इलेक्ट्रानिकी (Electronics)

इलेक्ट्रानिकी का तात्पर्य किसी परिपथ (Circuit) में इलेक्ट्रानों के नियंत्रण से है। इसके अंतर्गत प्रायः निर्वात ट्यूबों (Vacuum Tubes) व अर्धचालकों (Semiconductors) के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। एक साधारण विद्युत स्विच या विद्युत मोटर में भी इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह होता है परन्तु इन पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं होता। इसीलिए इन्हें इलेक्ट्रानिक उपकरण के बजाय इलेक्ट्रिक उपकरण कहते हैं। इलेक्ट्रानिक के अंतर्गत किसी विद्युत उपकरण में प्रवाहित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, गति व दिशा पर प्रभावपूर्ण नियंत्रण स्थापित करके वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

आज इलेक्ट्रानिक्स का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। इसका उपयोग कृषि, उद्योग, रक्षा, संचार, चिकित्सा, अनुसंधान, शिक्षा, घरेलू उपकरणों के निर्माण इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र में हो रहा है। विकास की प्रारंभिक अवस्था में इलेक्ट्रानिक यंत्रों में निर्वात ट्यूबों (Vacuum Tubes) का प्रयोग होता था जो आकार में काफी बड़े होते थे। धीरे- धीरे इनका स्थान अर्धचालकों व ट्रांजिस्टरों ने ले लिया। ये अधिक कार्यक्षम (Efficient) हल्के, छोटे, सस्ते, टिकाऊ (Durable) व सुविधाजनक होते हैं। वर्तमान समय में Integrated circuits व Microchips विकसित हो गये हैं, जो इस क्षेत्र के सर्वाधिक विकसित तकनीकी उत्पाद है।

तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic Emission)

जब किसी धातु को निर्वात में उच्च ताप तक गर्म किया जाय तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होने लगता है। इस घटना को तापायनिक उत्सर्जन तथा ऐसे इलेक्ट्रॉनों को तापायन (Thermion) कहते हैं। तापायनिक उत्सर्जन की खोज सर्वप्रथम थामस एल्वा एडिसन द्वारा सन् 1884 ई० में की गई थी। निर्वात ट्यूब पर आधारित डायोड व ट्रायोड वाल्वों का निर्माण इसी सिद्धान्त पर हुआ है। कैथोड किरण नलिका व एक्स किरण नलिका में इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन का आधार भी यही है।

तापायनिक उत्सर्जन का कारण (Reason of Thermionic Emission)

हम जानते हैं कि धातुओं (metals) के अंदर स्थित मुक्त इलेक्ट्रॉन अपने परमाणुओं से बाहर निकल कर धातु के अन्दर ही अनियमित गति करते रहते हैं, परन्तु धातु की सतह को छोड़कर बाहर नहीं जा पाते। जब धातु को उच्चताप तक गर्म करते हैं तो मुक्त इलेक्ट्रॉनों की औसत गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है और ये इलेक्ट्रॉन धन आयनों द्वारा लगने वाले आकर्षण कार्य फलन (Work Function) बल के विरुद्ध तल से बाहर निकलने लगते हैं। इलेक्ट्रानों को धातु से बाहर निकालने के लिए एक न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है जिसका मान अलग-अलग धातुओं के लिए अलग-अलग होता है। इस न्यूनतम ऊर्जा को उस धातु का कार्यफलन कहते हैं।

डायोड वाल्व (Diode Valve)

यह तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic emission) पर आधारित एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा उच्च निर्वात में विद्युत धारा का प्रवाह किया जा सकता है। इसका आविष्कार जॉन एम्ब्रोस फ्लेमिंग ने सन् 1904 ई० में किया था।

