U.P Board Class 10 Hindi 801 (HD) Question Paper 2024

U.P Board Class 10 Hindi 801 (HD) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2024
हिंदी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट  पूर्णांक: 70

निर्देश:

i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।

iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।

iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।

v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।

vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।

vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।

viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।

खण्ड – ‘अ’

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ निबन्धकार, आलोचक एवं इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं-

(A) बालकृष्ण भट्ट
(B) पदुमलाल पुत्रालाल ‘बख्शी’
(C) रामचन्द्र शुक्ल
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) रामचन्द्र शुक्ल

2. ‘महादेवी वर्मा’ द्वारा रचित रेखाचित्र है-

(A) जिन्दगी मुस्कुराई
(B) अतीत के चलचित्र
(C) गाँव की साँझ
(D) बाजे पायलिया के घुँघरू

Ans. (B) अतीत के चलचित्र

3. ‘कोणार्क’ के रचनाकार हैं-

(A) जगदीश माथुर
(B) रामकुमार वर्मा
(C) जयशंकर प्रसाद
(D) विष्णु प्रभाकर

Ans. (B) रामकुमार वर्मा

4. ‘चलो चाँद पर चलें’ के रचनाकार हैं-

(A) धर्मवीर भारती
(B) जयप्रकाश ‘भारती’
(C) ‘अज्ञेय’
(D) मोहन राकेश

Ans. (A) धर्मवीर भारती

5. ‘तूफानों के बीच’ रचना की विधा है-

(A) कहानी
(B) उपन्यास
(C) एकांकी
(D) रिपोर्ताज

Ans. (D) रिपोर्ताज

6. ‘केशवदास’ किस काल के कवि हैं ?

(A) आदिकाल
(B) रीतिकाल
(C) भक्तिकाल
(D) आधुनिक काल

Ans. (B) रीतिकाल

7. ‘भारत-भारती’ के रचनाकार हैं-

(A) मैथिलीशरण गुप्त
(B) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(C) माखनलाल चतुर्वेदी
(D) सूरदास

Ans. (A) मैथिलीशरण गुप्त

8. ‘भारतेन्दु युग’ की समयावधि है-

(A) सन् 1900 से 1928 ई० तक
(B) सन् 1868 से 1900 ई० तक
(C) सन् 1919 से 1936 ई० तक
(D) सन् 1800 से 1826 ई० तक

Ans. (B) सन् 1868 से 1900 ई० तक

9. ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ की रचना नहीं है-

(A) ग्राम्या
(B) स्वर्णधूलि
(C) कामायनी
(D) युगान्त

Ans. (D) युगान्त

10. ‘रीतिमुक्त’ काव्यधारा के कवि हैं-

(A) बिहारीलाल
(B) पद्माकर
(C) केशवदास
(D) घनानन्द

Ans. (D) घनानन्द

11. हा ! रघुनन्दन प्रेम परीते ।
तुम बिन जियत बहुत दिन बीते ।।

उपर्युक्त पंक्तियों में प्रयुक्त रस है-

(A) वीर रस
(B) हास्य रस
(C) करुण रस
(D) रौद्र रस

Ans. (C) करुण रस

12. “ज्यौं आँखिनु सब देखियै, आँख न देखी जाँहि ।”

उपर्युक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?

(A) उपमा अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) श्लेष अलंकार
(D) उत्प्रेक्षा अलंकार

Ans. (C) श्लेष अलंकार

13. ‘सोरठा’ छन्द के पहले एवं तीसरे चरण में मात्राएँ होती हैं-

(A) 13-11 मात्राएँ
(B) 11-13 मात्राएँ
(C) 11-11 मात्राएँ
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) 11-13 मात्राएँ

14. ‘सुगम’ शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है-

(A) सु
(B) स
(C) सुग
(D) गम

Ans. (A) सु

15. ‘नवरत्न’ में समास है-

(A) कर्मधारय समास
(B) द्विगु समास
(C) तत्पुरुष समास
(D) अव्ययीभाव समास

Ans. (B) द्विगु समास

16. ‘पृथ्वी’ का पर्यायवाची शब्द नहीं है-

(A) भू
(B) धरा
(C) वसुधा
(D) प्रसून

Ans. (D) प्रसून

17. ‘त्वाम्’ शब्द में विभक्ति एवं वचन है-

(A) द्वितीया विभक्ति, एकवचन
(B) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
(C) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
(D) तृतीया विभक्ति, एकवचन

Ans. (A) द्वितीया विभक्ति, एकवचन

18. अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद हैं-

(A) चार
(B) आठ
(C) दो
(D) पाँच

Ans. (A) चार

19. ‘कर्तृवाच्य’ में प्रधानता होती है-

(A) क्रिया की
(B) विशेषण की
(C) कर्ता की
(D) कर्म की

Ans. (C) कर्ता की

20. जिनके अलग-अलग रूप वाक्यों में मिलते हैं, वे पद कहलाते हैं-

(A) विकारी पद
(B) अविकारी पद
(C) प्रत्यय पद
(D) अव्यय पद

Ans. (A) विकारी पद

खण्ड – ‘ब’

वर्णनात्मक प्रश्न

1. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

जो वृद्ध हो गये हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आये हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत । वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है । तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं । तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

(i) उपर्युक्त अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
Ans.
उपर्युक्त अवतरण ‘वर्तमान काल’ नामक पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
इन पंक्तियों में लेखक ने तरुणों और वृद्धों की मानसिकता का स्पष्ट चित्रण किया है। लेखक के अनुसार तरुणों का मन सदैव भविष्य की ओर उन्मुख रहता है। वे अपने आने वाले समय को उज्ज्वल, सफल और सुखद मानते हैं, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों से असंतुष्ट रहते हैं और भविष्य को शीघ्र प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।

इसके विपरीत वृद्धजन अपने जीवन के स्वर्णिम अतीत में जीते हैं। उन्हें अपने बीते हुए दिन मधुर और सुखद लगते हैं, इसलिए वे वर्तमान से संतुष्ट नहीं होते। वे चाहते हैं कि अतीत की वही परिस्थितियाँ और गौरव फिर से वर्तमान में लौट आएँ।

इस प्रकार लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि तरुण भविष्य की ओर आकर्षित होते हैं और वृद्ध अतीत में रमते हैं, इसलिए दोनों ही वर्तमान से असंतोष अनुभव करते हैं।

(iii) लेखक ने वर्तमान काल को सुधारों का काल क्यों कहा है ?
Ans.
लेखक ने वर्तमान काल को सुधारों का काल इसलिए कहा है क्योंकि वर्तमान में तरुण और वृद्ध—दोनों वर्ग असंतुष्ट रहते हैं। तरुण भविष्य को शीघ्र वर्तमान में लाना चाहते हैं, इसलिए वे परिवर्तन और क्रान्ति के पक्षधर होते हैं। वहीं वृद्ध अपने गौरवपूर्ण अतीत को वर्तमान में लौटते देखना चाहते हैं और उसकी रक्षा में लगे रहते हैं।

