U.P Board Class 10 Hindi 801(BC) Question Paper 2025

U.P Board Class 10 Hindi 801(BC) Question Paper 2025 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2025
हिन्दी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट  पूर्णांक: 70

नोट : प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।

i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।

iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके सही उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट कलम से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से काला कर चिह्नित करें ।

iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें । ओ० एम०आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ह्वाइटनर का प्रयोग न करें।

v) प्रत्येक प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।

vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।

vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें।

viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।

खण्ड – अ 

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

निर्देश: नीचे दिए गए प्रत्येक प्रश्न के लिए चार विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प चुनकर उसे ओ. एम. आर. उत्तर पत्रक पर चिह्नित करें।

1. ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ रचना की विधा है:

(A) संस्मरण
(B) आत्मकथा
(C) जीवनी
(D) कहानी

Ans. (B) आत्मकथा

2. ‘लिखि कागद कोरे’ रचना के लेखक हैं:

(A) शान्तिप्रिय द्विवेदी
(B) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(C) प्रभाकर माचवे
(D) ‘अज्ञेय’

Ans. (B) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

3. रामचन्द्र शुक्ल की रचना है:

(A) ‘त्रिवेणी’
(B) ‘समाज और साहित्य’
(C) ‘प्रलय के पंख पर’
(D) ‘कालिदास की निरंकुशता’

Ans. (B) ‘समाज और साहित्य’

4. हिन्दी साहित्य का प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है:

(A) ‘चित्रलेखा’
(B) ‘हृदय की परख’
(C) ‘परीक्षा गुरु’
(D) ‘अन्तिम आकांक्षा’

Ans. (C) ‘परीक्षा गुरु’

5. शुक्लोत्तरयुगीन लेखक हैं:

(A) रायकृष्ण दास
(B) वियोगी हरि
(C) जयशङ्कर प्रसाद
(D) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी

Ans. (D) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी

6. ‘रीतिबद्ध काव्यधारा’ के कवि हैं:

(A) बोधा
(B) घनानन्द
(C) मतिराम
(D) बिहारी

Ans. (D) बिहारी

7. रीतिकालीन कवियों ने काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया :

(A) अवधी को
(B) ब्रजभाषा को
(C) खड़ीबोली को
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) ब्रजभाषा को

8. छायावाद्‌युगीन कवि हैं:

(A) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(B) मैथिलीशरण गुप्त
(C) राधाकृष्ण दास
(D) महादेवी वर्मा

Ans. (D) महादेवी वर्मा

9. ‘कनुप्रिया’ के रचयिता है:

(A) निराला
(B) गिरिजाकुमार माथुर
(C) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(D) धर्मवीर भारती

Ans. (D) धर्मवीर भारती

10. ‘नई कविता युग’ के कवि हैं:

(A) शमशेर बहादुर सिंह
(B) केदारनाथ अग्रवाल
(C) त्रिलोचन
(D) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Ans. (A) शमशेर बहादुर सिंह

11. हास्य रस का स्थायीभाव है:

(A) हास
(B) शोक
(C) रति
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A) हास

12. ‘जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाती है’ वहाँ होता है:

(A) रूपक अलङ्कार
(B) उत्प्रेक्षा अलङ्कार
(C) उपमा अलङ्कार
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) उत्प्रेक्षा अलङ्कार

13. ‘सोरठा’ छन्द के द्वितीय चरण में कितनी मात्राएँ होती हैं?

(A) 13
(B) 8
(C) 16
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) 16

14. ‘उपहार’ शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है:

(A) अप
(B) अभि
(C) उप
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) उप

15. ‘त्रिभुवन’ में समास है:

(A) तत्पुरुष
(B) द्विगु
(C) कर्मधारय
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) द्विगु

16. ‘ओष्ठ’ का तद्भव शब्द है:

(A) ओश्त
(B) ऊठ
(C) ओठ
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) ओठ

17. ‘युष्मद्’ शब्द के सप्तमी एकवचन का रूप है:

(A) तब
(B) त्वयि
(C) त्वत्
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) त्वयि

18. अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद हैं:

(A) आठ
(B) सात
(C) छ:
(D) चार

Ans. (C) छ:

19. “छात्र विद्यालय में खेलते हैं” कर्तृवाच्य वाक्य का कर्मवाच्य वाक्य होगा :

(A) छात्र विद्यालय में खेला करते हैं।
(B) छात्रों द्वारा विद्यालय में खेला जाता है।
(C) छात्रगण विद्यालय में खेलेंगे।
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B) छात्रों द्वारा विद्यालय में खेला जाता है।

20. वे अविकारी शब्द जिनमें पुरुष, लिङ्ग, बचन, कारक आदि के कारण परिवर्तन नहीं होता, उन्हें कहा जाता है:

(A) संज्ञा पद
(B) सर्वनाम पद
(C) अव्यय पद
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C) अव्यय पद

खण्ड – ब

(वर्णनात्मक प्रश्न)

1. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश का प्राण है। इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बंधी हुई हैं। जहाँ उनमें और सब तरह की विभिन्नताएँ, वहाँ उन सब में यह एकता है।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
Ans.
यह गद्यांश हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित निबन्ध से लिया गया है। इसमें लेखक ने भारतीय संस्कृति की महानता तथा उसकी एकात्मक शक्ति का वर्णन किया है।

(ii) हमारे देश का प्राण क्या है ?
Ans.
हमारे देश का प्राण उसकी संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना है। यही नैतिक चेतना सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधती है।

