किसी चालक में वैद्युत आवेश के प्रवाहित होने से जो ऊर्जा हाय होती है उसे वैद्युत ऊर्जा कहते हैं। यदि किसी चालक के सिरों के बीच विभवान्तर V वोल्ट हो तो Q कूलाम आवेश को चालक के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले जाने में V × q जूल कार्य करना पड़ेगा। (अर्थात् V× q जूल ऊर्जा व्यय होगी)। इस प्रकार कृत कार्य अथवा व्यय वैद्युत ऊर्जा
W = V × q जूल
W = Vit जूल (चूंकि q = it )
या W = i2 Rt जूल या (चूंकि V = iR )
या W= (V2 t)/R जूल (चूंकि i= V R )
विद्युत शक्ति (Electric Power)
किसी विद्युत परिपथ में वैद्युत ऊर्जा के व्यय होने की दर को वैद्युत सामर्थ्य या वैद्युत शक्ति कहते हैं।
सामर्थ्य (p) = ऊर्जा (w)/समय (t) = जूल/सेकण्ड या वाट
अतः यदि किसी वैद्युत परिपथ में एक जूल प्रति सेकेण्ड की दर से ऊर्जा व्यय हो रही हो तो परिपथ की वैद्युत शक्ति (Power) 1 वाट होगी।
P = w/t = Vi = i2 R = (v2)/R वाट
सामर्थ्य का S.I. मात्रक वाट है। परन्तु व्यवहार में यह एक छोटा मात्रक है। अतः व्यवहार में हम किलोवाट, मेगावाट, अश्व शक्ति (Horse Powers) आदि बड़े मात्रकों का प्रयोग करते हैं।
1 किलोवाट = 103 वाट (W)
1 मेगावाट (KW)(MW) = 106 वाट (W)
1 अश्व शक्ति (H.P.)= 746 वाट
विद्युत ऊर्जा की माप (Measurement of Electrical Energy)
घरों तथा उद्योगों में व्यय होने वाली बिजली का मूल्य वैद्युत ऊर्जा के आधार पर निकाला जाता है। (न कि वैद्युत शक्ति के आधार पर)। ऊर्जा का मात्रक जूल व्यावहारिक दृष्टि से बहुत छोटा मात्रक है। अतः इसके स्थान पर किलोवाट घंटा (KWH) जिसे बोर्ड ऑफ ट्रेड यूनिट (BTU) भी कहते हैं। बोलचाल की भाषा में केवल यूनिट (Unit) शब्द का प्रयोग होता है।
“1 किलोवाट घण्टा अथवा 1 यूनिट, वैद्युत ऊर्जा की वह मात्रा है जो कि किसी परिपथ में 1 घण्टे में व्यय होती है, जबकि परिपथ में 1 किलोवाट की वैद्युत शक्ति हो।”
अर्थात् 1 किलोवाट घंटा = 1 किलोवाट × 1 घण्टा
= 1000 वाट × 3600 सेकेण्ड
= 3.6 × 106 वाट सेकेंड (या जूल)
यदि किसी परिपथ में V वोल्ट के विभवान्तर में । एम्पियर की धारा 1 घंटे तक प्रवाहित हो तब परिपथ में व्यय हुई वैद्युत ऊर्जा = वैद्युत शक्ति × समय = Vi (वाट) × t (घण्टे)
= Vi 1000 (किलोवाट) × t (घण्टे)
= V× i × t/1000 किलोवाट घण्टे
अतः किलोवाट घंटो (यूनिटों) की संख्या
= (वोल्ट × एम्पियर × घण्टे)/1000 = (वाट × घण्टे)/1000
विद्युत धारा के प्रभाव (Effects of Electric Current)
विद्युत धारा के मुख्यतः निम्नलिखित प्रभाव होते हैं-
(1) ऊष्मीय प्रभाव (Thermal Effect)
(2) प्रकाशीय प्रभाव (Light effect)
(3) रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect)
(4) चुंबकीय प्रभाव (Magnetic Effect)
(1) विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव (Heating Effect of Electricity)- “किसी चालक में विद्युत् धारा के प्रवाह से चालक की तापवृद्धि को विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव (Heating effect of current) कहते हैं।”
