U.P Board Class 10 Hindi 801 (HC) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।
सत्र – 2024
हिंदी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांक: 70
निर्देश:
i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।
iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।
iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।
v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।
vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।
vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।
viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।
खण्ड – ‘अ’
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. ‘चन्द्रगुप्त’ रचना की विधा है :
(A) निबन्ध
(B) उपन्यास
(C) नाटक
(D) कविता
Ans. (C) नाटक
2. ‘दीप जले शंख बजे’ के लेखक हैं:
(A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(B) शान्तिप्रिय द्विवेदी
(C) रामवृक्ष ‘बेनीपुरी’
(D) देवेन्द्र सत्यार्थी
Ans. (A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
3. शुक्लोत्तर युगीन लेखक हैं:
(A) विनय मोहन शर्मा
(B) मन्नू भण्डारी
(C) उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’
(D) सत्येन्द्र द्विवेदी
Ans. (C) उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’
4. हजारीप्रसाद द्विवेदी लेखक हैं:
(A) पानी के प्राचीर के
(B) आपका बंटी के
(C) बूंद और समुद्र के
(D) बाणभट्ट की आत्मकथा के
Ans. (D) बाणभट्ट की आत्मकथा के
5. निम्नलिखित में से जयशङ्कर प्रसाद का नाटक नहीं है:
(A) अजातशत्रु
(B) स्कन्दगुप्त
(C) ध्रुवस्वामिनी
(D) अन्धेर नगरी
Ans. (D) अन्धेर नगरी
6. रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि हैं:
(A) बिहारी लाल
(B) बोथा
(C) भिखारीदास
(D) घनानन्द
Ans. (A) बिहारी लाल
7. ‘पद्माभरण’ के रचयिता है :
(A) सेनापति
(B) केशव
(C) पद्माकर
(D) भूषण
Ans. (C) पद्माकर
8. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की रचना है:
(A) कनुप्रिया
(B) सुनहरे शैवाल
(C) ठण्डा लोहा
(D) राम की शक्ति पूजा
Ans. (D) राम की शक्ति पूजा
9. प्रयोगवादी कवि हैं :
(A) भारत भूषण अग्रवाल
(B) केदारनाथ अग्रवाल
(C) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(D) सुमित्रानन्दन पन्त
Ans. (A) भारत भूषण अग्रवाल
10. ‘आँगन के पार द्वार’ के रचयिता है:
(A) धर्मवीर भारती
(B) भवानी प्रसाद मिश्र
(C) ‘अज्ञेय’
(D) गिरिजा कुमार माथुर
Ans. (C) ‘अज्ञेय’
11. ‘करुण’ रस का स्थायी भाव है :
(A) क्रोध
(B) शोक
(C) हास्य
(D) भय
Ans. (B) शोक
12. ‘चरण-कमल बंदौ हरि राई।’ में प्रयुक्त अलङ्कार है:
(A) उपमा
(B) उत्प्रेक्षा
(C) रूपक
(D) यमक
Ans. (C) रूपक
13. ‘रोला’ छन्द के प्रत्येक चरण में कितनी मात्राएँ होती हैं?
(A) 24
(B) 16
(C) 18
(D) 11
Ans. (A) 24
14. ‘अभ्यागत’ शब्द में उपसर्ग है:
(A) अनु
(B) अपि
(C) अव
(D) अभि
Ans. (D) अभि
15. ‘नीलकमल’ में समास है:
(A) द्वन्द्व
(B) द्विगु
(C) कर्मधारय
(D) बहुव्रीहि
Ans. (C) कर्मधारय
16. ‘योगी’ शब्द का तद्भव शब्द होगा:
(A) जोगी
(B) युगी
(C) जौगी
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (A) जोगी
17. ‘युष्मद्’ शब्द की सप्तमी विभक्ति, एकवचन का रूप होगा :
(A) तव
(B) त्वत्
(C) त्वयि
(D) तुभ्यम्
Ans. (C) त्वयि
18. रचना के आधार पर वाक्य के कितने भेद होते हैं?
(A) आठ
(B) तीन
(C) चार
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (B) तीन
19. ‘भाववाच्य’ में प्रधानता होती है:
(A) कर्ता की
(B) कर्म की
(C) क्रिया की
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (C) क्रिया की
20. ‘अविकारी’ शब्द है:
(A) इन्द्र
(B) गाय
(C) यथासम्भव
(D) आप
Ans. (C) यथासम्भव
खण्ड ब
(वर्णनात्मक प्रश्न)
21. निम्नलिखित में से किसी एक गद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सवृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा-पुरुष की संगति यदि बुरी होगी, तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति की ओर ले जाएगी ।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए ।
Ans. उपर्युक्त गद्यांश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित निबंध से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक ने संगति के प्रभाव का वर्णन करते हुए बताया है कि कुसंगति मनुष्य की नीति, सद्वृत्ति और बुद्धि का नाश कर देती है, जबकि सत्संगति उसे उन्नति के मार्ग पर ले जाती है।
(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने संगति के प्रभाव को अत्यन्त स्पष्ट रूप से समझाया है। लेखक कहता है कि यदि किसी युवा की संगति बुरी होती है, तो वह उसके लिए पैरों में बँधी हुई चक्की के समान बन जाती है। जैसे चक्की बोझ बनकर मनुष्य को नीचे खींचती है, वैसे ही कुसंगति व्यक्ति को धीरे-धीरे पतन और अवनति के गड्ढे में गिरा देती है।
इसके विपरीत, यदि उसकी संगति अच्छी हो, तो वह सहारा देने वाली मजबूत बाहु के समान होती है। सत्संगति मनुष्य को सही मार्ग दिखाती है, उसे नैतिक, बौद्धिक और चरित्रिक रूप से सुदृढ़ बनाती है तथा निरंतर उन्नति और सफलता की ओर अग्रसर करती है।
(iii) ‘सुदृढ़ बाहु’ का क्या अर्थ है ?
