरदर्शी: मुश्किल परिस्थितियों में भी भक्तों का मार्गदर्शन और समर्थन करते हैं।
इस प्रकार, ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण का चरित्र भक्तिपूर्ण, प्रेरक और आदर्श शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ङ) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में वर्णित ‘आजाद हिन्द सेना’ के गठन की घटना का वर्णन कीजिए ।
Ans.‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में कवि ने सुभाष चन्द्र बोस द्वारा ‘आजाद हिन्द सेना’ (आई.एच.ए.) के गठन का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें बताया गया है कि सुभाष चन्द्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों के अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध देशवासियों को संगठित किया। उन्होंने युवाओं को आजादी के लिए प्रेरित किया और एक अनुशासित और साहसी सेना का निर्माण किया। इस सेना का उद्देश्य देश को ब्रिटिश सत्ता से मुक्त कराना और स्वतंत्र भारत का निर्माण करना था। खण्डकाव्य में इस घटना का चित्रण उत्साहपूर्ण और प्रेरक है, जहाँ युवा देशभक्तों की निष्ठा और साहस को उजागर किया गया है।
(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के नायक ‘सुभाष चन्द्र बोस’ के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans. सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विशेषताओं वाला प्रस्तुत किया गया है:
- साहसी और निडर: देश की स्वतंत्रता के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने में तत्पर।
- नेतृत्व गुण: युवाओं और सैनिकों का मार्गदर्शन करने में सक्षम और प्रेरक नेता।
- देशभक्त: अपनी मातृभूमि के प्रति गहरी भक्ति और निष्ठा।
- संकल्पशील और दृढ़ निश्चयी: लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई भी कठिनाई उसे रोक नहीं सकती।
- संगठक और प्रेरक: लोगों को संगठित करने और उनमें उत्साह उत्पन्न करने की क्षमता।
इस प्रकार, खण्डकाव्य में सुभाष चन्द्र बोस एक प्रेरक, साहसी और आदर्श देशभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, जिनकी प्रेरणा आज भी स्वतंत्रता संग्राम के लिए युवाओं को प्रेरित करती है।
(च) (i) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘संघर्ष’ का सारांश लिखिए ।
Ans. ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘संघर्ष’ में कवि ने स्वतंत्रता संग्राम के कठिन और साहसपूर्ण संघर्ष का चित्रण किया है। इस सर्ग में बताया गया है कि भारतीय क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी शासन के अत्याचार और अन्याय के खिलाफ अपने प्राणों की परवाह किए बिना आंदोलन किया। उनके अदम्य साहस, उत्साह और निडरता से अंग्रेज़ों में डर पैदा हुआ। सर्ग में युवा क्रांतिकारियों के संघर्ष, त्याग और समर्पण को बड़े मार्मिक और प्रेरक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चन्द्रशेखर आजाद’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘चन्द्रशेखर आजाद’ का चरित्र खण्डकाव्य में निम्नलिखित गुणों वाला चित्र प्रस्तुत करता है:
- साहसी और निडर: अंग्रेज़ों के सामने अपने प्राणों की परवाह न करना।
- देशभक्त और समर्पित: मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने जीवन का बलिदान देना।
- नेतृत्व और संगठन क्षमता: अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित करना और संगठित करना।
- संघर्षशील: कठिन परिस्थितियों और संकटों में भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना।
- त्याग और आदर्श व्यक्तित्व: अपने व्यक्तिगत सुख और जीवन की चिंता किए बिना देश और स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहना।