इसमें कांच का एक लंबा बल्ब (Tube) होता है जिसमें निर्वात उत्पन्न कर दिया जाता है। इसमें दो इलेक्ट्रोड (निकिल धातु का कैथोड व मोलीबिड्नम धातु का एनोड) होते हैं। दोनों इलेक्ट्रोड को खोखता, लंबा व बेलनाकार बनाया जाता है। कैथोड के अंदर टंगस्टन धातु का एक तंतु होता है जो कैथोड को कहीं भी स्पर्श नहीं करता है। जब इसमें धारा प्रवाहित करते हैं तो कैथोड गर्म होने लगता है और इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं। इसे अप्रत्यक्ष तप्त कैथोड कहते हैं। कैथोड पर बेरियम-स्ट्रॉन्सियम ऑक्साइड का लेप चढ़ा देते हैं जिससे यह कम ताप पर ही अधिक इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन करता है। कभी-कभी तंतु ही कैथोड का कार्य करता है। तब इसे प्रत्यक्ष तप्त कैथोड कहा जाता है।

कैथोड के गर्म होने पर उससे इलेक्ट्रानों का उत्सर्जन होने लगता है जो कि एनोड द्वारा आकर्षित कर लिया जाता है। इस प्रकार परिपथ में धारा का प्रवाह होने लगता है। प्लेट (अर्थात् एनोड) को आवेशित करने के लिए प्लेट तथा कैथोड के मध्य एक उच्च विभव युक्त बैट्री लगा देते हैं। यदि एनोड प्लेट पर, कैथोड के सापेक्ष ऋण विभव हो तो उत्सर्जित इलेक्ट्रान प्लेट द्वारा प्रतिकर्षित कर दिये जाते हैं और धारा का प्रवाह नहीं होता। यदि एनोड प्लेट का विभव कैथोड के सापेक्ष धन विभव है तो प्लेट द्वारा इलेक्ट्रानों को आकर्षित कर लिया जाता है और परिपथ में धारा बहने लगती है। इस प्रकार वाल्व में केवल एक दिशा में ही धारा का प्रवाह संभव होता है। चूंकि इसमें दो इलेक्ट्रोड होते हैं, अतः इसे डायोड वाल्व कहते हैं। इस वाल्व का उपयोग दिष्टकारी (Rectifier) के रूप में किया जाता है। अर्थात् इसके द्वारा प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) को दिष्ट धारा (D.C.) में बदला जाता है।*

ट्रायोड वाल्व (Triode Valve)

सन् 1907 में अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. ली. डी. फॉरेस्ट ने डायोड का रुपान्तरण कर ट्रायोड वाल्व का आविष्कार किया। इसके लिए उन्होंने एनोड व कैथोड के बीच एक तीसरा इलेक्ट्रोड लगा दिया जिसे ग्रिड कहते हैं। इसी कारण इसे ट्रायोड वाल्व अर्थात् तीन इलेक्ट्रोड युक्त वाल्व कहते हैं।

ट्रायोड वाल्व के निम्नलिखित उपयोग होते हैं-

(1) इसके द्वारा दुर्बल प्रत्यावर्ती विभव (Voltage) को प्रबल प्रत्यावर्ती विभव में परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार यह एक प्रवर्धक (Amplifier) की भांति कार्य करता है।*

(2) विद्युत चुंबकीय तरंगें उत्पन्न करने के लिए यह एक दोलित्र (Oscillator) की भांति कार्य करता है।*

(3) इसके प्रयोग से ध्वनि तरंगों को रेडियो तरंगों से अलग किया जा सकता है। इस प्रक्रम में यह संसूचक (Detector) की भूमिका निभाता है।*

(4) इसकी सहायता से ध्वनि तरंगों को प्रसारित करने के लिए उन्हें रेडियो तरंगों पर अध्यारोपित किया जा सकता है। इस स्थिति में यह एक प्रेषी (Transmitter) की भांति कार्य करता है।*

अर्ध चालक (Semi Conductor)