Ans. ‘सुदृढ़ बाहु’ का अर्थ है — मजबूत सहारा देने वाली शक्ति अथवा विश्वसनीय सहायता।
अथवा
(ख) हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक बन जाएगा और आज जो तरुण है, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए ।
Ans. उपर्युक्त गद्यांश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित निबंध से लिया गया है। इसमें लेखक ने हिन्दी के प्रगतिशील साहित्य की प्रवृत्ति पर विचार करते हुए यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक युग का साहित्य अपने समय में भविष्य का स्वप्न देखता है, पर समय बीतने पर वही साहित्य अतीत का स्मारक बन जाता है।
(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक हिन्दी के प्रगतिशील साहित्य की प्रवृत्ति पर विचार व्यक्त करता है। लेखक कहता है कि प्रगतिशील साहित्य के रचनाकार यह मानते हैं कि उनके साहित्य में भविष्य की महानता और गौरव निहित है। उन्हें विश्वास होता है कि उनका रचा हुआ साहित्य आने वाले समय का मार्गदर्शक बनेगा।
लेकिन लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि समय के प्रवाह में वही साहित्य, जिसे आज नवीन और प्रगतिशील माना जा रहा है, कुछ समय बाद अतीत का स्मारक बन जाएगा। आज जो युवा हैं, वे ही आगे चलकर वृद्ध होंगे और अपने समय के साहित्य को गौरवपूर्ण मानकर उसकी स्मृति में जीएँगे। इस प्रकार प्रत्येक पीढ़ी अपने वर्तमान को भविष्य का स्वप्न मानती है, पर कालांतर में वही अतीत बन जाता है।
(iii) प्रस्तुत गद्यांश में ‘प्रगतिशीलता’ से क्या तात्पर्य है ?
Ans. प्रस्तुत गद्यांश में ‘प्रगतिशीलता’ से तात्पर्य उस साहित्यिक प्रवृत्ति से है, जो अपने समय की समस्याओं, विचारों और सामाजिक परिवर्तन को अभिव्यक्त करते हुए भविष्य के उज्ज्वल रूप का स्वप्न देखती है तथा अपने साहित्य को नवीन, उन्नत और युगानुकूल मानती है।
22. निम्नलिखित में से किसी एक पद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल
आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु बानि री ।
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर मधुर जैसी,
बंक चितवनि मंद-मंद मुसकानि री ।
कदम बिटप के निकट तटिनी के तट
अटा चढ़ि चाहि पीत पट फहरानि री।
रस बरसावैं तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Ans. उपर्युक्त पद्यांश रसखान द्वारा रचित है। इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के मनोहर रूप, उनकी बांसुरी की मधुर ध्वनि तथा ग्वाल-बालों और गायों के बीच उनके अलौकिक सौंदर्य का सजीव चित्रण किया है।
(ii) गोरज के बीच कृष्ण के सुन्दर रूप का सजीव चित्रण कवि ने किस प्रकार किया है ?
Ans. कवि ने गोरज (गायों के खुरों से उड़ी धूल) के बीच श्रीकृष्ण के रूप का अत्यन्त सजीव और मनोहारी चित्रण किया है। उनके मस्तक पर गोरज सुशोभित है, गले में बनमाला लहरा रही है। आगे गायें चल रही हैं और पीछे ग्वाल-बाल मधुर स्वर में गीत गा रहे हैं। श्रीकृष्ण मधुर धुन में बांसुरी बजा रहे हैं, उनकी तिरछी चितवन और मंद-मंद मुस्कान मन को मोह लेती है। वे पीत वस्त्र धारण किए, नदी के तट पर कदम्ब वृक्ष के निकट शोभायमान हैं। इस प्रकार कवि ने गोरज के बीच कृष्ण के सौंदर्य का जीवंत और आकर्षक चित्र प्रस्तुत किया है।
(iii) पद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans. प्रस्तुत पंक्तियों में कवि श्रीकृष्ण की अलौकिक छवि और बांसुरी की मधुरता का प्रभाव व्यक्त करता है। कवि कहता है कि कृष्ण का रूप और उनकी बांसुरी की धुन मानो रस की वर्षा कर रही है। यह रस शरीर की तपन को शांत कर देता है और आँखों को शीतलता प्रदान करता है। कृष्ण का यह मनोहारी स्वरूप प्राणों को भी आनंद से भर देता है और मन को पूरी तरह मोहित कर लेता है। इस प्रकार कवि ने कृष्ण के सौंदर्य और माधुर्य की अद्भुत प्रभावशीलता का वर्णन किया है।
अथवा
(ख)
फूल झरता है
फूल शब्द नहीं ।
बच्चा गेंद उछालता है,
सदियों के पार
लोकती है उसे एक बच्ची ।
बूढ़ा गाता है एक पद्य,
दुहराता है दूसरा बूढ़ा,
भूगोल और इतिहास से परे
किसी दालान में बैठा हुआ ।
(i) उपर्युक्त कविता के कवि एवं शीर्षक का नाम लिखिए ।
Ans. उपर्युक्त कविता के कवि – अशोक वाजपेयी हैं तथा कविता का शीर्षक – ‘फूल झरता है’ है।
(ii) रेखांकित पद्यांश का अंश स्पष्ट कीजिए ।
Ans. प्रस्तुत पंक्तियों में कवि यह स्पष्ट करता है कि कविता समय और स्थान की सीमाओं से मुक्त होती है। एक बूढ़ा व्यक्ति कविता का पद्य गाता है और दूसरा बूढ़ा उसे दोहराता है। वे किसी विशेष देश, काल या इतिहास से बँधे नहीं हैं, बल्कि एक साधारण से दालान में बैठकर कविता के आनंद में लीन हैं। इससे कवि यह बताना चाहता है कि कविता मानव जीवन की साझा अनुभूति है, जो पीढ़ियों को जोड़ती है और हर युग में समान रूप से प्रभावशाली रहती है।
(iii) कवि पद्यांश में किसकी विशेषता बता रहा है?