इस प्रकार खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद देशभक्ति, साहस और त्याग के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
(छ) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में वर्णित श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में महाभारत के प्रमुख पात्र कर्ण और श्रीकृष्ण के बीच संवाद का चित्रण है। इस सर्ग में श्रीकृष्ण कर्ण से यह अनुरोध करते हैं कि वह पाण्डवों के पक्ष में युद्ध में शामिल हों, क्योंकि धर्म और न्याय की जीत सुनिश्चित करनी है। परंतु कर्ण अपने कर्तव्य, मर्यादा और व्यक्तिगत नैतिक सिद्धांतों के अनुसार अपने गुरु दुर्योधन और क्षत्रिय कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहता है। संवाद में कर्ण की संकल्पशीलता, साहस और नैतिक प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। इस सर्ग में उनके चरित्र की महानता, आदर्शता और संघर्ष की गहराई को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक ‘कर्ण’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans. कर्ण का चरित्र खण्डकाव्य में निम्नलिखित गुणों वाला प्रस्तुत किया गया है:
- साहसी और वीर: युद्ध में निडर और निर्भीक, संकटों में भी अपनी हिम्मत नहीं खोता।
- कर्तव्यनिष्ठ और धर्मपरायण: अपने गुरु और क्षत्रिय कर्तव्यों के प्रति पूर्ण निष्ठा।
- उदार और दानी: अपने धन, शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग समाज और मित्रों की भलाई के लिए करता है।
- संघर्षशील और दृढ़: कठिन परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों से नहीं हटता।
- मर्यादित और आदर्श व्यक्तित्व: अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लालच से ऊपर उठकर सही मार्ग का पालन करता है।
इस प्रकार खण्डकाव्य में कर्ण साहस, त्याग, उदारता और आदर्श नैतिकता का प्रतीक है।
(ज) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए ।
Ans. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कवि ने भरत के जीवन और उनके कार्यों का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। उदाहरण के लिए ‘सिंहासन ग्रहण’ सर्ग में कवि ने यह वर्णन किया है कि कैसे भरत ने राज्याभिषेक और शासन की जिम्मेदारी को ग्रहण किया। इस सर्ग में भरत अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान, न्यायप्रिय और साहसी रूप में प्रस्तुत हैं। उन्होंने अपने राज्य और प्रजा की भलाई के लिए अपने निर्णयों में सर्वोच्च न्याय, विवेक और परिपक्वता का पालन किया। सर्ग में उनकी दूरदर्शिता, नीतिशास्त्र के ज्ञान और व्यक्तिगत साहस का सुंदर चित्रण है।
(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘भरत’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans. भरत का चरित्र इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित गुणों वाला प्रस्तुत किया गया है:
- कर्तव्यनिष्ठ और अनुशासित: अपने कर्तव्यों और शासन के प्रति पूर्ण निष्ठा।
- न्यायप्रिय: प्रजा और राज्य के हित में निर्णय लेना और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होना।
- साहसी और दृढ़: संकटों और चुनौतियों में भी निडर और साहसी।
- दूरदर्शी और बुद्धिमान: राज्य और प्रजा के हित के लिए रणनीति और योजना बनाना।
- उदार और आदर्श शासक: व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज और राज्य के कल्याण के लिए कार्य करना।
इस प्रकार, खण्डकाव्य में भरत का चरित्र आदर्श, साहसी और न्यायप्रिय शासक के रूप में चित्रित किया गया है।
(झ) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘लक्ष्मण’ की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans. ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण का चरित्र सशक्त, बहुआयामी और आदर्श नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके गुण इस प्रकार हैं:
