U.P Board Class 10 Hindi 801(BD) Question Paper 2025

U.P Board Class 10 Hindi 801(BD) Question Paper 2025 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2025
हिन्दी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट  पूर्णांक: 70

नोट : प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।

i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।

iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके सही उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट कलम से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से काला कर चिह्नित करें ।

iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें । ओ० एम०आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ह्वाइटनर का प्रयोग न करें।

v) प्रत्येक प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।

vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।

vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें।

viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।

खण्ड – अ 

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

निर्देश: नीचे दिए गए प्रत्येक प्रश्न के लिए चार विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प चुनकर उसे ओ. एम. आर. उत्तर पत्रक पर चिह्नित करें।

1. शुक्लयुगीन लेखक हैं-

(A) नाभादास
(B) शिवपूजन सहाय
(C) रामप्रसाद निरंजनी
(D) दौलत राम

Ans. (B) शिवपूजन सहाय

2. मोहन राकेश का नाटक है-

(A) अजातशत्रु
(B) सिन्दूर की होली
(C) स्वर्ग की अनक
(D) आधे-अधूरे

Ans. (D) आधे-अधूरे

3. ‘साहित्य की विशेषताएँ’ लेख की विधा है-

(A) आलोचना
(B) उपन्यास
(C) निबन्ध
(D) नाटक

Ans. (A) आलोचना

4. ‘महके आँगन-चहके द्वार’ के रचयिता हैं-

(A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(B) महादेवी वर्मा
(C) रामवृक्ष ‘बेनीपुरी’
(D) प्रभाकर माचवे

Ans. (A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

5. ‘उसने कहा था’ प्रसिद्ध कहानी के कहानीकार हैं-

(A) राजा शिव प्रसाद ‘सितारे हिन्द’
(B) इंशा अल्ला खाँ
(C) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
(D) बंग महिला

Ans. (C) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

6. रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि हैं-

(A) केशवदास
(B) घनानन्द
(C) ठाकुर
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A) केशवदास

7. प्रयोगबाद युगीन कृति है-

(A) कामायनी
(B) प्रिय प्रवास
(C) रंग में भंग
(D) धूप के धान

Ans. (D) धूप के धान

8. सुमित्रानन्दन पन्त की रचना है-

(A) ‘हिमतरंगिनी’
(B) ‘चिदम्बरा’
(C) ‘यशोधरा’
(D) ‘त्रिधारा’

Ans. (A) ‘हिमतरंगिनी’

9. ‘तीसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष है-

(A) 1979
(B) 1959
(C) 1951
(D) 1971

Ans. (D) 1971

10. ‘गंगा लहरी’ के रचयिता हैं-

(A) भूषण
(B) मतिराम
(C) पद्माकर
(D) देव

Ans. (C) पद्माकर

11. हास्य रस का स्थायीभाव है-

(A) विस्मय
(B) उत्साह
(C) हास
(D) जुगुप्सा

Ans. (C) हास

12. ‘धरन-कमल बंदों हरि राइ’ में अल‌ङ्कार है-

(A) रूपक
(B) उत्प्रेक्षा
(C) उपमा
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) उपमा

13. ‘सोरठा’ छन्द के द्वितीय चरण में मात्राएँ होती हैं-

(A) 11
(B) 13
(C) 16
(D) 24

Ans. (A) 11

14. ‘अभ्यागत’ शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है-

(A) अनु
(B) अधि
(C) अभि
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) अभि

15. ‘माता-पिता’ में समास है-

(A) कर्मधारय समास
(B) द्विगु समास
(C) बहुव्रीहि समास
(D) द्वन्द्व समास

Ans. (D) द्वन्द्व समास

16. ‘अमृत’ का पर्यायवाची शब्द है-

(A) जीवन
(B) पावन
(C) अमिय
(D) पिय

Ans. (C) अमिय

17. ‘युष्मद’ चतुर्थी एकवचन का रूप है-

(A) तुभ्यम्
(B) त्वत्
(C) तव
(D) युष्मासु

Ans. (A) तुभ्यम्

18. रचना के आधार पर वाक्य के भेद हैं-

(A) चार
(B) तीन
(C) छः
(D) पाँच

Ans. (B) तीन

19. भाववाच्य में प्रधानता होती है-

(A) कर्म की
(B) कर्ता की
(C) क्रिया की
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) क्रिया की

20. विकारी पद के भेद हैं-

(A) तीन
(B) छः
(C) आठ
(D) चार

Ans. (D) चार

खण्ड ‘ब’

1. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

वह अश्वारोही अवाक् खड़ा था। बुढ़िया के प्राण-पक्षी अनन्त में उड़ गए। वहाँ एक अष्टकोण मन्दिर बना और उस पर शिलालेख लगाया गया “सातों देश के नरेश हुमायूँ ने यहीं एक दिन विश्राम किया था। उसके पुत्र अकबर ने उसकी स्मृति में यह गगनचुम्बी मन्दिर बनाया।” पर उसमें कहीं ममता का नाम नहीं।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक कहानी ‘ममता’ से लिया गया है। इस गद्यांश में बुढ़िया ममता की मृत्यु तथा उसके पश्चात अकबर द्वारा हुमायूँ की स्मृति में बनवाए गए मन्दिर का वर्णन किया गया है, जिसमें मानवीय ममता का उल्लेख नहीं मिलता।

(ii) अकबर ने किसकी स्मृति में मन्दिर बनवाया ?
Ans.
अकबर ने अपने पिता बादशाह हुमायूँ की स्मृति में उस स्थान पर मन्दिर बनवाया।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक बताता है कि जिस स्थान पर एक निर्धन बुढ़िया ममता ने अपने मानवीय कर्तव्य का पालन किया था, उसी स्थान को इतिहास ने बाद में एक भव्य रूप दे दिया। शिलालेख में यह उल्लेख किया गया कि मुगल सम्राट हुमायूँ ने उस स्थान पर एक दिन विश्राम किया था और उसके पुत्र अकबर ने अपने पिता की स्मृति में वहाँ एक ऊँचा एवं विशाल मन्दिर बनवाया।

लेखक यह भी संकेत करता है कि यद्यपि यह स्थान ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध हो गया, परन्तु उस मन्दिर में उस बुढ़िया ममता के त्याग, करुणा और मानवता का कहीं उल्लेख नहीं है। इस प्रकार लेखक इतिहास की विडम्बना और मानवीय मूल्यों की उपेक्षा को उजागर करता है।