Ans. कवि इस पद्यांश में कविता की शाश्वतता और सार्वकालिक प्रभाव की विशेषता बता रहा है। वह यह स्पष्ट करता है कि कविता शब्द मात्र नहीं होती, बल्कि मानवीय अनुभूति है, जो समय, भूगोल और इतिहास की सीमाओं से परे जाकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्यों को जोड़ती रहती है।
23. नीचे दिए गए संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का संदर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
(क) वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते । अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानं च वर्द्धयति । अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः ।
Ans. संदर्भ —
उपर्युक्त संस्कृत गद्यांश प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा से संबंधित है, जिसमें वाराणसी की विद्या-परंपरा और संस्कृत भाषा के महत्व का वर्णन किया गया है।
हिन्दी अनुवाद —
वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर विद्या का दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। आज भी यहाँ संस्कृत भाषा की धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है और लोगों के ज्ञान को बढ़ा रही है। यहाँ अनेक श्रेष्ठ आचार्य और विद्वान वर्तमान समय में वैदिक साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में संलग्न हैं।
अथवा
(ख) एतस्मिन्नेव काले तस्य ग्रामीणस्य ग्रामः आगतः । स विहसन् रेलयानात् अवतीर्य स्वग्रामं प्रति अचलत् । नागरिकः लज्जितः भूत्वा तूष्णीम् अतिष्ठत् । सर्वे यात्रिणः वाचालं तं नागरिकं दृष्ट्वा अहसन् । तदा स नागरिकः अन्वभवत् यत् ज्ञानं सर्वत्र सम्भवति ।
Ans. संदर्भ —
उपर्युक्त संस्कृत गद्यांश एक कथात्मक प्रसंग से लिया गया है, जिसमें ग्रामीण और नागरिक के व्यवहार के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि ज्ञान किसी स्थान या वर्ग तक सीमित नहीं होता।
हिन्दी अनुवाद —
उसी समय उस ग्रामीण का गाँव आ गया। वह हँसता हुआ रेलगाड़ी से उतरकर अपने गाँव की ओर चल पड़ा। नागरिक लज्जित होकर चुपचाप खड़ा रह गया। उस अधिक बोलने वाले नागरिक को देखकर सभी यात्री हँस पड़े। तब उस नागरिक को अनुभव हुआ कि ज्ञान हर स्थान पर संभव होता है।
24. नीचे दिए गए संस्कृत श्लोक में से किसी एक का संदर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
(क) नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत् ।
विश्वमिस्मन्न अधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः ।।
Ans. संदर्भ —
उपर्युक्त श्लोक में हंस के माध्यम से नीर-क्षीर विवेक (सही-गलत का भेद) की महत्ता बताई गई है और यह प्रश्न किया गया है कि यदि विवेकशील व्यक्ति ही आलस्य करें, तो परंपरा और मर्यादा का पालन कौन करेगा।
हिन्दी अनुवाद —
हे हंस! यदि नीर-क्षीर के विवेक में तुम ही आलस्य करने लगोगे, तो फिर इस संसार में अब कुल-परंपरा (उत्तम आचरण) का पालन कौन करेगा?
अथवा
(ख) दाक्ष्यमेकपदं धम्यै दानमेकपदं यशः ।
सत्यमेकपदं स्वग्यै शीलमेकपदं सुखम् ।।
Ans. संदर्भ —
उपर्युक्त श्लोक में जीवन के नैतिक सिद्धांतों का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि संपत्ति, दान, यश, सत्य, शील और सुख प्रत्येक का अपना निश्चित स्थान और महत्व है, और इन्हें सही प्रकार से निभाना ही मानव जीवन की सफलता और नैतिकता का आधार है।
हिन्दी अनुवाद —
संपत्ति का एक ही उद्देश्य धर्म का पालन है, दान का एक ही उद्देश्य यश की प्राप्ति है। सत्य का एक ही स्थान अपने कर्तव्य में है, शील का एक ही स्थान है सुख प्राप्ति में।
25. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर लिखिए:
(क) (i) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चन्द्रशेखर आज़ाद’ की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. चन्द्रशेखर आज़ाद की चारित्रिक विशेषताएँ
चन्द्रशेखर आज़ाद एक असाधारण स्वतंत्रता सेनानी थे जिनका जीवन पूरी तरह मातृभूमि की सेवा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। उनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- साहस और वीरता – चन्द्रशेखर आज़ाद किसी भी कठिन परिस्थिति से डरते नहीं थे। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों और सैनिकों के सामने अनेक बार अपनी वीरता का परिचय दिया।
- त्याग और बलिदान की भावना – उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख, आराम और परिवार की सुरक्षा को त्यागकर पूरी तरह देश की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया।
- अटूट देशभक्ति – उनकी सोच और जीवन की दिशा पूरी तरह राष्ट्र और मातृभूमि के कल्याण पर केंद्रित थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए हर प्रकार की कठिनाई सहने को तैयार रहते थे।
- संकल्पशीलता और दृढ़ निश्चय – किसी भी परिस्थिति में अपने आदर्शों और लक्ष्य से नहीं भटकना उनकी विशेषता थी। उन्होंने हमेशा अपने संकल्प के अनुसार कार्य किया।
- अनुशासन और संगठन क्षमता – वे न केवल खुद अनुशासित थे, बल्कि अपने साथियों को भी संगठन और अनुशासन में प्रशिक्षित करते थे।
इन सभी गुणों ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक आदर्श नायक बना दिया।
(ii) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘बलिदान’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans. ‘बलिदान’ सर्ग में चन्द्रशेखर आज़ाद के स्वदेश और स्वतंत्रता के प्रति अटूट प्रेम को बड़े विस्तार से दर्शाया गया है। इस सर्ग में यह वर्णित है कि कैसे वे ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ साहसिक कृत्यों में संलग्न रहते हैं और देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
सर्ग में उनकी वीरता, उत्साह और संघर्ष का चित्रण है। वे अपने साथी क्रांतिकारियों के साथ मिलकर योजनाएँ बनाते हैं, ब्रिटिश सैनिकों से मुकाबला करते हैं और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए किसी भी बलिदान से नहीं डरते। अंततः, अपने आदर्शों के प्रति निष्ठा और देशभक्ति की भावना के चलते वे अपने प्राणों की आहुति देकर आज़ादी के प्रति अपने संकल्प को पूरा करते हैं।
यह सर्ग यह संदेश देता है कि सच्ची देशभक्ति में साहस, त्याग और अडिग निश्चय होना आवश्यक है, और चन्द्रशेखर आज़ाद इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
(ख) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सहृदयता और प्रेम – श्रीकृष्ण अपने अनुयायियों और भक्तों के प्रति सदा करुणामय और प्रेमपूर्ण हैं।