ऐसे चालक जिनकी सामान्य ताप पर (At room temperature) विद्युत चालकता (Electric Conductivity) सुचालकों से कम व कुचालकों से अधिक होती है, अर्धचालक कहते हैं। की प्रतिरोधकता 1 से 10-12 ओम-मीटर के बीच होती है। इनकी चालकता एक निश्चित परिसर (Rage) के बीच ताप के अनुक्रमानुपाती होती है। यह परिसर अलग-अलग अर्धचालकों के लिए अलग-अलग हो सकता है। किसी उपयुक्त अशुद्धि को मिलाकर भी अर्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ाई जा सकती है। इस प्रक्रिया द्वारा चालकता बढ़ाने को डोपिंग (Doping) कहते हैं। शुद्ध अर्धचालकों को निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor) तथा अशुद्ध मिश्रित अर्धचालकों को वाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductor) कहते हैं। सिलिकान (Si) व जर्मेनियम (Ge) मुख्य निज अर्धचालक हैं। इसके अलावा ग्रे-टिन (Sn), व मिश्रधातु गैलियम आर्सेनाइड (Ga As), आदि भी अर्धचालकों के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं।

चूंकि निज अर्धचालकों की चालकता कम होती है इसलिए वाह्य अर्धचालकों (extrinsic semiconductors) का प्रयोग अधिक किया जाता है। वाह्य अर्धचालक भी दो प्रकार के होते हैं-

1. N प्रकार के अर्धचालक (N-Type Semiconductor)

जब किसी निज अर्धचालक (Ge या Si) में कोई पंचसंयोजी तत्व (Pentavalent Element) जैसे आर्सेनिक (As), एण्टीमनी (Sb), फास्फोरस (P) इत्यादि अशुद्धि के रूप में मिला देते हैं तो, N प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है।* पंचसंयोजी अशुद्धि (Impurity) के मिलाने पर एक परमाणु के पांच संयोजक इलेक्ट्रॉनों में से चार इलेक्ट्रॉन चार निकटतम जर्मेनियम (या सिलिकान) परमाणुओं के साथ मिलकर चार सहसंयोजक बंध बना लेते हैं। इस प्रकार एक इलेक्ट्रॉन अर्धचालक में चलने के लिए स्वतंत्र रह जाता है। यह इलेक्ट्रॉन अर्धचालक में आवेश वाहक का कार्य करता है। इस प्रकार अर्धचालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाने से उसकी चालकता भी बढ़ जाती है।

2. P-प्रकार के अर्धचालक (P-Type Semi-Conductor)

जर्मेनियम या सिलिकान अर्धचालकों में त्रिसंयोजी अपद्रव्य (Tri-valent impurity) जैसे ऐल्युमिनियम (Al), बोरॉन (Bo) या गैलियम (Ga) इत्यादि मिला दिया जाता है तो P प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है।* मिलाये गये अपद्रव्य परमाणु के तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन, अर्धचालक पदार्थ के तीन इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलकर सहसंयोजक बंध (Co-Valent Bond) बना लेते हैं। परन्तु अर्धचालक (i.e. जर्मेनियम या सिलिकान) का एक इलेक्ट्रॉन सहसंयोजक बंध नहीं बना पाता। इस प्रकार पदार्थ में अपद्रव्य परमाणु के एक ओर रिक्त स्थान या कोटर (Hole) रह जाता है। विद्युत बल लगने पर इसके पास बगल के परमाणु से एक इलेक्ट्रान आ जाता है जिससे उस परमाणु में एक स्थान रिक्त होकर कोटर बन जाता है। इस प्रकार विद्युत का प्रवाह कोटरों (Hole) की गति के कारण होता है। ध्यातव्य है कि कोटर एक धनावेशित कण के समान, इलेक्ट्रॉनों की गति के विपरीत दिशा में (i.e. क्षेत्र की दिशा में) गति करता है।

P-N संधि डायोड (P-N Junction Diode)

जब एक P प्रकार के अर्धचालक को N प्रकार के अर्धचालक से जोड़ देते हैं तो उस संयोजन को जहां पर दोनों पदार्थ जुड़ते हैं, p-n संधि डायोड कहते हैं।

P-N संधि डायोड के उपयोग (Applications of PN Junction Diode)

(1) दिष्टकारी के रूप में (As a Rectifier) P-n संधि डायोड का उपयोग दिष्टकारी (Rectifier) के रूप में किया जाता है, अर्थात् यह प्रत्यावर्ती धारा (Alternative Current) को दिष्ट धारा (Direct Current) में परिवर्तित करता है।*