- साहसी और निडर:
लक्ष्मण किसी भी युद्ध या कठिन परिस्थितियों में डरता नहीं है। वह अपने देश, अपने धर्म और अपने परिवार की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहता है। युद्ध में उसकी वीरता और निर्भीकता सभी को प्रेरित करती है। - कर्तव्यनिष्ठ और धर्मपरायण:
लक्ष्मण अपने कर्तव्यों के प्रति अत्यंत सजग और समर्पित है। चाहे युद्ध का समय हो या अन्य संकट, वह हमेशा अपने धर्म और नैतिकता के अनुसार कार्य करता है। उसके लिए धर्म और कर्तव्य से ऊपर कोई चीज़ नहीं है। - भ्रातृभाव और प्रेमपूर्ण स्वभाव:
लक्ष्मण अपने भाई, सहयोगियों और अपने लोगों के प्रति प्रेम और स्नेह दिखाता है। वह केवल स्वयं के लिए नहीं बल्कि अपने आसपास के सभी लोगों के कल्याण के लिए भी संघर्ष करता है। - सहायता और सुरक्षा का गुण:
लक्ष्मण कमजोरों, असहायों और संकटग्रस्तों की रक्षा करता है। खण्डकाव्य में उसका यह गुण विशेष रूप से उजागर किया गया है, जिससे वह न केवल एक वीर योद्धा बल्कि आदर्श नेतृत्वकर्ता भी बनता है। - धैर्यशील और संयमी:
कठिन परिस्थितियों और असंख्य चुनौतियों में भी लक्ष्मण शांत, संयमी और दूरदर्शी रहता है। वह अपने क्रोध या भावनाओं में बहकर निर्णय नहीं करता, बल्कि विवेकपूर्ण और बुद्धिमान निर्णय लेता है।
(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. इस सर्ग में कवि ने लक्ष्मण की वीरता, साहस और रणनीति कौशल को विस्तारपूर्वक चित्रित किया है। युद्ध-संग्राम में लक्ष्मण अपने राज्य और प्रजा की रक्षा के लिए युद्धभूमि में प्रवेश करता है। वह न केवल अपनी शक्ति और तलवार की कला का उपयोग करता है, बल्कि अपने साथियों का मार्गदर्शन भी करता है।
सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि लक्ष्मण संकट के समय न केवल निडर रहता है, बल्कि अपने विरोधियों के मनोबल को भी तोड़ता है। वह अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति पूरी तरह निष्ठावान है। युद्ध के बीच में लक्ष्मण की रणनीति, साहस और संयम का वर्णन यह दर्शाता है कि एक आदर्श योद्धा वही होता है जो साहस, विवेक और धर्म का पालन करता है।
इसके अतिरिक्त कवि ने यह भी स्पष्ट किया है कि युद्ध केवल शक्ति के बल पर नहीं जीता जाता, बल्कि वीरता, निष्ठा और दूरदर्शिता के साथ-साथ नैतिकता का पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है। इस सर्ग से पाठक यह सीख लेते हैं कि संकट के समय साहस और अनुशासन से कार्य करना कितना महत्वपूर्ण है।
6. (क) दिए गए लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
Ans. जीवन परिचय:
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिन्दी के आधुनिक लेखक और समाज सुधारक माने जाते हैं। उनका जन्म 1898 में हुआ था। वे साहित्यिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से विशेष रूप से महत्व रखते थे। बख्शी जी ने अपने लेखन में समाज की विभिन्न विसंगतियों, सामाजिक अन्याय और मानव मन की जटिलताओं को उजागर किया। उनकी कहानियों और निबंधों में सादगी, स्पष्टता और मानवीय संवेदनाओं का अनुपम मिश्रण देखने को मिलता है। उनका साहित्य पाठकों को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि मानवता, नैतिकता और सामाजिक जागरूकता की सीख भी प्रदान करता है।
साहित्यिक योगदान:
बख्शी जी की रचनाएँ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने बच्चों और युवाओं के लिए भी कई प्रेरक कहानियाँ लिखीं। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य साहित्य के माध्यम से समाज में सुधार और चेतना का विकास करना था।
प्रमुख रचना:
- ‘अमर कहानी संग्रह‘
- इसके अलावा उनकी कई निबंध और कथा-संग्रह समाज और संस्कृति पर आधारित हैं।