तार के भीतर विद्यमान मुक्त इलेक्ट्रानों के गतिशील होने से विद्युत धारा बहती है और इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रान का तार (चालक) के परमाणुओं से टकराने की बारंबारता (Frequency) अल्पाधिक बढ़ जाती है, फलतः इलेक्ट्रान अपनी गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का कुछ भाग परमाणुओं को भी दे देते हैं, जिसके फलस्वरूप तार का ताप बढ़ जाता है। इस प्रकार वैद्युत ऊर्जा का कुछ भाग ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाता है। जिसे विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहते हैं।
तार में उत्पन्न ऊष्मा (H) का मान निम्न सूत्र से ज्ञात करते हैं-
H = Vit/4.2 कैलोरी = Vit जूल
या H = (V2 t)/(4.2R) कैलोरी = (V2 t)/R जूल
या, H = (i 2 * Rt)/4.2 कैलोरी = i 2 Rt जूल
जहां, V = चालक के सिरों के बीच उत्पन्न विभवान्तर
i = चालक में प्रवाहित धारा
t = 1 धारा प्रवाहित किये जाने की समयावधि।
व R = चालक का प्रतिरोध है।
H = i²Rt में विद्युत धारा द्वारा उत्पन्न उष्मा के जो नियम सम्मिलित हैं, वे जूल के नियम ही कहलाते हैं। यथा-
(i) यदि किसी चालक का प्रतिरोध नियत है, तो उसमें नियत समय में उत्पन्न उष्मा धारा के वर्ग के समानुपाती होती है। अर्थात् H∝ i² जबकि R और t नियत है।
(ii) यदि किसी चालक में प्रवाहित होती हुई धारा का मान नियत हो, तो किसी निश्चित समय में उत्पन्न उष्मा चालक के प्रतिरोध के समानुपाती होती है। अर्थात् H∝ R, जबकि i एवं t नियत हैं।
(iii) जब किसी चालक का प्रतिरोध तथा प्रवाहित होती हुई धारा नियत हो, तो उसमें उत्पन्न उष्मा समय का समानुपाती होती है। अर्थात् H∝ t, जबकि i और R नियत हो।
• ऊष्मा विद्युत व सीबेक प्रभाव (Thermo electricity and See beck Effect)
किसी तार या चालक को गर्म करने पर उसमें विद्युत धारा का प्रवाह होने लगता है, जिसे ऊष्मा विद्युत (Thermal Electricity) कहते हैं। इस धारा की प्राप्ति हेतु सीबेक नामक वैज्ञानिक ने एक युक्ति (Technique) विकसित की जिसे ताप-युग्म (Thermo- couple) कहते हैं व इस प्रभाव को सीबेक प्रभाव कहते हैं। इसके लिए सीबेक ने दो भिन्न-भिन्न धातुओं से बने दो चालकों को दो सिरों पर जोड़कर एक संधि (Joint) को ठंडा रखा व दूसरे को गरम किया। इस तापान्तर के कारण चालकों से होकर धारा प्रवाहित होने लगती है। इसे सीबेक प्रभाव कहते हैं। इसमें ऊष्मीय ऊर्जा का रूपान्तरण वैद्युत ऊर्जा में होता है। जिस विद्युत वाहक बल (e.m.f.) के कारण यह ऊष्मा विद्युत प्राप्त करती है, उसे ऊष्मीय विद्युत वाहक बल (Thermal Electro motive force) कहते हैं।
• पेल्टियर प्रभाव (Peltier Effect)
