ऊष्मागतिकी (Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) भौतिक विज्ञान (Physics) की वह शाखा है जिसमें ऊष्मा (Heat), यांत्रिक कार्य (Mechanical Work) तथा ऊर्जा (Energy) के बीच परस्पर संबंधों का अध्ययन किया जाता है। यह मुख्यतः ऊष्मा और यांत्रिक कार्य के एक-दूसरे में रूपान्तरण से संबंधित है।

कार्य व ऊष्मा की तुल्यता (Equivalence of Work and Heat)

किसी भी वस्तु का ताप दो प्रकार से बढ़ाया जा सकता है—

  1. सीधे ऊष्मा देकर (गर्म करके)
  2. यांत्रिक कार्य करके

उदाहरण:

  • साइकिल में हवा भरने पर पम्प का बैरल गर्म हो जाना
  • वाहन में ब्रेक लगाने पर ब्रेक ड्रम का गर्म होना
  • दियासलाई की तीली को रगड़ने पर उसका जल उठना

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ऊष्मा तथा यांत्रिक कार्य—दोनों से ताप-वृद्धि संभव है। ताप बढ़ने के बाद यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि ताप-वृद्धि ऊष्मा देने से हुई है या यांत्रिक कार्य करने से।
अतः ऊष्मा तथा कार्य परस्पर तुल्य (Equivalent) हैं।

ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक (Mechanical Equivalent of Heat)

वैज्ञानिक जूल (Joule) ने ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता का परिमाणात्मक अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि—1 किलोकैलोरी =4.18×103 जूल1 \text{ किलोकैलोरी } = 4.18 \times 10^3 \text{ जूल}

या1 कैलोरी =4.18 जूल1 \text{ कैलोरी } = 4.18 \text{ जूल}

यदि किसी वस्तु को QQ कैलोरी ऊष्मा दी जाए और इसके तुल्य कार्य WW जूल हो, तो—W=4.18QW = 4.18Q

यहाँ 4.18 को परिवर्तन-गुणक (Conversion Factor) कहते हैं।
इसे ही ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक कहा जाता है और इसे J से दर्शाते हैं।

अतः समीकरण—W=JQ\boxed{W = JQ}

जहाँ,J=4.18 जूल/कैलोरी =4.18×103 जूल/किलोकैलोरीJ = 4.18 \text{ जूल/कैलोरी } = 4.18 \times 10^3 \text{ जूल/किलोकैलोरी}

➤ ऊष्मागतिक निकाय (Thermodynamic System)

निश्चित सीमाओं से परिबद्ध बहुत अधिक संख्या में अणुओं (Molecules) अथवा परमाणुओं (Atoms) के उस समूह को, जिसका एक निश्चित दाब (Pressure), आयतन (Volume) तथा ताप (Temperature) हो, ऊष्मागतिक निकाय कहते हैं।

उदाहरण:

  • सिलिंडर में भरी गैस
  • फुटबॉल में भरी हवा

परिवेश (Surroundings)

ऊष्मागतिक निकाय के बाहर स्थित वे सभी वस्तुएँ अथवा निकाय, जिनसे ऊर्जा या पदार्थ का आदान-प्रदान हो सकता है, परिवेश (Surroundings) कहलाते हैं।

➤ ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम (Zeroth Law of Thermodynamics)

ऊष्मा का प्रवाह (Flow of Heat)

ऊष्मा का प्रवाह सदैव अधिक ताप वाले निकाय से कम ताप वाले निकाय की ओर होता है और यह प्रवाह तब तक चलता रहता है जब तक कि तापीय संतुलन (Thermal Equilibrium) स्थापित नहीं हो जाता।

ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम (Zeroth Law of Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम के अनुसार—

“यदि दो ऊष्मागतिक निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ अलग-अलग तापीय साम्य में हों, तो वे दोनों निकाय आपस में भी तापीय साम्य में होंगे।”

नियम की व्याख्या (चित्रानुसार)

माना कि दो निकाय A और B एक रुद्धोष्म दीवार (Adiabatic Wall) द्वारा पृथक हैं, अतः इनके बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता।
प्रत्येक निकाय एक तीसरे निकाय C के साथ सुचालक दीवार (Conducting Wall) द्वारा सम्पर्क में है, जिससे ऊष्मा का आदान-प्रदान संभव है।

यदि—

  • निकाय A तथा C तापीय साम्य में हों, तथा
  • निकाय B तथा C भी तापीय साम्य में हों,

तो निष्कर्षतः निकाय A और B भी आपस में तापीय साम्य में होंगे, भले ही वे सीधे संपर्क में न हों।

