बल वह बाह्य कारक (External effort) है जो किसी वस्तु की विराम (Rest) अथवा गति (Motion) की अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने का प्रयास करता है।
दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि—
बल वह धक्का (Push) या खिंचाव (Pull) है जो एक निकाय द्वारा दूसरे निकाय पर आरोपित किया जाता है।
बल का S.I. मात्रक न्यूटन (Newton) अथवा किग्रा·मी/से² होता है।
बल आकर्षण (Attraction) या प्रतिकर्षण (Repulsion) किसी भी प्रकार का हो सकता है।
बल के प्रकार (Types of Force)
• संपर्क बल (Force of contact)
वह बल जो किसी व्यक्ति, जीव, वस्तु, यंत्र (Machine) या निकाय (System) द्वारा किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, यंत्र अथवा निकाय पर प्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से आरोपित किया जाता है, संपर्क बल (Contact Force) कहलाता है।
इस प्रकार के बल में बल लगाने वाला कारक प्रत्यक्ष रूप से संपर्क में होता है।
उदाहरण:
• मनुष्य द्वारा पत्थर को धकेलना या खींचना
• हवा द्वारा वृक्षों को हिलाना
• किसी गतिमान वस्तु द्वारा स्थिर वस्तु को गतिमान बनाना या ऐसा करने का प्रयास करना
संपर्क बल के अंतर्गत
पेशीय बल (Muscular Force) सम्मिलित होता है।
• असंपर्क बल (Force without Contact)
जब बल उत्पन्न करने वाला कारक प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता, बल्कि उसका प्रभाव केवल अनुभव (Feel) किया जा सकता है, तब उस बल को अप्रत्यक्ष आरोपित बल या असंपर्क बल (Non-contact Force) कहते हैं।
इस प्रकार के बल में दो वस्तुओं के बीच प्रत्यक्ष संपर्क आवश्यक नहीं होता।
उदाहरण:
• पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में दण्ड चुम्बक को स्वतंत्र रूप से लटकाने पर उसका स्वतः घूमकर उत्तर–दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाना।
• पृथ्वी द्वारा वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करना।
असंपर्क बल के प्रकार:
- गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force)
- चुम्बकीय बल (Magnetic Force)
- वैद्युत बल (Electric Force)
1. गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force)
ब्रह्माण्ड में स्थित प्रत्येक कण अथवा पिण्ड (Particle/Body) अन्य सभी कणों या पिण्डों पर आकर्षण प्रकृति का एक बल आरोपित करता है, जिसकी दिशा संबंधित पिण्ड के गुरुत्वीय केंद्र (Centre of Gravity) की ओर होती है।
इस आकर्षण बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं।
ब्रह्माण्ड में तारों, ग्रहों तथा उपग्रहों की जो निश्चित एवं स्थिर व्यवस्था (Stable Arrangement/System) विद्यमान है, वह गुरुत्वाकर्षण बल का ही परिणाम है।
गुरुत्वाकर्षण बल की विशेषताएँ:
• यह बल सदैव आकर्षणात्मक होता है।
• यह एक असंपर्क बल है।
• इसका परिमाण
- दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती होता है।
- दोनों पिण्डों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम:
इस बल का परिमाण ज्ञात करने के लिए सर आइज़ैक न्यूटन ने निम्न सूत्र प्रतिपादित किया—
जहाँ—
= दोनों पिण्डों के द्रव्यमान
= दोनों पिण्डों के बीच की दूरी
= सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Universal Gravitational Constant)
जिसका मान है—