(ii) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
Ans. जीवन परिचय:
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के सीवान जिले में हुआ था। वे आधुनिक हिन्दी के महान राष्ट्रकवि और वीररस प्रधान कवि माने जाते हैं। दिनकर जी का काव्य देशभक्ति, वीरता, संघर्ष और समाज सुधार के विचारों से भरा हुआ है। उनका साहित्य राष्ट्रीयता की भावना, न्याय, साहस और नैतिकता का संदेश देता है। वे केवल कवि नहीं, बल्कि चिंतक और प्रेरक नेता भी थे, जिन्होंने युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम और समाज सुधार में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
साहित्यिक योगदान:
दिनकर जी ने महाकाव्य, गीत, गद्य और आलोचना सभी विधाओं में उत्कृष्ट कृतियाँ रची। उनके काव्य में भारतीय संस्कृति, वीरता और मानवता का अद्भुत मिश्रण मिलता है। उनके काव्य की विशेषता है कि वे संकट और संघर्ष में साहस, बलिदान और नैतिकता का संदेश देते हैं।
प्रमुख रचनाएँ:
- ‘रश्मिरथी’ – महाकाव्य, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के संघर्ष का वर्णन है।
- ‘कुरुक्षेत्र’ – वीररस प्रधान महाकाव्य।
- ‘सिंहासन बत्तीसी’ – प्रेरक और आदर्श कथाएँ।
- उनके कई गीत और निबंध भी समाजिक चेतना और राष्ट्रीयता के लिए प्रसिद्ध हैं।
(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ।
Ans. जीवन परिचय:
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के झारखंड जिले में हुआ था। वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान नेता, विद्वान और भारत के प्रथम राष्ट्रपति रहे। डॉ. प्रसाद जी का व्यक्तित्व सादगी, न्यायप्रियता और दूरदर्शिता से परिपूर्ण था। उन्होंने अपने जीवन को देश की सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। वे शिक्षा, सामाजिक सुधार और न्याय के प्रति गहन रुचि रखते थे। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही, उन्होंने गाँधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और अन्य आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया।
साहित्यिक और ऐतिहासिक योगदान:
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपने अनुभवों और विचारों को संस्मरण, आलेख और भाषणों के माध्यम से व्यक्त किया। उनका लेखन देशभक्ति, स्वतंत्रता संग्राम की कहानी और नैतिकता से प्रेरित है।
प्रमुख रचनाएँ:
- ‘भारत की आज़ादी का संघर्ष’ – स्वतंत्रता संग्राम के घटनाक्रम और उनके व्यक्तिगत अनुभव।
- अन्य संस्मरण और आलेख भारतीय राजनीति और संस्कृति के विषय पर।
विशेषताएँ:
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अपने समय के विचारशील, नैतिक और दूरदर्शी नेता थे। उनका व्यक्तित्व शिक्षा, न्याय और नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण है।
(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) मैथिलीशरण गुप्त
Ans. जीवन परिचय:
मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) हिन्दी के प्रमुख आधुनिक राष्ट्रकवि और वीररस प्रधान कवि थे। वे भारतीय संस्कृति और इतिहास की भावनाओं को अपने काव्य में उतारने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। गुप्त जी ने अपने साहित्यिक जीवन में देशभक्ति, वीरता और भारतीय संस्कृति को मुख्य रूप से स्थान दिया। उनकी रचनाएँ सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव से प्रेरित हैं।
साहित्यिक योगदान:
गुप्त जी का काव्य वीर रस और नैतिक संदेशों से परिपूर्ण है। उन्होंने इतिहास, पौराणिक कथाओं और सामाजिक मुद्दों को काव्य रूप में प्रस्तुत किया। उनके काव्य की भाषा सरल, मार्मिक और प्रभावशाली है।
प्रमुख रचना:
- ‘भारत भाग्य विधाता‘ – इस महाकाव्य में भारत के गौरवशाली अतीत और भारतीय संस्कृति की महानता का वर्णन है।