यह सीबेक प्रभाव के विपरीत प्रक्रिया है। जिसकी व्याख्या पेल्टियर नामक वैज्ञानिक ने की थी। इसमें यदि दो अलग-अलग धातुओं के चालकों को जोड़कर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो संधियों पर या तो ऊष्मा का उत्पादन होता है या अवशोषण। अर्थात् एक संधि पर यदि ऊष्मा का उत्पादन होता है तो दूसरे पर अवशोषण। धारा की दिशा उलटने पर गरम हो रही संधि ठंडी व ठंडी हो रही संधि गरम होने लगती है। इसे ही पेल्टियर प्रभाव कहते हैं।
• थाम्सन प्रभाव (Thomson Effect)
जब किसी चालक तार के दोनों सिरों का ताप समान रखकर बीच से उसे गर्म किया जाता है और साथ ही उसमें विद्युत धारा भी प्रवाहित की जाती है तो तार का आधा भाग ठंडा व आधा भाग गर्म हो जाता है, इसे ही थाम्सन प्रभाव कहते हैं। जिसकी व्याख्या थाम्सन नामक वैज्ञानिक ने की थी। धारा की दिशा उलटने पर गर्म हो रहा भाग ठंडा व ठंडा हो रहा भाग गर्म होने लगता है। धारा प्रवाह की दिशा में प्रथम आधा भाग ठंडा व बाद का आधा भाग गर्म होता है।
(2) विद्युत धारा का प्रकाशीय प्रभाव (Lighting Effect of Electricity)
जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक गर्म होने के साथ ही प्रकाश (Light) का भी उत्पादन करने लगता है, जिसे विद्युत धारा का प्रकाशीय प्रभाव कहते हैं।
यथा- जब हम हीटर या बल्ब के तार (Wire) में धारा प्रवाहित करते हैं, तो तार तप्त (Heat) होने के साथ ही प्रकाशमान भी हो जाता है। अंतर सिर्फ इतना होता है कि विद्युत हीटर में विद्युत ऊर्जा का अधिक भाग ऊष्मा में व थोड़ा भाग प्रकाश में रूपान्तरित होता है। जबकि बल्ब में विद्युत ऊर्जा का अधिक भाग प्रकाश में व कम भाग ऊष्मा में परिवर्तित होता है।
• विद्युत धारा के ऊष्मीय व प्रकाशीय प्रभाव पर आधारित घरेलू उपकरण
(i) विद्युत बल्ब (Electric Bulb)- विद्युत बल्ब का आविष्कार थामस एल्वा एडिसन नामक वैज्ञानिक ने किया था। इसमें काँच के खोखले गोले के अंदर टंगस्टन धातु का एक तंतु (Filament) होता है। इसमें धारा प्रवाहित करने पर वह अतितप्त (1500°C से 2500°C) हो जाता है, जिससे वह प्रकाश उत्सर्जित करने लगता है। तंतु के रूप में टंगस्टन जैसी उच्च गलनांक वाली धातुओं का ही प्रयोग संभव है क्योंकि निम्न गलनांक वाली धातुएँ कम ताप पर ही पिघल जाती हैं। बल्ब के अंदर की वायु निकाल कर उसमें नाइट्रोजन व आर्गन जैसी निष्क्रिय गैस का मिश्रण भर दिया जाता है, ताकि उच्च ताप पर तंतु का वाष्पीकरण न हो। ज्ञातव्य है कि साधारण बल्ब में विद्युत ऊर्जा का लगभग 5-10% भाग ही प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित हो पाता है जबकि CFL में 40- 50%, LED विद्युत लैम्पों में लगभग 80-90% तक विद्युत ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