पिण्ड द्वारा पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित किया जाता है तथा उसी परिमाण के बल से पिण्ड भी पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह न्यूटन के तृतीय गति नियम का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
उसी गुरुत्वाकर्षण सूत्र से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि पृथ्वी की सतह पर स्थित 1 किग्रा द्रव्यमान की वस्तु को पृथ्वी
न्यूटन बल से अपनी ओर आकर्षित करती है,
जहाँ—
= पृथ्वी का द्रव्यमान
= पृथ्वी की औसत त्रिज्या
यहाँ एक नियतांक होता है, जिसे गुरुत्वीय त्वरण (Gravitational Acceleration) कहते हैं तथा इसे g से निरूपित किया जाता है।
इसका मान लगभग—
होता है।
अतः पृथ्वी की ओर स्वतंत्रतापूर्वक गिर रही किसी भी वस्तु पर लगभग 9.8 मी/से² का त्वरण उत्पन्न होता है।
2. विद्युत चुम्बकीय बल (Electro-magnetic Force):
यह बल निम्न दो मूलभूत बलों के संयुक्त प्रभाव के रूप में प्रकट होता है—
(A) चुम्बकीय बल (Magnetic Force)
(B) स्थिर वैद्युत बल (Electrostatic Force)
(A) चुम्बकीय बल (Magnetic Force):
प्रत्येक चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं—
• उत्तरी ध्रुव (North Pole)
• दक्षिणी ध्रुव (South Pole)
इन ध्रुवों के बीच लगने वाले आकर्षण या प्रतिकर्षण बल को चुम्बकीय बल कहते हैं।
दो चुम्बकीय ध्रुवों के बीच लगने वाले बल का परिमाण निम्न सूत्र से ज्ञात किया जाता है—
जहाँ—
= दोनों ध्रुवों की चुम्बकीय प्रबलता (Pole Strength)
= ध्रुवों के बीच की दूरी
= माध्यम की पारगम्यता / चुम्बकशीलता (Permeability)
(B) स्थिर वैद्युत बल (Electrostatic Force):
दो स्थिर (At rest) बिन्दु आवेशों (Point Charges) के बीच लगने वाले बल को स्थिर वैद्युत बल कहते हैं।
इस बल की गणना कूलॉम के नियम द्वारा की जाती है—
जहाँ—
= दोनों बिन्दु आवेशों की तीव्रता
= दोनों आवेशों के बीच की दूरी
= माध्यम की विद्युतशीलता (Permittivity)
विद्युत–चुम्बकीय बल (Electromagnetic Force):
स्थिर वैद्युत बल तथा चुम्बकीय बल के संयुक्त प्रभाव से विद्युत–चुम्बकीय बल की उत्पत्ति होती है।
विशेषताएँ:
• यह बल आकर्षण (Attractive) या प्रतिकर्षण (Repulsive) दोनों प्रकृति का हो सकता है।
• यदि दोनों आवेश समान प्रकृति के हों → बल प्रतिकर्षी होता है।
• यदि दोनों आवेश विपरीत प्रकृति के हों → बल आकर्षी होता है।
विशेष ध्यान योग्य तथ्य:
• यदि आवेश स्थिर हों, तो उनके बीच लगने वाला बल स्थिर वैद्युत बल कहलाता है।
• यदि आवेशों के बीच सापेक्ष गति हो, तो उनके बीच उत्पन्न बल विद्युत–चुम्बकीय बल कहलाता है।
• विद्युत–चुम्बकीय बल का आदान–प्रदान फोटॉन (Photon) नामक कणों के माध्यम से होता है।
3. नाभिकीय बल (Nuclear Force)
परमाणु के नाभिकों के संयोजन (Composition), वियोजन (Fission/Fusion) अथवा क्षय (Decay) के लिए उत्तरदायी बलों को नाभिकीय बल कहा जाता है।
संयोजन एवं वियोजन के आधार पर नाभिकीय बलों को मुख्यतः दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है—
(i) प्रबल नाभिकीय बल (Strong Nuclear Force):
नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों को आपस में बाँधे रखने वाला बल प्रबल नाभिकीय बल कहलाता है। यह बल—
• दो प्रोटॉनों,
• दो न्यूट्रॉनों, अथवा
• एक प्रोटॉन व एक न्यूट्रॉन
के बीच कार्य करता है।
विशेषताएँ:
• इसका कार्यकारी परास (Range) अत्यंत कम होता है, लगभग मीटर (फर्मी के क्रम का)।
• इसकी प्रबलता अत्यधिक अधिक होती है।
उदाहरण:
यदि दो प्रोटॉन एक फर्मी ( m) की दूरी पर हों, तो उनके बीच कार्यरत आकर्षणात्मक प्रबल नाभिकीय बल, उनके बीच लगने वाले प्रतिकर्षी स्थिर वैद्युत बल से लगभग दस गुना अधिक होता है।
इसी कारण, प्रोटॉनों के बीच विद्युत प्रतिकर्षण के बावजूद वे नाभिक में बँधे रहते हैं।
• दूरी बढ़ने पर प्रबल बल अत्यंत तीव्रता से घटता है।
• यदि दो प्रोटॉनों के बीच दूरी लगभग 15 फर्मी हो जाए, तो यह बल नगण्य (Negligible) हो जाता है।
• माना जाता है कि प्रबल नाभिकीय बल क्वार्कों की पारस्परिक क्रिया के कारण उत्पन्न होता है।
• यह बल प्रकृति में ज्ञात सबसे शक्तिशाली बल है।
(ii) दुर्बल नाभिकीय बल (Weak Nuclear Force):
रेडियोधर्मिता (Radioactivity) की प्रक्रिया में निकलने वाले β-कणों (इलेक्ट्रॉनों) का उत्सर्जन दुर्बल नाभिकीय बल के कारण होता है।
इस प्रक्रिया में नाभिक का एक न्यूट्रॉन, प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन तथा एण्टीन्यूट्रिनो में परिवर्तित हो जाता है—
इलेक्ट्रॉन एवं एण्टीन्यूट्रिनो के बीच होने वाली पारस्परिक क्रिया दुर्बल बलों के कारण ही संभव होती है।
विशेषताएँ:
• इसका परिमाण प्रबल बल की तुलना में बहुत कम (लगभग गुना) होता है।
• यह बल W-बोसॉन (और Z-बोसॉन) के आदान-प्रदान द्वारा उत्पन्न होता है।
• यद्यपि इसे दुर्बल कहा जाता है, फिर भी इसका परिमाण गुरुत्वाकर्षण बल से लगभग 1025 गुना अधिक होता है।
• इसका कार्यकारी परास अत्यंत कम होता है, जो प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के आकार (फर्मी) से भी कम होता है।
➤ घर्षण बल (Force of Friction)
जब किसी सतह पर स्थित वस्तु को गतिमान करने का प्रयास किया जाता है अथवा वह गतिमान होती है, तब सतह के संपर्क के कारण एक ऐसा बल उत्पन्न होता है जो सतह के समान्तर तथा गति (या गति कराने वाले बल) की दिशा के विपरीत कार्य करता है।
इस गति-अवरोधक बल को घर्षण बल कहते हैं।
घर्षण बल के प्रकार:
(i) स्थैतिक घर्षण (Static Friction):
जब किसी स्थिर सतह पर रखी वस्तु पर बल लगाया जाता है, परंतु वह वस्तु गतिमान नहीं होती, तब लगाए गए बल के बराबर तथा विपरीत दिशा में जो घर्षण बल कार्य करता है, उसे स्थैतिक घर्षण कहते हैं।
यह बल वस्तु को गतिमान होने से रोकता है।
(ii) सर्पी घर्षण (Sliding Friction):
जब कोई वस्तु किसी सतह पर फिसलते हुए गतिमान होती है, तब सतह के समान्तर तथा गति की विपरीत दिशा में कार्य करने वाले घर्षण बल को सर्पी घर्षण कहते हैं।
(iii) लोटनिक घर्षण (Rolling Friction):
जब कोई गोलाकार वस्तु (जैसे— पहिया, गेंद आदि) किसी सतह पर लुढ़कती है, तब दोनों सतहों के संपर्क के कारण उत्पन्न तथा गति की विपरीत दिशा में कार्य करने वाले घर्षण बल को लोटनिक घर्षण कहते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा उपयोगी):
• स्थैतिक घर्षण > सर्पी घर्षण > लोटनिक घर्षण
• लोटनिक घर्षण सबसे कम होता है, इसलिए पहियों का उपयोग किया जाता है।

➤ अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal Force)
जब कोई पिण्ड किसी वृत्तीय पथ पर समान चाल से गति करता है, तो उस पर एक ऐसा बल कार्य करता है जिसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र की ओर होती है। इस बल को अभिकेंद्रीय बल कहते हैं।