➤ कार्य व ऊष्मा में अंतर (Difference between Work and Heat)

ऊष्मा तथा कार्य दोनों ही ऊर्जा के रूप हैं तथा एक-दूसरे में रूपान्तरित किए जा सकते हैं, परन्तु इनके बीच मूलभूत अंतर है।

जब ऊर्जा (Energy) का स्थानान्तरण तापान्तर (Temperature Difference) के कारण एक पिण्ड से दूसरे पिण्ड में होता है, तब स्थानान्तरित ऊर्जा को ऊष्मा (Heat) कहते हैं।

इसके विपरीत, जब ऊर्जा का स्थानान्तरण तापान्तर पर निर्भर नहीं करता, बल्कि किसी यांत्रिक प्रक्रिया या बल द्वारा किए गए कार्य के कारण होता है, तब उस ऊर्जा को कार्य (Work) कहा जाता है।

उदाहरण

  1. ऊष्मा का उदाहरण:
    जब एक गर्म वस्तु को ठण्डी वस्तु के संपर्क में रखा जाता है, तो ऊर्जा गर्म वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर प्रवाहित होती है। यह ऊर्जा ऊष्मा कहलाती है।
  2. कार्य का उदाहरण:
    जब किसी बर्तन में रखे ठण्डे जल को मथनी से मथा जाता है, तो व्यक्ति द्वारा किया गया यांत्रिक कार्य जल में ऊर्जा स्थानान्तरित करता है, जिससे जल का ताप बढ़ जाता है। यहाँ ऊर्जा का स्थानान्तरण तापान्तर के कारण नहीं, बल्कि किए गए कार्य के कारण होता है।

➤ आंतरिक ऊर्जा (Internal Energy)

प्रत्येक ऊष्मागतिक निकाय असंख्य अणुओं (Molecules) से निर्मित होता है। किसी निकाय की आंतरिक ऊर्जा उसके अणुओं की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) तथा स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) के योग के बराबर होती है।

आंतरिक ऊर्जा केवल निकाय की अवस्था (State) पर निर्भर करती है, न कि इस बात पर कि वह अवस्था किस प्रक्रिया द्वारा प्राप्त की गई है। इसलिए आंतरिक ऊर्जा एक अवस्था-फलन (State Function) है।

यदि कोई निकाय किसी प्रारंभिक अवस्था से चलकर विभिन्न अवस्थाओं से होते हुए पुनः उसी प्रारंभिक अवस्था में लौट आता है, तो उसकी आंतरिक ऊर्जा में कुल परिवर्तन शून्य होता है।ΔU=0\Delta U = 0

➤ ऊष्मा गतिकी का प्रथम नियम (First Law of Thermodynamics)

यदि किसी ऊष्मागतिक निकाय (System) को QQ ऊष्मा दी जाए, तो उसका कुछ भाग आंतरिक ऊर्जा (ΔU ) बढ़ाने में और शेष भाग निकाय द्वारा कार्य (WWW) करने में व्यय होता है। अतःQ=ΔU+WQ = \Delta U + W

अथवाΔU=QW\Delta U = Q – W

व्याख्या

  • ΔU\Delta U : आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन
  • WW : निकाय द्वारा किया गया कार्य
  • QQ : निकाय को दी गई ऊष्मा

यह नियम ऊर्जा संरक्षण का ही एक रूप है।

➤ विभिन्न प्रकार के ऊष्मा गतिक निकाय (Different Types of Thermodynamic Systems)

ऊष्मागतिक प्रक्रम (Thermodynamic Processes)

  1. चक्रीय प्रक्रम (Cyclic Process)
    • जब कोई निकाय विभिन्न अवस्थाओं से गुजरकर पुनः अपनी प्रारंभिक अवस्था में लौट आता है, इसे चक्रीय प्रक्रम कहते हैं।
    • इस प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा का परिवर्तन ΔU=0 होता है, चाहे कार्य किया गया हो या निकाय पर किया गया हो।
  2. समदाबी प्रक्रम (Isobaric Process)
    • ऐसा प्रक्रम जिसमें दाब (Pressure, P) स्थिर रहता है।
    • ΔP=0\Delta P = 0
  3. समआयतनिक प्रक्रम (Isochoric Process)
    • ऐसा प्रक्रम जिसमें आयतन (Volume, V) स्थिर रहता है।
    • ΔV=0\Delta V = 0
  4. समतापी प्रक्रम (Isothermal Process)
    • ऐसा प्रक्रम जिसमें ताप (Temperature, T) स्थिर रहता है।
    • ΔT=0\Delta T = 0
  5. रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic Process)
    • ऐसा प्रक्रम जिसमें निकाय और परिवेश के बीच ऊष्मा आदान-प्रदान शून्य रहता है।
    • Q=0Q = 0