इन दोनों के परस्पर विरोधी विचारों और प्रयासों के कारण वर्तमान काल में निरन्तर संघर्ष, विचार-मंथन और परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। यही कारण है कि समाज में नये सुधार होते रहते हैं और वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

अथवा

ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वंद्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है, क्योंकि प्रतिद्वंद्विता से भी मनुष्य का विकास होता है। किन्तु, अगर आप संसार व्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे। मगर, याद रखिए कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकूलस से, जिस हरकूलस के बारे में इतिहासकारों का यह मत है कि वह कभी पैदा ही नहीं हुआ ।

(i) उपर्युक्त अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
Ans.
उपर्युक्त अवतरण ‘ईर्ष्या’ नामक पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक भगवतशरण उपाध्याय हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
इन पंक्तियों में लेखक ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करता है। लेखक के अनुसार ईर्ष्या समान स्तर या समान क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तियों के बीच ही उत्पन्न होती है। यही कारण है कि कोई भिखमंगा किसी करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता, क्योंकि दोनों के बीच कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होती।

लेखक यह भी बताता है कि इस दृष्टि से ईर्ष्या का एक सकारात्मक पक्ष भी हो सकता है। जब व्यक्ति किसी से प्रतिद्वंद्विता करता है, तो वह स्वयं को आगे बढ़ाने, परिश्रम करने और बेहतर बनने का प्रयास करता है। इस प्रकार प्रतिद्वंद्विता मनुष्य के व्यक्तित्व और क्षमताओं के विकास में सहायक सिद्ध होती है।

(iii) लेखक के अनुसार प्रतिद्वंद्विता का सकारात्मक पक्ष क्या है ?
Ans.
लेखक के अनुसार प्रतिद्वंद्विता का सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे मनुष्य का विकास होता है। प्रतिद्वंद्विता व्यक्ति को अधिक परिश्रम करने, अपनी योग्यताओं को निखारने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। इसके कारण मनुष्य निरन्तर प्रगति करता है और जीवन में उच्च लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करता है।

2. निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

मैया हौं न चरैहीँ गाइ ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोर्सी, मेरे पाइ पिराइ ।
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंह दिवाइ ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालिन, गारी देति रिसाइ ।
मैं पठवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरी अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
उपर्युक्त पद्यांश सूरदास द्वारा रचित पद से लिया गया है। इसमें बालकृष्ण की बाललीला का वर्णन है, जहाँ वे गाय चराने न जाने का बहाना बनाकर माता यशोदा से अपनी बालसुलभ चतुराई और भावुकता प्रकट करते हैं।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
इन पंक्तियों में बालकृष्ण की भोली-भाली चतुराई और माता यशोदा का वात्सल्यभाव व्यक्त हुआ है। कृष्ण अपनी माता से कहते हैं कि यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो बलराम से पूछ लीजिए, मैं अपनी सौगंध भी देता हूँ।

कृष्ण की यह बात सुनकर माता यशोदा को ग्वालों की शरारत पर क्रोध आ जाता है। वे क्रोधित होकर ग्वालों को डाँटती-फटकारती हैं और गालियाँ देती हैं। इस प्रकार इन पंक्तियों में कृष्ण की बालसुलभ सरलता तथा यशोदा के स्नेह और क्रोध—दोनों का सुंदर चित्रण हुआ है।

(iii) बालकृष्ण गाय चराने क्यों नहीं जाना चाहते हैं ?
Ans.
बालकृष्ण गाय चराने इसलिए नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि वहाँ अन्य ग्वाल उनके चारों ओर घिरकर उन्हें परेशान करते हैं और उनके पैरों में चोट लग जाती है। इस कारण उन्हें पीड़ा होती है और वे गाय चराने जाने से कतराते हैं।

अथवा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
उपर्युक्त पद्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ से लिया गया है। इसमें कवि ने पुष्प के माध्यम से देशभक्ति की भावना को व्यक्त किया है तथा मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले वीरों के प्रति श्रद्धा प्रकट की है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
इन पंक्तियों में कवि ने पुष्प के माध्यम से उच्चतम देशभक्ति की भावना व्यक्त की है। पुष्प ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे साधारण आभूषणों या देवताओं के सिर पर सजने का गौरव नहीं चाहिए। वह चाहता है कि उसे तोड़कर उस मार्ग पर बिछा दिया जाए, जिस रास्ते से होकर मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर आगे बढ़ते हैं।

कवि का आशय यह है कि देश के लिए बलिदान देने वाले वीरों के चरणों में समर्पित होना ही सबसे बड़ा सम्मान है। यह पंक्तियाँ त्याग, समर्पण और राष्ट्रप्रेम की भावना को प्रकट करती हैं।

(iii) उपर्युक्त अवतरण में पुष्प किसका प्रतीक है? पुष्प को किन चीजों की चाह नहीं है, और क्यों ?
Ans.
उपर्युक्त अवतरण में पुष्प त्याग, बलिदान और देशभक्ति का प्रतीक है। वह स्वयं को मातृभूमि के लिए समर्पित करने की भावना प्रकट करता है।

पुष्प को सुरबालाओं के गहनों में गुँथने, प्रेमियों की माला बनने, सम्राटों के शव पर चढ़ने तथा देवताओं के सिर पर सजने की चाह नहीं है, क्योंकि ये सभी बातें व्यक्तिगत सौन्दर्य, भोग और मिथ्या गौरव से जुड़ी हैं। पुष्प का उद्देश्य इन सब से ऊपर उठकर मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले वीरों के चरणों में समर्पित होना है। उसे यही सबसे बड़ा सम्मान और सार्थकता प्रतीत होती है।

3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:

‘विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव’ इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते। अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, खिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति। तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यते । अतः सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः ।
Ans.
सन्दर्भ :
उपर्युक्त संस्कृत गद्यांश हमारी भारतीय संस्कृति की मूल भावना को व्यक्त करता है, जिसमें ईश्वर की एकता तथा सभी धर्मों के प्रति समान भाव और सम्मान का संदेश दिया गया है।

हिन्दी अनुवाद :
“इस विश्व का सृष्टिकर्ता ईश्वर एक ही है”—यह भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धान्त है। विभिन्न मतों को मानने वाले लोग अलग-अलग नामों से उसी एक ईश्वर की उपासना करते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा (ख्रिस्त), अल्लाह आदि नाम उसी एक परमात्मा के हैं। उसी ईश्वर को लोग गुरु भी मानते हैं। अतः सभी मतों के प्रति समान भाव और सम्मान रखना हमारी संस्कृति का संदेश है।”

अथवा

ताडितः चन्द्रशेखरः पुनः पुनः ‘भारतं जयतु’ इति वदति । (एवं स पञ्चदशकशाघातैः ताडितः) यदा चन्द्रशेखरः कारागारात् मुक्तः बहिः आगच्छति, तदैव सर्वे जनाः तं परितः वेष्टयन्ति, बहवः बालकाः तस्य पादयोः पतन्ति, तं मालाभिः अभिनन्दयन्ति च ।