(ii) विद्युत ऊष्मक (Electric Heater)- इसमें नाइक्रोम का एक सर्पिलाकार (Spherical) तार होता है। जो चीनी मिट्टी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) की प्लेट पर बने हुए खाँचों के अन्दर बिछा रहता है। इसे तापक तार (Heating Element) कहते हैं। नाइक्रोम, निकिल तथा क्रोमियम की एक मिश्र धातु (Alloy) होती है। जिसका गलनांक (Melting Point) व विशिष्ट प्रतिरोध (Resistivity) दोनों ही बहुत उच्च होता है। जिससे यह बिना पिघले बहुत उच्च ताप प्राप्त कर सके। अतितप्त होने पर यह लाल हो जाती है अर्थात् लाल रंग के प्रकाश व ऊष्मा (Heat) का उत्सर्जन करने लगती है। उल्लेखनीय है कि कोई वस्तु जैसे-जैसे गर्म होती है वह पहले लाल फिर क्रमशः नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी (Indigo) व बैंगनी (Violet) रंग के प्रकाश का उत्सर्जन करने लगती है। अर्थात् हम उत्सर्जित प्रकाश के रंग से किसी वस्तु के ताप का भी अनुमान लगा सकते हैं। विद्युत बल्ब पीली रोशनी देता है, जबकि हीटर लाल। इसका तात्पर्य है कि बल्ब के फिलामेन्ट का ताप हीटर के ताप कलर से बहुत अधिक होता है।

तापक तार को सीधा न रखकर सर्पिलाकार कुण्डली (Spherical Coil) के रूप में रखते हैं ताकि तार की काफी लंबाई थोड़े से ही स्थान में आ जाय और अधिक ऊष्मा उत्पन्न हो सके।
(iii) वैद्युत प्रेस (Electric Iron)- इसमें नाइक्रोंम का एक तापक तार अभ्रक की पतली चादर पर सपाट रूप में लिपटा होता है।
इसे अभ्रक की एक दूसरी पतली चादर पर रखकर प्रेस की तली पर रख देते हैं। तापक तार को ऊपर में ऐस्बेस्टस की मोटी चादर से ढक देते हैं। प्रेस की तली लोहे की बनी होती है। जिसकी बाहरी सतह पर क्रोमियम की पॉलिस होती है। जब तापक-तार में वैद्युत धारा प्रवाहित करते हैं तो यह लाल तप्त हो जाता है। चूंकि तापक तार ऐस्बेस्टस से ढका होता है तथा ऊपर वायु होती है, अतः इसमें उत्पन्न ऊष्मा ऊपर को नहीं जा पाती। (चूंकि ऐस्बेस्टस तथा वायु ऊष्मा व विद्युत के कुचालक हैं)। लगभग समस्त ऊष्मा अभ्रक में से होकर इस्त्री की तली में चली जाती है (अभ्रक विद्युत का अचालक व ऊष्मा का सुचालक है)। चूंकि प्रेस की बाहरी सतह पालिसदार होती है, अतः विकिरण द्वारा ऊष्मा की हानि न्यूनतम होती है।

(iv) विद्युत फ्यूज (Electric Fuse)- जब कभी घरों में बिजली के दोनों तार (फेस व न्यूट्रल) छिलने या प्लास्टिक कवर के उतर जाने से एक-दूसरे के प्रत्यक्ष संपर्क में आ जाते हैं अथवा विद्युत के बहुत सारे उपकरण एक साथ आन कर दिये जाते हैं तो परिपथ का विद्युत प्रतिरोध एकदम से गिर जाता है, फलस्वरूप परिपथ में बहुत अधिक धारा बहने लगती है। इससे उपकरणों के जल जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। तारों के लघु पथित (Short Circuit) हो जाने से विद्युत सप्लाई के ट्रांसफार्मरों तथा अन्य उत्पादन यंत्रों के जल जाने का भी डर रहता है। इस प्रकार लघु पथन के खतरों से बचने के लिए विभिन्न परिपथों में फ्यूज तार लगाये जाते हैं। फ्यूज तार, टिन व सीसे की मिश्र धातु (सोल्डर) का एक छोटा सा तार है, जो कि चीनी मिट्टी के होल्डर पर दो धात्विक टर्मिनलों के बीच खिंचा रहता है। इसका गलनांक तांबे के सापेक्ष काफी कम होता है।* इसे परिपथ के किसी एक संयोजक तार के श्रेणी क्रम (Series) में लगा देते हैं।* जब परिपथ में किसी कारण धारा का मान एक निर्धारित मान से अधिक हो जाता है तो फ्यूज तार तुरन्त गर्म होकर पिघल जाता है और परिपथ को तोड़ देता है जिससे धारा का प्रवाह तुरन्त रूक जाता है।
