जिन यांत्रिक तरंगों (Mechanical Waves) की आवृत्ति (Frequency) लगभग 20 हर्ट्ज (Hz) से 20 किलो हर्ट्ज (KHz) के बीच होती है, उनकी अनुभूति (Feeling) हमें अपने कानों (Ears) द्वारा होती है, और हम उन्हें ध्वनि (Sound) की संज्ञा से अभिहित करते हैं। जिन यांत्रिक तरंगों की आवृत्ति इस सीमा (Range) से बाहर होती है, उनके लिए हमारे कान सुग्राही नहीं होते। अतः हमें उनसे ध्वनि की अनुभूति नहीं होती। ध्वनि शब्द का प्रयोग प्रायः उन्हीं यांत्रिक तरंगों के लिए किया जाता है जिनकी अनुभूति हमें अपने कानों द्वारा होती है। भिन्न-भिन्न मनुष्यों व जीवों हेतु ध्वनितरंगों की आवृत्ति परिसर (Range of Frequency) भिन्न-भिन्न हो सकती है।
ध्वनि की उत्पत्ति (Production of Sound)
किसी माध्यम में विक्षोभ (Distrubance) द्वारा ध्वनि उत्पन्न होती है। विक्षोभ (Disturbance) उत्पन्न करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं।
जैसे- किसी छड़ (Rod) को ठोकने से, किसी खिंचे तार (Tight String) को किसी वस्तु से कंपित (Vibrate) कराने से तथा वायु स्तम्भ के सिरे पर फूंक कर दाब उत्पन्न करने से इत्यादि। इस विक्षोभ के उत्पन्न होने पर माध्यम में अनुप्रस्थ (Transverse) या अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। यदि इनकी आवृत्ति श्रव्यता परिसर (20 Hz-20KHz) में हो तो इनसे ध्वनि उत्पन्न हो जाती है। कंपन करने वाली वस्तु ही ध्वनि का स्रोत (Source of Sound) होती है। विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों (Musical Instruments) तथा द्विभुज (Tuning Fork) को गद्दी (Pad) पर ठोंकने से ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है। हमारे गले में ध्वनि उत्पादक अंग से वायु गुजरने पर विशेष स्नायुओं के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। विद्यालय की घंटी (Bell) बजाकर बाद में उसे स्पर्श करने पर घंटी के कंपन का स्पष्ट अनुभव होता है। स्पर्श करने पर कंपन बंद हो जाता है और ध्वनि भी रुक जाती है। इससे सिद्ध होता है कि
किसी वस्तु के कंपन से ही ध्वनि की उत्पत्ति होती है। ध्वनि का संचरण (Transmission) भी किसी पदार्थ के कणों के दोलन (Oscillation) के द्वारा होता है। वायु अथवा गैसों
में ध्वनि का संचरण केवल अनुदैर्ध्य तरंगों (Longitudinal Waves) के रूप में ही संभव है जबकि ठोसों एवं द्रवों में अनुप्रस्थ (Transverse) तथा अनुदैर्ध्य (Longitude) दोनों ही प्रकार की तरंगों द्वारा ध्वनि-ऊर्जा का संचरण संभव है।*
चूंकि माध्यम के क्रमागत कणों के दोलन से ही ऊर्जा का संचरण एक स्थान से दूसरे स्थान को होता है। अतः निर्वात् में इन यांत्रिक तरंगों के कारण ध्वनि का संचरण संभव नहीं, द्रव्य या पदार्थ, जिससे होकर ध्वनि संचरित होती है। माध्यम कहलाता है। यह ठोस, द्रव या गैस हो सकता है। स्रोत से उत्पन्न होकर ध्वनि सुनने वाले तक किसी माध्यम से होकर पहुँचती है। कंपन करने वाली वस्तु अपने निकटवर्ती कणों को भी कंपमान