Ans. सन्दर्भ :
उपर्युक्त संस्कृत गद्यांश में महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद के देशप्रेम, साहस और जन-आदर का वर्णन किया गया है।

हिन्दी अनुवाद :
पीटे जाने पर भी चन्द्रशेखर बार-बार “भारत की जय हो” कहते रहते हैं। इस प्रकार वे पन्द्रह बेंतों के प्रहार से दण्डित किए गए। जब चन्द्रशेखर कारागार से मुक्त होकर बाहर आते हैं, तभी सभी लोग उन्हें चारों ओर से घेर लेते हैं। अनेक बालक उनके चरणों में गिर पड़ते हैं और लोग उन्हें मालाओं से सम्मानित करते हैं।

4. दिए गए संस्कृत पद्यांश का सन्दर्भ सहित, हिन्दी में अनुवाद कीजिए:

नितरां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप! कदापि मा कृथाः ।
अत्यन्तसरस हृदयो यतः परेषां गुणग्रहीताऽसि ।।

Ans. सन्दर्भ :
उपर्युक्त संस्कृत पद्यांश में कवि ने कूप (कुएँ) को संबोधित करते हुए उसके गुणों की प्रशंसा की है और विनम्रता व परोपकार की भावना का संदेश दिया है।

हिन्दी अनुवाद :
हे कूप (कुएँ)! तुम अपने को अत्यन्त नीच समझकर कभी दुःखी मत होना, क्योंकि तुम्हारा हृदय अत्यन्त उदार है, इसलिए तुम दूसरों के गुणों को ग्रहण करने वाले हो।

अथवा

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ।।

Ans. सन्दर्भ :
उपर्युक्त संस्कृत श्लोक में जीवन में मित्रता और मित्रों के प्रकार का विवेचन किया गया है। इसमें बताया गया है कि जीवन में अलग-अलग परिस्थितियों में मित्र कैसे होते हैं।

हिन्दी अनुवाद :
सार्थक (सच्चा) मित्र वह है जो यात्रा में साथी बने, गृहस्थ जीवन में मित्र वह है जो पत्नी के समान विश्वासयोग्य हो, बीमार व्यक्ति के लिए मित्र वही है जो उसकी सेवा करे, दान देने वाला मित्र वही है जो उदारता दिखाए, और मृत्यु के समय मित्र वही है जो साथ दे और संकट में सहारा बने।

5. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर दिए गए प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए:

(क) (i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के ‘पंचम सर्ग’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
पंचम सर्ग में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और उनके अद्वितीय संघर्ष का गहन चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस सर्ग में बताया गया है कि गांधीजी सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने देशवासियों के हक और न्याय की रक्षा के लिए कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। वे केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और असमानताओं के उन्मूलन के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।

इस सर्ग में उनके धैर्य, साहस और अनुशासन का विशेष उल्लेख है। गांधीजी अपने जीवन को उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों के अनुरूप ढालकर जनता को प्रेरित करते हैं। उनके शब्दों और कार्यों से लोगों में साहस और निष्ठा का भाव उत्पन्न होता है। इस सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि गांधीजी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की चिंता नहीं करते, बल्कि अपने देश और समाज के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं।

सारांश: पंचम सर्ग महात्मा गांधी के चरित्र, उनके सत्यनिष्ठ और अहिंसक संघर्ष, सामाजिक सेवा और देशभक्ति के संदेश का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है। यह सर्ग पाठकों में अनुकरणीय आदर्शों को अपनाने और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा जगाता है।

(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘महात्मा गाँधी’ के चरित्र की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के अनुसार महात्मा गांधी के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ:

  1. सत्यनिष्ठा (सत्यप्रियता) – गांधीजी अपने जीवन में सत्य के मार्ग का पालन करते थे और कभी भी असत्य या छल का सहारा नहीं लेते थे।
  2. अहिंसा का पालन – वे सभी परिस्थितियों में हिंसा से दूर रहते थे और अपने संघर्ष को अहिंसक माध्यम से आगे बढ़ाते थे।
  3. धैर्य और संयम – कठिन परिस्थितियों में भी उनका धैर्य और संयम अडिग रहता था।
  4. कर्तव्यपरायणता – उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-आराम को त्यागकर देश और समाज की सेवा को सर्वोपरि रखा।
  5. सामाजिक चेतना – गांधीजी सभी समाजिक अन्याय, असमानता और अत्याचार के खिलाफ जागरूक रहते थे और सुधार हेतु कार्य करते थे।
  6. साधारण जीवनशैली – वे साधारण जीवन बिताते थे, भौतिक सुख-सुविधाओं में लिप्त नहीं होते थे।
  7. जनसेवा और प्रेरक शक्ति – उनके विचार और कार्य लोगों में प्रेरणा, साहस और निष्ठा का भाव उत्पन्न करते थे।

महात्मा गांधी का चरित्र सत्य, अहिंसा, त्याग, धैर्य और समाजसेवा का आदर्श है, जो उनके अनुयायियों और सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है।

(ख) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर जवाहरलाल नेहरू का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर जवाहरलाल नेहरू का चरित्र चित्रण:

खण्डकाव्य ‘ज्योति जवाहर’ में जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व और जीवन का आदर्श चित्र प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  1. देशभक्ति – नेहरूजी अपने जीवन में देश की सेवा को सर्वोपरि मानते थे। वे स्वतंत्र भारत के निर्माण और प्रगति के लिए समर्पित थे।
  2. सत्यनिष्ठा और निष्ठा – वे अपने आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ निष्ठावान थे और कभी समझौता नहीं करते थे।
  3. शिक्षित और दूरदर्शी – वे विद्वान, सूझ-बूझ वाले और दूरदर्शी नेता थे, जो राष्ट्र की दीर्घकालिक भलाई के लिए सोचते थे।
  4. सहनशीलता और धैर्य – कठिन परिस्थितियों में भी उनका धैर्य अडिग रहता था।
  5. समानता और मानवता – वे सभी समाजिक वर्गों के प्रति समान दृष्टिकोण रखते थे और मानवता का आदर करते थे।

नेहरू का चरित्र आदर्श नेतृत्व, द्रढ़ निश्चय, देशभक्ति और सामाजिक सेवा का प्रतीक है।

(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के कथानक का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू के जीवन और उनके संघर्षों का चित्रण किया गया है। इसमें उनके बाल्यकाल, शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और राजनीतिक जीवन का वर्णन है। कविता में दिखाया गया है कि कैसे नेहरूजी ने अपने ज्ञान, धैर्य और साहस के बल पर देशवासियों को एकजुट किया और स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

काव्य में उनके नेतृत्व, देशभक्ति और मानवता के प्रति समर्पण को उजागर किया गया है। यह खण्डकाव्य पाठकों में प्रेरणा उत्पन्न करता है और उन्हें नैतिक मूल्यों, समाजसेवा और देशभक्ति की ओर उन्मुख करता है।