- साहस और निर्भीकता – वे धर्म और न्याय की रक्षा के लिए किसी भी कठिनाई का सामना करने से नहीं डरते।
- नीति और विवेक – सभी कार्यों में वे विवेकशील और न्यायपूर्ण निर्णय लेते हैं।
- दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता – उनके विचार दूरगामी होते हैं और वे अपने अनुयायियों का सही मार्गदर्शन करते हैं।
- सौंदर्य और आकर्षण – उनका रूप, व्यक्तित्व और आचार इतना प्रभावशाली है कि सभी उनका सम्मान करते हैं और उनकी ओर आकर्षित होते हैं।
कविता में श्रीकृष्ण को आदर्श नायक के रूप में दिखाया गया है, जो धर्म, न्याय और प्रेम के मार्ग पर चलकर दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं।
(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘पूर्वाभास’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans. ‘पूर्वाभास’ सर्ग में कथा का प्रारंभिक परिचय प्रस्तुत किया गया है। इसमें दर्शाया गया है कि किस प्रकार घटनाओं का संकेत पहले ही मिलता है। सर्ग में श्रीकृष्ण की उपस्थिति और उनके गुणों का पूर्वाभास दिया गया है।
सर्ग की मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:
- वातावरण और परिस्थिति का परिचय दिया गया है।
- भविष्य में घटित होने वाली महत्त्वपूर्ण घटनाओं की झलक दी गई है।
- श्रीकृष्ण के साहस, विवेक और करुणा के गुणों का संकेत मिलता है।
- पाठक को इस बात का अनुमान हो जाता है कि आगे की कथाएँ उनके नेतृत्व और निर्णयों के इर्द-गिर्द घूमेंगी।
इस प्रकार ‘पूर्वाभास’ सर्ग कथानक की नींव रखता है और पाठक को भावनात्मक रूप से मुख्य पात्रों तथा घटनाओं से जोड़ता है।
(ग) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाष चन्द्र बोस की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र अत्यन्त प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि संकल्पशील, साहसी और दूरदर्शी नेता भी थे। उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- अटूट देशभक्ति – उनका जीवन पूरी तरह मातृभूमि की स्वतंत्रता और जनता की सेवा के लिए समर्पित था। वे हमेशा अपने देश के हित को व्यक्तिगत हितों पर प्राथमिकता देते थे।
- साहस और निर्भीकता – सुभाष चन्द्र बोस कभी भी खतरे या कठिनाइयों से नहीं डरते थे। ब्रिटिश शासन के सामने भी वे निर्भीक होकर अपने आदर्शों की रक्षा करते थे।
- नेतृत्व और प्रेरक क्षमता – वे अपने अनुयायियों और साथियों को सही दिशा में मार्गदर्शन और प्रेरणा देते थे। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी अपने कर्तव्य का पालन दृढ़ता से करते थे।
- संकल्पशीलता और दृढ़ निश्चय – उन्होंने अपने लक्ष्य और आदर्शों के प्रति कभी समझौता नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता प्राप्ति सर्वोपरि थी और इसके लिए कोई भी कठिनाई उन्हें रोक नहीं सकती थी।
- त्याग और बलिदान – उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और जीवन की सुरक्षा को त्यागकर मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प लिया।
इन सभी गुणों ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आदर्श नायक और प्रेरक व्यक्तित्व बना दिया। उनका जीवन देशभक्ति, साहस और बलिदान का जीवंत उदाहरण है।
(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans. तृतीय सर्ग में कवि ने सुभाष चन्द्र बोस के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान और संघर्ष का विस्तृत चित्रण किया है। इसमें उनकी साहसिक गतिविधियाँ, नेतृत्व क्षमता और देशभक्ति के आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं।
- सुभाष चन्द्र बोस अपने अनुयायियों के साथ क्रांतिकारी योजनाएँ बनाते और उन्हें कार्यान्वित करते हैं।
- वे अंग्रेज़ों के विरोध में सदा तत्पर रहते हैं और अपने साहस और निर्णयों से स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित करते हैं।
- उनके नेतृत्व में देशभक्तों का मनोबल ऊँचा रहता है और वे निडर होकर संग्राम में भाग लेते हैं।
- इस सर्ग में उनके बलिदान, त्याग और संघर्ष की महत्ता को विशेष रूप से दर्शाया गया है।
- पाठक इस सर्ग के माध्यम से यह समझ पाता है कि स्वतंत्रता केवल संघर्ष और त्याग से ही प्राप्त होती है, और सुभाष चन्द्र बोस इसके आदर्श प्रतीक हैं।
इस प्रकार तृतीय सर्ग सुभाष चन्द्र बोस की वीरता, साहस और नेतृत्व क्षमता को उजागर करता है और पाठक को देशभक्ति और संघर्ष के आदर्शों से परिचित कराता है।
(घ) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के ‘पृथ्वीराज’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans. ‘पृथ्वीराज’ सर्ग में कहानी का केंद्र मेवाड़ के शौर्य और वीरता की परंपरा है। इस सर्ग में पृथ्वीराज का चरित्र प्रस्तुत किया गया है, जो धर्म, न्याय और वीरता का प्रतीक है। सर्ग की मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:
- सर्ग में मेवाड़ के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश का परिचय दिया गया है।
- पृथ्वीराज की वीरता और साहस का वर्णन है, जो अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिए हर चुनौती का सामना करता है।
- इस सर्ग में उनके नेतृत्व, न्यायप्रियता और साहसिक निर्णयों के उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं।
- पाठक को यह समझाया गया है कि पृथ्वीराज का व्यक्तित्व शौर्य, पराक्रम और देशभक्ति का आदर्श है।
- सर्ग का उद्देश्य पाठक को मेवाड़ की वीर परंपरा और उसके वीर नेताओं की प्रेरणादायक कथाओं से परिचित कराना है।
इस प्रकार ‘पृथ्वीराज’ सर्ग मेवाड़ के शौर्य और वीरता की झलक प्रस्तुत करता है और आगे के कथानक के लिए आधार तैयार करता है।
(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप का चरित्र अत्यंत प्रेरक और आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- अटूट देशभक्ति – महाराणा प्रताप ने अपनी पूरी शक्ति और जीवन मेवाड़ की स्वतंत्रता और गौरव की रक्षा में समर्पित कर दी।
- साहस और वीरता – वे किसी भी युद्ध या कठिन परिस्थिति से नहीं डरते थे। हल्दीघाटी जैसे युद्धों में उनका शौर्य अद्वितीय था।
- संकल्पशीलता और दृढ़ निश्चय – महाराणा प्रताप ने अपने आदर्शों और न्यायप्रियता में कभी समझौता नहीं किया।
- त्याग और संयम – उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग किया और कठोर जीवन अपनाकर अपने कर्तव्य का पालन किया।