अथवा

मानवता के सम्पूर्ण इतिहास की सर्वाधिक रोमांच घटना के एक-एक क्षण के वे भागीदार बन रहे थे- उत्सुकता और कुतूहल के कारण अपने अस्तित्व से ही बिल्कुल बेखबर हो गए थे। युग-युग के किस देश और जाति ने चन्द्रमा पर पहुँचने के सपने नहीं सैंजोये आज इस धरा के ही दो मानव उन सपनों को सच कर दिखाने के लिए कृत-संकल्प थे ।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित विज्ञान-आधारित निबन्ध/लेख से लिया गया है। इसमें लेखक ने मानव इतिहास की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और रोमांचक घटना — चन्द्रमा पर मानव के पहुँचने — का वर्णन किया है। लेखक बताता है कि इस ऐतिहासिक क्षण को देखने वाले लोग उत्सुकता और कुतूहल में इतने डूबे थे कि वे अपने अस्तित्व तक को भूल गए थे।

(ii) मानव इतिहास की महत्वपूर्ण घटना कौन थी?
Ans.
मानव इतिहास की महत्वपूर्ण घटना मनुष्य का चन्द्रमा पर पहुँचना थी, जब पृथ्वी के दो मानव चन्द्रमा पर उतरकर मानव सभ्यता के युगों पुराने सपने को साकार करने के लिए कृतसंकल्प हुए।

(iii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक मानव की चिरकालीन आकांक्षा को व्यक्त करता है। वह बताता है कि प्राचीन काल से ही संसार के प्रत्येक देश और प्रत्येक जाति के लोगों ने चन्द्रमा पर पहुँचने का स्वप्न देखा है। यह सपना केवल कल्पना नहीं रहा, बल्कि मानव की जिज्ञासा और वैज्ञानिक चेतना का प्रतीक बन गया।

लेखक के अनुसार अब वह ऐतिहासिक क्षण आ गया था जब पृथ्वी के दो मानव वैज्ञानिक साधनों के सहारे चन्द्रमा पर पहुँचकर मानवता के युगों पुराने स्वप्न को साकार करने के लिए पूर्ण रूप से दृढ़-संकल्पित थे। यह घटना मानव बुद्धि, साहस और विज्ञान की महान उपलब्धि को दर्शाती है।

2. निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

मिला सत्य का हमें पुजारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है।
एक-एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित खण्डकाव्य ‘मुक्तिदूत’ से लिया गया है, जिसके रचयिता मैथिलीशरण गुप्त हैं। इस पद्यांश में कवि ने महात्मा गाँधी को सत्य और न्याय का पुजारी बताते हुए उनके नेतृत्व में देश की मुक्ति के लिए किए जा रहे सामूहिक संघर्ष और जनकल्याण की भावना को अभिव्यक्त किया है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि यह स्पष्ट करता है कि सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने वाले महान नेता के नेतृत्व में प्रत्येक अनुयायी का कर्तव्य मुक्ति प्राप्ति के लिए कार्य करना है। यहाँ मुक्ति का तात्पर्य केवल व्यक्तिगत उद्धार से नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण से है।

कवि यह भाव व्यक्त करता है कि जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करता है, तब सबके प्रयास मिलकर एक महान उद्देश्य की पूर्ति करते हैं और समाज में सर्वत्र कल्याण, शांति तथा प्रसन्नता का वातावरण बनता है।

(iii) ‘कोटि-कोटि कंठों से मिलकर’ पंक्ति में कौन सा अलंकार है ?
Ans.
इस पंक्ति में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

स्पष्टीकरण :
यहाँ ‘कोटि-कोटि’ शब्द की पुनरावृत्ति द्वारा असंख्य लोगों की सामूहिक आवाज़ को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है, इसलिए इसमें पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार माना गया है।

अथवा

पुर ते निकसी रघुवीर वधू, धरि धरि दए मग में इग द्वै।
झलकी भरि भाल कनीं जल की पुट सूखि गए मधुराधर वै
फिर बूझाति हैं, चलनों अब केतिक, पर्णकुटी करिहों कित है।
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति च्चगुरु चलीं जल च्वें ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का शीर्षक एवं कवि के मि का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
प्रस्तुत पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के अरण्यकाण्ड से लिया गया है। इसमें वनगमन के समय सीता जी की भावनात्मक स्थिति का मार्मिक वर्णन किया गया है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने सीता जी की कोमल और भावुक अवस्था का चित्रण किया है। वनमार्ग की कठिनाइयों के कारण उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें झलक आती हैं और उनके होंठ सूख जाते हैं। आगे वे श्रीराम से पूछती हैं कि अब कितनी दूर चलना है और पर्णकुटी कहाँ बनेगी।

सीता जी की इस व्याकुलता और थकान को देखकर श्रीराम की आँखों में करुणा के आँसू भर आते हैं। इस प्रकार कवि ने पति-पत्नी के बीच के प्रेम, करुणा और संवेदनशीलता को अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।

(iii) पद्यांश में प्रयुक्त ‘मधुराधर’ शब्द का विशेषण-विशेष्य छाँटकर लिखिए ।
Ans.

  • विशेषण – मधुर
  • विशेष्य – अधर (होंठ)

3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

वाराणसी सुविख्याता प्राचीना नगरी । इयं विमलसलिलतरङ्गायाः गङ्गायाः कूले स्थिता । अस्याः घट्टानां बलयाकृतिः पंक्तिः धवलायां चन्द्रिकायां बहु राजते । अगणिताः पर्यटकाः सुदुरेभ्यः देशेभ्यः नित्यम् अत्र आयान्ति, अस्याः घट्टानां शोभां विलोक्य बहु प्रशंसन्ति ।
Ans. सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश में भारत की प्राचीन एवं प्रसिद्ध नगरी वाराणसी का वर्णन किया गया है। इसमें गंगा नदी के तट, वहाँ के घाटों की शोभा तथा दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों का उल्लेख है।

हिन्दी अनुवाद :
वाराणसी एक अत्यन्त प्रसिद्ध और प्राचीन नगरी है। यह निर्मल जल की तरंगों वाली गंगा नदी के तट पर स्थित है। इसके घाटों की अर्धवृत्ताकार (घुमावदार) पंक्ति श्वेत चाँदनी में अत्यन्त सुशोभित दिखाई देती है। दूर-दूर के देशों से असंख्य पर्यटक प्रतिदिन यहाँ आते हैं और इन घाटों की शोभा देखकर बहुत प्रशंसा करते हैं।

अथवा

पुनः ग्रामाणो अब्रवीत् ‘इदानीं भवान् पृच्छतु प्रहेलिकाम् ।’ दण्डदानेन खिन्नः नागरिकः बहुकालं विचार्य न काञ्चित् प्रहेलिकाम् अस्मरत्, अतः अधिकं लज्जमानः अब्रवीत्, “स्वकीयायाः प्रहेलिकायाः त्वमेव उत्तरं ब्रूहि ।” तदा स ग्रामीणः विहस्य स्वप्रहेलिकायाः सम्यक् उत्तरं अवदत् ‘पत्रम्’ इति ।
Ans.
सन्दर्भ :
प्रस्तुत गद्यांश एक कथा से लिया गया है, जिसमें एक ग्रामीण और एक नागरिक के बीच प्रहेलिका (पहेली) पूछने-बताने का प्रसंग है। इसमें नागरिक की असमर्थता और ग्रामीण की बुद्धिमत्ता का वर्णन किया गया है।