(ग) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग ‘भामाशाह’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
सप्तम सर्ग में भामाशाह का अद्वितीय योगदान और महान राष्ट्रभक्ति का चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस सर्ग में बताया गया है कि जब मेवाड़ पर संकट का समय आया और महाराणा प्रताप को अपने राज्य की रक्षा के लिए धन, सेना और आवश्यक साधनों की आवश्यकता पड़ी, तब भामाशाह ने बिना किसी स्वार्थ के अपनी सम्पूर्ण संपत्ति, धन-संपत्ति और संसाधनों को महाराणा प्रताप की सेवा में समर्पित कर दिया।

भामाशाह ने केवल धन नहीं दिया, बल्कि अपने साहस, बुद्धिमत्ता और नेतृत्व कौशल से भी महाराणा प्रताप का मार्गदर्शन किया। उसकी यह तत्परता और त्याग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण राज्य और मातृभूमि की रक्षा के लिए थी। इस सर्ग में भामाशाह की देशभक्ति, त्याग, उदारता और वीरता को अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि कैसे भामाशाह और महाराणा प्रताप के संघर्षों ने मेवाड़ को स्वतंत्र और गौरवशाली बनाए रखा। पाठक इस सर्ग से साहस, त्याग और निष्ठा की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए ।
Ans.
‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ (विस्तृत):

  1. साहस और वीरता – नायक और उसके सहयोगी जैसे भामाशाह संकट के समय भी डरते नहीं हैं। वे शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं।
  2. देशभक्ति – उनका जीवन पूरी तरह मातृभूमि और राज्य की सेवा के लिए समर्पित है। वे अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की चिंता नहीं करते।
  3. त्याग और समर्पण – नायक और भामाशाह दोनों अपने धन, संसाधनों और समय का त्याग करके अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।
  4. सत्यनिष्ठा और दृढ़ निश्चय – वे अपने सिद्धांतों और धर्म के मार्ग पर अडिग रहते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
  5. नेतृत्व और निर्णय क्षमता – संकट के समय नायक अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करते हैं और रणनीति के माध्यम से संकट को अवसर में बदलते हैं।
  6. उदात्त विचार और आदर्श – उनके विचार उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों पर आधारित हैं, जो पाठकों को प्रेरित करते हैं।
  7. सामाजिक सेवा और प्रेरक व्यक्तित्व – उनका कार्य केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज और राज्य की भलाई के लिए होता है।

सारांश: ‘मेवाड़ मुकुट’ का नायक और भामाशाह जैसे चरित्र वीरता, देशभक्ति, त्याग, नेतृत्व, साहस और नैतिकता के सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। ये चरित्र न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि आज के समय में भी समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

(घ) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘प्रस्थान’ सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘प्रस्थान’ सर्ग में श्रीकृष्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटना का वर्णन किया गया है, जिसमें उनका धरती पर अपना कर्तव्य पूर्ण करने के बाद पुनः अपने दिव्य स्वरूप में लौटने का प्रसंग है। इस सर्ग में दर्शाया गया है कि श्रीकृष्ण ने मानवता और धर्म की रक्षा के लिए अनेक लीलाएँ और कार्य किए। उन्होंने धर्म, न्याय और सत्य के मार्ग पर चलकर अपने अनुयायियों और भक्तों को प्रेरित किया।

सर्ग में यह भी बताया गया है कि श्रीकृष्ण का प्रस्थान उनके दिव्य और अलौकिक रूप का प्रतीक है। उनका जाना केवल शोक का कारण नहीं है, बल्कि उनके द्वारा दिए गए उपदेशों और आदर्शों का स्थायी प्रभाव समाज में बना रहता है। इस सर्ग में भक्तों और अनुयायियों की श्रद्धा, प्रेम और शोक का भाव भी प्रस्तुत किया गया है।

(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘श्रीकृष्ण’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण:

  1. सत्यनिष्ठ और धर्मपरायण – श्रीकृष्ण हमेशा धर्म और न्याय के मार्ग पर चलते हैं और अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा के साथ करते हैं।
  2. दर्शनीय बुद्धिमत्ता और नीति-शास्त्रज्ञ – वे कठिन परिस्थितियों में भी विवेक और चातुर्य के साथ निर्णय लेते हैं।
  3. भक्तों और अनुयायियों के प्रति प्रेम और संरक्षण – अपने भक्तों और समाज के लिए उनका प्रेम और संरक्षण अडिग रहता है।
  4. साहस और वीरता – श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाओं और युद्धों में अपने साहस और पराक्रम का परिचय दिया।
  5. उदात्त विचार और आदर्श नेतृत्व – उनका व्यक्तित्व लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उन्होंने नेतृत्व के आदर्श प्रस्तुत किए।
  6. शांति और क्षमाशीलता – वे अपनी वीरता और शक्ति के बावजूद करुणामयी और क्षमाशील हैं।
  7. दिव्य और अलौकिक गुण – उनके कार्य और व्यक्तित्व अलौकिक और प्रेरणादायक हैं, जो भक्तों में श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करते हैं।

सारांश: श्रीकृष्ण का चरित्र सत्य, धर्म, बुद्धिमत्ता, साहस, करुणा और नेतृत्व का आदर्श है। उनका प्रस्थान और लीलाएँ मानवता और समाज को प्रेरित करती हैं, जिससे वे आज भी आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्मरणीय हैं।

(ङ) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
तृतीय सर्ग में सुभाष चंद्र बोस के साहस, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान का वर्णन है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि कैसे सुभाष ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और भारतीय स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना काम किया।

सर्ग में उनके नेतृत्व, दृढ़ निश्चय और क्रांतिकारी भावना को चित्रित किया गया है। उनके अदम्य साहस और कर्तव्यपरायणता ने अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया। तृतीय सर्ग में सुभाष का व्यक्तित्व उनके उत्साह, देशभक्ति और बलिदान की भावना के माध्यम से पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है।

(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण:

  1. देशभक्ति और साहस – सुभाष चंद्र बोस अपने देश के प्रति अत्यंत समर्पित और साहसी थे। वे भारतीय स्वतंत्रता के लिए किसी भी कठिनाई का सामना करने को तैयार रहते थे।
  2. नेतृत्व और दृढ़ निश्चय – वे अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करने वाले दूरदर्शी नेता थे। उनके निर्णय और कार्य दृढ़ निश्चय और साहस से परिपूर्ण थे।
  3. संकल्प और आत्म-त्याग – उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-आराम का त्याग करके स्वतंत्रता संग्राम में पूर्ण रूप से योगदान दिया।
  4. प्रेरक व्यक्तित्व – उनके विचार और क्रियाएँ लोगों में साहस और उत्साह उत्पन्न करती थीं।
  5. नैतिकता और आदर्श नेतृत्व – उनके कार्य और व्यक्तित्व उच्च नैतिक मूल्यों पर आधारित थे, जो समाज और युवाओं के लिए आदर्श बने।