- नेतृत्व और प्रेरणा – वे अपने सैनिकों और प्रजा के लिए प्रेरक रहे, उनका साहस और निडरता सभी के लिए आदर्श बनी।
कवि ने महाराणा प्रताप के जीवन और संघर्ष को देशभक्ति, वीरता और साहस का प्रतीक बताते हुए उनके व्यक्तित्व को अमर बना दिया है। उनका चरित्र आज भी स्वतंत्रता और साहस के आदर्श के रूप में याद किया जाता है।
(ङ) (i) ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का कथासार लिखिए ।
Ans. ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी के संघर्ष का विस्तृत चित्रण है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि कैसे महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से देश की स्वतंत्रता की ओर मार्गदर्शन किया।
सर्ग की मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:
- महात्मा गांधी अपने अनुयायियों के साथ सत्याग्रह और अहिंसात्मक आंदोलनों का आयोजन करते हैं।
- वे देशवासियों को अंग्रेज़ों के अत्याचार के विरोध में एकजुट करते हैं।
- उनके नेतृत्व और प्रेरक विचारों से लोग देशभक्ति और साहस की भावना से भर जाते हैं।
- सर्ग में उनके संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प का वर्णन है, जिससे पाठक को सत्य और अहिंसा के मार्ग का संदेश मिलता है।
- यह सर्ग महात्मा गांधी को मुक्ति का दूत प्रस्तुत करता है, जो अपने आदर्शों और अहिंसात्मक नीति से राष्ट्र को स्वतंत्रता की ओर ले जाते हैं।
(ii) ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गांधी का चरित्र प्रेरक और आदर्श रूप में चित्रित किया गया है। उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- अहिंसा और सत्याग्रह – गांधी जी का जीवन अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित था। वे दूसरों को हिंसा का रास्ता अपनाने के बजाय सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।
- संकल्प और धैर्य – उन्होंने कठिन परिस्थितियों और ब्रिटिश अत्याचारों के सामने भी अपने उद्देश्यों को अडिग रखा।
- त्याग और सरलता – वे भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर, साधारण जीवन जीते थे और समाज में समानता का संदेश देते थे।
- देशभक्ति और सेवा भाव – उनका जीवन पूरी तरह मातृभूमि की सेवा में व्यतीत हुआ। वे अपने अनुयायियों और जनता को समान विचार और कर्मशीलता के लिए प्रेरित करते थे।
- सशक्त नेतृत्व – गांधी जी ने देशवासियों को संगठित कर स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व प्रदान किया।
इस प्रकार महात्मा गांधी का चरित्र त्याग, धैर्य, साहस, अहिंसा और देशभक्ति का प्रतीक है। कवि ने उन्हें “मुक्ति-दूत” के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपने आदर्शों और प्रेरणा से पूरे राष्ट्र को स्वतंत्रता की ओर ले जाते हैं।
(च) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रभावशाली घटना का वर्णन कीजिए ।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रभावशाली घटना कर्ण का युद्ध में धनुषयुद्ध और उसकी वीरता का प्रदर्शन है। इस घटना में कर्ण अपने युद्ध कौशल और साहस का परिचय देते हैं। युद्ध के दौरान वह अपने मित्रों और धर्म के प्रति निष्ठा रखते हुए अडिग, वीर और निस्वार्थ भाव से लड़ता है।
- कर्ण अपने शत्रुओं के सामने निर्भीक और सशक्त रूप में दिखाई देते हैं।
- वे अपने सत्य, धर्म और मित्रता के आदर्शों का पालन करते हुए युद्ध करते हैं।
- यह घटना पाठक को कर्ण के साहस, वीरता और संघर्षशीलता का जीवंत अनुभव कराती है।
- इस युद्ध दृश्य के माध्यम से कवि ने कर्ण के अदम्य साहस और मानवीय गुणों को उजागर किया है।
इस प्रकार यह घटना खण्डकाव्य की सबसे प्रभावशाली और प्रेरणादायक घटना मानी जाती है।
(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कुन्ती’ की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती का चरित्र भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- मातृत्व और करुणा – कुन्ती अपने पुत्रों के प्रति स्नेही और ममता पूर्ण भाव रखती हैं।
- धैर्य और साहस – कठिन परिस्थितियों में भी वह साहसपूर्वक निर्णय लेती हैं।
- नैतिक विवेक – कुन्ती अपने निर्णयों में विवेकपूर्ण और न्यायप्रिय हैं।
- कर्तव्यपरायणता – अपने परिवार और राष्ट्र के हित में वह अपने कर्तव्य का पालन करती हैं।
- संघर्ष और बलिदान – कुन्ती व्यक्तिगत भावनाओं को त्यागकर राष्ट्र और परिवार के हित में बलिदान करती हैं।
इस प्रकार कवि ने कुन्ती का चरित्र सशक्त, धर्मपरायण और करुणामयी मातृत्व का आदर्श प्रस्तुत किया है। उनके निर्णय और व्यवहार पाठक को नैतिक और मानवीय मूल्यों का संदेश देते हैं।
(छ) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नायक ‘लक्ष्मण’ का चरित्र चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण का चरित्र अत्यंत साहसी, धैर्यवान और वीरता से परिपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- साहस और वीरता – लक्ष्मण युद्धभूमि में अपने कौशल और पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं। वह कठिन परिस्थितियों में भी निर्भीक रहते हैं।
- कर्तव्यनिष्ठा – अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए वे हमेशा न्याय और सच्चाई की रक्षा करते हैं।
- संघर्षशील और धैर्यवान – विपरीत परिस्थितियों में भी उनका साहस और धैर्य कम नहीं होता।
- पराक्रमी योद्धा – उनकी युद्धकला और रणनीति उन्हें युद्ध में अद्वितीय बनाती है।
- नैतिकता और आदर्श नेतृत्व – लक्ष्मण का चरित्र न केवल वीरता का प्रतीक है, बल्कि उनके निर्णय और व्यवहार सदाचार और नैतिकता से परिपूर्ण हैं।
कवि ने लक्ष्मण को साहस, धर्मपरायणता और नेतृत्व क्षमता का आदर्श नायक के रूप में चित्रित किया है।
(ii) ‘लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा लक्ष्मण की मूर्च्छा’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans. इस सर्ग में लक्ष्मण और मेघनाद के बीच महायुद्ध का विवरण प्रस्तुत किया गया है।
- मेघनाद और लक्ष्मण के बीच भयंकर युद्ध होता है, जिसमें दोनों अपनी-अपनी शक्ति और कौशल का परिचय देते हैं।
- लक्ष्मण अपनी वीरता और पराक्रम के बावजूद मेघनाद की विशेष अस्त्र-शस्त्र क्षमता के सामने थोड़े समय के लिए मूर्छित हो जाते हैं।
- इस युद्ध का उद्देश्य रघुकुल और राम की रक्षा है, और लक्ष्मण अपने धर्म और कर्तव्य के पालन में लगे रहते हैं।
- सर्ग में युद्ध की भयंकरता, नायक की वीरता और संकट में साहस का चित्रण किया गया है।