(ii) रसखान
Ans. जीवन परिचय:
रसखान (1643–1710) हिन्दी के प्रसिद्ध भक्ति काव्यकार और रासलीला-कवि थे। उनका जन्म राजस्थान में हुआ। वे विशेष रूप से कृष्ण भक्ति और रासलीला के काव्य के लिए जाने जाते हैं। रसखान जी ने भक्ति भाव को सरल और मार्मिक हिन्दी में व्यक्त किया। उनकी रचनाएँ प्रेम, भक्ति और ईश्वर की भक्ति के माध्यम से मानव मन को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।
साहित्यिक योगदान:
रसखान ने हिन्दी साहित्य में कृष्ण भक्ति और प्रेमरस प्रधान रचनाएँ दीं। उनकी रचनाएँ लोकप्रिय और सरल भाषा में हैं, जिससे आम जनता आसानी से समझ सके।
प्रमुख रचना:
- ‘सखियाँ और रासलीला पद‘ – जिसमें कृष्ण और राधा के प्रेम और भक्ति भाव का सुंदर चित्रण है।
(iii) महादेवी वर्मा
Ans. जीवन परिचय:
महादेवी वर्मा (1907–1987) हिन्दी साहित्य की आधुनिक नारीवादी कवयित्री और छायावादी युग की प्रमुख कवि हैं। उनका जन्म वाराणसी में हुआ। महादेवी वर्मा ने अपने काव्य में नारी जीवन, संवेदनशीलता, मनोभाव और आध्यात्मिकता को प्रमुख रूप से चित्रित किया। वे केवल कवयित्री नहीं, बल्कि निबंधकार और आलोचक भी थीं। उनका साहित्य भाव, संवेदना और विचारशीलता से परिपूर्ण है।
साहित्यिक योगदान:
महादेवी वर्मा ने छायावादी काव्य को नया आयाम दिया। उनके काव्य की भाषा सरल, स्पष्ट और भावनात्मक है। उन्होंने नारी स्वतंत्रता, समाजिक संवेदनाएँ और मानवीय भावनाओं को प्रमुखता से लिखा।
प्रमुख रचना:
- ‘नीड़ का निर्माण‘ – इस कविता संग्रह में नारी जीवन, प्रेम, भाव और संघर्ष का सुंदर चित्रण है।
(iv) अशोक वाजपेयी ।
Ans. जीवन परिचय:
अशोक वाजपेयी (जन्म 1945) हिन्दी के समकालीन कवि, आलोचक और विचारक हैं। वे समकालीन कविता, आलोचना और साहित्यिक चिंतन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनका साहित्य समाज, संस्कृति और मानव मन की गहन समझ पर आधारित है। अशोक वाजपेयी ने हिन्दी कविता में समकालीन मुद्दों, विचार और भावनाओं को प्रमुख स्थान दिया।
साहित्यिक योगदान:
अशोक वाजपेयी की कविताएँ विचारशील, गहन और समाजिक चेतना से भरपूर हैं। वे साहित्यिक आलोचना और आधुनिक काव्य विमर्श में भी सक्रिय रहे हैं।
प्रमुख रचना:
- ‘साहित्य और जीवन‘ – इस रचना में उन्होंने कविता और जीवन के गहन संबंध और साहित्य के महत्व को बताया है।
7. अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए, जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो।
Ans. श्लोक:
सत्यमेव जयते नानृतं, सत्यं परमं तपो गतम्।
अहिंसा परमो धर्मः, धर्मो रक्षति रक्षितः॥अर्थ:
- सत्य ही विजयी होता है, असत्य नहीं।
- सत्य परम तप का मार्ग है।
- अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।
- धर्म ही अपनी रक्षा करता है।
8. ‘बाद-विवाद’ प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर अपने चचेरे भाई को बधाई देते हुए पत्र लिखिए ।
Ans.
सुनित सिंह
गली नं. 5, मोहन नगर
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
प्रति:
प्रिय चचेरे भाई,
रामनगर, लखनऊ
विषय: बाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर बधाई।
प्रिय भैया,
मुझे यह जानकर अत्यंत हर्ष और गर्व हुआ कि आपने हाल ही में आयोजित बाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आपकी मेहनत, तैयारी और आत्मविश्वास का यह परिणाम है।
आपकी सफलता ने पूरे परिवार का मान बढ़ाया है। मुझे विश्वास है कि आपकी यह उपलब्धि आपके उज्जवल भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। आप हमेशा इसी तरह मेहनत और लगन से काम करते रहें।
आपकी इस सफलता के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
आपका शुभचिंतक भाई,
सुनित सिंह
अथवा
अपनी गली / मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए ।
Ans.