(iii) रेखाङ्कित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
रेखांकित अंश में लेखक का आशय है कि भारत में अनेक प्रकार की विविधताएँ हैं—भाषा, जाति, धर्म, प्रदेश, वर्ग आदि की भिन्नताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। फिर भी इन सब भिन्नताओं के बीच हमारी संस्कृति और नैतिक चेतना हमें एक सूत्र में बाँधकर रखती है।

अर्थात् बाहरी रूप से भिन्न होते हुए भी हम सब भारतीय एक ही सांस्कृतिक परम्परा और मूल्यों से जुड़े हुए हैं। यही हमारी राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है।

अथवा

अजन्ता संसार की चित्रकलाओं में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। इतने प्राचीनकाल के इतने सजीव, इतने गतिमान, इतने बहुसंख्यक कथाप्राण चित्र कहीं नहीं बने। अजन्ता के चित्रों ने देश-विदेश सर्वत्र की चित्रकला को प्रभावित किया। उसका प्रभाव पूर्व के देशों की कला पर तो पड़ा ही, मध्य पश्चिमी एशिया भी उसके कल्याणकर प्रभाव से वंचित न रह सका ।

(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
यह गद्यांश प्रख्यात इतिहासकार एवं साहित्यकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय के निबन्ध से लिया गया है। इसमें लेखक ने अजन्ता की चित्रकला की महत्ता और उसके वैश्विक प्रभाव का वर्णन किया है।

(ii) अजन्ता किस कला के लिए अद्वितीय स्थान रखता है ?
Ans.
अजन्ता संसार की चित्रकला में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। वहाँ के भित्ति-चित्र अपनी प्राचीनता, सजीवता और कलात्मक सौन्दर्य के कारण विश्वविख्यात हैं।

(iii) रेखाङ्कित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
रेखांकित अंश का आशय है कि अजन्ता के चित्रों का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने देश-विदेश की चित्रकला को प्रभावित किया। विशेष रूप से पूर्वी देशों की कला पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। इतना ही नहीं, मध्य और पश्चिमी एशिया की कला भी अजन्ता की श्रेष्ठ शैली से अछूती नहीं रही।

2. निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं ।
बृन्दावन गोकुल बन उपबन सघन कुंज की छाहीं ।।

प्रात समय माता जसुमति अरु, नंद देखि सुख पावत ।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ।।

गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनौं हित जदुनाथ ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
Ans.
यह पद्यांश भक्तिकाल के प्रसिद्ध कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित है। इसमें श्रीकृष्ण अपने सखा उद्धव से ब्रजभूमि के प्रति अपने गहरे प्रेम और लगाव को व्यक्त कर रहे हैं।

(ii) रेखाङ्कित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
रेखांकित पंक्तियों में श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें ब्रज, वृन्दावन, गोकुल के वन-उपवन और वहाँ की सघन कुंजों की छाया कभी नहीं भूलती। प्रातःकाल माता यशोदा और नन्द बाबा को देखकर उन्हें अत्यन्त सुख मिलता था। माता यशोदा प्रेमपूर्वक माखन, रोटी और दही सजाकर उन्हें खिलाती थीं।

इन पंक्तियों में कृष्ण के बाल्यकाल की मधुर स्मृतियाँ और ब्रज के प्रति उनका अटूट प्रेम झलकता है।

(iii) श्रीकृष्ण को ब्रज क्यों नहीं भूलता है ?
Ans.
श्रीकृष्ण को ब्रज इसलिए नहीं भूलता क्योंकि वहाँ उनका बचपन बीता था। वहाँ उन्हें माता यशोदा और नन्द बाबा का स्नेह मिला, गोप-गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ हँसी-खेल का आनंद मिला। ब्रज की प्राकृतिक सुंदरता और प्रेमपूर्ण वातावरण उनकी स्मृतियों में सदा बसा हुआ है।

अथवा

विश्व है असि का ?
नहीं संकल्प का है,
हर प्रलय कोण,
काया-कल्प का है,
फूल गिरते, शूल
शिर ऊँचा लिए है,
रसों के अभिमान
को नीरस किए है।

(i) उपर्युक्त  पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans.
यह पद्यांश राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित काव्य से लिया गया है। इसमें कवि ने संकल्प-शक्ति, साहस और परिवर्तन की भावना को व्यक्त किया है। कवि का संदेश है कि संसार केवल शस्त्र (असि) की शक्ति से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और आत्मबल से संचालित होता है।

(ii) रेखाङ्कित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans.
इन पंक्तियों में कवि का आशय है कि संसार में कोमलता (फूल) की अपेक्षा कठोरता और संघर्ष (शूल) अधिक प्रभावी दिखाई देते हैं। अनेक बार कोमल और मधुर भावनाएँ पीछे रह जाती हैं तथा कठोर परिस्थितियाँ सिर ऊँचा करके खड़ी रहती हैं।

“रसों के अभिमान को नीरस किए है” का अर्थ है कि जीवन की कठिनाइयाँ और संघर्ष भावुकता तथा सुख के अभिमान को समाप्त कर देते हैं। संघर्ष मनुष्य को वास्तविकता से परिचित कराता है और उसे दृढ़ बनाता है।

(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य लिखिए ।
Ans.
उपर्युक्त पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य

  1. विचार-प्रधानता – कविता में संकल्प-शक्ति और कर्म की महत्ता का प्रभावशाली चित्रण है।
  2. ओजपूर्ण भाषा – भाषा में वीरता और उत्साह का भाव है।
  3. अलंकार – विरोधाभास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  4. भाव – प्रेरणा, साहस और परिवर्तन का संदेश।
  5. छंदमुक्त शैली – मुक्तक शैली में प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति।

इस प्रकार यह पद्यांश ओज, विचार-गाम्भीर्य और प्रेरणात्मक भाव से परिपूर्ण है।

3. निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए ।

एषा कर्मवीराणां संस्कृतिः । ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः’ इति अस्याः उद्घोषः । पूर्व कर्म तदनन्तरं फलम् इति अस्माकं संस्कृते नियमः । इदानी यदा वयं राष्ट्रस्य नवनिर्माण संलग्नाः स्मः निरन्तरं कर्मकरणम् अस्माकं मुख्य कर्त्तव्यम् ।
Ans.