(v) प्रतिदीप्ति प्रकाश नलिका (Fluorescent Tube Ligth)
ट्यूब लाइट कांच की लगभग 120 सेमी. लम्बी नली होती है जिसके दोनों सिरों पर टंगस्टन धातु के तंतु (Filament) होते हैं। इनमें (तंतुओं में) धारा प्रवाहित करने हेतु प्रत्येक सिरे पर दो पिनें लगी होती हैं। ट्यूब लाइट को चालू (on) करने हेतु तांबे के तारों की एक कुंडली जिसे चोक (Choke) कहते हैं, तथा एक प्रवर्तक (Starter) भी लगा होता है। नलिका के दोनों तंतुओं, चोक तथा स्टार्टर को श्रेणी क्रम में स्थाई रूप से एक पट्टी (Frame) पर फिट कर दिया जाता है। पट्टी के तारों को किसी स्विच से होकर विद्युत बल्ब के परिपथ की ही भांति मेन्स से जोड़ दिया जाता है।
ट्यूबलाइट में लगभग 60-70% तक विद्युत ऊर्जा प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। अतः बल्ब की अपेक्षा ट्यूब लाइट से 4 से 6 गुना अधिक प्रकाश प्राप्त होता है। ट्यूब लाइट के अंदर प्रतिदीप्त (Fluorescent) पदार्थ का लेप होता है जिससे श्वेत प्रकाश प्राप्त होता है।*
सबसे खास बात यह है कि विद्युत बल्ब के विपरीत ट्यूबलाइट में धारा केवल स्टार्ट करते समय कुछ सेकेण्ड के लिए ही तंतुओं में बहती है, शेष समय धारा का प्रवाह ट्यूबलाइट में भरी गैस से होकर होता है। इससे तंतु के धातु का न तो वाष्पन होने पाता है नहीं ऑक्सीकरण की संभावना रहती है। यही कारण है कि बल्ब की तुलना में ट्यूब लाइट की आयु बहुत अधिक होती है और विद्युत का खर्च भी कम होता है।
जब तंतुओं में धारा प्रवाहित होती है तो इनसे इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते हैं जो ट्यूब में भरी अक्रिय गैस (आर्गन) का आयनीकरण (Ionisotion) कर देते हैं। फलस्वरूप ट्यूब में एक सिरे से दूसरे सिरे की ओर धारा बहने लगती है। ट्यूब में स्थित पारा गर्म होकर वाष्पित होता है और इससे विद्युत उत्सर्जन होने के कारण पराबैगनी किरणें उत्सर्जित होती हैं। ये पराबैगनी किरणें ट्यूब की दीवारों पर लेपित प्रतिदीप्त पदार्थ (Fluorescent) द्वारा अवशोषित (Absorb) कर ली जाती हैं और तत्पश्चात उसमें से निम्न आवृत्ति का प्रकाश उत्सर्जित होता है।
(3) विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect of Electricity)
