बहुत समय पहले की बात है। उत्तर भारत के एक सुंदर सरोवर में तीन मछलियाँ रहती थीं जिनमें गाढ़ी मित्रता थी। तीनों मछलियाँ सरोवर की अन्य मछलियों के साथ मिल-जुलकर विनोद और सैर करती रहती थीं। इनमें से पहली मछली का नाम था अनागतविधाता। वह बहुत बुद्धिमती थी और अपने नाम के अनुसार भविष्य की संभावित समस्याओं का हल पहले से ही निकालकर रखती थी। दूसरी मछली का नाम था प्रत्युत्पन्नमति। जैसा उसका नाम था वैसी ही तीक्ष्ण और तीव्र उसकी बुद्धि थी। वह भविष्य की किसी भी आशंकित समस्या का पहले से समाधान करने की आवश्यकता नहीं समझती थी क्योंकि उसकी सूझ-बूझ इतनी पैनी थी कि वह समय पड़ने पर किसी भी उलझन का हल क्षण भर में निकाल लेती थी। तीसरी मछली का नाम था यद्भविष्य। अपने नाम के अर्थ को वह भी सार्थक करती थी। वह किसी भी संकट की संभावना पर ध्यान नहीं देती थी तथा श्रम और चिंतन से बचती थी। उसका मत था कि यत्न करने और सोचने-विचारने से कोई लाभ नहीं क्योंकि ‘जो होना होगा सो तो होगा ही’ इसलिए सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देना चाहिए और निश्चिंत होकर आनंद से रहना चाहिए।

एक दिन शाम के समय उस सरोवर के किनारे से अकस्मात् दो मछुआरे निकल रहे थे। उन मछुआरों ने यह सरोवर पहले कभी नहीं देखा था। इतना रमणीय स्थान देखकर वे सरोवर के किनारे विश्राम करने बैठ गए। क्षण भर में उनका ध्यान पानी में सैर करती हुई मछलियों पर गया। “अरे! देखो इस सरोवर में कितनी ड़ी-बड़ी मछलियाँ हैं” पहला मछुआरा बोला। “हाँ, हाँ, और इतनी सारी मछलियाँ एक ही जगह हमने पहले कभी नहीं देखीं” दूसरा मछुआरा बोला। पहले मछुआरे ने फिर कहा, “भाई कल सवेरे हम यहाँ बड़ा जाल लेकर आएँगे और इन सब मछलियों को पकड़ेंगे।” “ठीक है” दूसरे मछुआरे ने सहर्ष सम्मति दिखाई और दोनों मछुआरे उत्साह से उठकर घर की ओर चल दिए।
मछुआरों की बातें तीनों मछलियों ने सुन लीं। उन्होंने तुरंत सरोवर की सभी मछलियों को बुलाकर एक सभा की। अनागतविधाता ने सब मछलियों को संबोधित करके बताया कि दो मछुआरे अगले दिन सवेरे सरोवर पर जाल डालकर सब मछलियों को पकड़ने की योजना बना रहे हैं। यह सुनकर सब मछलियाँ भयभीत हो गईं और पूछने लगीं कि क्या करना चाहिए। अनागतविधाता ने कहा कि इस संकट से बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि सवेरा होने से पहले हम सब यह सरोवर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चले जाएँ।

इस पर प्रत्युत्पन्नमति ने कहा कि मैं तो यहीं रहूँगी और यदि मछुआरे आएँगे तो उस समय की परिस्थिति देखकर कुछ उपाय ढूँढ़ लूँगी। यद्भविष्य तो स्वभाव से ही आलस्यमयी थी। वह कहने लगी कि मैं तो अपने इस पुराने निवास स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी। भाग्य में जो लिखा होगा वही होगा, मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यदि भाग्य में बचना लिखा होगा तो हम सब बच ही जाएँगे। हो सकता है मछुआरे आएँ ही नहीं। इसके पश्चात अनागतविधाता और बहुत-सी मछलियाँ घर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चली गईं। प्रत्युत्पन्नमति, यद्भविष्य और कुछ अन्य मछलियाँ जो यद्भविष्य की राय से सहमत थीं, वहीं रहीं।