सन्दर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी भारतीय संस्कृति और कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि से सम्बन्धित पाठ से लिया गया है। इसमें कर्म की महत्ता तथा राष्ट्र-निर्माण में निरन्तर कार्य करते रहने की प्रेरणा दी गई है।

हिन्दी अनुवाद :

यह कर्मवीरों की संस्कृति है। “मनुष्य को यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए” — यह इसका उद्घोष है। पहले कर्म और उसके बाद फल — यह हमारी संस्कृति का नियम है।

आज जब हम राष्ट्र के नव-निर्माण में लगे हुए हैं, तब निरन्तर कर्म करते रहना हमारा मुख्य कर्तव्य है।

अथवा

नागरिकः बहुकालं यावत् अचिन्तयत्, परं प्रहेलिकायाः उत्तरं दातुं समर्थः न अभवत्, अतः ग्रामीणम् अवदत्, अहम् अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तरं न जानामि । इदं श्रुत्वा ग्रामीणः अकथयत्, यदि भवान् उत्तरं न जानाति, तहिं ददातु दशरूप्यकाणि ।
Ans.

सन्दर्भ : प्रस्तुत गद्यांश एक शिक्षाप्रद कथा से लिया गया है। इसमें एक नागरिक और ग्रामीण के बीच हुई वार्ता का वर्णन है, जिसमें प्रहेलिका (पहेली) के माध्यम से बुद्धि-परीक्षा का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है।

हिन्दी अनुवाद :

नागरिक ने बहुत समय तक विचार किया, परन्तु वह पहेली का उत्तर देने में समर्थ नहीं हो सका। इसलिए उसने ग्रामीण से कहा — “मैं इस पहेली का उत्तर नहीं जानता।”

यह सुनकर ग्रामीण ने कहा — “यदि आप उत्तर नहीं जानते हैं, तो दस रुपये दीजिए।”

4. निम्नलिखित श्लोकों में से किसी एक श्लोक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।।
Ans.

सन्दर्भ : प्रस्तुत श्लोक महाभारत के भीष्मपर्व में स्थित श्रीमद्भगवद्गीता से लिया गया है। यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन (कौन्तेय) को युद्धभूमि में दिया था, जब वह मोहग्रस्त होकर युद्ध करने से हिचकिचा रहा था।

हिन्दी अनुवाद :

यदि तुम युद्ध में मारे जाओगे तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे और यदि विजय प्राप्त करोगे तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! दृढ़ निश्चय करके युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

अथवा

माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा ।
मनः शीघ्रतरं वातात् चिन्ता बहुतरी तृणात् ।।
Ans.

सन्दर्भ : प्रस्तुत श्लोक नीति-विषयक संस्कृत साहित्य से लिया गया है। इसमें जीवन के महत्त्वपूर्ण संबंधों और मन की प्रवृत्तियों की तुलना के माध्यम से शिक्षा दी गई है।

हिन्दी अनुवाद :

माता पृथ्वी से भी अधिक महान (गुरुतर) है और पिता आकाश से भी ऊँचे हैं। मन वायु से भी अधिक तीव्र गति वाला है और चिंता तिनके से भी अधिक (असंख्य और व्यापक) होती है।

5. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर दिए गए प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए :

(क) (i) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर ‘आजाद’ की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Ans.
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व को अत्यन्त ओजस्वी, त्यागमय और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. अटूट देशभक्ति – आजाद ने मातृभूमि की स्वतंत्रता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। राष्ट्र उनके लिए सर्वोपरि था।
  2. निर्भीकता और साहस – वे अंग्रेजों से कभी नहीं डरे। विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और वीरता का परिचय दिया।
  3. दृढ़ निश्चय – उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएँगे और अंत तक अपने वचन पर अडिग रहे।
  4. त्याग और बलिदान की भावना – उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर देश-सेवा को अपनाया।
  5. नेतृत्व क्षमता – वे क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक थे।

इस प्रकार खण्डकाव्य में आजाद का चरित्र एक आदर्श देशभक्त और वीर पुरुष के रूप में चित्रित है।

(ii) ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘बलिदान’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans.
‘बलिदान’ सर्ग में आजाद के अंतिम समय का मार्मिक चित्रण है। अंग्रेजों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। वे वीरतापूर्वक मुकाबला करते रहे और अनेक अंग्रेज सैनिकों को घायल किया।

जब उनके पास अंतिम गोली शेष रह गई और बच निकलने का कोई मार्ग न रहा, तब उन्होंने अपने संकल्प को स्मरण किया कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएँगे। अतः उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मारकर अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

उनका यह बलिदान देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। इस सर्ग में कवि ने उनके साहस, आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का ओजपूर्ण वर्णन किया है।

(ख) (i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन और स्वतंत्रता-संग्राम के संघर्षों का चित्रण है। तृतीय सर्ग में उनके नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभावशाली वर्णन मिलता है।