कर देती है। ये कण कंपमान वस्तु से हमारे कानों तक, स्वयं गति कर नहीं पहुँचते। सबसे पहले कंपमान वस्तु के संपर्क में रहने वाले माध्यम के कण अपनी संतुलित अवस्था से विस्थापित होते हैं। ये अपने निकटतम कणों पर एक बल लगाते हैं जिसके फलस्वरूप निकटवर्ती कण अपनी विरामावस्था से विस्थापित हो जाते हैं। निकटवर्ती कणों को विस्थापित करने के पश्चात प्रारंभिक कण अपनी मूल अवस्थाओं में वापस लौट आती हैं। माध्यम में यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि ध्वनि कानों तक नहीं पहुँच जाती। इस प्रकार माध्यम में ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ (न कि माध्यम के कण) माध्यम से होता हुआ संचरित होता है।
ध्वनि तरंगों का अभिग्रहण (Reception of Sound Waves)
सामान्यतः, हमें ध्वनि की अनुभूति वायु (Air) के माध्यम से होती है। जब वायु में दोलन करने वाले कण हमारे कान के पर्दे से टकराते हैं तो पर्दे में भी इसी प्रकार के दोलन उत्पन्न हो जाते हैं। ये दोलन कान की विशेष अस्थियों (Bones) के दोलन (कंपन) द्वारा भीतर के संवेदनशील अंगों (sensitive organs) तक पहुँचते हैं। इनसे हमें ध्वनि का अनुभव मष्तिष्क द्वारा होता है।
ध्वनि की चाल (Speed of Sound)
विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल भिन्न-भिन्न होती है। यह मुख्यतः माध्यम की प्रत्यास्थता के कारण ही विक्षोभ एक कण से दूसरे कण को संचारित होता है। कोई माध्यम जितना ही प्रत्यास्थ (Elastic) होगा ध्वनि की चाल उसमें उतनी ही अधिक होगी।
इसके विपरीत, अधिक घनत्व (Density) के माध्यम में ध्वनि की चाल कम होती है। ठोसों एवं धातुओं (Metals) की उच्च प्रत्यास्थता
के कारण ही ध्वनि की चाल धातुओं में बहुत अधिक होती है। द्रवों में ध्वनि की चाल गैसों के सापेक्ष अधिक तथा ठोसों के सापेक्ष कम होती है। माध्यम प्रत्यास्थ के साथ-साथ अविच्छिन्न (continuous) भी होना चाहिए अर्थात् ध्वनि स्रोत से लगातार कानों (ears) तक फैला होना चाहिए। गीली मिट्टी, लकड़ी का बुरादा, नमक इत्यादि में प्रत्यास्थता का गुण न के बराबर होता इसलिए इनसे ध्वनि का संचरण भी नहीं होता। सर्वप्रथम न्यूटन ने किसी माध्यम में अनुदैर्ध्य तरंगों की चाल ज्ञात करने का सूत्र दिया। न्यूटन के अनुसार-
(i) किसी विस्तृत ठोस में अनुदैर्ध्य तरंगों की चाल
v = √{(B + (4/3)η/d)}
जहां, B = ठोस का आयतन प्रत्यास्थता गुणांक
η = ठोस का दृढ़ता गुणांक
d = ठोस का घनत्व
(ii) यदि ठोस एक लंबे छड़ (Rod) के रूप में हो तो-
v = √(y/d)
जहां y = ठोस का यंग प्रत्यास्थता गुणांक व d = ठोस का घनत्व है।
(iii) द्रवों में तरंगों की चाल (v)-
v = √(B / d)
जहाँ, B = द्रव का आयतनात्मक प्रत्यास्थता गुणांक व
d = द्रव का घनत्व है।
(iv) गैसों में यांत्रिक तरंगों की चाल-
v= √B/a = √P/d
जहाँ, B = गैस का आयतन प्रत्यास्थता गुणांक,
P = गैस का दाब, व
d = गैस का घनत्व है।
➤ लाप्लास का संशोधन (Laplace’s Correction)
