U.P Board Class 10 Hindi 801 (HA) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2024
हिंदी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांक: 70
निर्देश:
i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।
iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।
iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।
v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।
vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।
vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।
viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।
खण्ड – ‘अ’
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. शुक्ल युग के लेखक नहीं हैं।
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) प्रेमचंद
(C) रामचंद्र शुक्ल
(D) भारतेंदु हरिश्चंद्र
Ans. (D) भारतेंदु हरिश्चंद्र
2. ‘पूस की रात’ कहानी के लेखक हैं।
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) प्रेमचंद
(C) सुदर्शन
(D) यशपाल
Ans. (B) प्रेमचंद
3. ‘सिंदूर की होली’ के नाटककार हैं :
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) रामकुमार वर्मा
(C) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(D) हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
Ans. (D) हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
4. ‘रूस में पच्चीस मास’ यात्रावृत्त के लेखक हैं-
(A) डॉ. नगेंद्र
(B) प्रभाकर माचवे
(C) रामवृक्ष बेनीपुरी
(D) राहुल सांकृत्यायन
Ans. (D) राहुल सांकृत्यायन
5. ‘माटी हो गयी सोना’ संस्मरण के लेखक हैं।
(A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(B) देवेन्द्र सत्यार्थी
(C) मांखनलाल चतुर्वेदी
(D) रामवृक्ष बेनीपुरी
Ans. (A) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
6. रीतिकाल को ‘अलंकृत काल’ किस विद्वान ने कहा है ?
(A) विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने
(B) मिश्रबंधुओं ने
(C) रामचंद्र शुक्ल ने
(D) जॉर्ज ग्रियर्सन ने
Ans. (C) रामचंद्र शुक्ल ने
7. निम्नलिखित में से कौन-सी कृति रीतिकालीन कवि देव की नहीं है ?
(A) कविप्रिया
(B) भाव विलास
(C) भवानी विलास
(D) रस विलास
Ans. (C) भवानी विलास
8. ‘भारतेंदु युग’ की विशेषता (प्रवृत्ति) नहीं है:
(A) राष्ट्रीयता की भावना
(B) सामाजिक चेतना का विकास
(C) अंग्रेज़ी शिक्षा का विरोध
(D) काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली का प्रयोग
Ans. (C) अंग्रेज़ी शिक्षा का विरोध
9. 1943 ई. में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ का संपादन किसने किया ?
(A) रामविलास शर्मा
(B) सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(C) प्रभाकर माचवे
(D) गिरिजा कुमार माथुर
Ans. (B) सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
10. ‘राम की शक्तिपूजा’ किसकी रचना है ?
(A) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
(B) जयशंकर प्रसाद
(C) रामनरेश त्रिपाठी
(D) महादेवी वर्मा
Ans. (A) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
11. “हाथी जैसी देह है, गैंडे जैसी खाल। तरबूजे-सी खोपड़ी, खरबूजे से गाल ।। “
उपर्युक्त पंक्तियों में कौन-सा रस है ?
(A) वीर रस
(B) करुण रस
(C) श्रृंगार
(D) हास्य रस
Ans. (D) हास्य रस
12. “उस काल मारे क्रोध के, तन कॉपने उनका लगा। मानो हवा के वेग से, सोता हुआ सागर जगा ।। उपर्युक्त रेखांकित पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?
(A) उपमा अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) उत्प्रेक्षा अलंकार
(D) श्लेष अलंकार
Ans. (C) उत्प्रेक्षा अलंकार
13. “जो सुमिरत सिधि होड़, गननायक करिबर बदन । करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।”
उपर्युक्त पंक्तियों में प्रयुक्त छंद है:
(A) सोरठा
(B) दोहा
(C) रोला
(D) कुण्डलिया
Ans. (B) दोहा
14. निम्नलिखित में से किस शब्द में ‘अनु’ उपसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है ?