ऊष्मागतिक निकाय के प्रकार (Types of Thermodynamic System)

  1. विलग निकाय (Isolated System)
    • ऐसा निकाय जो न तो कार्य कर सकता है और न ही ऊष्मा का आदान-प्रदान कर सकता है।
    • इसलिए, Q=W=0Q = W = 0
    • ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार— ΔU=QW=0\Delta U = Q – W = 0
    • अर्थात् विलग निकाय की आंतरिक ऊर्जा स्थिर रहती है और इसे किसी भी प्रक्रम द्वारा बदला नहीं जा सकता।

➤ विशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat)

किसी पदार्थ के 1 ग्राम द्रव्यमान का ताप 1 °C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं।

S=Qm×ΔtS = \frac{Q}{m \times \Delta t}

जहाँ,

  • QQ = दी गई ऊष्मा की मात्रा
  • mm = पदार्थ का द्रव्यमान
  • Δt\Delta t = ताप में हुई वृद्धि

मात्रक:

  • कैलोरी/ग्राम °C
  • किलो कैलोरी/किग्रा °C
  • जूल/किग्रा °C

विशिष्ट ऊष्मा का तुलनात्मक मान

  • द्रवों में: जल की विशिष्ट ऊष्मा सबसे अधिक है।
  • गैसों में: हाइड्रोजन गैस की विशिष्ट ऊष्मा सबसे अधिक है।
  • ठोस, द्रव और गैस में:
    • ठोस की विशिष्ट ऊष्मा सबसे कम होती है।
    • गैसों की विशिष्ट ऊष्मा तुलनात्मक रूप से सबसे अधिक होती है।

➤ ऊष्मा धारिता (Thermal Capacity)

किसी वस्तु के पूर्ण द्रव्यमान का ताप 1 °C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस वस्तु की ऊष्मा धारिता कहते हैं।

w=QΔtw = \frac{Q}{\Delta t}

जहाँ,

  • QQ = वस्तु को दी गई ऊष्मा
  • Δt\Delta t = ताप में हुई वृद्धि

मात्रक (Units):

  • जूल/°C (J/°C)
  • कैलोरी/°C (cal/°C)

महत्वपूर्ण बिंदु

  • ऊष्मा धारिता वस्तु के कुल द्रव्यमान पर निर्भर करती है।
  • यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान mm और विशिष्ट ऊष्मा SS ज्ञात हो, तो ऊष्मा धारिता ww इस प्रकार व्यक्त की जा सकती है—

w=m×Sw = m \times S

➤ विशिष्ट ऊष्मा तथा ऊष्मा धारिता में अंतर

विशिष्ट ऊष्मा और ऊष्मा धारिता के बीच मूल अंतर सही रूप में बताया है। इसे परीक्षा-उपयोगी, संक्षिप्त और यादगार रूप में लिखा जा सकता है—

विशेषताविशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat)ऊष्मा धारिता (Heat Capacity)
परिभाषा1 ग्राम पदार्थ का ताप 1 °C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्माकिसी वस्तु के पूर्ण द्रव्यमान का ताप 1 °C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा
निर्भरतापदार्थ की प्रकृति पर निर्भरवस्तु के कुल द्रव्यमान पर निर्भर
सूत्रS=QmΔtS = \frac{Q}{m \Delta t}S​w=QΔt=m×Sw = \frac{Q}{\Delta t} = m \times S
मात्रकcal/g°C, J/kg°Ccal/°C, J/°C

➤ ऊष्मा गतिकी का द्वितीय नियम (Second Law of Thermodynamics)

यह नियम ऊष्मा के प्रवाह की दिशा और ऊष्मा-कार्य रूपांतरण की संभावनाओं को व्यक्त करता है। इसे दो रूपों में व्यक्त किया जा सकता है—

  1. क्लॉज़ियस रूप (Clausius Statement):
    • ऊष्मा स्वतः कम ताप की वस्तु से अधिक ताप की वस्तु की ओर नहीं प्रवाहित हो सकती।
    • इसे केवल किसी वाह्य स्रोत (External Source) द्वारा संभव बनाया जा सकता है।
  2. केल्विन–प्लांक रूप (Kelvin–Planck Statement):
    • कोई भी यंत्र (Engine) ऊष्मा को पूरा कार्य (Mechanical Energy) में परिवर्तित नहीं कर सकता।