हिन्दी अनुवाद :
फिर ग्रामीण ने कहा— “अब आप पहेली पूछिए।” दण्ड दिए जाने से दुखी नागरिक बहुत देर तक सोचता रहा, परन्तु उसे कोई भी पहेली याद नहीं आई। इसलिए वह अधिक लज्जित होकर बोला— “अपनी पहेली का उत्तर तुम ही बता दो।” तब वह ग्रामीण हँसते हुए अपनी पहेली का सही उत्तर बोला— “पत्र।”

4. निम्नलिखित संस्कृत श्लोकों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

न वै ताडनात् तापनाद् वह्निमध्ये
न वै विक्रयात् क्लिश्यमानोऽहमस्मि ।
सुवर्णस्य मे मुख्य दुःखं तदेकं
यतो मां जनाः गुञ्जया तोलयन्ति ।।

Ans. सन्दर्भ : प्रस्तुत श्लोक एक शिक्षाप्रद प्रसंग से लिया गया है। इसमें सुवर्ण (सोना) अपने दुःख को व्यक्त करता हुआ बताता है कि उसे किन-किन कष्टों से गुजरना पड़ता है और उसका वास्तविक दुःख क्या है।

हिन्दी अनुवाद :
मैं न तो पीटे जाने से, न तपाए जाने से और न ही आग के बीच रखे जाने से दुःखी हूँ, और न ही बिकने के कारण मैं कष्ट अनुभव करता हूँ। मुझे सोने का मुख्य दुःख केवल यही है कि लोग मुझे गुञ्जा (रत्ती) के दाने से तौलते हैं।

अथवा

अपदो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः ।
अमुखं स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः ।।

Ans. सन्दर्भ : प्रस्तुत श्लोक में सच्चे पण्डित के लक्षण बताए गए हैं। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बाहरी आडम्बर नहीं, बल्कि वास्तविक गुण ही किसी व्यक्ति को पण्डित बनाते हैं।

हिन्दी अनुवाद :
जो विपत्ति के समय दूरदर्शी होता है, केवल अक्षर-ज्ञान वाला ही नहीं होता, जो दिखावे में चतुर वक्ता नहीं होता, परन्तु जो वास्तव में बात को ठीक से समझता और जानता है— वही व्यक्ति सच्चा पण्डित कहलाता है।

5. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर दिए गए प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए:

(क) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाषचन्द्र बोस को एक महान देशभक्त, क्रान्तिकारी और त्यागमूर्ति के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरित्र के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं—

  1. अदम्य देशभक्ति – सुभाषचन्द्र बोस का सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। वे भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने के लिए किसी भी प्रकार का बलिदान देने को तत्पर थे।
  2. साहस एवं वीरता – वे निर्भीक और साहसी नेता थे। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और शत्रुओं का डटकर सामना किया।
  3. त्याग और बलिदान की भावना – उन्होंने अपने सुख, आराम, पद और प्रतिष्ठा को त्यागकर देशसेवा का मार्ग अपनाया।
  4. दृढ़ संकल्प एवं नेतृत्व-क्षमता – सुभाषचन्द्र बोस में दृढ़ इच्छाशक्ति थी। उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज का संगठन कर भारतीयों में नवचेतना और आत्मविश्वास का संचार किया।
  5. प्रेरणादायी व्यक्तित्व – उनके विचार और कार्य युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस प्रकार ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाषचन्द्र बोस एक आदर्श, साहसी, त्यागी और राष्ट्रभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत हुए हैं।

(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans.
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में भारत की दयनीय स्थिति और अंग्रेजों के अत्याचारों का वर्णन किया गया है। देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है और जनता दुःखी तथा निराश है। इसी वातावरण में सुभाषचन्द्र बोस का उदय एक आशा-किरण के रूप में होता है।

प्रथम सर्ग में कवि सुभाषचन्द्र बोस के बचपन, उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और राष्ट्रप्रेम का संकेत करता है। सुभाष विदेशी शासन से दुखी होकर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का संकल्प लेते हैं। वे अन्याय, शोषण और दासता के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं तथा देशवासियों को जागृत करने का आह्वान करते हैं।

इस प्रकार प्रथम सर्ग में सुभाषचन्द्र बोस के राष्ट्रप्रेम, उनके दृढ़ निश्चय और स्वतंत्रता संग्राम की भूमिका का सशक्त चित्रण किया गया है, जो आगे की कथा की आधारशिला रखता है।

(ख) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘पूर्वाभास सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के पूर्वाभास सर्ग में राजसूय यज्ञ की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है। हस्तिनापुर में पाण्डवों की बढ़ती शक्ति, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की तैयारी तथा सभामण्डप का भव्य वर्णन किया गया है। इस सर्ग में यह संकेत मिलता है कि यज्ञ के अवसर पर किसी महान पुरुष की अग्रपूजा की जाएगी।
श्रीकृष्ण के अद्भुत व्यक्तित्व, उनकी कीर्ति और प्रभाव का पूर्वाभास मिलता है। सभा में उपस्थित राजाओं और विद्वानों के मन में यह प्रश्न उठता है कि अग्रपूजा का अधिकारी कौन होगा। इस प्रकार पूर्वाभास सर्ग में आगे होने वाली घटना—श्रीकृष्ण की अग्रपूजा और उससे उत्पन्न विरोध—का संकेत देकर कथानक की भूमिका तैयार की गई है।

(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्रांकन कीजिए ।
Ans.
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को आदर्श पुरुष, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और धर्म के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं—

  1. असाधारण बुद्धिमत्ता एवं विवेक – श्रीकृष्ण प्रत्येक परिस्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण कर उचित निर्णय लेते हैं। वे सभा में शान्त और संयमित रहते हैं।
  2. दूरदर्शिता – वे भविष्य की घटनाओं को भाँप लेते हैं और समय रहते उचित उपाय करते हैं। पूर्वाभास सर्ग में ही उनकी महानता का संकेत मिलता है।
  3. विनम्रता – इतने महान होते हुए भी श्रीकृष्ण अहंकाररहित हैं। वे स्वयं को साधारण सेवक की भाँति प्रस्तुत करते हैं।
  4. धर्म के रक्षक – वे धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
  5. लोकप्रियता एवं प्रभावशीलता – उनके गुणों और कार्यों के कारण वे सभी राजाओं और जनसामान्य में सम्मानित हैं।

