नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)

नाभिकीय विखंडन के विपरीत नाभिकीय संलयन वह अभिक्रिया है जिसमें दो या अधिक हल्के नाभिक मिलकर एक भारी नाभिक बनाते हैं। इस अभिक्रिया में भी कुछ द्रव्यमान की क्षति होती है। फलस्वरुप अत्यधिक ऊर्जा विमुक्त होती है। उल्लेखनीय है कि नाभिकीय संलयन में नाभिकीय विखंडन से अधिक ऊर्जा विमुक्त होती है। सूर्य व तारों की ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन ही है।* नाभिकीय संलयन की क्रिया अति उच्च ताप (≈ 108 K ) व अति उच्च दाब पर ही संपन्न होती है। उदाहरणस्वरुप जब हाइड्रोजन के दो समस्थानिकों ड्यूटीरियम ( 1H2 ) व ट्राइटियम (1H3) को उच्च ताप ( approx 108 K ) व उच्च दाब पर संलयित कराते हैं दोनों संयुक्त होकर हीलियम नाभिक ( 2He4 ) एक न्यूट्रान ( 0n1 ) व लगभग 17.6 MeV ऊर्जा विमुक्त करते हैं। इस अभिक्रिया में द्रव्यमान में हुई कमी व विमुक्त ऊर्जा की गणना हम आइन्सटीन के द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता (E = m c2) से कर सकते हैं।

1H2 + 1H3  → 2He4 + 0n1 + 17.6MeV ऊर्जा

हाइड्रोजन बम का निर्माण भी नाभिकीय संलयन अभिक्रिया पर ही आधारित होता है। नाभिकीय संलयन से प्राप्त ऊर्जा को नियंत्रित करके अभी इसका कोई रचनात्मक उपयोग संभव नहीं हो सका है।

परमाणु बम (Atom Bomb)

नाभिकीय विखण्डन के सिद्धान्त पर निर्मित विस्फोटक को परमाणु बम या नाभिकीय बम कहते हैं। परमाणु बम को बनाने के लिए भारी नाभिक वाले परमाणुओं (प्रायः यूरेनियम 235 या प्लूटोनियम 239) का प्रयोग करते हैं। इसमें अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया कराई जाती है जिससे कुछ ही सेकेण्डों में प्रयुक्त संपूर्ण पदार्थ का क्षय हो जाता है और प्रचंड विस्फोट होता है जिससे असीम ऊर्जा निर्मुक्त होती है। इसका प्रभाव भयंकर विनाश के रूप में सामने आता है। प्रथम परमाणु बम राबर्ट ओपन हीमर ने 1945 ई० में बनाया था। विस्फोट के समय तीव्र चमक, हजारों वायुमण्डलीय दाब के बराबर दाब, व प्रचंड हवा का झोंका उत्पन्न हो जाता है। इस समय ताप 107°C तक पहुँच जाता है। इसके अलावा भारी मात्रा में रेडियो ऐक्टिव विकिरण वातावरण में फैल जाता है जिसके कारण लोग अंधे, लूले व लंगड़े हो जाते हैं तथा कई तरह के चर्म रोगों का शिकार हो जाते हैं। ये प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं व सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं।

परमाणु बम का प्रथम प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान पर किया गया था। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा नगर पर व 9 अगस्त 1945 को नागासाकी नगर पर परमाणु बमों का प्रयोग किया गया था जिसमें व्यापक तबाही का नजारा दुनिया देख चुकी है। इसका आनुवंशिक प्रभाव आज भी देखने को मिलता है जिसके प्रभावस्वरुप वहाँ आज भी विकलांग बच्चे पैदा होते हैं।

हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb)

नाभिकीय संलयन पर आधारित विस्फोटक को हाइड्रोजन बम कहते हैं। इसका अविष्कार एडवर्ड टेलर (USA) ने 1952 ई० में किया था। हाइड्रोजन बम का निर्माण हाइड्रोजन के समस्थानिकों ड्यूटीरियम ( 1H2 या D2 ) व ट्राइटियम ( 1H3 या T3 ) के नाभिकीय संलयन द्वारा किया जाता है। नाभिकीय संलयन के लिए आवश्यक ताप व दाब एक छोटे से परमाणु बम के विस्फोट द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

हाइड्रोजन बम की क्षमता, परमाणु बम की अपेक्षा होती है। हाइड्रोजन बम का प्रभाव क्षेत्र परमाणु बम से अधिक होता है परन्तु इसका प्रभाव परमाणु बम की अपेक्षा कम समय तक रहता है। अमेरिका, चीन, रुस, फ्रांस व ब्रिटेन ऐसे देश हैं जिन्होंने हाइड्रोजन बम का निर्माण कर लिया है। भारत में भी 11 मई 1998 को पोखरण (राजस्थान) में संलयन आधारित परमाणु परीक्षण (प्रथम संलयन परीक्षण) किया गया। तात्पर्य यह कि अब भारत भी हाइड्रोजन बम बनाने की क्षमता रखता है।