महत्व और अनुप्रयोग

  • ऊष्मा इंजन (Heat Engines)
    • ऊष्मा को आंशिक रूप से कार्य में परिवर्तित करता है।
  • प्रशीतक (Refrigerators / Heat Pumps)
    • कम ताप की जगह से ऊष्मा निकालकर उच्च ताप की जगह भेजते हैं।

दोनों ही यंत्र द्वितीय नियम के आधार पर कार्य करते हैं।

• ऊष्मा इंजन (Heat Engine)

कोई भी चक्रीय युक्ति (Cyclic Device) जो ऊष्मा (Heat) को यांत्रिक कार्य (Mechanical Work) में अविरत रूप से (Continuously) रूपांतरित करती है, उसे ऊष्मा इंजन कहते हैं।

ऊष्मा इंजन के मुख्य भाग

  1. ऊष्मा स्त्रोत (Source of Heat)
    • कार्य करने हेतु ऊष्मा प्रदान करता है।
  2. कार्यकारी पदार्थ (Working Substance)
    • स्रोत से ऊष्मा ग्रहण करता है और लक्षित यांत्रिक कार्य करता है।
    • उदाहरण: भाप, गैस, आदि।
  3. सिंक (Sink)
    • कार्य के बाद बची हुई ऊष्मा को ग्रहण करता है।
    • ताप स्रोत से कम होता है।

ऊष्मा इंजन के प्रकार

  1. बाह्य दहन इंजन (External Combustion Engine)
    • ईंधन इंजन के बाहर जलता है।
    • उदाहरण: भाप इंजन (Steam Engine)
  2. आंतरिक दहन इंजन (Internal Combustion Engine)
    • ईंधन इंजन के भीतर जलता है।
    • उदाहरण: पेट्रोल इंजन, डीजल इंजन, गैस इंजन

Notes:

  • ऊष्मा इंजन की कार्यप्रणाली ऊष्मा स्रोत → कार्यकारी पदार्थ → सिंक क्रम में होती है।
  • यह इंजन ऊष्मा को आंशिक रूप से कार्य में परिवर्तित करता है; पूर्ण रूपांतरण संभव नहीं।

• प्रशीतक (Refrigerator)

प्रशीतक (Refrigerator) वह युक्ति है जिसमें किसी शीतल (cold) स्थान से ऊष्मा (heat) लेकर उसे किसी तप्त स्थान (hot place) पर पहुँचाया जाता है। वास्तव में, प्रशीतक एक उल्टे दिशा में कार्य करने वाला ऊष्मा इंजन है। लेकिन ऊष्मा इंजन के विपरीत, प्रशीतक में कार्यकारी पदार्थ शीतल वस्तु से ऊष्मा ग्रहण करता है और इसे किसी गर्म वस्तु या वातावरण में स्थानांतरित करता है। इस प्रक्रिया के लिए बाह्य ऊर्जा स्रोत, जैसे विद्युत मोटर, की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, प्रशीतक ऊष्मा को ठंडी वस्तु से गर्म स्थान की ओर पहुँचाता है और इसके लिए कार्य का उपयोग करता है।

वातानुकूलक (Air Conditioner)

वातानुकूलक (Air Conditioner, A.C.) भी प्रशीतक (Refrigerator) के सिद्धान्त पर कार्य करने वाला विद्युत चालित उपकरण है। इसका उपयोग किसी भवन (building) या कमरे (room) के तापमान (temperature), आर्द्रता (humidity) और हवा की गति (speed of air) को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। सामान्यत: वातानुकूलक कमरे का तापमान लगभग 20–25° C, वायु की नमी लगभग 60–70% और वायु की गति 0.0125–0.0416 मीटर/सेकंड पर बनाए रखता है। यह संयोजन मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। कुछ वातानुकूलक ऐसे भी बनाए जाते हैं जो सर्दियों में कमरे में गर्म हवा भी प्रदान कर सकते हैं।

➤ ऊष्मा गतिकी का तृतीय नियम (Third law of Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम (Third Law of Thermodynamics) कहता है कि किसी पदार्थ या ऊष्मागतिक निकाय (system) का तापमान परमशून्य (Absolute Zero, 0 K) तक कभी नहीं पहुँचाया जा सकता। अर्थात् परम शून्य ताप केवल एक आदर्श परिकल्पना (Ideal Hypothesis) या चरम अवस्था (Extreme State) है, जिसे किसी भी विधि से प्राप्त करना असंभव है। तथापि, निम्नतापिकी (Cryogenics) के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने लगभग 10810^{-8} केल्विन तक का ताप प्राप्त किया है, जो कि परम शून्य के काफी निकट है।

यह भी पढ़ें: ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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