(A) अनुकरण
(B) अनुशासन
(C) अनुत्तीर्ण
(D) अनुवाद
Ans. (C) अनुत्तीर्ण
15. ‘नीलकण्ठ’ समस्तपद में प्रयुक्त समास है :
(A) द्वंद्व
(B) बहुव्रीहि
(C) द्विगु
(D) अव्ययीभाव
Ans. (B) बहुव्रीहि
16. ‘बादल’ का पर्यायवाची शब्द नहीं है :
(A) नीरद
(B) अंबुद
(C) जलद
(D) जलज
Ans. (D) जलज
17. ‘युष्मद्’ (तुम) सर्वनाम शब्द का तृतीया एकवचन रूप है:
(A) युवाम्
(B) त्वया
(C) त्वत्
(D) तुभ्यम्
Ans. (B) त्वया
18. ‘आँधी आयी और हम घर भागने लगे।’ रचना के आधार पर इस वाक्य का प्रकार है-
(A) सरल वाक्य
(B) मिश्र वाक्य
(C) संयुक्त वाक्य
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (C) संयुक्त वाक्य
19. ‘महात्मा बुद्ध ने विश्व को शांति का संदेश दिया।’ इस वाक्य का वाच्यं बताइए :
(A) कर्तृवाच्य
(B) कर्मवाच्य
(C) भाववाच्य
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (A) कर्तृवाच्य
20. ‘वह अचानक चला गया।’ वाक्य में प्रयुक्त ‘अचानक’ पद का व्याकरणिक परिचय है :
(A) संज्ञा
(B) सर्वनाम
(C) क्रिया-विशेषण
(D) क्रिया
Ans. (C) क्रिया-विशेषण
खण्ड ब
(वर्णनात्मक प्रश्न)
21. निम्नलिखित में से किसी एक गद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी, तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति की ओर ले जाएगी।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Ans. प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के एक नीतिपरक निबंध/लेख से उद्धृत है। इसके लेखक ने इसमें कुसंगति के दुष्परिणामों तथा सुसंगति के लाभों को स्पष्ट किया है। लेखक यह बताना चाहता है कि बुरी संगति मनुष्य के चरित्र और बुद्धि दोनों का नाश कर देती है, जबकि अच्छी संगति उसे उन्नति के मार्ग पर ले जाती है।
(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans. लेखक का आशय यह है कि कुसंगति मनुष्य के लिए सबसे घातक रोग के समान होती है। जिस प्रकार ज्वर शरीर को कमजोर कर देता है, उसी प्रकार बुरी संगति मनुष्य के चरित्र, नैतिकता और सदाचार को नष्ट कर देती है। कुसंग केवल अच्छे आचरण का ही नाश नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को भी प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप मनुष्य सही-गलत का भेद नहीं कर पाता और उसके निर्णय गलत होने लगते हैं। इसलिए कुसंग को सबसे भयानक कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्य को भीतर से ही पतन की ओर ले जाती है।
(iii) कुसंग की तुलना किससे की गयी है ?
Ans. कुसंग की तुलना पैरों में बँधी चक्की से की गयी है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे नीचे की ओर, अर्थात् अवनति के गड्ढे में गिराती जाती है।
अथवा
(ख) ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है वही व्यक्ति बुरे किस्म का निंदक भी होता है। दूसरों की निंदा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और तब जो स्थान रिक्त होगा उस पर अनायास मैं ही बैठा दिया जाऊँगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Ans. प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के एक नीतिपरक गद्य पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक ने इसमें ईर्ष्या और निंदा के आपसी संबंध को स्पष्ट किया है। लेखक बताता है कि ईर्ष्या मनुष्य को निंदक बना देती है और वह दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है।
(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans. लेखक का आशय यह है कि ईर्ष्या एक ऐसा दुर्गुण है जिससे निंदा जन्म लेती है। जो व्यक्ति दूसरों की उन्नति या गुणों को देखकर जलता है, वह उन्हें सहन नहीं कर पाता। इसी कारण वह व्यक्ति दूसरों की बुराइयाँ खोजने लगता है और उनकी निंदा करता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं कुछ अच्छा करने के बजाय दूसरों को नीचा दिखाकर संतोष प्राप्त करता है। इसलिए कहा गया है कि जो मनुष्य ईर्ष्यालु होता है, वही स्वभाव से निंदक भी बन जाता है।
(iii) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निंदा क्यों करता है ?
Ans. ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निंदा इसलिए करता है ताकि वे लोग जनता या मित्रों की दृष्टि में गिर जाएँ। उसका उद्देश्य यह होता है कि जब दूसरों का सम्मान कम हो जाए, तब जो स्थान खाली होगा, उस पर वह स्वयं बैठ सके और समाज में प्रतिष्ठा व महत्व प्राप्त कर सके।
22. निम्नलिखित में से किसी एक पद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(क) ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
स्याम तुमहिं ह्याँ कौ नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने ।।
ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौं, बात कहत न लजाने।
बड़े लोग न विवेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने ।।
हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेहु सयाने।
कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने ।।
साँच कहाँ तुमकौ अपनी सौं, बूझति बात निदाने।
सूर स्याम जब तुमहि पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Ans. प्रस्तुत पद्यांश भक्तिकाल के सगुण कृष्ण-भक्ति शाखा के प्रसिद्ध कवि सूरदास द्वारा रचित है। यह पद उद्धव–गोपी संवाद से लिया गया है, जिसमें ब्रज की गोपियाँ उद्धव से अपने मन की पीड़ा व्यक्त करती हैं। इस पद्यांश में गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह-वेदना तथा उद्धव के ज्ञानयोग पर व्यंग्य प्रकट हुआ है।