इस प्रकार ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक बुद्धिमान, विनम्र, दूरदर्शी तथा धर्मनिष्ठ महान व्यक्तित्व के रूप में चित्रित हुए हैं।

(ग) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कैकेयी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans.
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी का चरित्र बहुआयामी रूप में चित्रित किया गया है। उनके प्रमुख चारित्रिक गुण निम्नलिखित हैं—

  1. मातृत्व-भावना – कैकेयी एक स्नेहमयी माता हैं। वे अपने पुत्र भरत से अत्यधिक प्रेम करती हैं और उसके भविष्य के प्रति चिंतित रहती हैं।
  2. महत्त्वाकांक्षी स्वभाव – भरत को राजा बनाने की इच्छा उनके मन में प्रबल है। इसी महत्त्वाकांक्षा के कारण वे कैकयी-पुत्र के राज्याभिषेक की कामना करती हैं।
  3. भावुकता एवं दुर्बलता – मंथरा के बहकावे में आकर वे अपने विवेक से विचलित हो जाती हैं। यह उनके चरित्र की मानवीय दुर्बलता को दर्शाता है।
  4. पश्चात्ताप की भावना – जब उन्हें अपने कर्मों का परिणाम समझ में आता है, तब वे अत्यन्त दुःखी और पश्चात्ताप से भर उठती हैं।
  5. नारी-मन का सजीव चित्रण – कैकेयी का चरित्र एक ऐसी नारी का रूप प्रस्तुत करता है जिसमें प्रेम, मोह, महत्वाकांक्षा और पश्चात्ताप—all एक साथ विद्यमान हैं।

इस प्रकार ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी का चरित्र यथार्थ, संवेदनशील और मानवीय रूप में उभरा है।

(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ की कथावस्तु का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ में अयोध्या के राजमहल का करुण वातावरण चित्रित किया गया है। राजा दशरथ के निधन के पश्चात् राजभवन शोक और विषाद से भर गया है। चारों ओर मौन, अश्रु और दुःख का वातावरण व्याप्त है।

इस सर्ग में भरत का अयोध्या आगमन होता है। वे पिता की मृत्यु और राम के वनवास का समाचार सुनकर अत्यन्त व्यथित हो जाते हैं। राजसिंहासन देखकर वे उसे स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर देते हैं। भरत स्वयं को राज्य का अधिकारी नहीं मानते और राम को ही सच्चा राजा स्वीकार करते हैं।

इस सर्ग में भरत की कर्तव्यनिष्ठा, भ्रातृप्रेम और त्याग-भावना का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। ‘राजभवन’ सर्ग भरत के कर्मवीर, आदर्श और उच्च चरित्र की सुदृढ़ आधारशिला रखता है।

(घ) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती का चरित्र करुणा, मातृत्व और पश्चात्ताप से युक्त रूप में प्रस्तुत हुआ है। उनके प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

  1. स्नेहमयी माता – कुन्ती के हृदय में कर्ण के प्रति गहरा मातृत्व-भाव है। यद्यपि सामाजिक मर्यादाओं के कारण वे उसे पहचान नहीं दे सकीं, फिर भी पुत्र-प्रेम उनके मन में सदैव जीवित रहा।
  2. कर्तव्य और मर्यादा-बोध – वे राजकुल की मर्यादाओं से बँधी हुई नारी हैं। लोक-लाज और सामाजिक भय के कारण उन्हें कठोर निर्णय लेने पड़े।
  3. अन्तर्द्वन्द्वग्रस्त नारी – कुन्ती का जीवन आत्मसंघर्ष से भरा है। एक ओर पुत्र-स्नेह है, दूसरी ओर सामाजिक प्रतिष्ठा और धर्म। यही द्वन्द्व उनके चरित्र को करुण बनाता है।
  4. पश्चात्ताप और करुणा – कर्ण के जीवन-संघर्ष और उसके साथ हुए अन्याय को देखकर वे गहरे पश्चात्ताप से भर उठती हैं।
  5. मानवीय संवेदना – उनका चरित्र एक ऐसी नारी का सजीव चित्र है, जो परिस्थितियों से विवश होकर भी भीतर से अत्यन्त संवेदनशील है।

इस प्रकार ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती एक करुण, मातृवत्सला, मर्यादाशील तथा अन्तर्द्वन्द्व से पीड़ित नारी के रूप में उभरती हैं।

(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग में कर्ण और कुन्ती के भावनात्मक संवाद का मार्मिक चित्रण है। इस सर्ग में कुन्ती कर्ण के पास जाकर अपने मातृत्व-सत्य को प्रकट करती हैं। वे कर्ण को अपना पुत्र स्वीकार करते हुए उससे पाण्डवों का साथ देने का आग्रह करती हैं।

कर्ण यह जानकर भी कि कुन्ती उसकी माता हैं, अपने जीवन-सिद्धान्त और कृतज्ञता को नहीं त्यागता। वह दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करता है और कुन्ती को वचन देता है कि युद्ध में वह अर्जुन को छोड़कर अन्य पाण्डवों को नहीं मारेगा।

इस सर्ग में कर्ण की दानवीरता, वचन-पालन, आत्मसम्मान और त्याग का उत्कृष्ट चित्रण मिलता है। साथ ही कुन्ती की करुणा और पश्चात्ताप भी प्रभावशाली रूप में उभरते हैं। षष्ठ सर्ग कर्ण के महान और त्रासद व्यक्तित्व को गहराई प्रदान करता है।

(ड) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार परे महाराणा प्रताप का चरित्रांकन कीजिए ।
Ans.
‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप को स्वाभिमान, वीरता और देशप्रेम का सजीव प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं—

  1. अडिग स्वाभिमान – महाराणा प्रताप ने जीवनभर आत्मसम्मान को सर्वोपरि माना। उन्होंने मुग़ल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, चाहे इसके लिए उन्हें कितने ही कष्ट क्यों न सहने पड़े।
  2. अदम्य वीरता और साहस – वे युद्धभूमि में अद्वितीय वीर थे। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने शत्रुओं का डटकर सामना किया।
  3. त्याग और तपस्या – राजसी वैभव त्यागकर उन्होंने वनवास, अभाव और कष्टपूर्ण जीवन को स्वीकार किया, परन्तु मेवाड़ की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया।
  4. देशभक्ति और स्वतंत्रता-प्रेम – उनका सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा।
  5. आदर्श नेतृत्व – महाराणा प्रताप अपने सैनिकों और प्रजा के लिए प्रेरणास्रोत थे। वे स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का मनोबल बढ़ाते थे।

इस प्रकार ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप एक महान, स्वाभिमानी, त्यागी और राष्ट्रनिष्ठ नायक के रूप में उभरते हैं।