अभिकेंद्रीय बल के बिना वृत्तीय गति संभव नहीं है।
अभिकेंद्रीय त्वरण:
अभिकेंद्रीय बल के कारण गतिमान पिण्ड में एक त्वरण उत्पन्न होता है, जिसे अभिकेंद्रीय त्वरण कहते हैं।
• इस त्वरण का परिमाण—,
जहाँ पिण्ड का रैखिक वेग तथा वृत्तीय पथ की त्रिज्या है।
• इस त्वरण की प्रवृत्ति वेग की दिशा को बदलने की होती है, न कि चाल को।
• इसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र की ओर रहती है।
अभिकेंद्रीय बल का सूत्र:
या
जहाँ—
= पिण्ड का द्रव्यमान
= पिण्ड का रैखिक वेग
= वृत्तीय पथ की त्रिज्या
= कोणीय वेग (Angular Velocity)
परीक्षा-उपयोगी तथ्य:
• अभिकेंद्रीय बल सदैव वेग के लम्बवत् होता है।
• यह बल चाल में परिवर्तन नहीं करता, केवल दिशा परिवर्तन करता है।

➤ अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force)
जब कोई वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर गति करती है, तब उस वस्तु को वृत्त के केंद्र से बाहर की दिशा में एक बल का अनुभव होता है। इस बल को अपकेंद्रीय बल कहते हैं।
अपकेंद्रीय बल एक आभासी (Pseudo / Apparent) बल होता है, जिसकी उत्पत्ति वस्तु के जड़त्व (Inertia) गुण के कारण होती है। यह बल केवल घूर्णनशील या त्वरित संदर्भ तंत्र (Non-inertial frame) में अनुभव किया जाता है।
विशेषताएँ:
• इसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र से बाहर की ओर होती है।
• इसका परिमाण अभिकेंद्रीय बल के बराबर होता है, परंतु दिशा विपरीत होती है।
• इसे वास्तविक बल नहीं माना जाता, क्योंकि इसका कोई बाह्य स्रोत नहीं होता।
bउदाहरण:
• यदि कोई व्यक्ति कार में यात्रा कर रहा हो और कार अचानक बाईं ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति को दाईं ओर झटका महसूस होता है। यह अनुभव अपकेंद्रीय बल के कारण होता है।
• वाशिंग मशीन में कपड़े इसी सिद्धांत पर साफ होते हैं। घूमते ड्रम में कपड़ों पर लगने वाले अपकेंद्रीय बल के कारण पानी और गंदगी बाहर की ओर निकल जाती है।
सूत्र (घूर्णनशील तंत्र में):
ध्यान देने योग्य तथ्य (परीक्षा हेतु):
• अभिकेंद्रीय बल वास्तविक बल है, जबकि अपकेंद्रीय बल आभासी बल है।
• दोनों का परिमाण समान तथा दिशा विपरीत होती है।
➤ तनाव बल (Tension Force)
जब किसी स्थिर (Fixed) वस्तु से किसी अन्य वस्तु को रस्सी, डोरी, तार या केबल द्वारा बाँधकर नीचे की ओर लटकाया जाता है अथवा किसी दिशा में खींचा जाता है, तब बाँधने वाले माध्यम में लटकी वस्तु के भार या लगाए गए खींचने वाले बल का विरोध होता है।
इस विरोध के परिणामस्वरूप उस माध्यम (रस्सी/डोरी/तार) में विपरीत दिशा में एक बल उत्पन्न होता है, जो प्रणाली में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
इस बल को तनाव बल (Tension Force) कहते हैं।
उदाहरण:
• रस्सी से बाँधकर किसी पत्थर को लटकाना।
• छत से लटकाया गया पंखा।
• क्रेन द्वारा भार उठाना।
महत्वपूर्ण विशेषताएँ (परीक्षा उपयोगी):
• तनाव बल की दिशा सदैव रस्सी या तार की लंबाई के अनुदिश होती है।
• यह बल केवल खींचने (Pull) का कार्य करता है, धक्का (Push) नहीं दे सकता।
• संतुलन की अवस्था में, तनाव बल का परिमाण लटकी वस्तु के भार के बराबर होता है।

➤ बलों का संतुलन (Balance of Force)
यदि किसी वस्तु पर एक से अधिक बल एक साथ कार्य कर रहे हों, परंतु उन बलों के कारण वस्तु की गति की अवस्था (विराम या समान चाल) में कोई परिवर्तन न हो, तो कहा जाता है कि वे बल संतुलन में हैं।