परमाणु भट्टी (Atomic Reactor)

परमाणु भट्टी एक ऐसी युक्ति (Technique) है जिसमें नाभिकीय विखण्डन के दौरान होने वाली श्रृंखला अभिक्रिया की दर को नियंत्रित कर के प्राप्त ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग किया जाता है। श्रृंखला अभिक्रिया के दौरान प्रत्येक नाभिक के विखण्डन से मुक्त होने वाले तीन न्यूट्रॉनों में से दो को रोक लिया जाता है। इसके लिए कैडमियम या बोरॉन की छड़ों (Rods) का प्रयोग किया जाता है। ये छड़ें तीन में से दो न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं। इन्हें नियंत्रक छड़ें (Controller Rods) कहते हैं। इस तरह एक ही न्यूट्रॉन क्रमशः आगे बढ़ पाता है और क्रमशः एक-एक परमाणु का ही विखण्डन होता है। न्यूट्रॉनों की गति को मंद (Slow) करने के लिए भारी जल (Heavy Water-D₂O) ग्रेफाइट या बेरीलियम आक्साइड का प्रयोग किया जाता है। इन्हें मंदक (Moderator) कहते हैं। भट्टियों में प्रशीतक (Coolent) के रूप में जल तथा कार्बन डाई आक्साइड का प्रयोग किया जाता है।

भारत में अधिकांश रियेक्टरों में मंदक के रूप में भारी जल (D₂O) का ही उपयोग किया जाता है। विखंडन से निकलने वाली ऊष्मीय ऊर्जा से पानी उबाल कर निकलने वाली भाप से टरबाइन चलाई जाती है जिससे विद्युत ऊर्जा का उत्पादन होता है। आज भारत में उत्पादित कुल विद्युत ऊर्जा का लगभग 3.0% इसी विधि से उत्पादित किया जा रहा है (समीक्षा अधिकारी 2013)। परमाणु भट्टी में विखण्डन के दौरान कई रेडियोधर्मी समस्थानिक भी बनते हैं जिनका कृषि, चिकित्सा, उद्योग व अनुसंधान आदि विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग होता है। प्रथम परमाणु भट्टी शिकागों विश्वविद्यालय (USA) में एनरिको फर्मी के नेतृत्व में बनाया गया था। संवर्धित यूरेनियम की कम उपलब्धता के कारण आजकल विकल्प के रूप में थोरियम व प्लूटोनियम का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जा रहा है। ज्ञातव्य है कि भारत में थोरियम के विशाल भण्डार हैं जिससे भविष्य में इसका प्रयोग बढ़ने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। प्रति इकाई थोरियम से प्रति इकाई यूरेनियम की अपेक्षा अधिक ऊर्जा (लगभग 250 गुना) प्राप्त होती है। साथ ही थोरियम के विखण्डन के पश्चात् प्राप्त अपशिष्ट भी कम रेडियोधर्मी होने के कारण पर्यावरणीय दृष्टि से भी अधिक अनुकूल है।

नाभिकीय विखण्डन के दौरान कई प्रकार की उच्चशक्ति व उच्च वेधन क्षमता युक्त रेडियोधर्मी किरणों का उत्सर्जन होता है। इनसे बचने के लिए रिऐक्टर के चारों ओर कंक्रीट की मोटी-मोटी दीवारें बनाई जाती हैं, जिन्हें परिरक्षक (Protector) कहा जाता है।

प्रजनक भट्टी (Breeder Reactor)

ऐसी परमाणु भट्टी जिसकी सहायता से अधिक विखण्डनीय पदार्थ उत्पन्न किया जाता है, ब्रीडर रिऐक्टर कहलाता है। उदाहरणस्वरुप यूरेनियम-238 से प्लूटोनियम-239 तथा थोरियम- 232 से यूरेनियम-233 प्राप्त किया जाता है। कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्द्र में कार्यरत फास्ट ब्रीडर रियेक्टर (FBR) से प्लूटोनियम से यूरेनियम उत्पादित किया जा रहा है।

सूर्य की ऊर्जा (Energy of Sun)

सूर्य व प्रकाशमान तारों की ऊर्जा का स्त्रोत वहाँ पर अनवरत चलने वाली नाभिकीय संलयन अभिक्रियाएँ ही हैं। यथा- सूर्य पर सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन (71%) है। सूर्य के क्रोड का तापमान लगभग 2 करोड़ डिग्री सेल्सियस है। इस ताप व उच्च दाब पर हाइड्रोजन के समस्थानिकों का संलयन होकर हीलियम नाभिक बनता है और ऊर्जा उत्पन्न होती है। एक ग्राम हाइड्रोजन समस्थानिकों के संलयन से लगभग 62 अरब जूल ऊर्जा का उत्पादन होता है। सूर्य जिस दर से आज ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहा है, उसी दर से लगभग एक हजार करोड़ वर्षों तक आगे भी करता रहेगा।