(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग ‘दौलत’ की कथावस्तु का वर्णन कीजिए ।
Ans.
‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग ‘दौलत’ में अकबर द्वारा महाराणा प्रताप को धन-वैभव और ऐश्वर्य का प्रलोभन दिए जाने का प्रसंग वर्णित है। अकबर चाहता है कि प्रताप उसकी अधीनता स्वीकार कर लें, बदले में उन्हें अपार धन, सम्मान और सुख-सुविधाएँ प्राप्त हों।

इस सर्ग में यह स्पष्ट किया गया है कि महाराणा प्रताप के लिए धन-दौलत का कोई महत्व नहीं है। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि मेवाड़ की स्वतंत्रता और स्वाभिमान के सामने संसार की सारी दौलत तुच्छ है। वे निर्धन रहना स्वीकार करते हैं, परन्तु पराधीनता नहीं।

‘दौलत’ सर्ग महाराणा प्रताप के चरित्र की दृढ़ता, त्याग और आत्मसम्मान को प्रभावशाली ढंग से उजागर करता है तथा यह संदेश देता है कि सच्चा मुकुट धन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान है।

(च)(i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद का चरित्रांकन कीजिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में मेघनाद (इन्द्रजीत) को एक अद्वितीय वीर, पराक्रमी और स्वाभिमानी योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. अप्रतिम वीरता – मेघनाद रणभूमि में अत्यन्त साहसी और पराक्रमी है। वह देवताओं तक को पराजित कर चुका है, इसी कारण उसे इन्द्रजीत कहा जाता है।
  2. अद्भुत युद्ध-कौशल – उसे अस्त्र-शस्त्रों और मायावी युद्ध-कला में पूर्ण निपुणता प्राप्त है। युद्ध में उसकी रणनीति और कौशल शत्रुओं को भयभीत कर देते हैं।
  3. पितृभक्ति – वह अपने पिता रावण के प्रति पूर्णतः निष्ठावान है और उनके सम्मान व राज्य की रक्षा के लिए प्राण तक देने को तत्पर रहता है।
  4. स्वाभिमान और आत्मगौरव – मेघनाद आत्मसम्मानी योद्धा है। वह पराजय को स्वीकार नहीं करता और अन्तिम क्षण तक संघर्ष करता है।
  5. त्रासद नायक – अत्यन्त वीर और योग्य होते हुए भी वह अधर्म की ओर से युद्ध करता है, जिससे उसका चरित्र करुण और त्रासद बन जाता है।

इस प्रकार ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में मेघनाद एक महावीर, स्वाभिमानी किन्तु त्रासद नायक के रूप में प्रस्तुत हुआ है।

(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी एक सगै का कथानक लिखिए।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में लंका और राम-रावण युद्ध की भीषण पृष्ठभूमि का चित्रण किया गया है। चारों ओर युद्ध का कोलाहल है, आकाश और पृथ्वी रणघोष से गूँज रहे हैं। इस सर्ग में युद्ध की उग्रता, वीरों के पराक्रम और भयावह वातावरण का सजीव वर्णन मिलता है।

प्रथम सर्ग में मेघनाद के रणप्रवेश का प्रभावशाली वर्णन है। उसके आगमन से राक्षस-सेना में उत्साह भर जाता है और वानर-सेना में हलचल मच जाती है। मेघनाद अपने अद्भुत युद्ध-कौशल से शत्रु-सैनिकों को परास्त करता है और युद्ध को अत्यन्त भीषण बना देता है।

इस प्रकार यह सर्ग सम्पूर्ण खण्डकाव्य के लिए संघर्षपूर्ण वातावरण तैयार करता है और मेघनाद के वीरतापूर्ण चरित्र की आधारशिला रखता है।

(छ) (i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी को भारत की स्वतंत्रता का संदेशवाहक, नैतिक शक्ति और मानवता के महान आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके प्रमुख चारित्रिक गुण इस प्रकार हैं—

  1. अहिंसा और सत्य के उपासक – गाँधीजी का सम्पूर्ण जीवन सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर आधारित है। वे बिना हिंसा के अन्याय का विरोध करते हैं।
  2. अदम्य साहस और दृढ़ निश्चय – वे अत्याचारों से भयभीत नहीं होते और सत्याग्रह के माध्यम से अंग्रेजी शासन को चुनौती देते हैं।
  3. त्याग और सादगी – गाँधीजी ने भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर सादा जीवन अपनाया और जनसाधारण के साथ एकात्म हो गए।
  4. जननेता और प्रेरक व्यक्तित्व – वे जन-जन को स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
  5. मानवता और करुणा – उनके हृदय में सभी के लिए प्रेम, करुणा और समानता की भावना है।

इस प्रकार ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी एक सत्यनिष्ठ, अहिंसक, त्यागी और जन-प्रेरक महान व्यक्तित्व के रूप में चित्रित हैं।

(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु का वर्णन कीजिए ।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में भारत की दासता और अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का सजीव चित्रण किया गया है। देश की जनता शोषण, अन्याय और भय के वातावरण में जीवन व्यतीत कर रही है। इसी समय महात्मा गाँधी स्वतंत्रता के मुक्तिदूत के रूप में देशवासियों के सामने आते हैं।

इस सर्ग में गाँधीजी द्वारा सत्याग्रह, असहयोग और अहिंसक आन्दोलन का आह्वान किया गया है। वे जनमानस को भय त्यागकर अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देते हैं। उनके शब्दों और आचरण से जनता में नया आत्मविश्वास और जागृति उत्पन्न होती है।

इस प्रकार द्वितीय सर्ग में स्वतंत्रता-संग्राम की चेतना, गाँधीजी के नेतृत्व और जनजागरण का प्रभावशाली वर्णन मिलता है, जो सम्पूर्ण खण्डकाव्य की भावभूमि को सुदृढ़ करता है।

(ज) (i) ‘मातृ‌भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर ‘आजाद’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर ‘आजाद’ को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी, निर्भीक वीर और त्यागमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. अदम्य देशभक्ति – आजाद का सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। वे देश की गुलामी को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
  2. असीम साहस और वीरता – वे निडर क्रान्तिकारी थे। अंग्रेजी शासन और पुलिस-बल से कभी भयभीत नहीं हुए और अन्तिम क्षण तक संघर्ष करते रहे।
  3. दृढ़ संकल्प – ‘आजाद’ रहने की उनकी प्रतिज्ञा उनके जीवन का मूल मंत्र थी। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे जीवित रहते हुए कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएँगे।
  4. त्याग और बलिदान की भावना – उन्होंने निजी सुख, परिवार और जीवन तक का बलिदान मातृभूमि के लिए कर दिया।
  5. प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व – उनका जीवन और बलिदान युवाओं में राष्ट्रप्रेम और क्रान्ति की भावना जगाता है।

इस प्रकार ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर ‘आजाद’ एक साहसी, त्यागी, संकल्पशील और राष्ट्रभक्त नायक के रूप में चित्रित हुए हैं।

