अरुणाचल प्रदेश में चौखाम के मंडल कार्यालय में वल्लरी के पिताजी एक अधिकारी हैं। इस बार उन्होंने दिल्ली से अपने परिवार को भी अपने पास बुला लिया है। कहाँ दिल्ली की भीड़भरी सड़कें, हॉर्न बजाती हुई कारें और बसें, आदमियों की लंबी-लंबी कतारें और कहाँ चौखाम का खुला और शांत वातावरण। जिधर देखो, हरियाली ही हरियाली और फूल ही फूल। यहाँ के लोगों के मुखों पर सदैव मुस्कान बनी रहती है।
एक दिन वल्लरी को उसके मित्र चाऊतान ने अपने घर बुलाया। वल्लरी अपने पिताजी के साथ चाऊतान के घर गई। उस समय चाऊतान के पिताजी घर की सफाई कर रहे थे। वल्लरी और उसके पिताजी को देखकर उन्होंने सफाई का काम छोड़ दिया और उन दोनों का स्वागत किया।
चाऊतान की माताजी कई प्रकार के पकवान ले आईं। ये पकवान बहुत स्वादिष्ट थे। वल्लरी और उसके पिताजी पकवान खाने लगे। तभी वल्लरी ने देखा कि सड़क पर एक शोभायात्रा निकल रही है। शोभायात्रा में बहुत-से लोग थे। कुछ लोगों के कंधों पर पालकियाँ थीं। इन पालकियों में बड़ी-बड़ी और सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ रखी हुई थीं। शोभायात्रा में सब लोग नाचते-गाते हुए जा रहे थे। लोगों में बहुत उत्साह था।

वल्लरी ने चाऊतान से पूछा, “ये लोग कहाँ जा रहे हैं? बहुत प्रसन्न दिख रहे हैं।”
चाऊतान ने बताया, “अभी एक-दो दिन पहले ही हमारे गाँव के लोगों ने नदी के किनारे एक मंदिर बनाया है। ये लोग बौद्ध-विहार से भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ लाए हैं और इन्हें मंदिर ले जा रहे हैं। ये मूर्तियाँ तीन दिन तक उस मंदिर में रखी रहेंगी। गाँव के लोग इन मूर्तियों पर प्रतिदिन जल चढ़ाएँगे और इनकी पूजा करेंगे।”
“क्या हम लोग भी शोभायात्रा में सम्मिलित हो सकते हैं?” वल्लरी के पिताजी ने पूछा। “हाँ-हाँ, अवश्य। चलिए, हम सब शोभायात्रा में चलते हैं।” चाऊतान के पिताजी बोले। सब लोग शोभायात्रा में सम्मिलित हो गए। शोभायात्रा में लोग गाते-बजाते हुए और नाचते-कूदते हुए चले जा रहे थे। उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।
थोड़ी देर में शोभायात्रा मंदिर के पास पहुँची। मंदिर की जालीदार दीवारें बाँस और बाँस की खपच्चियों से बनी हुई थीं। बीच-बीच में पेड़ों की हरी-भरी टहनियाँ लगाई गई थीं और खोंस-खोंसकर उन पर रंग-बिरंगे फूल सजा दिए गए थे। इतना सादा और सुंदर मंदिर वल्लरी ने पहले कभी नहीं देखा था।
देखते-देखते भीड़ मंदिर के द्वार पर एकत्रित होने लगी। बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्र पढ़ते हुए इन मूर्तियों को पालकियों से उतारा और इन्हें मंदिर में रख दिया। अब वे इन मूर्तियों की पूजा करने लगे और इन पर जल चढ़ाने लगे।
हँसी-खुशी के इस वातावरण में वल्लरी ने देखा कि लोग एक-दूसरे पर बालटियाँ भर-भरकर पानी डाल रहे हैं। वे एक-दूसरे के चेहरों पर चावल का आटा भी लगा रहे हैं। वल्लरी को होली की याद आ गई। उसने चाऊतान से कहा, “चाऊतान भाई, लगता है कि लोग होली का त्योहार मना रहे हैं।” चाऊतान बोला, “तुम्हें मालूम नहीं, आज हमारे यहाँ साङकेन का त्योहार है। आज से हमारा नया वर्ष आरंभ होता है।”

वल्लरी ने बताया, “हमारे यहाँ भी होली से ही नया वर्ष आरंभ होता है। होली के दिन हम लोग भी एक-दूसरे के ऊपर रंगीन पानी फेंकते हैं और मुँह पर गुलाल लगाते हैं। होली के दूसरे दिन लोग एक-दूसरे से मिलने जाते हैं। उस दिन लोग घरों में कई प्रकार की मिठाइयाँ और नमकीन बनाते हैं और अतिथियों का स्वागत करते हैं।”
चाऊतान ने बताया, “आज शाम को हम लोग भी अपने ताऊजी के यहाँ जाएँगे। हमारी ताईजी ने भी विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए होंगे। हम उन्हें प्रणाम करेंगे। वे हमें आशीर्वाद देंगे। कल मेरी बुआजी और मेरे फूफाजी भी हमारे यहाँ आएँगे।”
इतने में किसी ने वल्लरी और उसके पिताजी पर एक बालटी पानी डाल दिया। वे भीग गए। फिर तो लोग बहुत देर तक एक-दूसरे पर पानी डालते रहे और साङकेन मनाते रहे।
“तीन दिन तक इसी तरह साङकेन मनाया जाता है।” चाऊतान ने बताया। “तीसरे दिन बौद्ध भिक्षु इन मूर्तियों को पुनः पालकियों में रखकर बौद्ध-विहार ले जाएँगे। वहाँ वे मंत्र पढ़-पढ़कर इन मूर्तियों को इनके स्थान पर रख देंगे।”
चाऊतान के पिताजी ने बताया, “गाँव के लोग फिर बौद्ध-विहार जाएँगे और भिक्षुओं को बार-बार दंडवत प्रणाम करेंगे। भिक्षु लोग हमें आशीर्वाद देंगे –
“खेती फूले-फले तुम्हारी तुम्हें न हो कोई बीमारी। हिल-मिलकर सब नाचें-गाएँ, नए साल में खुशी मनाएँ।”