सारांश: सुभाष चंद्र बोस का चरित्र साहस, दृढ़ निश्चय, देशभक्ति, नेतृत्व और बलिदान का प्रतीक है। ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में उनका व्यक्तित्व पाठकों को प्रेरणा देता है और स्वतंत्रता, कर्तव्य और निष्ठा की भावना को जागृत करता है।

(च) (i) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चन्द्रशेखर आजाद’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण:

चन्द्रशेखर आजाद का व्यक्तित्व साहस, देशभक्ति और बलिदान का आदर्श है। उनका चरित्र निम्नलिखित विशेषताओं से पूर्ण है:

  1. देशभक्ति – आजाद का सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख और जीवन की परवाह किए बिना स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।
  2. साहस और वीरता – वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी निडर रहते थे। अंग्रेजों की धमकियों और कैद के बावजूद उनका साहस कभी नहीं डिगा।
  3. कर्तव्यनिष्ठा – उन्होंने अपने कर्तव्य और आदर्शों के प्रति अडिग रहकर राष्ट्र और जनता के हित में कार्य किया।
  4. स्वतंत्र और दृढ़ व्यक्तित्व – आजाद का व्यक्तित्व स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक था। वे किसी के सामने झुकने वाले नहीं थे।
  5. लोकप्रियता और प्रेरक शक्ति – उनके व्यक्तित्व और कार्य ने समाज और अन्य क्रांतिकारियों में प्रेरणा, साहस और उत्साह उत्पन्न किया।

सारांश: चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र साहस, देशभक्ति, बलिदान, कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व का अद्वितीय उदाहरण है। ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य में उनका व्यक्तित्व युवाओं के लिए प्रेरणा और आदर्श प्रस्तुत करता है।

(ii) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
एक सर्ग में वर्णित है कि कैसे चन्द्रशेखर आजाद जेल से निकलकर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हैं। उन्होंने कारागार की यातनाओं और पन्द्रह बेंतों की सजा को सहन किया। जेल से मुक्त होने के बाद जनता ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। बच्चे उनके चरणों में गिर पड़े और लोग उन्हें मालाओं से अभिनन्दन करते हैं। इस सर्ग में आजाद की देशभक्ति, साहस, अनुयायियों के प्रति प्रेम और प्रेरक नेतृत्व को चित्रित किया गया है।

सर्ग का मुख्य संदेश यह है कि सच्चे स्वतंत्रता सेनानी अपने देश और आदर्शों के लिए जीवन को त्यागने को तैयार रहते हैं और उनका योगदान समाज और राष्ट्र के लिए अमूल्य होता है।

(छ) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ‘कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान’ की कथाबस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
तृतीय सर्ग में कर्ण के उदार और साहसी व्यक्तित्व का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस सर्ग में दर्शाया गया है कि कर्ण ने अतुलनीय दानशीलता का परिचय देते हुए अपने असाधारण कवच और कुण्डल को दान दे दिया। यह दान उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुरक्षा और जीवन की चिंता किए बिना किया, क्योंकि उनका मानना था कि दूसरों की सहायता करना और धर्म का पालन करना सर्वोपरि है।

सर्ग में यह भी दिखाया गया है कि कर्ण की यह उदारता और दानशीलता उनके महान व्यक्तित्व और नैतिक आदर्शों का प्रतीक है। इस दान के माध्यम से उनका साहस, धर्मनिष्ठा और दूसरों के प्रति करुणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ:

  1. उदारता और दानशीलता – कर्ण हमेशा दूसरों की सहायता करने को तत्पर रहते थे। उनका सबसे बड़ा उदाहरण कवच-कुण्डल दान है।
  2. साहस और वीरता – कर्ण युद्ध में अपने साहस और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। वे अपने दुश्मनों से डरते नहीं थे।
  3. धर्मनिष्ठा – वे धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलते थे और अपने आदर्शों का पालन कभी नहीं छोड़ते थे।
  4. त्याग और निःस्वार्थ भाव – कर्ण ने अपने व्यक्तिगत लाभ, सम्मान और सुरक्षा की चिंता किए बिना दूसरों के हित को सर्वोपरि रखा।
  5. सद्गुण और आदर्श व्यक्तित्व – उनका जीवन और कर्म आज भी पाठकों और युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

सारांश: कर्ण का चरित्र साहस, उदारता, निष्ठा, त्याग और आदर्श नेतृत्व का प्रतीक है। खण्डकाव्य में उनका व्यक्तित्व पाठकों में नैतिकता, पराक्रम और दानशीलता की भावना उत्पन्न करता है।

(ज) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ में कर्मवीर भरत के अदम्य साहस, कर्तव्यपरायणता और न्यायप्रियता का चित्रण किया गया है। इस सर्ग में वर्णित है कि भरत ने अपने राज्य में न्याय, अनुशासन और प्रशासनिक कुशलता बनाए रखने के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने राजभवन में शासन की जिम्मेदारियों को निष्ठा और परिश्रम के साथ निभाया।

सर्ग में यह भी दर्शाया गया है कि राम और उनके अनुयायियों की सहायता और मार्गदर्शन से भरत ने राज्य और जनता की सेवा की। यह सर्ग उनके नेतृत्व, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा की महानता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘राम’ के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर राम के चरित्र की विशेषताएँ:

  1. सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता – राम सदैव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलते हैं। वे अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहते हैं।
  2. कर्तव्यनिष्ठा – अपने परिवार और राज्य के प्रति उनका कर्तव्यपालन प्रेरक है।
  3. साहस और वीरता – कठिन परिस्थितियों में भी राम निडर रहते हैं और अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।
  4. करुणा और सहानुभूति – वे अपने अनुयायियों और प्रजा के प्रति दयालु और सहानुभूतिपूर्ण हैं।
  5. नेतृत्व और मार्गदर्शन – राम अपने अनुयायियों और नागरिकों का मार्गदर्शन करते हैं, उन्हें प्रेरित और उत्साहित करते हैं।
  6. न्यायप्रिय और उदात्त विचार – उनका निर्णय और कार्य उच्च नैतिक मूल्यों और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं।

सारांश: राम का चरित्र धर्म, साहस, करुणा, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श प्रस्तुत करता है। खण्डकाव्य में राम के गुण पाठकों और युवाओं के लिए प्रेरक हैं, जो उन्हें नैतिकता और साहस का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं।

(झ) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘मेघनाद’ सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘मेघनाद’ सर्ग में रावण के पुत्र मेघनाद के अद्भुत पराक्रम और युद्ध कौशल का चित्रण किया गया है। इस सर्ग में मेघनाद के वीरता, साहस और रणनीति की विशेषताओं को उजागर किया गया है। मेघनाद ने युद्ध में अपनी शक्ति और युक्तियों से राम और उनके अनुयायियों को चुनौती दी।