(ii) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘समर्थ’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘समर्थ’ सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद की योग्यता, आत्मबल और क्रान्तिकारी क्षमता का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इस सर्ग में यह स्पष्ट किया गया है कि आजाद केवल भावुक युवक नहीं, बल्कि संगठनकर्ता, कुशल रणनीतिकार और साहसी योद्धा हैं।

वे क्रान्तिकारी साथियों का मार्गदर्शन करते हैं, उन्हें आत्मविश्वास और साहस से भरते हैं तथा मातृभूमि के लिए बलिदान को सर्वोच्च कर्तव्य बताते हैं। इस सर्ग में आजाद की मानसिक दृढ़ता, नेतृत्व-क्षमता और संघर्ष के लिए उनकी पूर्ण तैयारी का वर्णन मिलता है।

इस प्रकार ‘समर्थ’ सर्ग चन्द्रशेखर आजाद को एक सक्षम, आत्मनिर्भर और संकल्पवान क्रान्तिकारी के रूप में प्रस्तुत करता है और सम्पूर्ण खण्डकाव्य की भावधारा को सुदृढ़ बनाता है।

(झ) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर लोकनायक ‘जवाहरलाल नेहरू’ की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू को भारत के लोकनायक, दूरदर्शी नेता और आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. अदम्य देशभक्ति – नेहरूजी का सम्पूर्ण जीवन देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते थे।
  2. दूरदर्शी नेतृत्व – वे भविष्य की आवश्यकताओं को समझने वाले नेता थे। आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील भारत का स्वप्न उन्होंने देखा।
  3. लोकतांत्रिक सोच – नेहरूजी लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे।
  4. मानवतावादी दृष्टिकोण – उनके हृदय में मानवता, शांति और विश्व-बंधुत्व की भावना थी।
  5. प्रेरणादायी व्यक्तित्व – उनका जीवन युवाओं को राष्ट्रनिर्माण और सेवा के लिए प्रेरित करता है।

इस प्रकार ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू एक प्रबुद्ध, दूरदर्शी, लोकतांत्रिक और मानवतावादी लोकनायक के रूप में प्रस्तुत हुए हैं।

(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू के जीवन, विचारों और योगदान का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। इसमें उनके बचपन, शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम में सहभागिता तथा महात्मा गाँधी के नेतृत्व में किए गए संघर्षों का उल्लेख है।

काव्य में नेहरूजी के कारावास-जीवन, त्याग और कष्टों का वर्णन करते हुए उनके अडिग संकल्प को दर्शाया गया है। स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी भूमिका—औद्योगीकरण, वैज्ञानिक दृष्टि, शिक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना—को विशेष रूप से उजागर किया गया है।

इस प्रकार ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य एक ऐसे महान नेता की जीवन-ज्योति को प्रस्तुत करता है, जिसने भारत को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर किया।

6. (क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) जयशंकर प्रसाद
Ans.
जीवन-परिचय : जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के छायावाद युग के सर्वश्रेष्ठ और सर्वांगीण साहित्यकार माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1889 ई० में उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। बाल्यावस्था में ही माता-पिता का निधन हो जाने के कारण उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा, परन्तु उनकी प्रतिभा और आत्मबल ने उन्हें महान साहित्यकार बनाया।

प्रसाद जी ने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी और अंग्रेज़ी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे कवि, नाटककार, उपन्यासकार, कथाकार और निबन्धकार—सभी रूपों में अद्वितीय थे। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति, दर्शन, आध्यात्मिकता, राष्ट्रप्रेम, मानव-मूल्य और सौन्दर्य-बोध का उत्कृष्ट समन्वय देखने को मिलता है।

जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्यधारा के प्रमुख स्तम्भ माने जाते हैं। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, भावपूर्ण और कलात्मक है। उन्होंने हिन्दी साहित्य को गम्भीरता, गरिमा और दार्शनिक ऊँचाई प्रदान की। उनका निधन सन् 1937 ई० में हुआ।

प्रमुख रचना :
कामायनी (महाकाव्य)

(ii) जयप्रकाश भारती
Ans.
जीवन-परिचय : जयप्रकाश भारती आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि एवं खण्डकाव्यकार थे। वे संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान माने जाते हैं। उनका साहित्य मुख्यतः राष्ट्रीय चेतना, आदर्शवाद, वीरता, त्याग और देशभक्ति से ओत-प्रोत है।

जयप्रकाश भारती ने हिन्दी साहित्य को अनेक उत्कृष्ट खण्डकाव्य प्रदान किए, जिनमें भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों का प्रेरणादायी चित्रण मिलता है। उनकी रचनाएँ छात्रों में राष्ट्रप्रेम, साहस और नैतिक मूल्यों का विकास करती हैं।

उनकी भाषा सरल, ओजपूर्ण और भावप्रवण है। वे ऐसे कवि थे जिन्होंने काव्य को केवल सौन्दर्य का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र-जागरण का माध्यम बनाया।

प्रमुख रचना :
जय सुभाष (खण्डकाव्य)

(iii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
Ans.
जीवन-परिचय : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान लेखक, शिक्षाविद् तथा भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका जन्म सन् 1884 ई० में बिहार राज्य के सीवान जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ।

वे बचपन से ही अत्यन्त मेधावी थे और उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने महात्मा गाँधी के साथ सक्रिय भूमिका निभाई। वे अनेक बार जेल गए, परन्तु राष्ट्रसेवा के मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए।

डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व सरलता, सच्चाई, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता का प्रतीक था। उन्होंने हिन्दी भाषा के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका लेखन आत्मकथात्मक, प्रेरणादायी और ऐतिहासिक महत्त्व का है। उनका निधन सन् 1963 ई० में हुआ।

प्रमुख रचना :
आत्मकथा

(iv) डॉ० भगवतशरण उपाध्याय ।
Ans.
जीवन-परिचय : डॉ० भगवतशरण उपाध्याय हिन्दी और संस्कृत साहित्य के सुप्रसिद्ध विद्वान, इतिहासकार और संस्कृति-चिन्तक थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व और सभ्यता पर गहन शोध किया। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान थे।

उनका लेखन शोधपरक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की निरन्तरता, महानता और वैशिष्ट्य को अपने ग्रन्थों के माध्यम से उजागर किया। डॉ० उपाध्याय की रचनाएँ विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी मानी जाती हैं।

उनकी भाषा गंभीर, प्रौढ़ और विषयानुकूल है। उन्होंने हिन्दी निबन्ध साहित्य को विद्वत्तापूर्ण ऊँचाई प्रदान की।