सुनित सिंह
गली नं. 5, मोहन नगर
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
प्रति:
स्वास्थ्य अधिकारी
नगर निगम, लखनऊ
विषय: मोहल्ले की नालियों की सफाई के संबंध में।
मान्यवर,
सविनय निवेदन है कि हमारे मोहल्ले की नालियों की सफाई लंबे समय से नहीं हुई है। इस कारण मौसमी बीमारी और गंदगी बढ़ गई है। गंदगी के कारण मच्छर और अन्य कीट उत्पन्न हो गए हैं, जिससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
कृपया हमारी गली की नालियों की समुचित सफाई कराकर मोहल्ले के निवासियों को स्वास्थ्य एवं स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराने की कृपा करें।
आपकी शीघ्र कार्यवाही के लिए हम आपके आभारी रहेंगे।
भवदीय,
सुनित सिंह
गली नं. 5, मोहन नगर
लखनऊ
9. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए :
(i) सुवर्णस्य किं मुख्य दुःखम् ?
Ans. सुवर्णस्य मुख्य दुःखम् लोभः च लोभस्यानन्तरम् अभावः च।
(सुवर्ण का मुख्य दुःख लोभ और इसके कारण उत्पन्न अभाव है।)
(ii) कीर्तिः केन वर्धते ?
Ans. कीर्तिः सत्कार्यैः सत्कर्मैः च वर्धते।
(कीर्ति उत्तम कार्यों और अच्छे कर्मों द्वारा बढ़ती है।)
(iii) वाराणसी नगरी कुत्र स्थिता ?
Ans. वाराणसी नगरी भारतस्य उत्तरप्रदेश राज्ये स्थितम्।
(वाराणसी नगर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है।)
(iv) आरुणिः कः आसीत् ?
Ans. आरुणिः सूर्यस्य रथस्य सारथिः आसीत्।
(आरुण सूर्य के रथ का सारथी था।)
(v) चन्द्रशेखरः स्वगृष्ठं किम् अवदत् ?
Ans. चन्द्रशेखरः स्वगृष्टं ‘मृत्युः आगच्छति, परन्तु मातृभूमिः अमरति’ इति अवदत्।
(चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने गुरु से कहा कि मृत्यु आएगी, किन्तु मातृभूमि अमर रहती है।)
10. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :
(i) किसी यात्रा का वर्णन
Ans. पिछले वर्ष मैं अपने परिवार के साथ राजस्थान की एक यात्रा पर गया। यह यात्रा मेरे लिए अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक अनुभव रही। हमने जयपुर, उदयपुर और जोधपुर के दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया।
जयपुर में सबसे पहले हमने हवा महल, सिटी पैलेस और जंतर-मंतर देखा। हवा महल की वास्तुकला अद्भुत और अनोखी थी। सिटी पैलेस में राजपूत शाही जीवन और संस्कृति की झलक देखने को मिली। उदयपुर की पिछोला झील और सिटी पैलेस का दृश्य अत्यंत मनमोहक था। यहाँ की शांत झील और सुंदर महल हमारी आँखों को तृप्त कर रहे थे।
जोधपुर में हमने मेहरानगढ़ किला का भ्रमण किया। किले की विशाल दीवारें, शाही महल और संग्रहालय ने हमें इतिहास और वीरता का अनुभव कराया। इस यात्रा में हमें स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज और व्यंजन भी जानने का अवसर मिला।
इस यात्रा से न केवल राजस्थान की संस्कृति, इतिहास और कला के बारे में ज्ञान मिला, बल्कि परिवार के साथ समय बिताने का आनंद भी प्राप्त हुआ। यात्रा ने मेरी सोच को विस्तृत किया और अनुभवों से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। यह यात्रा मेरे जीवन की अविस्मरणीय यादों में से एक बन गई।
(ii) नई शिक्षा नीति
Ans. नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने भारत के शिक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार और क्रांति लाई है। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा को सुलभ, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण बनाना है। नई शिक्षा नीति में प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक बहुभाषिक शिक्षा, व्यावहारिक ज्ञान और कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इस नीति के अनुसार विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि सृजनात्मक, आलोचनात्मक और व्यावहारिक क्षमता भी विकसित करने का अवसर मिलेगा। इसमें डिजिटल शिक्षा, शोध और कौशल आधारित पाठ्यक्रम को प्रमुखता दी गई है। शिक्षकों का प्रशिक्षण और शिक्षण पद्धति भी आधुनिक और प्रभावशाली बनाई गई है।