जब सवेरा हुआ तो सरोवर की मछलियाँ मना रहीं थीं कि कदाचित् मछुआरे नहीं आएँगे। परंतु थोड़ी ही देर में मछुआरों की ध्वनियाँ सुनाई पड़ीं और उन्होंने आकर जाल डाल दिया और सभी मछलियों को पकड़ लिया। प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य भी जाल में फँस गई थीं। मछुआरे बड़े प्रसन्न थे कि इतनी स्वस्थ और बड़ी-बड़ी मछलियाँ उन्होंने पकड़ ली हैं।
अब प्रत्युत्पन्नमति अपने बचने का उपाय बड़ी तीव्रता से सोचने लगी और उसे तुरंत सूझ गया कि क्या करना चाहिए। मछुआरों की बातचीत से वह समझ गई कि उन्हें स्वस्थ और जीवित मछलियाँ ही चाहिए। उसने उसी क्षण अपना शरीर सिकोड़ लिया और आँखें बंद करके निर्जीव सी बनकर पड़ गई। मछुआरे मछलियों को सँभालने लगे तो देखा कि एक मरी हुई मछली है। उन्होंने तुरंत प्रत्युत्पन्नमति को जाल से निकालकर सरोवर में फेंक दिया और अपनी प्रत्युत्पन्न बुद्धि के कारण उसकी जान बच गई। पर यद्भविष्य की जान नहीं बच सकी और मछुआरे उसे और उसकी साथी मछलियों को लेकर चलते बने।

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बातचीत के लिए
1. क्या आपने कभी नदी, पोखर या समुद्र तट का भ्रमण किया है? आपने वहाँ क्या-क्या देखा?
Ans. हाँ, मैंने नदी/पोखर का भ्रमण किया है। वहाँ मैंने बहता हुआ जल, तैरती मछलियाँ, किनारे बैठे पक्षी, नावें और आसपास की हरियाली देखी। वातावरण बहुत शांत और सुंदर था।
2. क्या किसी कार्य को भाग्य के भरोसे छोड़ना चाहिए? अपने उत्तर का कारण दीजिए।
Ans. नहीं, किसी कार्य को केवल भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। हमें अपनी बुद्धि, परिश्रम और सूझ-बूझ से प्रयास करना चाहिए। भाग्य उन्हीं का साथ देता है जो स्वयं प्रयत्न करते हैं।
3. यद्भविष्य मछुआरों से अपने प्राण नहीं बचा पाई। यदि उसके स्थान पर आप होते तो मछुआरों से अपने प्राण कैसे बचाते?
Ans. यदि मैं यद्भविष्य के स्थान पर होता तो या तो पहले ही सरोवर छोड़ देता या फिर प्रत्युत्पन्नमति की तरह कोई चतुराई अपनाकर अपने प्राण बचाने का प्रयास करता।
4. आपको कौन-सी मछली सबसे अच्छी लगी और क्यों?
Ans. मुझे प्रत्युत्पन्नमति सबसे अच्छी लगी क्योंकि उसने अपनी बुद्धि और सूझ-बूझ से संकट के समय अपनी जान बचा ली।
पाठ से
1. निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर पर मछली का चित्र (🐡) बनाइए। एक से अधिक विकल्प भी सही हो सकते हैं।
(क) अनागतविधाता को बहुत बुद्धिमती किस कारण से बताया गया है?
(i) नाम के अनुरूप स्वभाव होने के कारण (🐡)
(ii) सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देने और चिंता न करने के कारण
(iii) भविष्य की संभावित समस्याओं का हल पहले से ही निकाल लेने के कारण (🐡)
(iv) श्रम और चिंतन से बचने की प्रवृत्ति के कारण
(ख) मछुआरों की बातें सुनकर सभी मछलियों ने सभा क्यों की?