- पाठक इस सर्ग से लक्ष्मण के अदम्य साहस, संघर्षशीलता और वीरता का अनुभव प्राप्त करता है।
इस प्रकार यह सर्ग लक्ष्मण की साहसिकता, पराक्रम और युद्ध कौशल को उजागर करता है और खण्डकाव्य में युद्ध और वीरता का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
(ज) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के ‘राम-भरत मिलन’ सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘राम-भरत मिलन’ सर्ग में भरत और राम के पुनर्मिलन का मार्मिक और प्रेरक दृश्य प्रस्तुत किया गया है। इस सर्ग की मुख्य घटनाएँ निम्नलिखित हैं:
- भरत, जो अपने भाई राम के प्रति सच्ची भक्ति और सम्मान रखता है, उन्हें राजगद्दी का प्रस्ताव देने के लिए आता है।
- राम की अनुपस्थिति में भरत ने राज्य का संचालन अपनी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन से किया, लेकिन उनका मन हमेशा राम के प्रति समर्पित था।
- राम और भरत का मिलन भावनाओं से भरा है, जिसमें भाईचारे, समर्पण और आदर्श नेतृत्व का संदेश है।
- इस सर्ग में भरत का चरित्र कर्तव्य, धैर्य और आदर्श भाव का प्रतीक है, जबकि राम का चरित्र धर्म, सत्य और मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करता है।
सर्ग का मुख्य संदेश यह है कि भाईचारा, समर्पण और कर्तव्यपरायणता जीवन में सर्वोपरि गुण हैं।
(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कैकेयी’ की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी का चरित्र भी महत्वपूर्ण है और उसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- संकल्पशीलता – कैकेयी अपने उद्देश्यों और संकल्पों के प्रति दृढ़ रहती हैं।
- सत्ताप्रेम – उन्हें सत्ता और राजगद्दी का मोह है, जो उनके निर्णयों में दिखाई देता है।
- भावनात्मक और नीतिमूलक निर्णय – कभी-कभी उनके निर्णय व्यक्तिगत लाभ और भावनाओं के आधार पर होते हैं, जिससे कथा में संघर्ष पैदा होता है।
- प्रभावशाली और दूरदर्शी – उनके निर्णयों का राजकाज और परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
- मानविय पक्ष – उनके चरित्र में मानवीय भावनाओं, लालच और मातृत्व की जटिलताएँ भी दिखाई देती हैं, जो उन्हें वास्तविक और जीवंत बनाती हैं।
कवि ने कैकेयी के चरित्र को सत्ताप्रेम, संकल्पशीलता और मानवीय जटिलताओं का मिश्रण प्रस्तुत किया है, जिससे कथा में संघर्ष और उत्कंठा बनी रहती है।
(झ) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में मुख्य रूप से नेतृत्व, देशभक्ति और समाज सुधार के आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं। इस खण्डकाव्य का कथानक इस प्रकार है:
- कथा का केंद्र नेता और समाज सुधारक की संघर्षशील यात्रा है।
- नायक समाज में व्याप्त अंधकार और अन्याय के खिलाफ सत्य, न्याय और ज्ञान की ज्योति फैलाने का प्रयास करता है।
- खण्डकाव्य में नायक अपने साहस, बुद्धिमत्ता और दृढ़ निश्चय से समाज में सुधार लाने के लिए कठिनाइयों का सामना करता है।
- उसके प्रयासों से जनता में जागरूकता और देशभक्ति की भावना उत्पन्न होती है।
- खण्डकाव्य का उद्देश्य पाठकों को नेतृत्व, त्याग और राष्ट्रभक्ति के आदर्शों से परिचित कराना है।
इस प्रकार ‘ज्योति जवाहर’ का कथानक सत्य, ज्ञान और समाज सुधार के लिए संघर्ष को केंद्र में रखता है।
(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ के नायक का चरित्र प्रेरक, साहसी और आदर्शवादी है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- साहस और निडरता – नायक कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और आदर्शों से विचलित नहीं होता।
- देशभक्ति और समाज सेवा – उसका जीवन समाज और राष्ट्र के हित में समर्पित है।
- दूरदर्शिता और विवेक – नायक अपने निर्णय और कार्यों में विवेकपूर्ण और दूरदर्शी होता है।
- त्याग और समर्पण – व्यक्तिगत सुख और लाभ को त्यागकर वह समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित रहता है।
- प्रेरक नेतृत्व – नायक के आचरण और संघर्ष से अन्य लोग प्रेरित होते हैं और उसके मार्गदर्शन में समाज सुधार में योगदान देते हैं।
इस प्रकार नायक का चरित्र सत्य, साहस, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है।
26. (क) दिए गए लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
Ans. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कहानीकार और उपन्यासकार थे। उनका जन्म 20वीं सदी के प्रारंभ में हुआ। बख्शीजी ने अपने लेखन में समाज के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पक्षों को उजागर किया। उनकी रचनाएँ जीवन के यथार्थ और संघर्षों को सरल और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करती हैं। वे अपने लेखन के माध्यम से पाठकों में सामाजिक जागरूकता, नैतिक मूल्यों की समझ और मानवता के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना चाहते थे। उनकी कहानियाँ और उपन्यास समाज में व्याप्त असमानता, गरीबी, अन्याय और महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।
प्रमुख रचना: “समाज का दर्पण” – इस रचना में बख्शीजी ने समाज के विभिन्न पहलुओं का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें व्यक्तियों के संघर्ष, सामाजिक बाधाएँ और मानवीय संवेदनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
(ii) जयशङ्कर प्रसाद
Ans. जयशंकर प्रसाद (1889–1937) हिंदी साहित्य के छायावादी युग के महान कवि, नाटककार और लेखक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। वे काव्य, नाटक, आलोचना और गद्य सभी क्षेत्रों में समान रूप से पारंगत थे। जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ मुख्यतः आध्यात्मिकता, प्रेम, मानवीय संवेदनाएँ और देशभक्ति से ओतप्रोत होती हैं। उनके साहित्य में भाव और भाषा की शुद्धता, छायावादी प्रभाव और गहन विचारधारा का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
प्रसिद्ध कवि होने के साथ-साथ वे उपन्यास और नाटककार भी थे। उन्होंने हिंदी नाट्यसाहित्य को नई दिशा दी और भारतीय संस्कृति, परंपरा और वीरता का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया। उनके नाटकों में पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण, भावों की गहराई और कथानक की प्रबलता स्पष्ट दिखाई देती है।
प्रमुख रचना: उनका प्रसिद्ध नाटक “अजातशत्रु” है। इस नाटक में उन्होंने भारतीय इतिहास के राजा अजातशत्रु का जीवन, संघर्ष और नैतिक मूल्यों के प्रति उसकी निष्ठा का प्रभावशाली चित्रण किया है। इस नाटक के माध्यम से जयशंकर प्रसाद ने साहस, धर्म और कर्तव्यपरायणता का संदेश दिया है।
जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य में आधुनिक साहित्यिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक मानी जाती हैं।
(iii) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
Ans. आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884–1941) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक, इतिहासकार और विचारक थे। उन्होंने साहित्य के विकासक्रम, छायावादी और आधुनिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया। शुक्लजी का दृष्टिकोण था कि साहित्य केवल भाषा और शैली का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का दर्पण है। उन्होंने साहित्य के इतिहास और विकास को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया, जिससे पाठक हिंदी साहित्य की विविधता और प्रगतिशीलता को समझ सकें।
प्रमुख रचना: “हिंदी साहित्य का इतिहास” – इस ग्रंथ में शुक्लजी ने हिंदी साहित्य के प्रत्येक काल और युग का विस्तारपूर्वक विवेचन किया और साहित्य की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित किया।
(iv) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
Ans. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख राष्ट्रकवि और वीर रस के कवि थे। उनका जन्म 1908 में बिहार में हुआ। दिनकरजी के काव्य में देशभक्ति, वीरता, नैतिकता और सामाजिक चेतना प्रमुख थी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और समाज सुधार के लिए कविताएँ लिखीं। उनके काव्य की विशेषता भाषा की उच्चता, भावों की गहराई और प्रेरक संदेश है।
प्रमुख रचना: “रसभीर” – इस काव्य में उन्होंने वीर रस के माध्यम से साहस, शौर्य और राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार किया।
(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) तुलसीदास्
Ans. तुलसीदास (1532–1623) हिन्दी साहित्य के महान कवि और संत थे। वे आध्यात्मिकता, भक्ति और धार्मिक काव्य के लिए प्रसिद्ध हैं। तुलसीदास ने अपने जीवन में भगवान राम के प्रति गहरी भक्ति व्यक्त की और इसे अपनी रचनाओं में संपूर्णता से प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी में भक्ति, नैतिकता, प्रेम और समाज सुधार का गहन प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने हिन्दी भाषा को सरल, प्रभावशाली और जनप्रिय बनाया। तुलसीदास ने न केवल काव्य रचना की, बल्कि समाज को धार्मिक और नैतिक मार्ग पर प्रेरित किया।
प्रमुख रचना: “रामचरितमानस” – यह काव्य महाकाव्य भगवान राम के जीवन, धर्म और आदर्शों का अत्यंत सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है। इसमें भक्तिभाव और नैतिकता का संदेश सर्वोपरि है।
(ii) मैथिलीशरण गुप्त
Ans. मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964) आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि थे। उन्हें राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम के कवि के रूप में जाना जाता है। उनके काव्य में देशभक्ति, वीरता और सामाजिक सुधार के तत्व स्पष्ट दिखाई देते हैं। मैथिलीशरण गुप्त ने छायावादी कविताओं और वीर रस की कविताओं के माध्यम से लोगों में जागरूकता और राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा की।
प्रमुख रचना: “भारत भाग्य विधाता” – इस कविता में उन्होंने भारत के गौरव, उसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर और स्वतंत्रता की आवश्यकता का भावपूर्ण चित्रण किया है।
(iii) सुमित्रानन्दन पन्त
Ans. सुमित्रानन्दन पन्त (1900–1973) हिंदी के प्रगतिशील और प्रकृति प्रधान कवि थे। उन्हें ‘पहाड़ का कवि’ कहा जाता है क्योंकि उनके काव्य में प्राकृतिक दृश्य, ग्रामीण जीवन और मानवीय संवेदनाओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा में प्रकृति, मानवता और प्रेम का सुंदर चित्रण किया। उनके काव्य में देशभक्ति का भाव भी मिलता है।
प्रमुख रचना: “कल्पना” – इस काव्य संग्रह में उन्होंने मानव जीवन, प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय भावों को सरल और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया है।
(iv) अशोक बाजपेयी
Ans. अशोक बाजपेयी (जन्म 1942) समकालीन हिंदी के प्रसिद्ध कवि और आलोचक हैं। वे अपने काव्य में समाज, आधुनिक जीवन और व्यक्ति की भावनाओं को गहनता से प्रस्तुत करते हैं। उनके काव्य में गहरी विचारधारा, सौंदर्यबोध और संवेदनशीलता दिखाई देती है। अशोक बाजपेयी का लेखन समकालीन समाज की समस्याओं और मानव अनुभव को उजागर करता है।
प्रमुख रचना: “टुकड़ों में बँटी कविता” – इस काव्य संग्रह में उन्होंने आधुनिक जीवन की जटिलताओं और सामाजिक असमानताओं को भावपूर्ण शैली में व्यक्त किया है।
27. अपनी पाठ्ध-पुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।
Ans. श्लोक:
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयाद्
एष धर्मः सनातनः।
व्याख्या:
इस श्लोक में जीवन का मूल मंत्र दिया गया है कि हमेशा सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, परंतु अप्रिय या हानिकारक सत्य न बोलना चाहिए। साथ ही प्रिय के नाम पर झूठ नहीं बोलना चाहिए। इसे सनातन धर्म और नैतिकता का मूल संदेश माना गया है।
28. अपने मुहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए ।
Ans.
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
नगर निगम,
[आपके नगर का नाम]
विषय: मुहल्ले की नालियों की समुचित सफाई हेतु
महोदय,
सविनय निवेदन है कि हमारे मुहल्ले [आपके मुहल्ले का नाम/गली का नाम] की नालियाँ लंबे समय से गंदगी और कचरे से भरी हुई हैं। इस कारण वहाँ गंदगी का ढेर लग गया है और पानी की निकासी भी सही प्रकार से नहीं हो पा रही है। गर्मियों में यह स्थिति स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकती है, जिससे बुखार, डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक रोग फैलने का खतरा रहता है।
अतः आपसे निवेदन है कि हमारे मुहल्ले की नालियों की समुचित और नियमित सफाई कराएँ। इसके अलावा यदि संभव हो तो कचरा उठाने और नालियों की मरम्मत की भी व्यवस्था की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याएँ न हों।
आपकी सहायता और ध्यान के लिए हम आपके आभारी रहेंगे।
धन्यवाद।
भवदीय,
[आपका नाम]
[गली/मुहल्ला का नाम]
[तारीख]
29. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए :
(i) आरुणिः कः आसीत् ?