सर्ग में यह दिखाया गया है कि मेघनाद केवल वीर नहीं था, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और साहसी योद्धा भी था। इसके माध्यम से युद्ध में धैर्य, साहस और कर्तव्यपरायणता का महत्व पाठकों के सामने स्पष्ट किया गया है।

(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘लक्ष्मण’ का चरित्र-वित्रण कीजिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मण का चरित्र-वित्रण:

  1. साहस और वीरता – लक्ष्मण ने युद्ध में अपने साहस और पराक्रम का अद्वितीय परिचय दिया।
  2. भाईप्रेम और निष्ठा – राम के प्रति उनका प्रेम और निष्ठा अडिग है। वे हमेशा अपने बड़े भाई राम के साथ खड़े रहते हैं।
  3. कर्तव्यनिष्ठा – लक्ष्मण ने अपने कर्तव्य का पालन पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ किया।
  4. संकल्प और धैर्य – कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उनका धैर्य और संकल्प उन्हें मजबूत बनाता है।
  5. रणनीति और बुद्धिमत्ता – लक्ष्मण युद्ध में बुद्धिमत्ता और रणनीति का उपयोग कर दुश्मनों को परास्त करते हैं।
  6. सत्यनिष्ठा और नैतिकता – उनका व्यक्तित्व नैतिकता और आदर्शों पर आधारित है।

सारांश: लक्ष्मण का चरित्र साहस, निष्ठा, प्रेम, धैर्य और बुद्धिमत्ता का अद्भुत मिश्रण है। ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में उनके कार्य और व्यक्तित्व पाठकों को कर्तव्यपरायणता और वीरता की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

6. (क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :

(i) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
Ans.
जीवन परिचय:
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के पटना जिले के ‘कालीकोट’ गाँव में हुआ। वे हिंदी साहित्य के महान कवि, विचारक और राष्ट्रप्रेमी व्यक्तित्व के धनी थे। दिनकर का साहित्य विशेष रूप से वीर रस और देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत है। उनके काव्य में समाज सुधार, नैतिकता, संघर्ष और मानव मूल्य प्रमुख रूप से व्यक्त होते हैं।

दिनकर का बचपन ग्रामीण वातावरण में बीता, जहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपरा और देशभक्ति की गहरी समझ विकसित की। उन्होंने अपने जीवन में साहित्य और राष्ट्रसेवा दोनों को सर्वोपरि माना। वे अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों से गहराई से प्रभावित हुए और उन्होंने अपने काव्य में स्वतंत्रता संग्राम, वीरता और नैतिकता के संदेश को स्थान दिया।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में ‘रस्मिरथ’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘उर्वशी’ और ‘संस्कृति और जीवन’ शामिल हैं। विशेष रूप से ‘रस्मिरथ’ महाभारत के पात्रों और युद्ध की वीरता को भावपूर्ण और राष्ट्रीय चेतना के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इस काव्य में न केवल युद्ध और वीरता का गौरव है, बल्कि नैतिक मूल्य और कर्तव्यपरायणता की सीख भी समाहित है।

(ii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
Ans.
जीवन परिचय:
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के ज़रियापुर गाँव में हुआ। वे भारत के पहले राष्ट्रपति बने और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से योगदान देने वाले प्रमुख नेता रहे। उनका व्यक्तित्व सरल, अनुशासित, ज्ञानवान और राष्ट्रभक्त था। शिक्षा और सामाजिक चेतना के प्रति उनका उत्साह अत्यधिक था।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने जनता को जागरूक करने, शिक्षा और सामाजिक सुधार के लिए लेखन और व्याख्यानों के माध्यम से भी कार्य किया। उनके कार्यों में सादगी, नैतिकता और आदर्श नेतृत्व स्पष्ट दिखाई देता है।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख रचनाओं में आत्मकथा ‘मैं और मेरा समय’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस रचना में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रसेवा और अपने जीवन के अनुभवों का विस्तार से उल्लेख किया है। इसके अलावा उनके कई लेख और भाषण भारतीय समाज और राष्ट्र के विकास की दिशा में प्रेरक हैं।

(iii) भगवतशरण उपाध्याय ।
Ans.
जीवन परिचय:
भगवतशरण उपाध्याय का जन्म 30 अक्टूबर 1898 को बिहार के कटिहार जिले में हुआ। वे हिंदी साहित्य में विशेष रूप से राष्ट्रभक्ति, समाज सुधार और नैतिक शिक्षा के कवि और लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका साहित्य सरल, प्रभावशाली और आम जनता तक पहुँचने योग्य है।

उपाध्याय जी का जीवन साहित्य और समाज सेवा में समर्पित रहा। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और समाज सुधार में अपनी लेखनी का भरपूर उपयोग किया। उनके साहित्य में समाज के प्रति जागरूकता, नैतिकता, मानवता और देशभक्ति का गहन प्रभाव देखा जा सकता है।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘मैत्रेय’, ‘अंगूर’, और ‘भारत की आत्मा’ शामिल हैं। इन रचनाओं में उन्होंने मानवता, धर्म, समाज और राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को विस्तारपूर्वक व्यक्त किया है। उनके काव्य और लेखन का उद्देश्य केवल साहित्यिक सुंदरता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र में जागरूकता और सुधार लाना भी था।

(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) सुभद्रा कुमारी चौहान
Ans.
जीवन परिचय (विस्तृत):
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में हुआ। वे हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्री और स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक लेखिका थीं। उनका साहित्य देशभक्ति, साहस, वीरता और समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत है।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने जीवन में शिक्षा और साहित्य दोनों को उच्च प्राथमिकता दी। वे न केवल कवि थीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय राष्ट्रभक्त भी थीं। उनके लेखन में महिलाओं के अधिकार, सामाजिक जागरूकता और देशभक्ति के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनका व्यक्तित्व साहसी, निडर और प्रेरक था।

प्रमुख रचना:
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘झाँसी की रानी’ है। यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस, वीरता और देशभक्ति का गौरवपूर्ण चित्रण करती है। इस काव्य ने न केवल देशभक्ति की भावना को लोगों में जगाया, बल्कि युवाओं को अपने कर्तव्य और आदर्श के प्रति जागरूक किया।

(ii) मैथिलीशरण गुप्त
Ans.
जीवन परिचय (विस्तृत):
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के विरल गाँव में हुआ। वे हिंदी के प्रमुख राष्ट्रकवि और समाज सुधारक थे। उनका काव्य विशेष रूप से वीर रस, देशभक्ति और सामाजिक चेतना से परिपूर्ण है। गुप्त जी ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और भारतीयता के गौरव को अपने काव्य में उजागर किया।