इस सर्ग में देश की दयनीय स्थिति, अंग्रेजों के अत्याचार और जनता की पीड़ा का चित्रण किया गया है। गाँधीजी सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर जनसमूह को संगठित करते हैं। वे लोगों को अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण असहयोग और सत्याग्रह के लिए प्रेरित करते हैं।

जनता उनके आह्वान पर जागृत होती है और विदेशी शासन के विरुद्ध आंदोलन तीव्र रूप लेता है। इस सर्ग में गाँधीजी के नेतृत्व, त्याग और आत्मबल का ओजपूर्ण चित्रण है।

(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधीजी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans.
‘मुक्तिदूत’ में गाँधीजी को एक महान नेता, त्यागी और राष्ट्र-उद्धारक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. सत्य और अहिंसा के उपासक – उन्होंने सत्य और अहिंसा को जीवन का आधार बनाया।
  2. उच्च आदर्शों वाले नेता – वे नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति के समर्थक थे।
  3. जन-नेता – वे जनसाधारण के दुःख-दर्द को समझते थे और उनके हित में कार्य करते थे।
  4. त्याग और सादगी – उनका जीवन अत्यंत सादा और त्यागमय था।
  5. दृढ़ संकल्प और आत्मबल – कठिन परिस्थितियों में भी वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।

इस प्रकार ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में गाँधीजी का चरित्र एक ऐसे महापुरुष के रूप में चित्रित है, जिसने सत्य, अहिंसा और त्याग के बल पर राष्ट्र को स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया।

(ग) (ⅰ) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में नायक को एक ओजस्वी, कर्मशील और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. अदम्य साहस – नायक विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोता और साहसपूर्वक संघर्ष करता है।
  2. दृढ़ संकल्प – वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अडिग रहता है और कठिनाइयों से नहीं घबराता।
  3. देशप्रेम – उसमें मातृभूमि के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण भाव है।
  4. त्याग और बलिदान की भावना – वह अपने स्वार्थों का त्याग कर समाज और राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानता है।
  5. नेतृत्व क्षमता – वह दूसरों को प्रेरित करने वाला और संघर्ष के लिए तैयार करने वाला व्यक्तित्व है।

इस प्रकार ‘तुमुल’ का नायक एक आदर्श वीर और प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में संघर्ष और क्रांति की गाथा का वर्णन है। इसमें देश की दासता, अत्याचार और अन्याय की स्थिति का चित्रण किया गया है। नायक इन परिस्थितियों से व्यथित होकर संघर्ष का मार्ग अपनाता है।

वह लोगों में जागृति लाता है और उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित करता है। संघर्ष के दौरान अनेक बाधाएँ आती हैं, परन्तु नायक अपने साहस और दृढ़ निश्चय से उनका सामना करता है।

अंततः उसके त्याग और परिश्रम से जन-चेतना जागृत होती है और परिवर्तन की दिशा प्रशस्त होती है। खण्डकाव्य का मुख्य संदेश यह है कि साहस, संकल्प और संघर्ष से ही विजय प्राप्त होती है।

(घ) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans.
‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप को वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. अदम्य स्वाभिमान – महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल सम्राट की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा।
  2. असीम देशभक्ति – वे मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए जीवनभर संघर्षरत रहे। मातृभूमि की रक्षा के लिए उन्होंने कष्ट सहना स्वीकार किया, पर पराधीनता नहीं।
  3. त्याग और तपस्या – उन्होंने वन-वन भटककर कठिन जीवन व्यतीत किया, घास की रोटी खाई, किन्तु स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया।
  4. वीरता और पराक्रम – युद्धभूमि में वे अत्यन्त साहसी और रणकुशल थे।
  5. धैर्य और दृढ़ता – विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने आशा और साहस नहीं छोड़ा।

इस प्रकार खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप को मेवाड़ का गौरव और स्वतंत्रता-संग्राम का अमर नायक दिखाया गया है।

(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के ‘पृथ्वीराज’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
Ans.
‘पृथ्वीराज’ सर्ग में राजपूताना के वीरों की परंपरा और उनके गौरव का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में राजपूत वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की भावना को प्रमुखता दी गई है।

इसमें बताया गया है कि राजपूत वीर कभी अन्याय और पराधीनता को स्वीकार नहीं करते। वे अपने प्राणों की आहुति देकर भी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करते हैं। पृथ्वीराज के प्रसंग के माध्यम से राजपूतों की वीर परंपरा, शौर्य और देशभक्ति का ओजपूर्ण चित्रण किया गया है।

यह सर्ग सम्पूर्ण खण्डकाव्य में प्रेरणा और गौरव की भावना को प्रकट करता है तथा पाठकों के मन में स्वाभिमान और देशप्रेम का संचार करता है।

(ङ) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर भरत की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Ans.
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में भरत को आदर्श भाई, त्यागी पुरुष और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. भ्रातृ-प्रेम – भरत को अपने बड़े भाई राम से अत्यन्त प्रेम था। उन्होंने राज्य को स्वीकार न करके भ्रातृ-प्रेम की सर्वोच्च मिसाल प्रस्तुत की।
  2. त्याग की भावना – उन्होंने राजसिंहासन और राजसुखों का त्याग कर तपस्वी जीवन अपनाया।
  3. कर्तव्यनिष्ठा – वे अपने दायित्वों के प्रति सजग और निष्ठावान थे। उन्होंने राम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर स्वयं सेवक के रूप में शासन चलाया।
  4. धर्मपरायणता – भरत सदैव धर्म और मर्यादा के मार्ग पर चले।
  5. निःस्वार्थता – उनमें लोभ और स्वार्थ का लेशमात्र भी नहीं था।