Ans. आरुणिः सूर्यस्य रथस्य सारथि आसीत्।
(ii) वीरः केन पूज्यते ?
Ans. वीरः साहसेन, धैर्येण च पूज्यते।
(iii) चन्द्रशेखरः स्वनाम किम् अवदत् ?
Ans. चन्द्रशेखरः स्वनाम आज़ादम् अवदत्।
(iv) मैत्री केन वर्धते ?
Ans. मैत्री दया, सौहार्दं, सत्यं च कृत्वा वर्धते।
30. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबंध लिखिए :
(i) आतंकवाद: कारण एवं निवारण
Ans. आतंकवाद आज विश्व की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन गया है। यह न केवल मानव जीवन के लिए खतरा है, बल्कि समाज की स्थिरता, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर प्रभाव डालता है। आतंकवाद के कई कारण हैं। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक पिछड़ापन, सामाजिक अन्याय, धार्मिक और जातीय संघर्ष, तथा अशिक्षा इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं। इसके अलावा, व्यक्तिगत स्वार्थ और मनोवैज्ञानिक असंतोष भी कुछ लोगों को हिंसक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त करता है।
आतंकवाद का निवारण केवल पुलिस या सेना द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सुधारों की आवश्यकता है। शिक्षा का प्रसार और रोजगार के अवसर बढ़ाना, धार्मिक और जातीय सौहार्द बढ़ाना, और संवेदनशील लोगों को सही मार्गदर्शन देना आवश्यक है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कड़े कानून भी आतंकवाद को रोकने में मदद करते हैं। यदि हम समाज में समानता, न्याय और समझदारी की भावना विकसित करें, तो आतंकवाद को जड़ से समाप्त किया जा सकता है।
(ii) देश-प्रेम
Ans. देश-प्रेम या देशभक्ति किसी व्यक्ति के हृदय में अपने देश के प्रति उत्पन्न सम्मान, सम्मान और समर्पण की भावना है। यह न केवल सैनिकों, स्वतंत्रता सेनानियों या नेताओं के लिए आवश्यक है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक गुण है। देशभक्ति हमें अपने देश की सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करने की प्रेरणा देती है।
देश-प्रेम के कई रूप हैं। यह कानून का पालन करना, समाज सेवा, शिक्षा और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेना, पर्यावरण की सुरक्षा करना और अपने देश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों को सम्मान देना शामिल है। स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत के वीरों – जैसे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस और भगत सिंह – ने अपने देश के लिए अद्वितीय बलिदान दिया। उनका जीवन देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
आज का समय शिक्षा और विज्ञान का है। देशभक्ति केवल युद्ध या बलिदान से नहीं, बल्कि समानता, प्रगति और समाज सेवा के माध्यम से भी प्रदर्शित होती है। एक जागरूक और कर्मठ नागरिक ही देश को प्रगति की ओर ले जा सकता है।
(iii) विज्ञान वरदान या अभिशाप
Ans. वर्तमान समय में विज्ञान ने मानव जीवन को अत्यधिक विकसित और सुविधाजनक बनाया है। विज्ञान की खोजों और आविष्कारों ने हमारी जीवनशैली, संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा को सरल और प्रभावी बना दिया है। उदाहरण के लिए, मोबाइल, इंटरनेट, कंप्यूटर, चिकित्सा उपकरण और परिवहन के आधुनिक साधन हमारे जीवन को सुगम बनाते हैं। विज्ञान की वजह से आज हम अंतरिक्ष की यात्रा कर सकते हैं, रोगों का निदान और उपचार कर सकते हैं और सूचना का आदान-प्रदान क्षणों में कर सकते हैं। इस दृष्टि से विज्ञान मानव जीवन के लिए वरदान के समान है।
परंतु, विज्ञान का दुरुपयोग और संतुलनहीन विकास कभी-कभी अभिशाप भी साबित होता है। हथियारों और परमाणु ऊर्जा का निर्माण मानव जाति के लिए गंभीर खतरा बन गया है। प्रदूषण, वनों की कटाई, जैविक और रासायनिक प्रयोग भी पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही, आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रयोग ने युवाओं में मानसिक तनाव, एकाकीपन और असंवेदनशीलता जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।
इसलिए विज्ञान को वरदान या अभिशाप मानना हमारे उपयोग और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि हम विज्ञान का सतत और नैतिक उपयोग करें, तो यह मानव जीवन में प्रगति, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास की ओर मार्गदर्शन करता है। परंतु यदि इसका दुरुपयोग या अंधाधुंध प्रयोग किया जाए, तो यह मानवता के लिए विनाशकारी भी हो सकता है।
अतः विज्ञान का महत्व और उपयोग मानव विवेक और नैतिकता पर निर्भर है। हमें विज्ञान को अपने जीवन में संतुलित, नियंत्रित और सकारात्मक रूप से अपनाना चाहिए ताकि यह वरदान बने और अभिशाप न बने। यही विज्ञान का सही और सार्थक उपयोग है।
(iv) विद्यार्थी-जीवन में खेल का महत्त्व
Ans. विद्यार्थी जीवन शिक्षा, अनुशासन और व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण समय है। इस जीवन में खेल-कूद का विशेष महत्त्व है। खेल केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नहीं, बल्कि मानसिक विकास, अनुशासन, सहयोग और नेतृत्व कौशल के लिए भी आवश्यक हैं। नियमित खेल से विद्यार्थी स्वस्थ शरीर, तेज मन और संतुलित भावनाएँ प्राप्त करते हैं।
खेलों के माध्यम से विद्यार्थी टीमवर्क, साहस, सहनशीलता और प्रतिस्पर्धा की भावना सीखते हैं। ये गुण जीवन में सफलता प्राप्त करने में अत्यंत सहायक होते हैं। खेलों से न केवल शारीरिक शक्ति बढ़ती है, बल्कि मानसिक तनाव और दबाव भी कम होता है। स्कूल और कॉलेजों में आयोजित प्रतियोगिताएँ विद्यार्थियों को प्रतिभा और आत्मविश्वास विकसित करने का अवसर प्रदान करती हैं।
इसके अलावा, खेलों का समाज में भी विशेष महत्व है। यह समाज में स्वास्थ्य, मित्रता और समानता की भावना को बढ़ावा देता है। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को अपने जीवन में खेलों के लिए समय निकालना चाहिए और उन्हें नियमित रूप से अपनाना चाहिए।