कार्बन समस्थानिक द्वारा काल निर्धारण (Carbon Dating)

किसी मृत जीव (पेड़-पौधे, जन्तु इत्यादि) की आयु कार्बन- 14 (6C14) समस्थानिक की सहायता से ज्ञात की जा सकती है।* जीवित अवस्था में जीव कार्बन तत्व ग्रहण करते रहते हैं जिसमें कार्बन का रेडियोधर्मी समस्थानिक (C14) भी अल्प मात्रा में उपस्थित होता है। जीव की मृत्यु के बाद वातावरण से कार्बन का अवशोषण बंद हो जाता है। परन्तु कार्बन-14 का विघटन जारी रहता है। कार्बन-14 की सक्रियता दर व उसकी बची मात्रा के आधार पर जीव के मृत होने का समय अर्थात् उसकी आयु ज्ञात कर ली जाती है।

यूरेनियम समस्थानिक द्वारा काल निर्धारण (Uranium Dating)

चट्टानों व अति प्राचीन निर्जीव पदार्थों की आयु उसमें उपस्थित रेडियोधर्मी यूरेनियम की सहायता से भी ज्ञात की जाती है।* इसकी सहायता से पृथ्वी व चंद्रमा की आयु ज्ञात की गई है जो कि लगभग समान (4.5 अरब वर्ष) ही है। इसका विकास अमेरिकन रसायन शास्त्री विलार्ड एफ० लिबी ने किया।

कृत्रिम रेडियो धर्मिता (Artificial Radioactivity)

किसी स्थाई नाभिक को कृत्रिम तरीके से अस्थाई नाभिक में बदलकर उसमें कृत्रिम रेडियो धर्मिता पैदा की जा सकती है। यह विचार सर्वप्रथम मेरी क्यूरी की पुत्री आइरिन क्यूरी व आइरिन क्यूरी के पति फ्रेडरिक जूलियट ने दिया। बाद में इस पर व्यापक शोधकार्य रदरफोर्ड ने किया। रदरफोर्ड ने तीव्र गति से गतिमान अल्फाकणों की नाइट्रोजन के नाभिक पर बमबारी करके ऑक्सीजन का रेडियोधर्मी समस्थानिक (8O17) प्राप्त किया।

7N14 + 2He4 →  8O17 + 1H1 (P+)

यह भी पढ़ें : परमाणु (Atom)

FAQs

Q1. भारत में संलयन पर आधारित प्रथम परमाणु परीक्षण कब व कहां किया गया?
Ans.
11 मई 1998 को पोखरण (राजस्थान) में।

Q2. भारत का प्रथम परमाणु संयंत्र कौन सा है?
Ans.
तारापुर परमाणु विद्युत संयंत्र, (मुंबई-1969 के कार्यरत)

Q3. रेडियम का आविष्कार किसने किया ?
Ans.
मैडम क्यूरी-(1898)

Q4. पर्यावरणीय दृष्टि से थोरियम, यूरेनियम की अपेक्षा अधिक उत्तम ऊर्जा स्रोत है। क्यों ?
Ans.
यह यूरेनियम की तुलना में कम नुकसानदेह अपशिष्ट देता है।

Q5. थोरियम का मुख्य स्रोत क्या है?
Ans.
मोनाजाइट।

Q6. भारत में थोरियम किन राज्यों में प्रचुरता में पाया जाता है?
Ans.
केरल,झारखंड, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व राजस्थान।

Q7. यूरेनियम व थोरियम में से कौन सा तत्व अधिक ऊर्जाक्षम है?
Ans.
थोरियम ।

Q8. परमाणु बम का सिद्धान्त आधारित है
Ans.
नाभिकीय विखण्डन की अनियंत्रित अभिक्रिया)

Q9. हाइड्रोजन बम का कार्यकारी सिद्धान्त है?
Ans.
ड्यूटीरियम का नाभिकीय संलयन की अनियंत्रित अभिक्रिया।

Q10. कलपक्कम (तमिलनाडु) स्थित परमाणु ऊर्जा संस्थान का क्या नाम है?
Ans.
इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च।

Q11. एटॉमिक मिनरल्स डाइरेक्टरेट फॉर एक्सप्लोरेशन एण्ड रिसर्च संस्थान कहां अवस्थित हैं?
Ans.
हैदराबाद

Q12. हरिश्चन्द्र रिसर्च इंस्टीट्यूट कहां अवस्थित है?
Ans.
इलाहाबाद

Q13. साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स कहां अवस्थित है?
Ans.
कोलकाता (प० बं०)

Q14. भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का जनक किसे माना जाता है?
Ans.
डॉ० होमी जहाँगीर भाभा को ।

Q15. प्रथम भारतीय नाभिकीय भट्टी का क्या नाम है?
Ans.
अप्सरा (4-अगस्त, 1956 से कार्यरत)

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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