इस प्रकार ‘कर्मवीर भरत’ में भरत का चरित्र त्याग, आदर्श और कर्तव्य का प्रतीक बनकर उभरता है।

(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के ‘राजभवन’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans.
‘राजभवन’ सर्ग में उस समय की स्थिति का वर्णन है जब भरत को राम के वनवास और पिता दशरथ के निधन का समाचार मिलता है। वे अत्यन्त दुःखी होते हैं और अपनी माता कैकेयी के कृत्य से व्यथित हो उठते हैं।

राजभवन में शोक और निराशा का वातावरण व्याप्त है। भरत को जब राज्य संभालने के लिए कहा जाता है, तो वे इसे अस्वीकार कर देते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि राज्य पर केवल राम का ही अधिकार है।

इसके बाद वे राम को वन से वापस लाने के लिए प्रस्थान करते हैं। इस सर्ग में भरत की धर्मनिष्ठा, भ्रातृ-प्रेम और त्याग का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया गया है।

(च) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती का चरित्र अत्यन्त मार्मिक और संवेदनशील रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह एक ओर महान माता हैं, तो दूसरी ओर परिस्थितियों से विवश नारी भी हैं।

कुन्ती की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. ममतामयी माता – उन्होंने कर्ण को जन्म दिया, परन्तु सामाजिक भयवश उसे त्यागना पड़ा। बाद में उनके हृदय में सदैव पुत्र-वियोग की वेदना रही।
  2. कर्तव्य और धर्म की भावना – वे धर्म और मर्यादा का पालन करने वाली थीं। महाभारत युद्ध से पूर्व उन्होंने कर्ण को सत्य बताया और धर्म के पक्ष में आने का अनुरोध किया।
  3. संवेदनशीलता – उनके हृदय में कर्ण के लिए गहरा प्रेम और करुणा थी।
  4. धैर्य और सहनशीलता – जीवन की विपरीत परिस्थितियों को उन्होंने धैर्यपूर्वक सहा।
  5. नैतिक साहस – उचित समय पर सत्य प्रकट करने का साहस दिखाया।

इस प्रकार खण्डकाव्य में कुन्ती का चरित्र एक करुणामयी, धर्मनिष्ठ और साहसी माता के रूप में चित्रित हुआ है।

(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग में युद्ध से पूर्व का मार्मिक प्रसंग चित्रित है। इसमें कुन्ती कर्ण से मिलने जाती हैं और उसे उसके जन्म का सत्य बताती हैं कि वह उनका ज्येष्ठ पुत्र है।

कुन्ती कर्ण से अनुरोध करती हैं कि वह पाण्डवों का साथ दे और अपने भाइयों के विरुद्ध युद्ध न करे। कर्ण यह सत्य जानकर भावुक हो उठता है, परन्तु वह दुर्योधन के प्रति अपने उपकार और मित्रता को नहीं भूलता।

वह कुन्ती से वचन देता है कि वह केवल अर्जुन से ही युद्ध करेगा और अन्य पाण्डवों को नहीं मारेगा। इस सर्ग में कर्ण की उदारता, वचनपालन और कुन्ती की करुणा का अत्यन्त हृदयस्पर्शी चित्रण है।

(छ) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू का चरित्र एक महान राष्ट्रनायक, दूरदर्शी नेता और मानवतावादी व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है।

उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. गहन देशप्रेम – नेहरूजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत की स्वतंत्रता और प्रगति के लिए समर्पित कर दिया।
  2. त्याग और संघर्षशीलता – स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अनेक बार जेल यातनाएँ सही, पर अपने आदर्शों से विचलित नहीं हुए।
  3. दूरदर्शिता – वे आधुनिक भारत के निर्माण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और औद्योगिक विकास के समर्थक थे।
  4. मानवतावाद – वे विश्व-शांति और भाईचारे के पक्षधर थे।
  5. लोकतांत्रिक विचारधारा – उन्होंने भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया।

इस प्रकार खण्डकाव्य में नेहरूजी को राष्ट्र की ज्योति, मार्गदर्शक और आदर्श नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
Ans.
‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू के जीवन-प्रसंगों और उनके राष्ट्रीय योगदान का वर्णन है। इसमें उनके बचपन, शिक्षा, स्वतंत्रता-संग्राम में भागीदारी, जेल-जीवन तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यों का चित्रण किया गया है।

काव्य में यह दर्शाया गया है कि कैसे उन्होंने देश को आधुनिकता, विज्ञान, शिक्षा और औद्योगिक विकास की दिशा में अग्रसर किया। वे राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत बने और स्वतंत्र भारत की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार यह खण्डकाव्य नेहरूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व को उजागर करते हुए उन्हें राष्ट्र की उज्ज्वल ज्योति के रूप में स्थापित करता है।

(ज) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
Ans.
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाष चन्द्र बोस को अदम्य साहस, प्रखर देशभक्ति और त्याग की मूर्ति के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. अटूट राष्ट्रप्रेम – उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया था।
  2. अदम्य साहस और निर्भीकता – वे किसी भी शक्ति से भयभीत नहीं हुए। अंग्रेज शासन के विरुद्ध सशक्त संघर्ष किया।
  3. दृढ़ संकल्प – उन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” का आह्वान कर युवाओं में जोश भर दिया।
  4. नेतृत्व क्षमता – उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज का गठन कर सैनिकों का कुशल नेतृत्व किया।
  5. त्याग और तपस्या – उन्होंने आरामदायक जीवन त्यागकर देश की सेवा को अपनाया।