(i) गप-शप के लिए
(ii) अपने प्राण बचाने हेतु कोई उपाय ढूँढ़ने के लिए (🐡)
(iii) मछुआरों को अपने जाल में फँसाने के लिए
(iv) पास के दूसरे सरोवर में जाने के लिए
(ग) मछुआरों ने प्रत्युत्पन्नमति को जाल में से बाहर क्यों फेंक दिया?
(i) उन्हें जीवित मछलियाँ चाहिए थीं। (🐡)
(ii) उन्हें प्रत्युत्पन्नमति सुंदर नहीं लगी।
(iii) जाल में बहुत अधिक मछलियाँ थीं।
(iv) उनसे जाल उठाया नहीं जा रहा था।
(घ) मछुआरों के जाल में कौन-कौन सी मछलियाँ फँस गईं?
(i) अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और अन्य सभी बड़ी-बड़ी मछलियाँ
(ii) प्रत्युत्पन्नमति, यद्भविष्य और अन्य सभी बड़ी-बड़ी मछलियाँ (🐡)
(iii) अनागतविधाता और अन्य सभी बड़ी-बड़ी मछलियाँ
(iv) प्रत्युत्पन्नमति, यद्भविष्य और अनागतविधाता
सोचिए और लिखिए
1. प्रत्युत्पन्नमति पहले से ही समस्या का समाधान करने की आवश्यकता क्यों नहीं समझती थी?
Ans. क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत तेज थी और वह विश्वास करती थी कि वह संकट आने पर तुरंत उपाय सोच सकती है।
2. सभी मछलियों के भयभीत होने का क्या कारण था?
Ans. मछुआरों द्वारा जाल डालकर सभी मछलियों को पकड़ने की योजना सुनकर सभी मछलियाँ भयभीत हो गईं।
3. ‘जो होना होगा सो तो होगा ही’, यह किस मछली का मानना या और वह ऐसा क्यों मानती थी?
Ans. यह यद्भविष्य मछली का मानना था क्योंकि वह आलसी थी और सब कुछ भाग्य पर छोड़कर निश्चिंत रहना चाहती थी।
4. अनागतविधाता ने मछुआरों की योजना से बचने के लिए क्या उपाय सुझाया?
Ans. उसने सुझाव दिया कि सभी मछलियाँ सवेरा होने से पहले सरोवर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चली जाएँ।
5. प्रत्युत्पन्नमति ने मछुआरों से बचने के लिए क्या उपाय किया?
Ans. उसने अपने शरीर को निर्जीव बना लिया, जिससे मछुआरों ने उसे मरी हुई समझकर सरोवर में फेंक दिया।
अनुमान और कल्पना
1. प्रत्युत्पन्नमति ने मछुआरों से बचने की जो योजना बनाई, यदि वह उसमें सफल न होती तो उसकी अन्य योजना क्या हो सकती थी?
Ans. वह जाल में फँसी रहते हुए किसी प्रकार जाल को काटकर भागने या पानी में छलांग लगाकर निकलने का प्रयास कर सकती थी।
2. क्या आपने समुद्र देखा है? अनुमान लगाकर बताइए कि समुद्र में इतना अधिक जल कहाँ से आता है।
Ans. समुद्र में जल नदियों, वर्षा और हिमनदों के पिघलने से आता है। सभी नदियाँ अंततः समुद्र में मिल जाती हैं।
3. अपनी सूझ-बूझ के कारण प्रत्युत्पन्नमति मछुआरों से बच गई। मान लीजिए कि वह तैरकर पास के सरोवर में अपनी मित्र अनागतविधाता के पास पहुँच गई। दोनों में आपस में क्या-क्या बातचीत हुई होगी? अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
Ans. प्रत्युत्पन्नमति कहती—
“मित्र! तुम्हारी सलाह सही थी। समय रहते संकट पहचान लेना बहुत आवश्यक है।”
अनागतविधाता उत्तर देती—
“और संकट के समय बुद्धि का सही उपयोग करना भी उतना ही जरूरी है।”
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