मैथिलीशरण गुप्त का व्यक्तित्व सरल, गंभीर और विचारशील था। वे जीवन भर सत्य, नैतिकता और देशभक्ति के आदर्शों के प्रति निष्ठावान रहे। उनके काव्य में राष्ट्रप्रेम, वीरता और सामाजिक सुधार के संदेश स्पष्ट रूप से मिलते हैं। उन्होंने अपने कविताओं के माध्यम से समाज में जागरूकता और राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहित किया।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘साकेत’, ‘भारत भारती’, और ‘जयद्रथ वध’ शामिल हैं। विशेष रूप से ‘भारत भारती’ ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति की भावना को पाठकों तक पहुँचाया। यह काव्य राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और नैतिकता का प्रतीक माना जाता है।

(iii) बिहारीलाल
Ans.
जीवन परिचय (विस्तृत):
बिहारीलाल हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि और रीतिकाव्य के प्रभावशाली प्रतिनिधि हैं। वे रीतिकाव्य, शृंगार रस और नैतिक काव्य के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका साहित्य भाव, रस और नैतिक संदेश से परिपूर्ण है। बिहारीलाल का व्यक्तित्व गंभीर, विचारशील और साहित्यिक निष्ठा से ओतप्रोत था।

वे समाज के नैतिक मूल्यों, जीवन की सादगी और सौंदर्य की प्रशंसा के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके काव्य में शब्दों की मिठास, अर्थ की गहनता और भावों की प्रखरता देखी जा सकती है।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख रचना ‘सुभाषितावली’ है। इसमें जीवन के महत्वपूर्ण नैतिक और सामाजिक मूल्यों का संग्रह है। यह रचना न केवल साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट है, बल्कि जीवन के व्यवहारिक और नैतिक मार्गदर्शन का भी साधन है।

(iv) केदारनाथ सिंह ।
Ans.
जीवन परिचय (विस्तृत):
केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के पिलिबीथ गाँव में हुआ। वे हिंदी के आधुनिक कवि, आलोचक और विचारक थे। उनके काव्य में समकालीन जीवन, मानवीय संवेदनाएँ, समाजिक और व्यक्तिगत संघर्ष, और प्रकृति का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है।

केदारनाथ सिंह का व्यक्तित्व साधारण, संवेदनशील और जागरूक था। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से जीवन के जटिल अनुभवों को सरल और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। उनके काव्य की विशेषता है कि यह भावनाओं को मार्मिकता और गहनता के साथ व्यक्त करता है, और पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।

प्रमुख रचना:
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘वह तोड़ता पत्थर’, ‘आदम का सांझा’, और ‘संसार’ शामिल हैं। विशेष रूप से ‘वह तोड़ता पत्थर’ में उन्होंने जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों के बीच मनुष्य की साहस, धैर्य और संघर्षशीलता को उजागर किया है।

7. अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए, जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो ।
Ans.
श्लोक:
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥”

अर्थ और व्याख्या:
इस श्लोक का अर्थ है कि सभी प्राणी सुखी हों, सभी स्वस्थ हों, सभी के लिए शुभ कार्य और घटनाएँ हों, और किसी को भी दुःख का भागी न होना पड़े। यह श्लोक सामाजिक समरसता, अहिंसा, और समग्र मानव कल्याण का संदेश देता है।

श्लोक हमें सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की भावना के महत्व को समझाता है। यह केवल व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण में भी मार्गदर्शक है।

विशेष टिप्पणी:
यह श्लोक हमें समानता, करुणा और मानवता की सीख देता है। इसे कण्ठस्थ रखना और अपने जीवन में लागू करना न केवल साहित्यिक अभ्यास के लिए, बल्कि सही जीवन मूल्यों को अपनाने के लिए भी आवश्यक है।

8. अपने निवास स्थान के आसपास मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगर/जनपद के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए ।
Ans.

प्रति,
स्वास्थ्य अधिकारी,
नगर/जनपद कार्यालय,
[नगर का नाम]।

विषय: मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई हेतु।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं [आपका नाम], निवासी [आपका मोहल्ला/गाँव का नाम], आपके ध्यान में एक समस्या लाना चाहता हूँ। हमारे मोहल्ले की नालियाँ लंबे समय से अस्वच्छ और जाम हुई हुई हैं। इससे गंदगी, बदबू और मच्छरों की समस्या उत्पन्न हो गई है। गर्मियों में यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी अनेक बीमारियाँ फैलने का खतरा बढ़ गया है।

मैं आपसे विनम्र निवेदन करता हूँ कि हमारे मोहल्ले की नालियों की तत्काल और नियमित सफाई करवाई जाए। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में नालियाँ समय-समय पर साफ रखी जाएँ, ताकि गंदगी और बीमारियों का फैलाव रोका जा सके।

आपकी सहायता और कार्रवाई के लिए हम मोहल्ले के सभी लोग आपके आभारी होंगे।

धन्यवाद।

भवदीय,
[आपका नाम]
[आपका पता/मोहल्ला]
[दिनांक]

अथवा

अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को छात्रवृत्ति के लिए एक आवेदनपत्र लिखिए ।
Ans.

प्रधानाचार्य महोदय,
[विद्यालय का नाम]
[विद्यालय का पता]

विषय: छात्रवृत्ति के लिए आवेदन।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं, [आपका नाम], कक्षा [कक्षा का नाम] का छात्र/छात्रा, आपके विद्यालय में अध्ययनरत हूँ। मेरा विद्यार्थी क्रमांक [क्रमांक] है।

मैं आर्थिक रूप से कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा/रही हूँ। मेरे परिवार की आय सीमित है और मेरी पढ़ाई जारी रखने में आर्थिक सहायता की आवश्यकता है। इसी कारण मैं आपसे छात्रवृत्ति प्रदान करने की प्रार्थना करता/करती हूँ।

मैंने विद्यालय में हमेशा अच्छे अंक प्राप्त किए हैं और सभी शैक्षणिक एवं सह-पाठयक्रम गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया है। यदि मुझे छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है तो मैं अपनी पढ़ाई में और अधिक मेहनत करने का वचन देता/दती हूँ।

आपसे विनम्र निवेदन है कि मेरी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मुझे छात्रवृत्ति देने की कृपा करें।

धन्यवाद।

भवदीय,
[आपका नाम]
कक्षा: [कक्षा]
[विद्यालय का नाम]
[दिनांक]

9. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए।

(i) भूमेः गुरुतरं किम् अस्ति ?
Ans.
भूमेः गुरुतरं पदार्थं भूमिः एव अस्ति। भूमिः सर्वेभ्यः जीवभ्यः आधारं प्रदत्ते।
(अर्थ: पृथ्वी का सबसे भारी या प्रमुख तत्व पृथ्वी ही है। यह सभी जीवों के लिए आधार प्रदान करती है।)

(ii) विद्या केन वर्धते ?
Ans.
विद्या अध्यानेन, शीलवृद्ध्यै च वर्धते।
(अर्थ: विद्या अध्ययन और अच्छे संस्कारों के द्वारा बढ़ती है।)