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बातचीत के लिए
1. त्योहारों पर घरों में कई प्रकार की मिठाइयाँ और नमकीन बनाई जाती हैं। आपको कौन-सी मिठाइयाँ और नमकीन अच्छी लगती हैं? वे किस त्योहार पर बनाई जाती हैं?
Ans. मुझे लड्डू, गुजिया और रसगुल्ला मिठाइयों में अच्छे लगते हैं। नमकीन में नमकपारे और चकली पसंद हैं। गुजिया होली पर, लड्डू दीपावली पर और नमकपारे होली व दीपावली दोनों त्योहारों पर बनाए जाते हैं।
2. आप कौन-से त्योहार मनाते हैं? उनमें और साङकेन में कौन-कौन सी समानताएँ हैं?
Ans. मैं होली, दीपावली, दशहरा और रक्षाबंधन मनाता/मनाती हूँ। होली और साङकेन में समानता यह है कि दोनों में नया वर्ष आरंभ होता है, लोग प्रसन्न रहते हैं, एक-दूसरे पर पानी डालते हैं और मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं।
3. हमारे देश में अनेक अवसरों पर शोभायात्राएँ (जुलूस) निकाली जाती हैं। आपने कौन-कौन सी शोभायात्राएँ देखी हैं? उनके बारे में अपने अनुभव बताइए।
Ans. मैंने गणेश चतुर्थी, रामनवमी और दुर्गा पूजा की शोभायात्राएँ देखी हैं। शोभायात्राओं में लोग भजन-कीर्तन करते हैं, मूर्तियाँ सजाकर निकाली जाती हैं और वातावरण बहुत उत्साहपूर्ण होता है।
4. आप नया वर्ष कब और कैसे मनाते हैं?
Ans. मैं नया वर्ष 1 जनवरी और होली के समय मनाता/मनाती हूँ। इस दिन हम एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और घर में मिठाइयाँ बनती हैं।
पाठ से
प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सामने तारे का चिह्न (*) बनाइए –
1. साङकेन क्यों मनाया जाता है?
(क) दीपावली पर्व के कारण
(ख) नव वर्ष प्रारंभ होने के उपलक्ष्य में (*)
(ग) नए मंदिर के उद्घाटन की प्रसन्नता में
(घ) बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर
2. भगवान बुद्ध का मंदिर कहाँ बना हुआ था?
(क) चिकित्सालय के पास
(ख) सरोवर के किनारे
(ग) नदी के किनारे (*)
(घ) समुद्र के किनारे
3. लोग बहुत देर तक एक-दूसरे पर पानी डालते रहे क्योंकि –
(क) उन्हें गरमी लग रही थी।
(ख) वे स्नान कर रहे थे।
(ग) वे गंदे हो गए थे।
(घ) वे साङकेन मना रहे थे। (*)
4. “यहाँ के लोगों के मुखों पर सदैव मुस्कान बनी रहती है।” इस वाक्य का क्या अर्थ है?
(क) यहाँ के लोग सदैव प्रसन्न रहते हैं। (*)
(ख) यहाँ के लोग सदैव प्रसन्न रहने का अभिनय करते हैं।
(ग) यहाँ के लोगों को खेलना-कूदना अच्छा लगता है।
(घ) यहाँ के लोगों को नाचना-गाना अच्छा लगता है।
पाठ से
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए –
(क) साडकेन का त्योहार मनाते समय वल्लरी को होली की याद क्यों आई?
Ans. वल्लरी को होली की याद इसलिए आई क्योंकि साङकेन में भी लोग एक-दूसरे पर पानी डाल रहे थे और प्रसन्नता से त्योहार मना रहे थे, जैसे होली में किया जाता है।
(ख) वल्लरी को चौखाम और दिल्ली में क्या अंतर लगा?
Ans. वल्लरी को दिल्ली में भीड़-भाड़, शोर और भागदौड़ दिखी, जबकि चौखाम में शांति, खुला वातावरण, हरियाली और लोगों के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी।
(ग) मंदिर की सजावट कैसे की गई थी?
Ans. मंदिर की दीवारें बाँस और बाँस की खपच्चियों से बनी थीं। उनमें हरी-भरी टहनियाँ और रंग-बिरंगे फूल लगाए गए थे। मंदिर बहुत सादा और सुंदर था।
(घ) आपको कौन-कौन आशीर्वाद देते हैं? वे क्या आशीर्वाद देते हैं?
Ans. मुझे माता-पिता, दादा-दादी और गुरुजन आशीर्वाद देते हैं। वे मुझे स्वस्थ रहने, पढ़ाई में आगे बढ़ने और सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
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