इस स्थिति में उन सभी बलों का परिणामी बल (Resultant Force) शून्य होता है।
उदाहरण:
रस्साकसी के खेल में जब दो टीमें रस्से को बराबर परिमाण के बल से अपनी-अपनी दिशा में खींचती हैं, तो रस्सा तथा दोनों टीमें अपने-अपने स्थान पर स्थिर रहती हैं।
इस अवस्था में दोनों टीमों द्वारा रस्से पर लगाए गए बल संतुलित बल कहलाते हैं।
➤ जड़त्व (Inertia)
जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है, जिसके कारण वह अपनी अवस्था में परिवर्तन—अर्थात् विराम या गति की अवस्था—का विरोध करती है। दूसरे शब्दों में, किसी निकाय द्वारा लगाए गए बल के कारण होने वाले अवस्था-परिवर्तन का विरोध करने की प्रवृत्ति को जड़त्व कहते हैं।
वस्तुओं की इस प्रवृत्ति को “जड़त्व” (Inertia) नाम गैलीलियो गैलीली द्वारा दिया गया था।
जड़त्व और द्रव्यमान का संबंध:
किसी वस्तु का जड़त्व उसके द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है।
• द्रव्यमान जितना अधिक होता है,
• वस्तु में जड़त्व अर्थात् बल का विरोध करने की क्षमता उतनी ही अधिक होती है।
इसी कारण—
• भारी वस्तु को विराम अवस्था से गति में लाने या
• गतिमान अवस्था से विराम में लाने
के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है।
न्यूटन के गति विषयक नियम (Newton’s Laws of Motion)
सर आइज़ैक न्यूटन (Sir Isaac Newton) ने गैलीलियो के पश्चात वस्तुओं की गति का गहन अध्ययन किया और 1686 ई. में गति से संबंधित तीन नियमों का प्रतिपादन किया।
(i) प्रथम गति नियम (First Law of Motion):
यदि कोई वस्तु विरामावस्था में है या समान वेग से सीधी रेखा में गतिमान है, तो वह उसी अवस्था में बनी रहती है, जब तक उस पर कोई बाह्य बल आरोपित न किया जाए।
वस्तुओं की यह प्रवृत्ति उनके जड़त्व (Inertia) के कारण होती है, इसलिए इस नियम को जड़त्व का नियम (Law of Inertia) भी कहा जाता है।
उदाहरण:
जब कोई कार या बस अचानक तेज़ी से आगे बढ़ती है, तो उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यात्री के शरीर का निचला भाग वाहन के साथ आगे बढ़ जाता है, जबकि ऊपरी भाग जड़त्व के कारण कुछ समय तक विरामावस्था में बना रहता है। परिणामस्वरूप यात्री को पीछे की ओर झटका महसूस होता है।
(ii) द्वितीय गति नियम (Second Law of Motion):
यदि किसी वस्तु पर कोई बाह्य बल आरोपित किया जाता है, तो उस वस्तु में उत्पन्न त्वरण,
• लगाए गए बल के समानुपाती, तथा
• वस्तु के द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
इस नियम को गणितीय रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है—
अर्थात्,
“किसी वस्तु पर आरोपित बल, उसके द्रव्यमान तथा उसमें उत्पन्न त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।”
(iii) तृतीय गति नियम (Third Law of Motion):
यदि कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर बल लगाती है, तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर उतने ही परिमाण का बल, विपरीत दिशा में लगाती है।
इस नियम को क्रिया–प्रतिक्रिया का नियम भी कहते हैं।
उदाहरण:
जब बन्दूक से गोली छोड़ी जाती है, तो बन्दूक द्वारा गोली पर लगाए गए बल के कारण गोली आगे की ओर जाती है, तथा प्रतिक्रिया बल के कारण बन्दूक पीछे की ओर धक्का खाती है।
भार (Weight)