न्यूटन ने यह माना था कि जब अनुदैर्ध्य तरंगें किसी गैस में संचरित होती हैं तो गैस का ताप स्थिर रहता है। इस पर लाप्लास ने संशोधन किया व बताया कि जब किसी गैस में ध्वनि तरंगें चलती हैं तो गैस का तापमान स्थिर नहीं रहता है बल्कि परिवर्तित होता है। संपीडन (Compression) की जगह ताप बढ़ता है व विरलन (rarer) की जगह ताप कम होता है। अतः लाप्लास ने उक्त सूत्र में गैस के आयतन प्रत्यास्थता गुणांक की जगह रुद्धोष्म आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (adiabatic bulk modulus) प्रतिस्थापित कर दिया।
➤ हाइगेन्स का द्वितीयक तरंगिका का सिद्धान्त (Secondary Waves Theory of Hygens)
हाइगेन्स ने किसी माध्यम में तरंगों के संचरण की व्याख्या करने के लिए एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे हाइगेन्स का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धान्त कहते हैं। यथा-
(i) जब किसी माध्यम में स्थित तरंग-स्रोत से तरंगें निकलती हैं, तो तरंग स्रोत के चारों ओर स्थित माध्यम के कण कंपन करने लगते हैं। माध्यम में वह पृष्ठ जिसमें स्थित सभी कण समान कला में कंपन करते हैं, तरंगाग्र कहलाते है।
(ii) तरंगाय (Wave front) पर स्थित माध्यम का प्रत्येक कण एक नये तरंग स्त्रोत का कार्य करता है जिससे नई तरंगें सभी दिशाओं में निकलती हैं। इन नई तरंगों को द्वितीयक तरंगिकाएँ (secondary waves) कहते हैं। माध्यम में द्वितीयक तरंगिकाएँ उसी चाल से आगे की ओर बढ़ती हैं जिस चाल से प्राथमिक तरंगें आगे बढ़ती हैं।
➤ ध्वनि की चाल पर कारकों का प्रभाव
(i) दाब का प्रभाव (Effect of Pressure)- यदि गैस का ताप नियत रहे तो ध्वनि की चाल पर दाब परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
(ii) ताप का प्रभाव (Effect of Temperature)- किसी गैस में ध्वनि की चाल गैस के परमताप के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होती है। 1°सेल्सियस ताप बढ़ने से वायु में ध्वनि की चाल लगभग 0.61 मीटर/सेकेण्ड बढ़ जाती है।
जहाँ Vt, t°c पर वायु में ध्वनि की चाल हैं।
Vt = 332 + 0.61t
(iii) वायु की गति का प्रभाव (Effect of Motion of Air)- यदि हवा चल रही है तो ध्वनि की चाल भी बदल जाती है। यदि ध्वनि की चाल तथा वायु की चाल w हो तो वायु की दिशा में ध्वनि की चाल (v + w) तथा हवा की विपरीत दिशा में ध्वनि की चाल (v – w) होगी।
(iv) घनत्व का प्रभाव (Effect of Density)- गैसों (वायु) का घनत्व बढ़ने पर उसमें ध्वनि की चाल कम हो जाती है। इसी कारण आर्द्र मौसम में आवाज दूर तक जाती है तथा शुष्क मौसम में कम दूर। क्योंकि आर्द्रता बढ़ने पर वायुमण्डल का घनत्व घटता है तथा आर्द्रता घटने पर वायु का घनत्व बढ़ता है। इसी कारण वर्षा ऋतु में ट्रेन की सीटी की आवाज अपेक्षाकृत दूर तक सुनी जाती है।
(v) आवृत्ति का प्रभाव (Effect of Frequency)- ध्वनि की चाल पर आवृत्ति का प्रभाव नहीं पड़ता। विभिन्न आवृत्तियों की ध्वनि-तरंगें वायु में एक ही चाल से चलती हैं। यदि वायु में ध्वनि की चाल ध्वनि की आवृत्ति पर निर्भर करती तो किसी संगीत कार्यक्रम में विभिन्न वाद्ययत्रों से निकली संगीत धुनें हमें आनंदित न कर पातीं।*