(2) प्रकाश उत्सर्जक डायोड (Light Emitting Diode- LED)- प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) एक ऐसी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को विकिरण ऊर्जा (दृश्य, अदृश्य, अवरक्त विकिरण व प्रकाश) में परिवर्तित करती है।*

LED की अन्य परम्परागत लैंपों से श्रेष्ठता (Advantages of LEDs from Traditional Lamps)

(1) इनकी दक्षता परम्परागत लैंपों से कई गुना अधिक होती है। कारण यह कि ये बहुत कम विद्युत ऊर्जा खर्च करते हैं।

(2) ये आकार में छोटे, सस्ते व टिकाऊ होते हैं।

(3) ये एक वर्षी प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं।

(4) लगभग संपूर्ण विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में बदल देते हैं। इस प्रकार ये मितव्ययी होते हैं।

(5) पर्यावरण को भी कम से कम क्षति पहुँचाते हैं अर्थात् पारिस्थितिक मित्र (ecofriendly) होते हैं।

(6) चोर सूचक घण्टी (Burglar Alarm) भी LED के उपयोग से निर्मित की जाती है।*

(7) अवरक्त विकिरण का उत्सर्जन करने वाले LED का उपयोग दूरस्थ नियंत्रण (Remote Controll) में किया जाता है।*

(8) कंप्यूटर, कैलकुलेटर्स आदि के प्रदर्शन युक्तियों (Dis- plays) में भी LEDs का उपयोग होता है।

• फोटो डायोड (Photo-Diode)- फोटो डायोड एक ऐसी युक्ति है जो प्रकाशीय संकेतों (Optical Signals) के संसूचन (Detection) में प्रयुक्त होती है। इसमें भी p-n संधि डायोड का प्रयोग होता है। जब इसके सतह पर प्रकाश आपतित होता है, तो परिपथ में धारा प्रवाहित होने लगती है। प्रवाहित धारा का मान प्रकाश की तीव्रता बढ़ने के साथ बढ़ता जाता है। इसे फोटो कंडक्टिव सेल (Photo Conductive cell) भी कहते हैं।

कैडमियम सल्फाइड (cds) युक्त फोटो कंडक्टिव सेल का प्रयोग सबसे अधिक होता है जो कि दृश्य प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। लेड सल्फाइड (PbS) तथा इंडियम एण्टीमनी (InSb) सेल का प्रयोग अवरक्त विकिरण के संसूचन (Detection) में किया जाता है। इसी प्रकार सेलिनियम सेल का प्रयोग नीले प्रकाश के संसूचन में होता है। इस फोटो डायोड का प्रयोग प्रकाश संचालित कुंजियों (light Operated Switches) में भी किया जाता है।

• सौर सेल (Solar Cell)- यह p-n संधि डायोड युक्त एक ऐसी युक्ति है जो अपने ऊपर आपतित प्रकाशीय ऊर्जा के अधिकांश भाग को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। इसे प्रकाश वोल्टीय सेल (Photo-Voltaic Cell) भी कहते हैं।

सौर सेलों के निम्न लाभ हैं-

(1) सुदूर क्षेत्रों जहाँ विद्युत ऊर्जा के कोई अन्य स्रोत नहीं हैं के लिए यह युक्ति वरदान स्वरुप है।

(2) मानव निर्मित उपग्रहों में लगे उपकरणों को लगातार ऊर्जा इसी युक्ति से प्राप्त होती है।

(3) ये सेल पूरी तरह प्रदूषण मुक्त होते हैं और इनके अधिक रखाव की भी आवश्यकता नहीं होती।

(4) ये सेलें काफी टिकाऊ (Durable) भी होती हैं।

• जेनर डायोड (Zener Diode)- यह एक ऐसा डायोड युक्ति है जिसके अंदर से धारा अग्रदिशिक होने पर तो प्रवाहित होती ही है, साथ ही पश्चदिशिक होने पर भी यह धारा प्रवाह होने की अनुमति देती है, यदि इसके सिरों पर आरोपित विभवान्तर एक निश्चित मान (भंजक वोल्टता) से अधिक हो। इस दशा में यह एक विभव नियंत्रक (Voltage Stabliser) के रूप में कार्य करता है।