इस प्रकार खण्डकाव्य में सुभाषचन्द्र बोस को क्रांति और स्वतंत्रता के महानायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(ii) ‘जय सुभाष’ के तृतीय सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans.
‘जय सुभाष’ के तृतीय सर्ग में सुभाषचन्द्र बोस के क्रांतिकारी कार्यों और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार वे विदेश जाकर भारतीयों को संगठित करते हैं और स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाते हैं।

इस सर्ग में सैनिकों को प्रेरित करते हुए उनका ओजपूर्ण भाषण, देशभक्ति से ओत-प्रोत वातावरण और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना का चित्रण है। सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में सैनिकों में उत्साह और त्याग की भावना जागृत होती है।

यह सर्ग वीरता, राष्ट्रप्रेम और क्रांतिकारी चेतना से परिपूर्ण है तथा पाठकों के मन में देशभक्ति का संचार करता है।

(झ) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘आयोजन’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans.
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य का ‘आयोजन’ सर्ग युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ की तैयारियों का वर्णन करता है। इस सर्ग में यज्ञ के भव्य आयोजन, देश-देशांतर के राजाओं के आमंत्रण तथा सभा की साज-सज्जा का सजीव चित्रण है।

सभा में यह विचार उठता है कि अग्रपूजा (प्रथम सम्मान) किसे दिया जाए। अनेक महान राजाओं और ऋषियों की उपस्थिति में यह प्रश्न महत्वपूर्ण बन जाता है। अंततः सर्वसम्मति से श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के योग्य माना जाता है, क्योंकि वे गुण, ज्ञान, नीति और पराक्रम में श्रेष्ठ हैं।

इस निर्णय से सभा का वातावरण गौरवपूर्ण हो उठता है, किंतु कुछ व्यक्तियों के मन में ईर्ष्या और असंतोष भी जन्म लेता है। इस प्रकार ‘आयोजन’ सर्ग में यज्ञ की भव्यता और श्रीकृष्ण के सम्मान का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans.
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली और बहुआयामी रूप में प्रस्तुत हुआ है।

  1. नीतिज्ञ और दूरदर्शी – वे धर्म और नीति के ज्ञाता हैं तथा उचित समय पर उचित निर्णय लेने में समर्थ हैं।
  2. विनम्र और सरल – महान होते हुए भी उनमें अहंकार नहीं है।
  3. धर्मरक्षक – वे सदैव धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए तत्पर रहते हैं।
  4. पराक्रमी – संकट की घड़ी में वे निर्भीकता से कार्य करते हैं।
  5. लोकनायक – सभी राजाओं और प्रजाजनों द्वारा आदर और सम्मान प्राप्त करते हैं।

अग्रपूजा में उन्हें प्रथम सम्मान मिलना उनके महान गुणों और उच्च चरित्र का प्रमाण है। वे आदर्श पुरुष, नीति-पुरुष और धर्मसंरक्षक के रूप में चित्रित किए गए हैं।

6. (क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:

(i) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
Ans.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में हुआ। वे हिन्दी साहित्य के प्रथम वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित आलोचक माने जाते हैं। उनके पिता का नाम चन्द्रबली शुक्ल था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने स्वाध्याय से व्यापक ज्ञान अर्जित किया।

आचार्य शुक्ल का साहित्य-दर्शन लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत था। वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का नैतिक और बौद्धिक विकास भी है। उन्होंने हिन्दी आलोचना को नई दिशा दी और उसे तार्किकता, ऐतिहासिकता तथा वस्तुनिष्ठता प्रदान की।

वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर आसीन रहे। उन्होंने अनेक निबंध, आलोचनात्मक ग्रंथ और इतिहास-ग्रंथ लिखे। 1941 ई. में उनका निधन हो गया।

प्रमुख रचनाहिन्दी साहित्य का इतिहास — यह हिन्दी साहित्य का प्रथम सुव्यवस्थित और प्रमाणिक इतिहास-ग्रंथ माना जाता है।

(ii) डॉ. भगवतशरण उपाध्याय
Ans.
भगवतशरण उपाध्याय का जन्म 1910 ई. में हुआ। वे हिन्दी के सुप्रसिद्ध निबंधकार, इतिहासकार और संस्कृति-चिंतक थे। उन्होंने भारतीय इतिहास, कला, पुरातत्त्व और संस्कृति के विविध पक्षों का गंभीर अध्ययन किया।

उनकी लेखन-शैली सरल, स्पष्ट तथा ज्ञानवर्धक है। वे तथ्यों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने में कुशल थे। उनके निबंधों में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग दिखाई देता है। उन्होंने हिन्दी साहित्य को वैचारिक गहराई प्रदान की।

डॉ. उपाध्याय ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की और हिन्दी गद्य को समृद्ध बनाया।

प्रमुख रचना‘भारतीय संस्कृति के स्रोत’ — इस कृति में भारतीय संस्कृति की जड़ों और विकास का विश्लेषण किया गया है।

(iii) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
Ans.
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. को बिहार के सिमरिया गाँव में हुआ। वे हिन्दी साहित्य के महान कवि एवं राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा, परंतु उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी उच्च शिक्षा प्राप्त की।

दिनकर जी की कविताओं में ओज, वीरता, राष्ट्रीयता और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय मिलता है। वे स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित थे और उनकी रचनाओं में क्रांतिकारी स्वर स्पष्ट सुनाई देता है। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे तथा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनकी काव्य-भाषा प्रभावशाली, ऊर्जावान और प्रेरणादायी है। 1974 ई. में उनका निधन हुआ।