उल्लेखनीय है कि ध्वनि तरंगों के एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करने पर ध्वनि की चाल तथा तरंग दैर्ध्य परिवर्तित हो जाते हैं परन्तु आवृत्ति वही रहती है।*
विभिन्न गैसों में ध्वनि की चाल (Speed of Sound in Different Gasses)
विभिन्न गैसों में ध्वनि की चाले गैसों के घनत्त्रों अथवा अणुभारों के वर्ग मूल के व्युत्क्रमानुपाती होती हैं।
v∝ 1/(√d) या v∝ 1/(√m)
विभिन्न माध्यम में ध्वनि की चाल | |||
अवस्था | पदार्थ/माध्यम | चाल 25°C पर | चाल 0°C पर |
ठोस | ऐलुमिनियम निकिल स्टील लोहा पारा काँच (फ्लिट) | 6420 मी०/से० 6040 मी०/से० 5960 मी०/से० 5950 मी०/से० 3980 मी०/से० | 6420 m/s 5130 m/s 1450 m/s 5640 m/s |
द्रव | जल (समुद्री) जल (आसुत) इथेनाल | 1531 मी०/से० 1498 मी०/से० 1207 मी०/से० | 1533 m/s 1493 m/s 1213 m/s |
गैस | हाइड्रोजन हीलियम वायु (air) आक्सीजन | 1284 मी०/से० 965 मी०/से० 346 मी०/से० 316 मी०/से० | 1269 m/s 332 m/s |
ध्वनि तरंगों के अभिलक्षण (Characteristics of Sound)
कुछ ध्वनियाँ कर्ण प्रिय या संगीतमय (Musical) होती है; कुछ सामान्य होती हैं व कुछ अप्रिय (Irrtating)। इनका निर्धारण निम्नलिखित तीन अभिलक्षणों से होता है-
(i) तीव्रता ( Intensity)- तीव्रता ध्वनि का वह अभिलक्षण है, जिसके कारण हमें कोई ध्वनि तीव्र (Loud), या मंद (Slow) महसूस होती है। इसका संबंध ध्वनि तरंग के आयाम (Amplitude) से होता है। यदि हम किसी मेज पर धीरे से चोट (strik) करें तो हमें एक मृदु ध्वनि सुनाई देती है क्योंकि इससे कम ऊर्जा की ध्वनि तरंग उत्पन्न होती है। विपरीतः यदि हम मेज पर जोर से चोट करें तो हमें प्रबल ध्वनि सुनाई देती है क्योंकि यह अधिक ऊर्जा की ध्वनि तरंग उत्पन्न करती है। आयाम (Amplitude) जितना ही अधिक होता है ध्वनि की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होती है। स्रोत से दूर जाने पर इसका आयाम तथा प्रबलता दोनों ही क्रमशः कम होते जाते हैं। माध्यम के किसी बिन्दु पर ध्वनि की तीव्रता, उसके इकाई क्षेत्रफल से प्रति सेकेण्ड तल के लंबवत (Perpendicular) गुजरने वाली ऊर्जा के बराबर होती है। इसका SI मात्रक माइक्रोवाट प्रति वर्गमीटर तथा व्यावहारिक मात्रक बेल (Bell) है। ज्ञातव्य है कि बेल के 10वें भाग को डेसीबल कहते हैं। ध्वनि की तीव्रता स्रोत की शक्ति (Power); श्रोता व स्रोत के बीच की दूरी तथा चारों तरफ के माध्यमों (फर्श, दीवार व छत आदि) से होने वाले परावर्तनों पर निर्भर करती है। ध्वनि की तीव्रता श्रोत से स्त्रोता की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है (यदि बीच के माध्यम में अवशोषण व परावर्तन शून्य हो)। इसके अलावा ध्वनि की तीव्रता ध्वनि के आयाम (amplitude) व ध्वनि के आवृत्ति (frequency) के अनुक्रमानुपाती होती है।