(iii) चन्द्रशेखरः कः आसीत् ?
Ans.
चन्द्रशेखरः भारतस्य स्वाधीनता संग्रामस्य वीरः आसीत्।
(अर्थ: चन्द्रशेखर आजाद भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक वीर था।)

(iv) वाराणस्यां नगयाँ कति विश्वविद्यालयाः सन्ति ?
Ans.
वाराणस्यां नगरे द्वौ विश्वविद्यालयौ सन्ति।
(अर्थ: वाराणसी नगर में दो विश्वविद्यालय हैं। — यह उत्तर आपके पाठ्यक्रम अनुसार भिन्न हो सकता है। यदि आपके पाठ्यपुस्तक में अधिक विश्वविद्यालयों का उल्लेख है, तो संख्या उसी अनुसार लिखें।)

10. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :

(i) पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या एवं समाधान
Ans.
पर्यावरण-प्रदूषण आज हमारे जीवन का एक गंभीर संकट बन गया है। यह समस्या मुख्यतः वायु, जल, ध्वनि और मृदा प्रदूषण के रूप में दिखाई देती है। फैक्ट्री, वाहन, प्लास्टिक, रासायनिक अपशिष्ट और अनियंत्रित निर्माण कार्य इसके प्रमुख कारण हैं। वायु प्रदूषण से सांस की बीमारियाँ और फेफड़ों के रोग बढ़ रहे हैं। जल प्रदूषण से नदियाँ, तालाब और झीलें गंदी हो रही हैं, जिससे मछलियों और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। ध्वनि प्रदूषण से मानसिक तनाव और सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है।

इस समस्या का समाधान केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि समाज और प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। हमें साफ-सफाई, वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक का कम उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। सरकार को कड़े नियम और दंड लागू करने चाहिए ताकि प्रदूषण पर नियंत्रण रखा जा सके।

यदि हम सभी मिलकर प्रयास करें और अपने दैनिक जीवन में सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल आदतें अपनाएँ, तो हम पर्यावरण को स्वच्छ, सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक बना सकते हैं। पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है, क्योंकि पृथ्वी और हमारे भविष्य की सुरक्षा इसी पर निर्भर है।

(ii) इण्टरनेट
Ans.
इंटरनेट आज हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। यह ज्ञान, सूचना और संचार का अद्भुत माध्यम है। इसके माध्यम से हम किसी भी विषय पर जानकारी कुछ ही सेकंड में प्राप्त कर सकते हैं। ऑनलाइन शिक्षा, बैंकिंग, व्यवसाय, सामाजिक नेटवर्किंग और मनोरंजन में इसका व्यापक उपयोग है। इंटरनेट ने दुनिया को एक छोटे गाँव के रूप में जोड़ दिया है, जहाँ दूर-दराज के लोग भी एक-दूसरे से संपर्क कर सकते हैं।

हालांकि, इंटरनेट के अधिक उपयोग से आंखों की कमजोरी, मानसिक तनाव, समय की बर्बादी और साइबर अपराध जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही हैं। गलत सूचना और ऑनलाइन फ्रॉड भी चिंता का विषय हैं। इसलिए हमें इंटरनेट का संतुलित और सुरक्षित उपयोग करना चाहिए।

इंटरनेट का सही और जागरूक उपयोग हमें ज्ञानवर्धन, सूचना प्राप्ति और रचनात्मकता के क्षेत्र में मदद करता है। इसके माध्यम से हम शिक्षा, व्यवसाय और व्यक्तिगत विकास में अपने जीवन को सरल और बेहतर बना सकते हैं। अतः इंटरनेट एक वरदान है, यदि इसे समझदारी और अनुशासन के साथ उपयोग किया जाए।

(iii) छात्र तथा अनुशासन
Ans.
छात्र जीवन एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें अनुशासन का विशेष महत्व है। अनुशासन के बिना कोई भी छात्र अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अनुशासन का अर्थ केवल नियमों का पालन करना नहीं है, बल्कि समय का सदुपयोग, अपने कार्यों की जिम्मेदारी और सही व्यवहार को अपनाना भी है।

अनुशासनहीन छात्र अक्सर पढ़ाई में ध्यान नहीं देते और समय का सही उपयोग नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप उनका भविष्य प्रभावित होता है। विद्यालय में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, जैसे समय पर कक्षा में उपस्थित होना, शिक्षकों के निर्देश का पालन करना, और कक्षा में शांति बनाए रखना

अनुशासन वाले छात्र न केवल व्यक्तिगत रूप से सफल होते हैं, बल्कि समाज के लिए भी आदर्श बनते हैं। अनुशासन हमें सकारात्मक सोच, आत्म-नियंत्रण और लक्ष्य की प्राप्ति में मदद करता है। अतः प्रत्येक छात्र के लिए अनुशासन अपनाना और जीवन में इसे निभाना अत्यंत आवश्यक है।

(iv) किसी एक त्योहार का वर्णन
Ans.
दीपावली भारत का प्रमुख और अत्यंत उल्लासपूर्ण त्योहार है। यह अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और ज्ञान पर अज्ञान की विजय का प्रतीक है। दीपावली के दिन लोग अपने घरों और दुकानों को दीपक और रंगोली से सजाते हैं। इस दिन मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं, पूजा-अर्चना की जाती है और परिवार व मित्र मिलकर खुशियाँ मनाते हैं।

दीपावली केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह सदाचार, भाईचारा और सामाजिक समरसता की शिक्षा भी देती है। बच्चे और बुजुर्ग मिलकर इस पर्व का आनंद लेते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। इसके माध्यम से समाज में सकारात्मकता और प्रेम का संदेश फैलता है।

त्योहार के दौरान सुरक्षा और पर्यावरण का ध्यान रखना भी आवश्यक है। आजकल पटाखों के उपयोग से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, इसलिए हमें अधिक से अधिक दीप जलाकर और सजावट करके इसे मनाना चाहिए। दीपावली हमारी संस्कृति और परंपरा का गौरवपूर्ण प्रतीक है।

(v) नई शिक्षा नीति ।
Ans.
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी सुधार है। इसका उद्देश्य सर्वांगीण शिक्षा, व्यावहारिक ज्ञान और कौशल विकास प्रदान करना है। इस नीति में प्रारंभिक शिक्षा, बहुभाषिक शिक्षा, डिजिटल शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया है।

NEP के अनुसार, विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं, बल्कि सृजनात्मकता, नवाचार और व्यावहारिक कौशल सीखने का अवसर भी मिलेगा। इससे विद्यार्थी भविष्य में राष्ट्र और समाज के लिए सक्षम नागरिक बनेंगे। नीति में शिक्षकों के प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान और कौशल विकास को भी प्राथमिकता दी गई है।

नई शिक्षा नीति का प्रभावी कार्यान्वयन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और सोच को व्यापक बनाएगा। यह नीति शिक्षा के स्तर को उन्नत बनाने और भारत को विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी स्थान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी। यदि सभी लोग इसे सही रूप में अपनाएँ तो यह नीति देश के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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