नई शिक्षा नीति से विद्यार्थियों में रचनात्मक सोच, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता का विकास होगा। इसके माध्यम से छात्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। यह नीति शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास और चरित्र निर्माण का मार्ग भी बनाती है।
इस प्रकार, नई शिक्षा नीति भारत के शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता, नवाचार और विकास का प्रतीक है और विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार करती है।
(iii) इन्टरनेट
Ans. आज का युग इन्टरनेट का युग है। इन्टरनेट ने हमारे जीवन को अत्यंत सरल, तेज और सुविधाजनक बना दिया है। इसके माध्यम से हम दुनिया के किसी भी कोने से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, शिक्षा ले सकते हैं, व्यापार कर सकते हैं और अपने मित्रों और परिवार से जुड़े रह सकते हैं।
इन्टरनेट के द्वारा हम शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, व्यापार और मनोरंजन के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति कर रहे हैं। छात्र ऑनलाइन कक्षाओं और डिजिटल पुस्तकालयों से ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। व्यापारी अपने उत्पादों को ऑनलाइन बेचकर व्यवसाय बढ़ा सकते हैं। सोशल मीडिया ने संवाद और सूचना के आदान-प्रदान के तरीके बदल दिए हैं।
हालांकि, इन्टरनेट का अत्यधिक प्रयोग कभी-कभी व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा, समय की बर्बादी और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए हमें इसका सावधानीपूर्वक और जिम्मेदारी से उपयोग करना चाहिए।
यदि इसका सही उपयोग किया जाए तो इन्टरनेट न केवल ज्ञान और सूचना का अमूल्य स्रोत है, बल्कि यह हमारे जीवन को और भी सुव्यवस्थित और आधुनिक बना सकता है। यह विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में भी सहायक है।
(iv) आत्मनिर्भर भारत
Ans. आज का भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है। आत्मनिर्भर भारत का मतलब केवल आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, तकनीकी और मानसिक रूप से स्वावलंबी होने का संदेश भी देता है। यदि देश के लोग अपने संसाधनों, कौशल और प्रतिभा पर भरोसा करें, तो हम किसी भी संकट का सामना कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान का मुख्य उद्देश्य है कि स्थानीय उद्योग, कृषि, स्टार्टअप, विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा दिया जाए। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और युवा सशक्त बनेंगे।
आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि हम आवश्यक वस्तुएँ और सेवाएँ अपने देश में ही उत्पादन करें, आयात पर निर्भरता कम करें और देश की आर्थिक शक्ति बढ़ाएँ। यह योजना देश के विकास के साथ-साथ नागरिकों में स्वावलंबन, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना भी जगाती है।
यदि हर नागरिक अपने कौशल और संसाधनों का सही उपयोग करे और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दे, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक और तकनीकी दृष्टि से भी विश्व में अग्रणी बन सकता है। आत्मनिर्भर भारत केवल एक अभियान नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और भविष्य का सपना है।
(v) पुस्तकालय से लाभ ।
Ans.