(ii) पद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans. इन पंक्तियों में ब्रज की गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि आपने जो बातें हमसे कही हैं, उन्हें हमने धैर्यपूर्वक सुन लिया और सहन भी कर लिया। अब आप स्वयं अपने मन से सोचिए और समझदारी से विचार कीजिए। गोपियाँ आगे कहती हैं कि हम जैसी अबला, प्रेम में डूबी स्त्रियों और आप जैसे दिगंबर (वैरागी, योगी) पुरुष की अवस्था में कितना अंतर है। फिर भी आप हम दोनों को एक-सा समझकर हमें योग का उपदेश देने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रकार गोपियाँ उद्धव के ज्ञानयोग पर व्यंग्य करती हैं और यह स्पष्ट करती हैं कि उनके लिए प्रेममार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है, योगमार्ग नहीं।
(iii) ‘ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौं, बात कहत न लजाने।’ से क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए।
Ans. इस पंक्ति का तात्पर्य यह है कि गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि वे ब्रज की सरल और प्रेम में डूबी स्त्रियों को योग का उपदेश दे रहे हैं, जबकि वे इसके योग्य नहीं हैं। गोपियाँ यह कहना चाहती हैं कि ज्ञानयोग और वैराग्य की बातें उनके सहज प्रेम के सामने निरर्थक हैं। उद्धव को गोपियों से ऐसे उपदेश करते समय लज्जा आनी चाहिए, क्योंकि वे कृष्ण-प्रेम में पूर्णतः तल्लीन हैं और उनके लिए प्रेम ही सर्वोच्च साधना है।
अथवा
(ख) चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Ans. प्रस्तुत पद्यांश मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध देशभक्ति-काव्य ‘मातृ-भूमि के लिए’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने एक पुष्प के माध्यम से देशप्रेम, त्याग और बलिदान की भावना को व्यक्त किया है। कवि यह दिखाना चाहता है कि सच्चा गौरव भोग-विलास या सम्मान में नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए समर्पण में है।
(ii) पद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
Ans. इन पंक्तियों में कवि एक पुष्प के माध्यम से अपनी भावना व्यक्त करता है। पुष्प कहता है कि उसे यह इच्छा नहीं है कि वह किसी अप्सरा (सुरबाला) के गहनों में गूँथकर सौंदर्य की वस्तु बने। न ही वह यह चाहता है कि उसे प्रेमी की माला में पिरोकर किसी प्रिय को लुभाने का साधन बनाया जाए। कवि का भाव यह है कि पुष्प भोग-विलास, श्रृंगार और आकर्षण का साधन बनना नहीं चाहता, बल्कि उससे कहीं उच्च और पवित्र उद्देश्य के लिए उपयोग होना चाहता है। यह पंक्तियाँ कवि की त्याग, उच्च आदर्श और देशभक्ति की भावना को प्रकट करती हैं।
(iii) पुष्प वनमाली के समक्ष अपनी कौन-सी इच्छा (चाह) प्रकट करता है ?
Ans. पुष्प वनमाली (भगवान/माली) के सामने यह इच्छा प्रकट करता है कि उसे देवताओं, राजाओं या प्रेमियों के आभूषण के रूप में उपयोग न किया जाए, बल्कि उसे उस मार्ग पर फेंक दिया जाए जहाँ से होकर मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर गुजरते हैं। वह चाहता है कि वीर अपने सिर मातृभूमि पर चढ़ाते समय उसी पुष्प को रौंदते हुए आगे बढ़ें, क्योंकि यही उसके जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।
23. नीचे दिए गए संस्कृत गद्यांश में से किसी एक का संदर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
(क) वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते। अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानञ्च वर्धयति। अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाड्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः। न केवलं भारतीयाः अपितु वैदेशिकाः गीर्वाणवाण्याः अध्ययनाय अत्र आगच्छन्ति निःशुल्कं च विद्यां गृह्णन्ति ।
Ans. संदर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड से लिया गया है। इसमें वाराणसी (काशी) की प्राचीन परंपरा, संस्कृत शिक्षा तथा ज्ञान-विकास के केंद्र के रूप में उसकी महत्ता का वर्णन किया गया है।
हिन्दी अनुवाद :
वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर में विद्या का दिव्य प्रकाश फैलता आ रहा है। आज भी यहाँ संस्कृत भाषा की धारा निरंतर प्रवाहित हो रही है और लोगों के ज्ञान में वृद्धि कर रही है। यहाँ अनेक श्रेष्ठ आचार्य और विद्वान वैदिक साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में निरत हैं। यहाँ केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशी विद्वान भी संस्कृत भाषा का अध्ययन करने के लिए आते हैं और निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं।
अथवा
एकदा बहवः जनाः धूमयानम् (रेल) आरुह्य नगरं प्रति गच्छन्ति स्म। तेषु केचित् ग्रामीणाः केचिच्च नागरिकाः आसन्। मौनं स्थितेषु तेषु एकः नागरिकः ग्रामीणान् उपहसन् अकथयत् “ग्रामीणा : अद्यापि पूर्ववत् अशिक्षिताः अज्ञाश्च सन्ति। न तेषां विकासः अभवत् न च भवितुं शक्नोति।” तस्य तादृशं जल्पनं श्रुत्वा कोऽपि चतुरः ग्रामीणः अब्रवीत् “भद्र नागरिक ! भवान् एव किञ्चित् ब्रवीतु यतो हि भवान् शिक्षितः बहुज्ञः च अस्ति।’ इदम् आकर्ण्य स नागरिकः सदर्प ग्रीवाम् उन्नमय्य अकथयत्, “कथयिष्यामि, परं पूर्व समयः विधातव्यः। “
Ans. संदर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड से लिया गया है। इसमें नगर और ग्राम के लोगों के व्यवहार के माध्यम से घमंड और वास्तविक बुद्धिमत्ता का अंतर स्पष्ट किया गया है।
हिन्दी अनुवाद :