ट्रांजिस्टर (Transistor)

यह n व p प्रकार के अर्धचालकों से बनी एक ऐसी इलेक्ट्रानिक युक्ति है जो ट्रायोड वाल्व के स्थान पर प्रयोग की जाती है। इसका आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिकों जॉन बर्डीन शॉकले तथा बैटन ने किया था जिसके लिए इन्हें 1956 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। यह दो प्रकार का होता है-

(i) p-n-p-ट्रांजिस्टर व (ii) n-p-n-ट्रॉजिस्टर। p-n-p ट्रांजिस्टर में, दो P प्रकार के अर्ध चालक गुटकों के बीच में एक पतला n प्रकार का अर्धचालक गुटका रखकर बनाते हैं।

इसमें प्रथम P प्रकार के गुटके को उत्सर्जक (emitter-E) दूसरे P प्रकार के गुटके को संग्राहक (Collector-C) व मध्य के n प्रकार के गुटके को आधार (Base) कहते हैं। इसी प्रकार जब दो n प्रकार के गुटकों के मध्य एक P प्रकार का गुटका रख कर दबा देते हैं तो इसे n-p-n ट्रांजिस्टर कहते हैं।

n-p-n ट्रांजिस्टर के भीतर तथा बाहरी परिपथ में आवेश वहन का कार्य इलेक्ट्रॉन करते हैं जबकि p-n-p ट्रांजिस्टर के भीतर आवेश वहन का कार्य कोटर करते हैं परन्तु वाह्य परिपथ में इलेक्ट्रॉन।

• ट्रांजिस्टर्स के उपयोग (Usages of Transistors):

ट्रायोड वाल्व की तरह ट्रांजिस्टर भी प्रवर्धक (Amplifier), दोलित्र (Oscillator), संसूचक (Detector) व प्रेषी (Transmitter) की भाँति कार्य करता है। इसके अलावा यह इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में स्विच के रूप में भी प्रयुक्त होता है। इसके द्वारा दुर्बल संकेतों (Weak Signals) को निम्न प्रतिरोध क्षेत्र (low resistant area) से उच्च प्रतिरोध क्षेत्र में अन्तरित कर दिया जाता है।

इस प्रकार ट्रांजिस्टरों का उपयोग आधुनिक इलेक्ट्रानिक यंत्रों यथा-रेडियो, टेलीवीजन, कम्प्यूटर, श्रवण सहायक यंत्रों (Hear- ing Aids), सेलफोन, घड़ियों इत्यादि में बहुतायत हो रहा है।

ट्रायोड वाल्व व ट्रांजिस्टर की तुलना (Comparison of Triode Valme and Transistor)

(i) ट्रायोड वाल्व की तुलना में ट्रांजिस्टर्स छोटे, हल्के, टिकाऊ तथा सस्ते होते हैं। इस प्रकार इनके प्रयोग द्वारा सूक्ष्म यंत्रों का निर्माण संभव हो पाता है तथा इनका प्रयोग व वहन (to carry) अधिक सुविधाजनक होता है।

(ii) ट्रांजिस्टर्स काफी कम वोल्टेज पर कार्य करने में सक्षम होते हैं अर्थात् अधिक उपयुक्त (efficient) होते हैं। इनमें शक्तिक्षय (Power Loss) कम होता है।

(iii) ट्रांजिस्टर्स की आयु, ट्रायोड वाल्वों की तुलना में बहुत अधिक होती है।

(iv) ट्रायोड की तुलना में ट्रांजिस्टर्स यांत्रिक व विद्युत आघात सहने में अधिक सक्षम होते हैं।

(v) ट्रांजिस्टर का उपयोग धारा प्रवर्धक के रूप में जबकि ट्रायोड वाल्व का प्रयोग वोल्टेज प्रवर्धन में किया जाता है।