शुद्ध या आसुत जल विद्युत का कुचालक होता है परन्तु जब उसमें कोई अशुद्धि (अम्ल, क्षार या लवण) मिली हो तो उससे विद्युत का प्रवाह होने लगता है। अर्थात् वह सुचालक हो जाता है। ऐसे घोल या विलयन को, जिसमें विद्युत धारा का प्रवाह हो सकता है, विद्युत अपघट्य (Electrolyt) कहते हैं। जब किसी विद्युत अपघट्य में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो वह धनायनों व ऋणायनों में अपघटित (Decompose) होने लगता है जिसे विद्युत अपघटन (Electrolysis) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इस घटना को विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहते हैं। वह उपकरण या पात्र जिसमें विद्युत अपघटन की क्रिया होती है। उसे वोल्टामीटर (Voltameter) कहते हैं। विद्युत सेल की ही भांति इसमें भी दो भिन्न धातुओं के इलेक्ट्रोड (एनोड व कैथोड) का प्रयोग किया जाता है। एनोड से होकर धारा विद्युत अपघट्य में प्रवेश करती है व कैथोड से होकर बाहर निकलती है। धारा प्रवाहित करने पर विद्युत अपघट्य में धनायन (Cation), ऋण इलेक्ट्रोड (Cathode) की ओर तथा ऋणायन (Anion), धन इलेक्ट्रोड की ओर गति करते हैं और उन पर जाकर जमा (Deposit) भी हो जाते हैं।
विद्युत अपघटन के उपयोग (Usages of Electrolysis)
(i) धातुओं का शुद्धिकरण (Purification of Metals)- धातुओं का शुद्धिकरण करने के लिए शुद्ध धातु का कैथोड व शुद्ध धातु का एनोड बनाकर वोल्ट मीटर में अशुद्ध धातु के घोल को विद्युत अपघट्य बना दिया जाता है। इसके बाद इसमें धारा प्रवाहित करने पर विलयन का विद्युत अपघटन प्रारम्भ हो जाता है और शुद्ध धातु का निक्षेपण कैथोड पर होने लगता है। इस विधि से अयस्कों से धातुओं का निष्कर्षण (Extraction) भी किया जाता है।
(ii) विद्युत लेपन (Electro Plating)- इस विधि का प्रयोग करके किसी धातु की पतली परत (Layer) किसी दूसरी धातु पर चढ़ाई जाती है। जिस पर धातु परत चढ़ाना हो उसका एनोड बनाते हैं और जिस धातु का परत चढ़ाना हो उसका कैथोड बनाते हैं। दोनों इलेक्ट्रोडों को किसी विद्युत अपघट्य विलयन में डुबाकर एक विद्युत सेल का रूप प्रदान करते हैं और इसे किसी परिपथ में जोड़कर धारा प्राप्त करते हैं। इस प्रक्रिया में एनोड की धातु अपघट्य या विलयन में घुलकर पुनः कैथोड पर निक्षेपित होती है और थोड़ी ही देर में एक पतली परत चढ़ जाती है। सोना, चांदी, निकिल, तांबा आदि धातुओं की पालिश बनावटी आभूषणों पर प्रायः इसी तरह चढ़ाई जाती है।
(iii) यौगिकों का विश्लेषण (Analysis of Compounds)- विद्युत अपघटन की प्रक्रिया द्वारा कुछ यौगिकों यथा : हाइड्रोक्लोरिकअम्ल (HCI) व हाइड्रोजन साइनाइट (HCN) आदि की संरचना (Structure) व गुणधर्मों का विश्लेषण (Analysis) किया जाता है।
(iv) विद्युत सेलों का निर्माण (Composition of Electric cells) – विद्युत अपघट्य सिद्धान्त का प्रयोग करके हम विद्युत सेलों का निर्माण करते हैं जिनकी संरचना व कार्य विधि हम इसी इकाई में पढ़ चुके हैं। हम यह भी पढ़ चुके हैं कि इस तरह दो प्रकार के विद्युत सेलों का निर्माण किया जाता है। एक प्राथमिक सेल (जिसमें आवेशन की क्रिया नहीं होती सिर्फ निरावेशन द्वारा विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है और जल्दी ही विद्युत अपघट्य को बदलना पड़ता है। व दूसरा- द्वितीयक या संचायक सेल (जिसमें आवेशन व निरावेशन दोनों तरह की क्रियाएं होती हैं और सेल लंबे समय तक कार्य करता है)