एक बार बहुत-से लोग रेलगाड़ी में चढ़कर नगर की ओर जा रहे थे। उनमें कुछ ग्रामीण थे और कुछ नगरवासी। सब चुपचाप बैठे थे, तभी एक नगरवासी ग्रामीणों का उपहास करते हुए कहने लगा— “ग्रामीण आज भी पहले की तरह अशिक्षित और अज्ञानी हैं। न उनका कभी विकास हुआ है और न ही हो सकता है।” उसकी ऐसी बातें सुनकर एक चतुर ग्रामीण बोला— “हे सज्जन नगरवासी! आप ही कुछ कहिए, क्योंकि आप शिक्षित और बहुत ज्ञानी हैं।” यह सुनकर वह नगरवासी घमंड से गर्दन उठाकर बोला— “मैं बताऊँगा, पर पहले समय निश्चित करना होगा।”
24. नीचे दिए गए संस्कृत पद्यांश में से किसी एक का संदर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
(क) सार्थ: प्रवसतो मित्रं किंस्विन् मित्रं गृहे सतः।
आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन् मित्रं मरिष्यतः ।।
Ans. संदर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड से लिया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में सच्चे मित्र की पहचान का भाव व्यक्त किया गया है।
हिन्दी अनुवाद :
यात्रा पर जाते हुए व्यक्ति का मित्र कौन होता है? घर पर रहते हुए किसे मित्र कहा जाता है? रोगी व्यक्ति का मित्र कौन होता है? और जो मरने वाला है, उसका मित्र कौन होता है? अर्थात् जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में ही सच्चे मित्र की परीक्षा होती है।
अथवा
(ख) बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः।
उभयत्र समो वीरः वीर भावो हि वीरता ।।
Ans. संदर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत पद्यांश पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड से उद्धृत है। इसमें वीर पुरुष के गुण और वीरता की सच्ची परिभाषा दी गई है।
हिन्दी अनुवाद :
चाहे बंधन हो या मृत्यु, चाहे विजय हो या पराजय—इन सभी अवस्थाओं में वीर पुरुष समान रहता है। क्योंकि हर परिस्थिति में समान भाव रखना ही सच्ची वीरता है।
25. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए :
(i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी का चरित्र चित्रण कीजिए।
Ans. ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी को भारत-माता के सच्चे मुक्तिदूत के रूप में चित्रित किया गया है। वे सत्य, अहिंसा और प्रेम के पुजारी हैं। गाँधीजी ने बिना हथियार उठाए अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और जन-जन में स्वतंत्रता की चेतना जगाई।
उनका जीवन सादगी, त्याग और आत्मबल का प्रतीक है। वे गरीबों, दलितों और शोषितों के सच्चे हितैषी थे। गाँधीजी में अद्भुत नेतृत्व क्षमता, नैतिक साहस और आत्मविश्वास था। वे जनसमूह को साथ लेकर चलने वाले महान मार्गदर्शक थे। इस प्रकार ‘मुक्तिदूत’ में महात्मा गाँधी को महान राष्ट्रनायक, आध्यात्मिक योद्धा और स्वतंत्रता के अग्रदूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश लिखिए।
Ans. ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में भारत की दासता, पीड़ा और संघर्ष का मार्मिक चित्रण किया गया है। इस सर्ग में कवि ने देशवासियों की व्यथा, अंग्रेज़ों के अत्याचार और जनता की निराशा का वर्णन किया है।
इसी सर्ग में महात्मा गाँधी एक आशा-किरण बनकर उभरते हैं। वे सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाकर जनता को अन्याय के विरुद्ध संगठित करते हैं। देशवासियों में नवचेतना, साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है। यह सर्ग स्वतंत्रता संग्राम की चेतना को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है।
(ख (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवन और व्यक्तित्व पर आधारित है। इसमें उनके बाल्यकाल, शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी तथा राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान का वर्णन किया गया है।
काव्य में नेहरूजी को ज्ञान, आधुनिकता और प्रगतिशील सोच का प्रतीक बताया गया है। कवि ने उनके जीवन को भारत के भविष्य को आलोकित करने वाली ज्योति के रूप में प्रस्तुत किया है।
(ii) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहरलाल नेहरू को विद्वान, दूरदर्शी और राष्ट्रनिर्माता के रूप में चित्रित किया गया है। वे आधुनिक भारत के शिल्पकार थे। उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक सोच और मानवतावादी भावना थी।
नेहरूजी बच्चों से अत्यधिक प्रेम करते थे, इसलिए उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहा जाता है। वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक भी थे। देश को प्रगति और शांति के मार्ग पर ले जाना उनका मुख्य उद्देश्य था। इस प्रकार नेहरूजी का चरित्र ज्ञान, करुणा और नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण है।
(ग) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को दूरदर्शी, विनम्र, धर्मज्ञ और लोककल्याणकारी नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे अपनी महानता के बावजूद अहंकाररहित हैं। राजसूय यज्ञ में वे स्वयं अग्रपूजा का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करते, बल्कि समाज के वास्तविक योग्य व्यक्ति की पहचान कराते हैं।
श्रीकृष्ण में समता, न्याय और विवेक की अद्भुत क्षमता है। वे सच्चे अर्थों में धर्म के रक्षक हैं और योग्य व्यक्ति को सम्मान दिलाने के पक्षधर हैं। उनका व्यक्तित्व यह सिद्ध करता है कि सच्ची महानता नम्रता और त्याग में निहित होती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ‘अग्रपूजा’ में आदर्श पुरुष और कुशल मार्गदर्शक के रूप में उभरते हैं।