प्रमुख रचना :
भारत का सांस्कृतिक इतिहास

(ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) मैथिलीशरण गुप्त
Ans.
जीवन-परिचय : मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी साहित्य के राष्ट्रकवि माने जाते हैं। उनका जन्म 3 अगस्त 1886 ई० को उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद के चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ। वे बाल्यकाल से ही काव्य-रचना में रुचि रखते थे। औपचारिक शिक्षा अधिक न होने पर भी स्वाध्याय के बल पर वे हिन्दी, संस्कृत और ब्रजभाषा के महान कवि बने।

मैथिलीशरण गुप्त जी का काव्य राष्ट्रीय चेतना, आदर्शवाद, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत है। उन्होंने रामायण और महाभारत के पात्रों को आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत कर समाज को नई दिशा दी। वे हिन्दी साहित्य में खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले प्रमुख कवियों में से एक हैं।

भारत सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया था। उनका निधन 12 दिसम्बर 1964 ई० को हुआ।

प्रमुख रचना :
भारत-भारती

(ii) बिहारीलाल
Ans.
जीवन-परिचय : बिहारीलाल हिन्दी साहित्य के रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनका जन्म लगभग 1603 ई० में ग्वालियर क्षेत्र में माना जाता है। वे आमेर (जयपुर) के राजा जयसिंह के दरबार में राजकवि थे।

बिहारीलाल ने मुख्यतः श्रृंगार रस का उत्कृष्ट चित्रण किया है। उनकी कविता की विशेषता है—संक्षिप्तता में गहन भावाभिव्यक्ति। उन्होंने दोहे जैसे छोटे छन्द में प्रेम, नीति, भक्ति और लोकजीवन के गूढ़ भावों को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

उनकी भाषा ब्रजभाषा है, जो अत्यन्त मधुर, सरस और अलंकारयुक्त है। हिन्दी साहित्य में उन्हें “गागर में सागर भरने वाला कवि” कहा जाता है।

प्रमुख रचना :
बिहारी सतसई

(iii) सुमित्रानन्दन पन्त
Ans.
जीवन-परिचय : सुमित्रानन्दन पन्त हिन्दी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। उनका जन्म 20 मई 1900 ई० को उत्तराखण्ड के कौसानी गाँव में हुआ। प्रकृति की सुरम्य गोद में पले-बढ़े होने के कारण उनकी कविता में प्रकृति-सौन्दर्य का अद्भुत चित्रण मिलता है।

पन्त जी की कविता में सौन्दर्य, कोमलता, मानवीय संवेदना और आध्यात्मिक चेतना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। समय के साथ उनकी काव्य-दृष्टि सामाजिक और प्रगतिशील भी होती गई। उन्होंने साहित्य को मानवीय मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया।

उन्हें साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका निधन 28 दिसम्बर 1977 ई० को हुआ।

प्रमुख रचना :
पल्लव

(iv) अशोक वाजपेयी ।
Ans.
जीवन-परिचय : अशोक वाजपेयी आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध समकालीन कवि, आलोचक और सांस्कृतिक चिन्तक हैं। उनका जन्म 16 जनवरी 1941 ई० को मध्य प्रदेश में हुआ। वे प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय रहे।

अशोक वाजपेयी की कविता में आधुनिक जीवन की जटिलताएँ, मानवीय अनुभव, संवेदना और बौद्धिक गहराई दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ भावुकता के साथ-साथ विचारप्रधान भी हैं। उन्होंने हिन्दी कविता को आधुनिक चेतना और वैश्विक दृष्टि से समृद्ध किया।

उन्हें साहित्य के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।

प्रमुख रचना :
कुछ पूर्वापर

7. अपनी पाठ्यपुस्तक के संस्कृत खण्ड से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए, जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो।
Ans.

विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

8. विद्यालय में खेल-कूद की सामग्री की ओर ध्यान दिलाते हुए प्रधानाचार्य को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए ।
Ans.

सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय,
__________ विद्यालय,
__________।

विषय : विद्यालय में खेल-कूद की सामग्री की ओर ध्यान दिलाने हेतु प्रार्थना-पत्र।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय का एक विद्यार्थी हूँ। हमारे विद्यालय में खेल-कूद की कक्षाएँ नियमित रूप से होती हैं, परन्तु खेल-कूद की सामग्री पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। कई सामग्री पुरानी और टूटी-फूटी हो चुकी है, जिससे विद्यार्थियों को खेल अभ्यास में कठिनाई होती है।

क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बैडमिंटन आदि खेलों के लिए आवश्यक गेंदें, बल्ले, जाल, रैकेट आदि की संख्या कम होने के कारण सभी विद्यार्थियों को अभ्यास का पूरा अवसर नहीं मिल पाता। खेल-कूद न केवल शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि मानसिक विकास और अनुशासन के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।

अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि विद्यालय में खेल-कूद की नई एवं पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराने की कृपा करें, जिससे हम सभी विद्यार्थी खेल गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग ले सकें।

धन्यवाद।

भवदीय,
आपका आज्ञाकारी छात्र
नाम : __________
कक्षा : __________
दिनांक : __________

अथवा

किसी पर्यटक स्थल का वर्णन करते हुए अपने मित्र को एक पत्र लिखिए कि वह भी कुछ दिनों के लिए आपके पास आ जाए ।
Ans.

प्रिय मित्र रोहित,

सप्रेम नमस्कार।
आशा है तुम सकुशल होगे। मैं यहाँ पूरी तरह स्वस्थ हूँ और अपनी पढ़ाई में भी मन लग रहा है। इस पत्र का उद्देश्य तुम्हें अपने यहाँ आने का निमंत्रण देना है।

इन दिनों मैं वाराणसी घूम रहा हूँ, जो भारत की एक अत्यन्त प्राचीन और प्रसिद्ध पर्यटक नगरी है। यह पवित्र नगरी गंगा नदी के तट पर स्थित है। यहाँ के घाट, मंदिर और संकरी गलियाँ बहुत आकर्षक हैं। प्रातःकाल गंगा-तट पर होने वाली आरती का दृश्य अत्यन्त मनमोहक होता है। सायंकाल गंगा आरती देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर, दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और सारनाथ जैसे स्थल यहाँ की शोभा को और बढ़ाते हैं।

यहाँ का वातावरण शान्त, आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक है। नाव की सवारी करते समय गंगा की लहरों और घाटों की सुंदरता मन को बहुत प्रसन्न करती है। स्थानीय खान-पान भी बहुत स्वादिष्ट है, विशेषकर कचौड़ी-सब्ज़ी और बनारसी मिठाइयाँ।

मित्र, यदि तुम कुछ दिनों के लिए मेरे पास आ जाओ तो हमें साथ-साथ इन सभी दर्शनीय स्थलों को देखने का अवसर मिलेगा। इससे हमारा ज्ञान भी बढ़ेगा और मनोरंजन भी होगा। यहाँ ठहरने की पूरी व्यवस्था है, इसलिए किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी।