(v) मुद्रण (Printing)- आजकल विद्युत अपघटन विधि द्वारा छपाई का कार्य भी किया जाता है। इसके लिए छपाई सामग्री (Printing Matter) तैयार कर के ताँबे के वोल्टामीटर में कैथोड की जगह रख देते हैं। विद्युत अपघटन करने पर सेट किये गये अक्षरों (Letters) पर तांबे की एक परत चढ़ जाती है। जिससे उच्च गुणवत्ता युक्त छपाई करना संभव हो पाता है।
(4) विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव (Magnetic Effect of Electricity)
जब किसी चालक (Conductor) तार से विद्युत धारा का प्रवाह होता है तो चालक के परितः एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इसे ही हम विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं। जिसकी खोज ओस्ट्रेंड (Oersted) ने सन् 1812 ई. में की थी।
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FAQs
Q1. विद्युत बल्ब से वायु क्यों निकाल दी जाती है?
Ans. क्योंकि उच्चताप पर तंतु, वायु में उपस्थित ऑक्सीजन से क्रिया करके ऑक्सीकृत हो सकता है।
Q2. बल्ब में निष्क्रिय गैसें क्यों भरी जाती हैं?
Ans. क्योंकि निष्क्रिय गैसों के अभाव में तंतु वाष्पित हो सकता है।
Q3. कौन सी धातु रोशनी के बल्बों में फिलामेंट के रूप में प्रयुक्त होती है?
Ans. टंगस्टन
Q4. जलते हुए बल्ब के तन्तु का ताप सामान्यतः कितना होता है?
Ans. (1500-2500)°C
Q5. विद्युत बल्ब के फिलामेण्ट के निर्माण के लिए टंगस्टन का प्रयोग किया जाता है। क्यों?
Ans. इसके उच्च गलनंक, क्वथनांक व प्रतिरोध के कारण।
Q6. लंबी अवधि के उपयोग के बाद बल्ब के अंदर की ओर एक धुंधला धब्बा बन जाता है। इसका क्या कारण है?
Ans. टंगस्टन तंतु की वाष्प बनकर वहां एकत्रित हो जाती है।
Q7. टंगस्टन धातु का गलनांक व क्वथनांक कितना होता है?
Ans. 3422° सेल्सियस व 5555° सेल्सियस
Q8. टंगस्टन धातु की खोज किसने की थी?
Ans. टनबर्न बर्गमेन (1781) ने।
Q9. विद्युत बल्बों में फिलामेंट के रूप में टंगस्टन धातु का ही प्रयोग क्यों करते हैं?
Ans. क्योंकि इसका उच्च गलनांक (3422°C) होने के कारण उच्च ताप पर भी यह नहीं पिघलता व उच्च प्रतिरोध (500- 800) का होने के कारण अति तप्त होकर अधिक प्रकाश देता है।
Q10. ट्यूब लाइट (Fluorescent Tube) में कौन सी गैस भरी होती है?
Ans. आर्गन के साथ पारा वाष्प (Mercury Vapour)
[आर्गन के स्थान पर जेनान या नियान गैस भी भरी जा सकती है।]
Q11. विद्युत बल्ब के अंदर कौन सी गैस भरी जाती है?
Ans. नाइट्रोजन के साथ अक्रिय गैस आर्गन आदि का मिश्रण भरा जाता है।
Q12. बल्बों में निर्वात के स्थान पर नाइट्रोजन, आर्गन आदि का मिश्रण भरने का क्या कारण है?
Ans. इससे तंतु (Filament) का ऑक्सीकरण बहुत कम होता है और बल्ब की प्रयोग (Use) अवधि बढ़ जाती है।
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