भार एक प्रकार का बल है, जो पृथ्वी द्वारा किसी वस्तु पर लगाए गए गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उत्पन्न होता है। पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण प्रत्येक वस्तु को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे उस वस्तु पर एक बल कार्य करता है। इसी बल को वस्तु का भार कहते हैं।
जब कोई वस्तु पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ऊर्ध्वाधर दिशा में गति करती है, तो उसमें एक त्वरण उत्पन्न होता है, जिसे गुरुत्वीय त्वरण (g) कहते हैं।
भार का सूत्र:
वस्तु का भार निम्न सूत्र से ज्ञात किया जाता है—
जहाँ—
= वस्तु का भार
= वस्तु का द्रव्यमान
= गुरुत्वीय त्वरण
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा हेतु):
• भार एक सदिश राशि है।
• भार का SI मात्रक न्यूटन (N) है।
• भार का मान स्थान के साथ बदलता है, क्योंकि g का मान बदलता है।
• द्रव्यमान स्थिर रहता है, जबकि भार बदलता है।
• द्रव्यमान तथा भार में अंतर (Difference between mass and weight)
- द्रव्यमान (Mass):
किसी पिण्ड या वस्तु में पदार्थ (Matter) की जितनी मात्रा होती है, उसे उस वस्तु का द्रव्यमान (Mass) कहते हैं।
- द्रव्यमान सदैव नियत (Fixed) रहता है।
- इसका SI मात्रक किलोग्राम (kg) है।
- भार (Weight):
वह बल जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपनी ओर खींचती है, उसे उस वस्तु का भार (Weight) कहते हैं।
- भार गुरुत्वीय त्वरण (g) पर निर्भर करता है।
- इसका SI मात्रक न्यूटन (N) है।
- इसका मान स्थान के अनुसार परिवर्तनीय होता है।
द्रव्यमान और भार का संबंध:
जहाँ—
= वस्तु का भार
= वस्तु का द्रव्यमान
= गुरुत्वीय त्वरण
महत्वपूर्ण तथ्य:
- एक ही वस्तु का भार पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर बदलता है।
- वस्तु का भार दूसरे ग्रहों या उपग्रहों पर ले जाने पर भी बदल जाता है।
- उदाहरण: यदि किसी वस्तु का भार पृथ्वी पर 6 N है, तो चंद्रमा पर वह लगभग 1 N हो जाता है।
- कारण: चंद्रमा का गुरुत्वीय त्वरण gm पृथ्वी के ge का केवल 1/6 है।
- पृथ्वी पर भार में परिवर्तन:
- ध्रुवों पर भार अधिकतम होता है।
- विषुवत रेखा पर भार न्यूनतम होता है।
- यह परिवर्तन पृथ्वी की आकृति और पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण होता है।
यह भी पढें : गति (Motion)
FAQs
प्रश्न: बल की एस.आई. इकाई क्या है?
उत्तर: न्यूटन (Newton)
प्रश्न: बल से वस्तु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: गति, आकार या दिशा बदल सकती है।
प्रश्न: रगड़ बल किस दिशा में कार्य करता है?
उत्तर: गति के विपरीत दिशा में।
प्रश्न: चुम्बक द्वारा लगाया गया बल क्या कहलाता है?
उत्तर: चुम्बकीय बल।
प्रश्न: गुरुत्वाकर्षण बल किस कारण लगता है?
उत्तर: पृथ्वी की ओर खींचने के कारण।
प्रश्न: क्या बल अदृश्य होता है?
उत्तर: हाँ।
प्रश्न: स्थिर वस्तु को गति देने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: बल।
प्रश्न: बल किस यंत्र से मापा जाता है?
उत्तर: स्प्रिंग बैलेंस (Spring Balance)
प्रश्न: बल के दो मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर: संपर्क बल और असंपर्क बल।
प्रश्न: बल लगाने पर वस्तु की दिशा में क्या परिवर्तन हो सकता है?
उत्तर: दिशा बदल सकती है।
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