प्रमुख रचनारश्मिरथी — यह काव्य महाभारत के कर्ण पर आधारित एक प्रसिद्ध खंडकाव्य है।

(iv) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
Ans.
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई 1894 ई. को मध्य प्रदेश में हुआ। वे हिन्दी के प्रतिष्ठित निबंधकार, संपादक और साहित्यकार थे। उन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन कर हिन्दी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

बख्शी जी के निबंधों में गम्भीर चिंतन, भावात्मकता और भाषा की सजीवता मिलती है। वे समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों पर गहन विचार प्रस्तुत करते थे। उनकी शैली सरल, परिमार्जित और प्रभावपूर्ण है।

उन्होंने हिन्दी गद्य साहित्य को समृद्ध और सशक्त बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

प्रमुख रचना‘पंचपात्र’ — यह उनकी प्रसिद्ध निबंध-कृति है, जिसमें विचारों की गहराई और साहित्यिक सौंदर्य का सुंदर समन्वय है।

ख) निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :

(i) तुलसीदास
Ans.
तुलसीदास का जन्म लगभग 1532 ई. में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले (राजापुर) में माना जाता है। वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के महान कवि थे। उनका जीवन अत्यंत कष्टपूर्ण रहा, परंतु वे बचपन से ही भगवान राम के प्रति अत्यंत श्रद्धावान थे।

तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से रामभक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी भाषा अवधी और ब्रज थी, जो सरल, मधुर और लोकप्रचलित थी। उन्होंने समाज में नैतिक मूल्यों और धर्म की भावना को सुदृढ़ किया।

उनकी रचनाओं में भक्ति, नीति और आदर्श जीवन का संदेश मिलता है।

प्रमुख रचनारामचरितमानस — यह रामकथा पर आधारित महान महाकाव्य है, जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

(ii) मैथिलीशरण गुप्त
Ans.
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 ई. को उत्तर प्रदेश के चिरगाँव (झाँसी) में हुआ। वे खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता, मानवता और नारी-सम्मान की भावना प्रमुख है।

महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी थी। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है। उन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास को अपनी कविताओं में जीवंत रूप से प्रस्तुत किया।

वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। 1964 ई. में उनका निधन हुआ।

प्रमुख रचनासाकेत — इस काव्य में रामकथा को विशेष रूप से उर्मिला के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।

(iii) महादेवी वर्मा
Ans.
महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 ई. को फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे हिन्दी साहित्य के छायावाद युग की प्रमुख कवयित्री थीं। उन्हें ‘आधुनिक मीरा’ भी कहा जाता है।

उनकी कविताओं में विरह, करुणा, आत्मानुभूति और आध्यात्मिक भावनाओं की प्रधानता है। वे एक संवेदनशील लेखिका, शिक्षाविद् और समाज-सुधारक भी थीं। उन्होंने महिला शिक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी कार्य किया।

उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1987 ई. में उनका निधन हुआ।

प्रमुख रचनायामा — यह उनकी प्रसिद्ध काव्य-कृति है, जिसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।

(iv) अशोक बाजपेयी
Ans.
अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी 1941 ई. को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में हुआ। वे समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख कवि, आलोचक और सांस्कृतिक चिंतक हैं।

उन्होंने प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य-सृजन जारी रखा। उनकी कविताओं में आधुनिक जीवन की संवेदनाएँ, सौंदर्य-बोध और मानवीय अनुभूतियाँ व्यक्त होती हैं। वे भाषा के प्रयोग और शिल्प के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

उन्होंने अनेक कविता-संग्रह और आलोचनात्मक ग्रंथ लिखे हैं।

प्रमुख रचना‘शहर अब भी संभावना है’ — यह उनका चर्चित काव्य-संग्रह है, जिसमें आधुनिक जीवन की जटिलताओं का चित्रण है।

7. अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।
Ans.

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

8. अपनी गली मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए।
Ans.

सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी महोदय,
नगर निगम,
__________ (नगर का नाम)

विषय: गली-मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के संबंध में निवेदन।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं __________ (अपने मोहल्ले का नाम) का निवासी हूँ। हमारे क्षेत्र की नालियाँ पिछले कई दिनों से साफ नहीं की गई हैं। नालियों में गंदा पानी जमा रहने के कारण अत्यधिक दुर्गंध फैल रही है तथा मच्छरों की संख्या भी बढ़ गई है। इससे संक्रामक रोग फैलने की आशंका बनी हुई है।

बरसात के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है, जिससे आने-जाने में कठिनाई होती है और बच्चों एवं बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार स्थानीय स्तर पर सफाई की मांग की गई, परंतु अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।

अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि शीघ्र ही सफाई कर्मचारियों को भेजकर नालियों की समुचित सफाई करवाने की कृपा करें, ताकि क्षेत्रवासियों को स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण मिल सके।

आपकी कृपा के लिए हम सभी निवासी सदैव आभारी रहेंगे।

धन्यवाद।

भवदीय,
__________ (आपका नाम)
पता: __________
मोबाइल नंबर: __________
दिनांक: __________

अथवा

अपने प्रधानाचार्य को छात्रवृत्ति के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
Ans.

सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय/महोदया,
__________ विद्यालय,
__________ (स्थान)

विषय: छात्रवृत्ति प्रदान करने हेतु आवेदन।

महोदय/महोदया,

सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा _______ का छात्र/छात्रा हूँ। मैंने गत वार्षिक परीक्षा में _______% अंक प्राप्त किए हैं तथा सदैव विद्यालय की शैक्षिक एवं सह-पाठयक्रम गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया है।

मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं है। मेरे पिता/अभिभावक की आय सीमित है, जिससे मेरी पढ़ाई का पूरा खर्च वहन करना कठिन हो रहा है। मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता/चाहती हूँ और भविष्य में विद्यालय तथा परिवार का नाम रोशन करना चाहता/चाहती हूँ।

अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि मेरी आर्थिक स्थिति एवं शैक्षिक योग्यता को ध्यान में रखते हुए मुझे छात्रवृत्ति प्रदान करने की कृपा करें, जिससे मैं अपनी शिक्षा निर्बाध रूप से जारी रख सकूँ।

इसके लिए मैं आपका सदैव आभारी/आभारी रहूँगा/रहूँगी।

धन्यवाद।

भवदीय,
__________ (आपका नाम)
कक्षा: _______
अनुक्रमांक: _______
दिनांक: _______

9. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए:

(i) चन्द्रशेखरः स्वगृहं किम् अवदत् ?
Ans.
चन्द्रशेखरः स्वगृहं त्यक्त्वा देशसेवायै गच्छामि इति अवदत्।

(ii) कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
Ans.
कूपः जनानां उपेक्षया दुःखम् अनुभवति।

(iii) पुरुराजः केन सह युद्धम् अकरोत् ?
Ans.
पुरुराजः सिकन्दरस्य सेनया सह युद्धम् अकरोत्।

(iv) विद्या केन वर्धते ?
Ans.
विद्या अभ्यासेन वर्धते।

10. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :

(i) छात्र तथा अनुशासन
Ans.
छात्र जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल होता है। इसी अवस्था में व्यक्ति के चरित्र, व्यक्तित्व और भविष्य की नींव रखी जाती है। यदि छात्र जीवन में अनुशासन का पालन किया जाए, तो जीवन की दिशा और दशा दोनों सुधर जाती हैं।

अनुशासन का अर्थ है—नियमों का पालन करना, समय का सदुपयोग करना और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना। एक अनुशासित छात्र नियमित रूप से विद्यालय जाता है, समय पर अपना कार्य पूरा करता है तथा अपने गुरुजनों और अभिभावकों का सम्मान करता है।

अनुशासन से छात्र में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और आत्मसंयम का विकास होता है। इसके विपरीत, अनुशासनहीनता से जीवन में अव्यवस्था, असफलता और पछतावा ही प्राप्त होता है।

अतः प्रत्येक छात्र का कर्तव्य है कि वह अनुशासन को अपने जीवन का अंग बनाए। अनुशासन ही सफलता की कुंजी है और उज्ज्वल भविष्य का आधार भी।

(ii) सड़क सुरक्षा, जीवन-रक्षा
Ans.
सड़क सुरक्षा आज के समय की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। बढ़ती जनसंख्या और वाहनों की संख्या के कारण सड़क दुर्घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। प्रतिदिन अनेक लोग असावधानी के कारण अपनी जान गँवा देते हैं।

सड़क पर चलते समय यातायात नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। वाहन चलाते समय हेलमेट और सीट बेल्ट का प्रयोग करना चाहिए। तेज गति से वाहन चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग करना तथा नशे की अवस्था में वाहन चलाना अत्यंत खतरनाक है।

पैदल यात्रियों को भी सड़क पार करते समय ज़ेब्रा क्रॉसिंग का उपयोग करना चाहिए। बच्चों को भी प्रारंभ से ही यातायात नियमों की शिक्षा दी जानी चाहिए।

यदि हम सभी सजग और सतर्क रहें, तो दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। वास्तव में, सड़क सुरक्षा ही जीवन-रक्षा है।

(iii) भारत में आतंकवाद: समस्या और समाधान
Ans.
आतंकवाद आज विश्व की गंभीर समस्या है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है। आतंकवाद का उद्देश्य समाज में भय और अशांति फैलाना होता है। इससे निर्दोष लोगों की जान जाती है और देश की शांति एवं प्रगति बाधित होती है।

भारत ने अनेक आतंकी घटनाओं का सामना किया है। आतंकवाद देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है। इसके पीछे कट्टरता, असंतोष, बेरोजगारी और बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप जैसे कारण होते हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए सख्त कानून, सतर्क सुरक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता आवश्यक है। साथ ही, युवाओं को सही शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराना भी जरूरी है, ताकि वे भटकाव का शिकार न हों।

हम सभी नागरिकों का कर्तव्य है कि देश की सुरक्षा के प्रति जागरूक रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना प्रशासन को दें। सामूहिक प्रयास से ही आतंकवाद का उन्मूलन संभव है।

(iv) देश-प्रेम
Ans.
देश-प्रेम का अर्थ है—अपने राष्ट्र के प्रति सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण की भावना रखना। जो व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है, वह उसके सम्मान, प्रगति और सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है।

हमारा देश भारत विविधताओं से भरा हुआ है। यहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म और संस्कृतियाँ होते हुए भी एकता की भावना है। देश-प्रेम हमें इन विविधताओं का सम्मान करना सिखाता है।

देश-प्रेम केवल युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में भी प्रकट होता है—जैसे नियमों का पालन करना, ईमानदारी से कार्य करना, पर्यावरण की रक्षा करना और राष्ट्रधन की सुरक्षा करना।

महान स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। हमें उनके आदर्शों का पालन करते हुए राष्ट्र की उन्नति में अपना योगदान देना चाहिए।

अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सच्चे अर्थों में देशभक्त बने और अपने देश की उन्नति में सहयोग करे।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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