मेरा बचपन : पाठ -7

हाय बचपन ! तेरी याद नहीं भूलती। वह कच्चा टूटा घर, वह पयाल का बिछौना, वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना, सारी बातें आँखों के सामने फिर रही हैं।

मैं अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाया करता था। मेरी उम्र आठ साल थी, हलधर मुझसे दो साल जेठे थे। हम दोनों प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना लेते थे।

रामलीला में भी आनंद आता था। मेरे घर से बहुत थोड़ी दूर पर रामलीला मैदान था। जिस घर में लीला पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था। दो बजे दिन से पात्रों की सजावट शुरू होने लगती। मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता। जिस उत्साह से दौड़कर छोटे-मोटे काम करता, उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।

गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न थापी की, मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गए तो खेल शुरू हो गया। विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महँगे होते हैं। पर हम अंग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई है। हमारे स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ जो बिना दाम, कौड़ी के खेले जाते हैं। ठीक है, गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है तो क्या क्रिकेट से सिर टूट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे। खैर, यह तो अपनी-अपनी रुचि है, मुझे गुल्ली ही सब खेलों से अच्छी लगती है। प्रातःकाल घर से निकल जाना, पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटना और गुल्ली-डंडा बनाना। वह उत्साह, वह लगन, वह खिलाड़ियों के जमघट, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था, अभिमान की गुंजाइश ही न थी।

घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं। न नहाने की सुध है, न खाने की। गुल्ली है जरा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा है।

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बातचीत के लिए

1. लेखक को रामलीला की तैयारियों में कौन-कौन से काम सबसे अधिक उत्साहित करते होंगे?
Ans.
लेखक को पात्रों की सजावट देखना, छोटे-मोटे काम करना, सामान लाना-ले जाना और लीला के पात्रों के पास रहना सबसे अधिक उत्साहित करता होगा।

2. आपको लेखक के बचपन की कौन-कौन सी बातें सबसे अच्छी लगीं? वे बातें आपको अच्छी क्यों लगीं?
Ans.
मुझे लेखक का नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना और गुल्ली-डंडा खेलना सबसे अच्छा लगा, क्योंकि ये बातें सरल, सच्ची और आनंद से भरी हुई हैं।

3. खेलते समय चोट न लगे, इसके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
Ans.
खेलते समय सावधानी रखना, नियमों का पालन करना, सुरक्षित स्थान पर खेलना और आपस में धक्का-मुक्की न करना चाहिए।

4. लेखक के पिता और घर के अन्य सदस्य चौके में बैठे-बैठे क्या-क्या बातें करते होंगे?
Ans.
वे लेखक की शरारतों, देर से घर आने, न नहाने-खाने और खेल में अधिक समय लगाने की बातें करते होंगे।

पाठ से

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए –

1. लेखक के चचेरे भाई हलधर की आयु कितनी थी?
Ans.
लेखक की आयु आठ वर्ष थी और हलधर उससे दो साल बड़े थे, इसलिए हलधर की आयु दस वर्ष थी।

2. लेखक ने अपने घरवालों के क्रोध का कारण क्या बताया है?
Ans.
लेखक ने बताया कि घरवाले इसलिए नाराज़ होते थे क्योंकि वह न नहाने-खाने की सुध रखता था और गुल्ली-डंडा खेलने में लगा रहता था।

3. लेखक के अनुसार, गुल्ली-डंडा और विलायती खेलों में क्या अंतर है?
Ans.
गुल्ली-डंडा बिना खर्च के खेला जाता है, जबकि विलायती खेलों के सामान महँगे होते हैं और खेलने की फीस भी देनी पड़ती है।

4. इस पाठ में लेखक ने अपने बचपन के किन-किन अनुभवों को याद किया है?
Ans.
लेखक ने कच्चे घर में रहना, खेतों में घूमना, पढ़ने जाना, रामलीला देखना और गुल्ली-डंडा खेलना जैसे अनुभवों को याद किया है।

समझ और अनुभव

1. लेखक के बचपन के कौन-कौन से काम आपने भी किए हैं?
Ans.
मैंने भी दोस्तों के साथ खेलना, पेड़ों पर चढ़ना और खुले मैदान में दौड़-भाग करना किया है।

2. लेखक अपने बचपन में खेलने के लिए स्वयं गुल्ली बना लेते थे। आप कौन-कौन से खेल-खिलौने स्वयं बना लेते हैं? किसी एक को बनाकर कक्षा में लेकर आइए और अपने समूह के साथ मिलकर खेलिए।
Ans.
मैं कागज की नाव, पतंग और गेंद बनाना जानता हूँ।

3. अनेक बच्चे कपड़े धोने के लिए काम में आने वाली ‘थापी’ को बल्ले की तरह उपयोग कर लेते हैं। आप अपने घर या पास-पड़ोस की किन वस्तुओं को खेल-खिलौने की तरह उपयोग में लेते हैं?
Ans.
हम लकड़ी की डंडी, खाली बोतल और प्लास्टिक की गेंद को खेल-खिलौने की तरह उपयोग करते हैं।

4. लेखक बचपन में अनेक काम उत्साह से दौड़-दौड़कर किया करते थे। आप कौन-से काम बहुत उत्साह से करते हैं?
Ans.
मैं खेलना, चित्र बनाना, दोस्तों के साथ समय बिताना और नई चीजें सीखना बहुत उत्साह से करता हूँ।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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