आशा है तुम अवश्य आने का प्रयास करोगे। शीघ्र उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।

तुम्हारा प्रिय मित्र
सुनीत
दिनांक : __________

9. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत् में दीजिए :

(i) अलक्षेन्द्रः कः आसीत् ?
Ans.
अलक्षेन्द्रः एकः महान् विजेता आसीत्।

(ii) दुराग्रहः कुत्र नास्ति ?
Ans.
दुराग्रहः मूर्खेषु नास्ति। (या — जगति कुत्रापि नास्ति, पाठानुसार)

(iii) भूमेः गुरुतरं किम् अस्ति ?
Ans.
भूमेः गुरुतरं माता अस्ति।

(iv) कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
Ans.
कूपः जलाभावात् दुःखम् अनुभवति।

10. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए।

(i) साम्प्रदायिकता: एक अभिशाप
Ans.
साम्प्रदायिकता समाज की वह संकीर्ण भावना है, जिसमें व्यक्ति अपने धर्म, जाति या सम्प्रदाय को राष्ट्र और मानवता से ऊपर मानने लगता है। यह भावना समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और सहिष्णुता को नष्ट कर देती है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में साम्प्रदायिकता एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है।

साम्प्रदायिकता के कारण समाज में वैमनस्य, घृणा और हिंसा फैलती है। दंगे, आगजनी, हत्या और लूटपाट जैसी घटनाएँ इसी का परिणाम हैं। निर्दोष लोग अपनी जान और सम्पत्ति खो बैठते हैं। इससे न केवल सामाजिक शान्ति भंग होती है, बल्कि देश की आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति भी रुक जाती है।

राजनीतिक स्वार्थों के कारण कई बार साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काया जाता है। कुछ लोग अपने लाभ के लिए जनता को धर्म और जाति के नाम पर बाँटते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो जाता है।

भारत की संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना पर आधारित है। यहाँ सभी धर्मों ने प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। साम्प्रदायिकता इन मूल्यों के विरुद्ध है। इससे मुक्ति के लिए शिक्षा, नैतिकता, सहिष्णुता और राष्ट्रीय भावना का विकास आवश्यक है।

(ii) विज्ञान बरदान या अभिशाप
Ans.
विज्ञान आधुनिक युग का आधार स्तम्भ है। इसके कारण मानव जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। विज्ञान ने मानव को प्रकृति की शक्तियों पर नियन्त्रण करने की क्षमता प्रदान की है। आज हमारा जीवन विज्ञान के बिना अधूरा प्रतीत होता है।

विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। असाध्य रोगों का उपचार सम्भव हुआ है। यातायात के साधनों ने दूरियों को कम कर दिया है। रेल, मोटर, जहाज और वायुयान ने विश्व को एक गाँव में बदल दिया है। संचार के क्षेत्र में मोबाइल, इंटरनेट और उपग्रहों ने क्रान्ति ला दी है।

किन्तु विज्ञान के दुष्परिणाम भी हैं। परमाणु हथियार, जैविक और रासायनिक हथियार मानव सभ्यता के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता से बेरोजगारी बढ़ रही है। औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण फैल रहा है, जिससे पर्यावरण असन्तुलित हो गया है।

वास्तव में विज्ञान स्वयं न तो वरदान है और न ही अभिशाप। उसका उपयोग ही उसे वरदान या अभिशाप बनाता है। यदि विज्ञान का प्रयोग मानव कल्याण के लिए हो, तो वह वरदान है; यदि विनाश के लिए हो, तो अभिशाप।

(iii) छात्र और अनुशासन
Ans.
अनुशासन मानव जीवन का अनिवार्य अंग है और छात्र जीवन में इसका विशेष महत्व है। अनुशासन का अर्थ है—नियमों का पालन करना, समय का सदुपयोग करना और संयमित आचरण अपनाना।

छात्र जीवन भविष्य की नींव होता है। यदि इस अवस्था में अनुशासन का पालन न किया जाए, तो जीवन की दिशा भटक सकती है। एक अनुशासित छात्र नियमित अध्ययन करता है, समय पर विद्यालय जाता है, गुरुजनों का सम्मान करता है और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहता है।

विद्यालय अनुशासन सिखाने का सर्वोत्तम स्थान है। यहाँ छात्र समयपालन, स्वच्छता, शिष्टाचार, आज्ञाकारिता और आत्मसंयम सीखता है। अनुशासन से आत्मविश्वास बढ़ता है और चरित्र का निर्माण होता है।

बिना अनुशासन के ज्ञान भी निष्फल हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि महान व्यक्ति वही बने, जिन्होंने अपने जीवन में अनुशासन का पालन किया।

(iv) स्वच्छ भारत अभियान
Ans.
स्वच्छता स्वास्थ्य और सभ्यता की पहचान है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा स्वच्छ भारत अभियान प्रारम्भ किया गया। इस अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती के अवसर पर हुई।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त करना, स्वच्छ वातावरण का निर्माण करना और नागरिकों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाना है। इसके अंतर्गत गाँव-गाँव और शहर-शहर शौचालयों का निर्माण किया गया तथा कचरा प्रबन्धन पर विशेष ध्यान दिया गया।

स्वच्छता से अनेक बीमारियों से बचाव होता है। गन्दगी मलेरिया, डेंगू और हैजा जैसी बीमारियों को जन्म देती है। स्वच्छ वातावरण से न केवल स्वास्थ्य सुधरता है, बल्कि देश की छवि भी विश्व स्तर पर निखरती है।

इस अभियान की सफलता के लिए जन-सहभागिता अत्यन्त आवश्यक है। केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। प्रत्येक नागरिक को अपने घर, विद्यालय और आसपास स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए।

(v) किसी यात्रा का वर्णन ।
Ans.
यात्रा मानव जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव है। यात्रा से ज्ञान बढ़ता है और मन प्रसन्न होता है। पिछले वर्ष मुझे अपने परिवार के साथ वाराणसी यात्रा करने का अवसर मिला, जो मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा रही।

वाराणसी भारत का एक प्राचीन धार्मिक नगर है। गंगा नदी के तट पर बसे इस नगर की संस्कृति और आध्यात्मिकता अद्भुत है। हमने गंगा आरती देखी, जो अत्यन्त मनोहारी थी। दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार से वातावरण पवित्र हो गया था।

इसके अतिरिक्त हमने काशी विश्वनाथ मन्दिर और सारनाथ का भ्रमण किया। सारनाथ वह स्थान है, जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। इस यात्रा से मुझे भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को समझने का अवसर मिला।

यात्रा से हमें नई-नई बातें सीखने को मिलती हैं और जीवन में नवीन उत्साह का संचार होता है।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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