(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग में राजसूय यज्ञ के अवसर पर अग्रपूजा को लेकर उत्पन्न विवाद का वर्णन किया गया है। अनेक राजा और सभासद अपनी-अपनी श्रेष्ठता का दावा करते हैं।
इसी समय श्रीकृष्ण अपने विवेक से यह सिद्ध करते हैं कि अग्रपूजा का अधिकारी वही है जिसने समाज के लिए सर्वाधिक त्याग और सेवा की हो। वे शिशुपाल के अहंकार और दुराचार को उजागर करते हैं। अंततः धर्म की विजय होती है और योग्य व्यक्ति को सम्मान प्राप्त होता है। यह सर्ग न्याय, विवेक और धर्म की श्रेष्ठता को स्पष्ट करता है।
(घ) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘लक्ष्मी’ का सारांश लिखिए।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘लक्ष्मी’ में मेवाड़ की समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य का चित्रण किया गया है। इस सर्ग में बताया गया है कि मेवाड़ केवल धन-वैभव से नहीं, बल्कि वीरता, आत्मसम्मान और धर्म से समृद्ध है।
कवि यह स्पष्ट करता है कि लक्ष्मी मेवाड़ में धर्म और स्वाभिमान के साथ निवास करती है। यहाँ की संपन्नता का मूल कारण वहाँ के शासकों का न्यायप्रिय और कर्तव्यनिष्ठ होना है। यह सर्ग मेवाड़ की गौरवशाली परंपरा को उजागर करता है।
(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र चित्रण कीजिए।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य का नायक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त है। वह मेवाड़ की आन-बान-शान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगाने को सदैव तत्पर रहता है। उसके जीवन का उद्देश्य स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की रक्षा है।
नायक में अदम्य साहस, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व क्षमता विद्यमान है। वह ऐश्वर्य की अपेक्षा राष्ट्र और धर्म को अधिक महत्व देता है। इस प्रकार ‘मेवाड़ मुकुट’ का नायक भारतीय वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक है।
(ङ) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans. ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य का नायक नेताजी सुभाषचन्द्र बोस हैं। वे अदम्य साहस, देशभक्ति और त्याग के प्रतीक हैं। उनका जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए पूर्णतः समर्पित है।
सुभाषचन्द्र बोस में असाधारण नेतृत्व क्षमता, संगठन शक्ति और क्रांतिकारी दृष्टिकोण था। उन्होंने ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का गठन कर सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया। वे आत्मसम्मानी, निडर और दृढ़ निश्चयी थे। उनके चरित्र में अनुशासन, आत्मबल और राष्ट्रप्रेम की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस प्रकार ‘जय सुभाष’ में नायक को स्वतंत्रता संग्राम का महान योद्धा रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
Ans. ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में भारत की पराधीन अवस्था और अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों का चित्रण किया गया है। देशवासियों में निराशा और असंतोष व्याप्त है।
इसी सर्ग में सुभाषचन्द्र बोस एक आशा और क्रांति के प्रतीक के रूप में प्रकट होते हैं। वे देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने का संकल्प लेते हैं और जनमानस में स्वाधीनता की चेतना जागृत करते हैं। यह सर्ग संपूर्ण काव्य की भूमिका के रूप में कार्य करता है।
(च) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कैकेयी का चरित्र चित्रण कीजिए।
Ans. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी को आत्मग्लानि, पश्चाताप और मातृत्व-भावना से युक्त नारी के रूप में चित्रित किया गया है। प्रारंभ में वे दासी मंथरा के बहकावे में आकर राम को वनवास और भरत को राज्य दिलाने का वर माँगती हैं।
परंतु बाद में उन्हें अपने कृत्य का गहरा पश्चाताप होता है। वे भरत के त्याग और आदर्शों को देखकर अत्यंत लज्जित होती हैं। इस काव्य में कैकेयी को मानवीय दुर्बलताओं वाली, पर अंततः सुधरने वाली माता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ की कथावस्तु लिखिए।
Ans. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ में राम के वनवास और दशरथ के निधन के बाद की स्थिति का वर्णन है। राजभवन शोक, पीड़ा और पश्चाताप से भर जाता है।
इस सर्ग में भरत का महान त्याग और कर्तव्यबोध उजागर होता है। वे राज्य स्वीकार करने से इनकार करते हैं और स्वयं को राम का सेवक मानते हैं। यह सर्ग भरत के कर्मवीर और आदर्श चरित्र को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।
(छ) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
Ans. ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में राम-रावण युद्ध के भीषण और उग्र रूप का चित्रण किया गया है। इस काव्य में युद्ध का वातावरण अत्यन्त भयानक, गर्जनापूर्ण और विनाशकारी दिखाई देता है। रणभूमि में अस्त्र-शस्त्रों की टंकार, योद्धाओं की गर्जना और आकाश-पाताल को कंपा देने वाला संघर्ष प्रस्तुत किया गया है।
कवि ने इस काव्य में वीरता, पराक्रम और युद्ध की उग्रता का सजीव वर्णन किया है। विशेष रूप से मेघनाद और लक्ष्मण के युद्ध का प्रभावशाली चित्र सामने आता है। ‘तुमुल’ खण्डकाव्य वीर-रस प्रधान है और यह बताता है कि युद्ध में साहस, शौर्य और बलिदान का कितना महत्व होता है।