* कोई स्रोत जितने बड़े आकार का होता है उससे उत्पादित ध्वनि का आयाम उतना ही अधिक होता है, फलस्वरूप तीव्रता भी उतनी ही अधिक होती है। यही कारण है कि घण्टा (bell) जितना ही बड़ा होता है उसके ध्वनि की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होती है। अनुनाद के कारण भी ध्वनि की प्रबलता बढ़ जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 45 डेसीबल तीव्रता की ध्वनि को सर्वोपयुक्त तथा 75 डेसीबल से अधिक की ध्वनि का मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना है। 85 डेसीबल की ध्वनि शोर (Noise) में बदल जाती है और 85 या अधिक तीव्रता की ध्वनि में रहने पर व्यक्ति बहरा हो सकता है तथा 150 डेसीबल या अधिक की ध्वनि व्यक्ति को पागल भी बना सकती है।
(ii) सुर (Pitch)- सुर, ध्वनि का वह लक्षण है, जिससे ध्वनि को मोटा (grave) या तीक्ष्ण (Shrill) कहा जाता है। सुर, जिसे तारत्व भी कहा जाता है, आवृत्ति (frequency) पर निर्भर करती है।* जब ध्वनि की आवृत्ति बढ़ती है, तो ध्वनि का तारत्व अर्थात् सुर भी बढ़ता है। फलतः ध्वनि पतली व तीक्ष्ण हो जाती है। इस प्रकार कर्कश ध्वनि उच्च आवृत्ति वाले स्रोत से उत्पन्न होती है जबकि पतली ध्वनि कम आवृत्ति वाले स्रोत से। बच्चों, स्त्रियों एवं चिड़ियों की आवाज पतली, तारत्व अधिक होने के कारण ही होती है।* पुरुषों की आवाज मोटी, तारत्व कम होने के कारण होती है। मच्छरों की भनभनाहट, अधिक तारत्व की ध्वनियों के उदाहरण हैं।* ध्यातव्य है कि ध्वनि के तारत्व का ध्वनि की तीव्रता (Intensity) से कोई सरोकार नहीं है। अधिक तीव्र ध्वनि का तारत्व कम अथवा अधिक कुछ भी हो सकता है। जैसे सिंह की दहाड़ एक प्रबल ध्वनि है, किन्तु इसका तारत्व बहुत कम होता है,* जबकि मच्छर की भनभनाहट एक धीमी ध्वनि है किन्तु इसका तारत्व सिंह की दहाड़ से ज्यादा होता है।*
सारणी: विभिन्न ध्वनि स्त्रोतों की तीव्रता | |
ध्वनिस्त्रोत | तीव्रता (डेसीबल में) |
• फुसफुसाहट | 15-20 |
• सामान्य वार्तालाप | 30-60 |
• जोर से बातचीत | 60-70 |
• गुस्से में बातचीत | 70-80 |
• ट्रक, ट्रैक्टर | 90-100 |
• यंत्र कारखाने | 100-110 |
• आर्केस्ट्रा | 110-120 |
• जेट विमान | 140-150 |
• मशीनगन | 150-160 |
• मिशाइल व राकेट | 160-170 |
(iii) गुणता (Quality or Timbre)- ध्वनि की ‘गुणता’ वह अभिलक्षण है जो हमें समान तारत्व (pitch) तथा तीव्रता (intensity) की दो ध्वनियों में अंतर करने में सहायता करता है। एकल आवृत्ति की ध्वनि को टोन (tone) कहते हैं तथा अनेक आवृत्तियों के मिश्रण से उत्पन्न ध्वनि को स्वर (note) कहते हैं और यह सुनने में सुखद होती है। यही संगीत की कर्णप्रियता का कारण होता है। भिन्न-भिन्न ध्वनि स्रोतों से निकलने वाली ध्वनियों की भिन्न गुणता के कारण ही हम उनके समान प्रबलता व तारत्व का होने के बावजूद सुनकर अन्तर कर लेते हैं। * परिचितों की आवाज सुनकर ही जान लेते हैं कि बोलने वाला व्यक्ति कौन है।
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