(vi) अधिक गर्म होने पर ट्रांजिस्टरों के क्षतिग्रस्त हो जाने का भय रहता है। अतः ये उच्च ताप परिवर्तनों व उच्च वैद्युत धारा पर कार्य हेतु कम उपयुक्त होते हैं।

(vii) ट्रांजिस्टर्स की निर्गत शक्ति (Output), ट्रायोड वाल्व की अपेक्षा कम होती है।

गैसों में विद्युत विसर्जन (Electric Discharge through Gases)

सामान्यतया (साधारण ताप व दाब पर) गैसें विद्युत की कुचालक होती हैं।* परन्तु यदि उनमें उच्च विभवान्तर उत्पन्न कर दिया जाय तो प्रयुक्त इलेक्ट्रोडों के बीच विद्युत का विसर्जन अथवा प्रवाह होने लगता है। यदि गैस का दाब कम कर दिया जाय तो उनके बीच कम विभवान्तर पर ही गैसों का विसर्जन संभव हो जाता है। कारण यह है कि विभवान्तर उत्पन्न करने पर गैसों का आयनीकरण हो जाता है अर्थात् धनायन (cation) व ऋणायन (Anion) उत्पन्न हो जाते हैं, जो एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में गति करने लगते हैं, जिससे विद्युत का प्रवाह संभव हो पाता है। जिस नली (tube) में यह क्रिया होती है उसे विसर्जन नलिका (Dis- charge Tube) कहते हैं। उल्लेखनीय है कि अत्यल्प दाब (10mm पारा से कम) पर भी गैसों में विसर्जन नहीं हो पाता क्योंकि इस दाब पर परमाणुओं की संख्या इतनी कम हो जाती है कि पर्याप्त धनायन उपलब्ध नहीं रह जाते अतः टक्कर से इलेक्ट्रॉन नहीं निकल पाते।

विसर्जन के समय उत्पन्न इलेक्ट्रॉन (कैथोड कण) किसी परमाणु से टकराते हैं तो उसे उत्तेजित (Exite) कर देते हैं। जब वे उत्तेजित परमाणु अपनी सामान्य अवस्था में वापस आते हैं तो प्रकाश उत्सर्जित करते हैं।

यह भी पढ़ें : नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)

FAQs

Q1. तापायनिक उत्सर्जन की खोज किसने की?
Ans.
थामस एल्वा एडिसन ने।

Q2. किसी धातु से इलेक्ट्रानों को बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा की मात्रा को क्या कहते हैं?
Ans.
उस धातु का कार्य-फलन।

Q3. डायोड वाल्व का आविष्कार किसने किया ?
Ans.
जॉन ए. फ्लेमिंग ने।

Q4. डायोड वाल्व का मुख्य उपयोग क्या है?
Ans.
दिष्टकरण (AC को DC में बदलना)।

Q5. ट्रायोड वाल्व का आविष्कार किसने किया ?
Ans.
डॉ. ली.डी. फारेस्ट (1907 ई०)

Q6. ट्रायोड वाल्व के मुख्य उपयोग क्या हैं?
Ans.
यह प्रवर्धक, दोलित, संसूचक व प्रेषी इत्यादि के रूप में कार्य करता है।

Q7. किस ताप पर अर्ध चालक, अचालक (Insulator) की भाँति कार्य करने लगता है?
Ans.
शून्य डिग्री सेल्सियस पर।

Q8. अर्ध चालकों की चालकता होती है?
Ans.
कुचालकों से ज्यादा व सुचालकों से कम ।

Q9. ताप बढ़ाने पर अर्ध चालकों की चालकता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Ans.
चालकता बढ़ जाती है।

Q10. अर्ध चालकों की चालकता कैसे बढ़ाई जा सकती है?
Ans.
ताप वृद्धि द्वारा अथवा कोई उपयुक्त अशुद्धि मिलाकर।

Q11. सरकार ने झावा (जला कोयला) के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। क्यों?
Ans.
क्योंकि इससे जर्मेनियम प्राप्त होता है, जिसका प्रयोग अर्धचालक बनाने में होता है।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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