(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद का चरित्र चित्रण कीजिए।
Ans. ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में मेघनाद को एक अत्यन्त वीर, पराक्रमी और निडर योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह रावण का योग्य पुत्र और युद्ध-कला में निपुण है। मेघनाद अपने बल, साहस और अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में अद्वितीय है।
उसके चरित्र में अदम्य साहस, आत्मसम्मान और युद्ध-कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। वह अपने कुल और राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राणों की बाज़ी लगा देता है। यद्यपि वह अधर्म की ओर से युद्ध करता है, फिर भी उसकी वीरता और रणकौशल प्रशंसनीय हैं। इस प्रकार मेघनाद ‘तुमुल’ में एक वीर-नायक के रूप में उभरता है।
(ज) (i) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के नायक चन्द्रशेखर आज़ाद का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Ans. ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आज़ाद को एक असाधारण क्रांतिकारी, निर्भीक और देशभक्त नायक के रूप में चित्रित किया गया है। उनका जीवन भारत माता की स्वतंत्रता के लिए पूर्णतः समर्पित था।
आज़ाद में अदम्य साहस, आत्मबल और त्याग की भावना थी। वे कभी भी अंग्रेज़ों के सामने झुकने को तैयार नहीं हुए। उनका प्रसिद्ध संकल्प था— “आज़ाद ही जिया हूँ, आज़ाद ही मरूँगा।” वे युवाओं के लिए प्रेरणा-स्रोत थे। इस प्रकार चन्द्रशेखर आज़ाद का चरित्र बलिदान, वीरता और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है।
(ii) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग (बलिदान) की कथावस्तु संक्षेप में
Ans. ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ‘बलिदान’ में चन्द्रशेखर आज़ाद के अंतिम संघर्ष और सर्वोच्च त्याग का वर्णन किया गया है। अंग्रेज़ी पुलिस उन्हें इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लेती है।
आज़ाद वीरतापूर्वक अंग्रेज़ों से मुकाबला करते हैं और अंतिम गोली स्वयं को मारकर मातृभूमि के लिए अमर बलिदान देते हैं। यह सर्ग देशप्रेम, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के लिए प्राणोत्सर्ग की भावना को अत्यन्त मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है।
(झ) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन पर आधारित है। इसमें उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक के महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है। कथा में कर्ण का जन्म दुर्योधन के मित्र और एक महान योद्धा के रूप में होता है। उसे पिता की पहचान नहीं होती और वह समाज में तिरस्कृत जीवन व्यतीत करता है। काव्य में कर्ण की उदारता, धर्मपरायणता, वीरता और अपने मित्र के प्रति वफादारी को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है। कथा में युद्धभूमि में उसके संघर्ष, उसकी महानता और अंततः महाभारत युद्ध में मृत्यु की घटनाएँ भी वर्णित हैं।
(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र चित्रण कीजिए।
Ans. कर्ण का चरित्र अत्यंत प्रेरणादायक और वीरतापूर्ण है। वह न केवल धर्मप्रिय और उदार था, बल्कि अपने मित्र दुर्योधन के प्रति पूर्ण निष्ठावान भी था। उसकी वीरता और पराक्रम अद्वितीय थे। कर्ण जीवन भर अपनी उत्पत्ति के कारण तिरस्कार और कठिनाइयों का सामना करता रहा, फिर भी वह कभी असंतुष्ट नहीं हुआ। उसका दानशील स्वभाव, वीरता, मित्रता, और न्यायप्रियता उसे महापुरुष के रूप में प्रस्तुत करती हैं। युद्ध में उसकी साहसिकता और आत्म-बलिदान का भाव उसके चरित्र की महानता को और उजागर करता है।
26. (क) दिए गए लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचनाका उल्लेख कीजिए :
(i) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
Ans. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1899 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख इतिहासकार, आलोचक और शोधकर्ता माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य के विकासक्रम का गहन अध्ययन किया और उसके आधार पर कई महत्वपूर्ण कृतियाँ दीं। शुक्ल जी का कार्य छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता और आलोचना के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। उनका सबसे प्रसिद्ध योगदान हिंदी साहित्य का इतिहास है, जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य की उत्पत्ति, विकास और विभिन्न कालों की विशेषताओं का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया। उन्होंने साहित्य को केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि समाज और संस्कृति का प्रतिबिंब माना। आचार्य शुक्ल का दृष्टिकोण विश्लेषणात्मक और सटीक था, जो आज भी साहित्य अध्ययन में मार्गदर्शक है।
(ii) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
Ans. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ। वे स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति और एक विद्वान व्यक्तित्व के धनी थे। डॉ. प्रसाद शिक्षा, राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय रहे। उन्होंने देश की स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय संविधान के निर्माण में भी योगदान दिया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने शिक्षा और संस्कृति पर कई लेख लिखे और विद्यार्थियों को प्रेरित किया। उनकी प्रमुख रचना भारत का इतिहास और संस्कृति भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है। इसमें उन्होंने देश की ऐतिहासिक घटनाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का विवेचन किया। उनका जीवन साधारणता, ईमानदारी और निष्ठा का उदाहरण है।
(iii) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
Ans. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 1896 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के विद्वान लेखक और आलोचक थे। बख्शी जी ने साहित्यिक आलोचना और रचनात्मक लेखन दोनों में गहन अध्ययन किया। उनका दृष्टिकोण समाज और साहित्य के बीच संबंध को उजागर करता है। उनकी प्रमुख कृति साहित्य और समाज हिंदी साहित्य में सामाजिक प्रभावों और बदलावों का विवेचन करती है। बख्शी जी का लेखन सरल, स्पष्ट और विचारशील है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य या मनोरंजन के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया। उनके विचार और आलोचनाएँ आज भी साहित्यिक अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
(iv) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
Ans. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार में हुआ। वे आधुनिक हिंदी कविता के महान कवि माने जाते हैं। दिनकर जी का कवि जीवन वीर रस, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक चेतना से प्रेरित रहा। उनकी कविताएँ युवाओं में उत्साह और साहस भरती हैं। उनका लेखन स्पष्ट, प्रभावशाली और भावपूर्ण है। दिनकर जी की प्रमुख रचना रस युद्ध है, जिसमें उन्होंने न केवल मानवीय भावनाओं को बल्कि राष्ट्रीय चेतना और युद्ध के वीर रस को व्यक्त किया है। उन्हें उनकी वीर रस की कविताओं और समाजोपयोगी लेखन के कारण ‘राष्ट्रीय कवि’ कहा गया। दिनकर जी का साहित्य आज भी युवाओं को प्रेरित करता है और हिंदी कविता के इतिहास में उनका स्थान अविस्मरणीय है।
(ख) दिए गए कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:
(i) महाकवि सूरदास
Ans. महाकवि सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी के आस-पास उत्तर प्रदेश के भीमगांव या सुल्तानपुर जिले में हुआ था। वे हिंदी और अवधी के प्रमुख भक्तिकालीन कवि थे। सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति में रच-बसकर कविताएँ लिखीं और उन्हें प्रेम, भक्ति और लीलाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनका जीवन अत्यंत साधु और भक्ति-पूर्ण था। उनकी दृष्टि में भक्ति ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य थी। उन्होंने सूरसागर की रचना की, जो उनके भक्ति और प्रेम की अभिव्यक्ति का महान ग्रंथ है। सूरदास की रचनाएँ सरल भाषा में हैं, लेकिन भावों और आध्यात्मिक गहराई से परिपूर्ण हैं। उनका साहित्य आज भी भक्ति साहित्य के आदर्श के रूप में माना जाता है।
(ii) बिहारीलाल
Ans. बिहारीलाल का जन्म 1595 ईस्वी में बिहारीपुर, बिहार में हुआ। वे छायावादी हिंदी कविता के प्रमुख कवि माने जाते हैं और उनके प्रमुख योगदान में सतसई रचना शामिल है। सतसई में 700 छोटे-छोटे दोहों के माध्यम से प्रेम, श्रृंगार और जीवन के विभिन्न पहलुओं का सुन्दर चित्रण किया गया है। बिहारीलाल का जीवन अत्यंत सरल और साहित्य-प्रिय था। उनके दोहे शैलीगत दृष्टि से संक्षिप्त, सुबोध और भावपूर्ण हैं। उनकी कविता का मुख्य आकर्षण भाषा की सरलता और गहन भावनात्मक प्रभाव है। उनका साहित्य आज भी प्रेम और श्रृंगार रस के आदर्श के रूप में पढ़ा जाता है।
(iii) मैथिलीशरण गुप्त
Ans. मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में हुआ। वे आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवि माने जाते हैं और राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जीवन साहित्य और समाज सेवा के प्रति समर्पित था। मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदी कविता में भारतीय संस्कृति, महापुरुषों और राष्ट्रीय चेतना को प्रमुख स्थान दिया। उनकी प्रमुख रचना भारत भारती है, जिसमें वे भारत की गौरवशाली संस्कृति और इतिहास को उजागर करते हैं। उनके कविता में राष्ट्रभक्ति, नैतिकता और सामाजिक चेतना का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।
(iv) सुभद्रा कुमारी चौहान
Ans. सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को झांसी, उत्तर प्रदेश में हुआ। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और आधुनिक हिंदी की प्रमुख कवयित्री थीं। उनके लेखन का मुख्य विषय देशभक्ति, सामाजिक चेतना और नारी सशक्तिकरण था। उनका जीवन राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित था। उनकी प्रमुख रचना झाँसी की रानी है, जो रानी लक्ष्मीबाई के वीरता और साहस पर आधारित है। इस कविता में उन्होंने देशभक्ति और नारी शक्ति को सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएँ आज भी युवा पीढ़ी में प्रेरणा का स्रोत हैं।
27. अपनी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड से कण्ठस्थ एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।
Ans.
अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च।
अहिंसा परमं दानं दानात् सत्यं विशिष्यते॥
28. आपके विद्यालय के पुस्तकालय में हिन्दी की पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का अभाव है। इन्हें मँगाने का अनुरोध करते हुए अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र लिखिए।
Ans.
सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
__________ (विद्यालय का नाम)
__________ (स्थान)
विषय : विद्यालय के पुस्तकालय में हिन्दी की पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं की व्यवस्था कराने हेतु प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय का एक छात्र हूँ। हमारे विद्यालय के पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की कुछ पुस्तकें तो उपलब्ध हैं, परन्तु हिन्दी विषय की पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का अभाव है। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है तथा प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य ज्ञान की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है।
हिन्दी की अच्छी पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध न होने के कारण विद्यार्थियों को अध्ययन में कठिनाई होती है तथा उनकी भाषा-शैली और साहित्यिक ज्ञान का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। यदि पुस्तकालय में हिन्दी की कहानियाँ, उपन्यास, काव्य-संग्रह तथा ‘प्रतियोगिता दर्पण’, ‘सरिता’, ‘नंदन’ आदि पत्र-पत्रिकाएँ मँगवा दी जाएँ, तो विद्यार्थियों को बहुत लाभ होगा।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि विद्यालय के पुस्तकालय में हिन्दी की उपयोगी पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं की शीघ्र व्यवस्था कराने की कृपा करें।
धन्यवाद।
भवदीय
आपका आज्ञाकारी छात्र
सुनीत सिंह
कक्षा – 10
दिनांक : __________
अथवा
अखिल भारतीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता मित्र को एक बधाई-पत्र लिखिए।
Ans.
प्रिय मित्र __________,
सप्रेम नमस्कार।
यह जानकर अत्यन्त हर्ष हुआ कि तुमने अखिल भारतीय वाद–विवाद प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है। इस शानदार उपलब्धि पर मैं तुम्हें हार्दिक बधाई देता हूँ। तुम्हारी यह सफलता तुम्हारी कड़ी मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और प्रभावशाली वक्तृत्व कला का परिणाम है।
मुझे पूर्ण विश्वास था कि तुम इस प्रतियोगिता में अवश्य सफलता प्राप्त करोगे। तुम्हारी इस उपलब्धि से न केवल तुम्हारे माता-पिता और गुरुजन, बल्कि हम सभी मित्र भी गर्व का अनुभव कर रहे हैं। तुमने अपने विद्यालय/महाविद्यालय का नाम रोशन किया है।
ईश्वर से मेरी यही कामना है कि भविष्य में भी तुम इसी प्रकार निरन्तर प्रगति करते रहो और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करो। शीघ्र ही मिलकर इस सफलता का उत्सव मनाएँगे।
पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
तुम्हारा मित्र
सुनीत सिंह
29. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए :
(i) चन्द्रशेखरः कः आसीत् ?
Ans. चन्द्रशेखरः भारतस्य एकः महान् स्वाधीनता-संग्रामे वीरः क्रान्तिकारी आसीत्।
(ii) वीरः केन पूज्यते ?
Ans. वीरः सर्वैः जनैः पूज्यते।
(iii) वाराणसी नगरी कस्याः नद्याः कूले स्थिता ?
Ans. वाराणसी नगरी गङ्गायाः नद्याः कूले स्थिता।
(iv) ज्ञानं कुत्र सम्भवति ?
Ans. ज्ञानं विद्यालये सम्भवति।
30. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबंध लिखिए:
(i) जल है तो कल है
Ans. जल जीवन का आधार है। जल के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पति सभी जल पर निर्भर हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास भी नदियों के किनारे ही हुआ है। इसलिए कहा गया है— “जल है तो कल है।”
आज के समय में जल की समस्या अत्यन्त गंभीर होती जा रही है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, वनों की कटाई और जल के दुरुपयोग के कारण जल-स्रोत सूखते जा रहे हैं। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यदि समय रहते जल संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में भयंकर जल संकट उत्पन्न हो सकता है।
जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, तालाबों और कुओं का संरक्षण, नदियों की स्वच्छता तथा जल के अपव्यय को रोकना अत्यन्त आवश्यक है। हमें अपने दैनिक जीवन में जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।
अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जल का संरक्षण ही हमारे उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है। सच ही कहा गया है— जल है तो कल है।
(ii) मेरे सपनों का भारत
Ans. भारत एक महान देश है, जहाँ प्राचीन काल से ही ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की समृद्ध परम्परा रही है। मेरे सपनों का भारत एक ऐसा भारत है, जहाँ सभी नागरिक सुखी, समृद्ध और सुरक्षित हों।
मेरे सपनों के भारत में कोई भूखा न हो, सभी को शिक्षा और स्वास्थ्य की समान सुविधाएँ उपलब्ध हों। यहाँ जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर भेदभाव न हो, बल्कि सभी लोग भाईचारे और सद्भाव के साथ रहें। नारी को पुरुष के समान अधिकार और सम्मान प्राप्त हो।
मेरे सपनों का भारत स्वच्छ, हरित और विकसित हो। यहाँ भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अशिक्षा का नामोनिशान न हो। युवा वर्ग राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाए और विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाए।
अंततः मेरे सपनों का भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जो शांति, प्रगति और मानवता का प्रतीक हो तथा विश्व में अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाए।