U.P Board Class 10 Hindi 801 (HB) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।
सत्र – 2024
हिंदी
समय: तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांक: 70
निर्देश:
i) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
ii) यह प्रश्नपत्र दो खण्डों, खण्ड अ तथा खण्ड ब में विभक्त है।
iii) खण्ड अ में 1 अंक के 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं जिनके उत्तर ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर नीले अथवा काले बाल प्वाइंट पेन से सही विकल्प वाले गोले को पूर्ण रूप से भरकर चिह्नित करें।
iv) खण्ड अ के प्रत्येक प्रश्न का निर्देश पढ़कर केवल प्रदत्त ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर ही उत्तर दें। ओ० एम० आर० उत्तर पत्रक पर उत्तर देने के पश्चात उसे नहीं काटें तथा इरेजर अथवा ड्राइटनर का प्रयोग न करें।
v) प्रश्न के अंक उसके सम्मुख अंकित हैं।
vi) खण्ड – ब में 50 अंक के वर्णनात्मक प्रश्न हैं।
vii) खण्ड – ब में सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ ही करें। प्रत्येक उपभाग नये पृष्ठ से प्रारम्भ किये जायें।
viii) प्रथम प्रश्न से आरम्भ कीजिए तथा अन्तिम प्रश्न तक करते जाइए। जो प्रश्न न आता हो उस पर समय नष्ट न कीजिए ।
खण्ड – ‘अ’
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. शुक्लयुगीन लेखक हैं :
(A) राम प्रसाद निरञ्जनी
(B) माखन लाल चतुर्वेदी
(C) यशपाल
(D) सदल मिश्र
Ans. (B) माखन लाल चतुर्वेदी
2. ‘गुनाहों का देवता’ रचना की विधा है:
(A) काहानी
(B) नाटक
(C) उपन्यास
(D) आत्मकथा
Ans. (C) उपन्यास
3. किशोरी लाल गोस्वामी की रचना है:
(A) ‘सरस्वती’
(B) ‘राग दरबारी’
(C) ‘दुलाई वाली’
(D) ‘इन्दुमती’
Ans. (D) ‘इन्दुमती’
4. ‘ध्रुवस्वामिनी’ के लेखक हैं:
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) जगदीश चन्द्र माथुर
(C) राम कुमार वर्मा
(D) मोहन राकेश
Ans. (A) जयशंकर प्रसाद
5. ‘संस्कृति और सभ्यता’ निबन्ध के निबन्धकार है:
(A) रामदास गौड़
(B) श्यामसुन्दर दास
(C) रामचन्द्र शुक्ल
(D) डॉ. नगेन्द्र
Ans. (C) रामचन्द्र शुक्ल
6. ‘भावविलास’ के रचयिता हैं:
(A) भूषण
(B) केशव
(C) मतिराम
(D) देव
Ans. (B) केशव
7. रीतिमुक्त काव्यधारा की रचना है:
(A) सुजानसागर
(B) बिहारी सतसई
(C) ललित ललाम
(D) काव्य निर्णय
Ans. (C) ललित ललाम
8. ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष है:
(A) 1943
(B) 1951
(C) 1979
(D) 1985
Ans. (B) 1951
9. ‘प्रगतिवाद’ युग के कवि हैं:
(A) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
(B) प्रभाकर माचवे
(C) नरेश मेहता
(D) जगदीश गुप्त
Ans. (D) जगदीश गुप्त
10. महादेवी वर्मा की रचना है:
(A) त्रिधारा
(B) वीणा
(C) पथ के साथी
(D) गुंजन
Ans. (D) गुंजन
11. ‘विन्ध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिनु नारि दुःखारे’ पंक्ति में कौन-सा रस है ?
(A) करुण रस
(B) हास्य रस
(C) श्रृंगार रस
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (A) करुण रस
12. ‘जहाँ उपमेय में उपमान की समानता प्रकट की जाए वहाँ अलंकार होता है।
(A) उपमा
(B) रूपक
(C) उत्प्रेक्षा
(D) सन्दह
Ans. (A) उपमा
13. ‘सोरठा छन्द’ के दूसरे और चौथे चरण में मात्राएँ होती हैं:
(A) 11
(B) 16
(C) 12
(D) 13
Ans. (B) 16
14. ‘अपव्यय’ शब्द में उपसर्ग जुड़ा है:
(A) अ
(B) उप
(C) अप
(D) अधि
Ans. (C) अप
15. ‘माता-पिता’ में समास है:
(A) कर्मधारय
(B) द्विगु
(C) बहुव्रीहि
(D) द्वन्द्व
Ans. (D) द्वन्द्व
16. ‘समुद्र’ शब्द का पर्यायवाची शब्द नहीं है:
(A) सागर
(B) पारावार
(C) महीपति
(D) जलधि
Ans. (C) महीपति
17. ‘सौं’ का तत्सम शब्द है:
(A) शत
(B) सव
(C) सत
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (A) शत
18. ‘तेषाम्’ में विभक्ति और वचन है:
(A) पञ्वमी विभक्ति, द्विवचन
(B) सप्तमी विभक्ति, एकवचन
(C) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
(D) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन
Ans. (C) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
19. ‘तुमसे सोया नहीं जा सकता’ वाक्य में वाच्य है:
(A) कर्तृवाच्य
(B) भाववाच्य
(C) कर्मवाच्य
(D) इनमें से कोई नहीं
Ans. (B) भाववाच्य
20. विकारी पद नहीं है:
(A) गाय
(B) सभा
(C) प्रतिदिन
(D) रमेश
Ans. (C) प्रतिदिन
खण्ड व
(वर्णनात्मक प्रश्न)
21. निम्नलिखित में से किसी एक गद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) यह एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत है, जो अनन्तकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस सारे देश में बहता रहा है। यह हमारा सौभाग्य रहा है कि हमने ऐसे ही एक मूर्त रूप को अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते भी देखा है और जिसने अमरत्व की याद दिलाकर हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डाल हमारे मृतप्राय शरीर में नये प्राण फूंके और मुरझाये हुए दिलों को फिर खिला दिया। वह अमरत्व सत्य और अहिंसा का है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans. प्रस्तुत गद्यांश महात्मा गाँधी के विचारों पर आधारित एक निबन्ध से लिया गया है। इसमें लेखक ने सत्य और अहिंसा को भारत की प्राचीन नैतिक एवं आध्यात्मिक परम्परा का अमर स्रोत बताते हुए गाँधीजी को उसका सजीव प्रतीक माना है।
(ii) मानव मात्र के लिए वर्तमान में क्या आवश्यक हो गया है ?
Ans. वर्तमान समय में मानव मात्र के लिए सत्य और अहिंसा को अपनाना अत्यन्त आवश्यक हो गया है, क्योंकि इन्हीं मूल्यों से समाज में नैतिक चेतना, शान्ति, प्रेम और मानवता का पुनर्जागरण सम्भव है।
(iii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. लेखक का आशय यह है कि हमारा यह परम सौभाग्य रहा है कि हमने सत्य और अहिंसा जैसे महान आदर्शों को केवल ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी के रूप में सजीव रूप में अपने बीच देखा। गाँधीजी का जीवन, आचरण और संघर्ष मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। उन्होंने सत्य और अहिंसा के अमर मूल्यों की स्मृति दिलाकर समाज में नई चेतना का संचार किया। उनके प्रभाव से निराश, शक्तिहीन और नैतिक रूप से पतन की ओर बढ़ते समाज को नया जीवन मिला। जैसे सूखी हड्डियों में नई मज्जा भर जाती है, वैसे ही गाँधीजी ने मृतप्राय मानवता में नई शक्ति, आशा और उत्साह भर दिया तथा निराश और मुरझाए हुए हृदयों को पुनः जीवन्त बना दिया।
अथवा
(ख) ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है ? जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा जगेगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans. प्रस्तुत गद्यांश ईर्ष्या विषयक एक निबन्ध से लिया गया है। इसमें लेखक ने ईर्ष्या की प्रवृत्ति से बचने के उपाय बताते हुए मानसिक अनुशासन और सकारात्मक सोच के महत्व पर प्रकाश डाला है।
(ii) लेखक ईर्ष्या से बचने के लिए किस आदत को छोड़ने को कहता है ?
Ans. लेखक ईर्ष्या से बचने के लिए फालतू और अनावश्यक बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ने को कहता है।
(iii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. लेखक का अभिप्राय यह है कि ईर्ष्या का मूल कारण किसी न किसी प्रकार का अभाव या कमी की भावना होती है। व्यक्ति दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने लगता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसके पास कुछ नहीं है। इसलिए लेखक कहता है कि ऐसे व्यक्ति को यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि उसके भीतर किस बात की कमी है और उस कमी को रचनात्मक एवं सकारात्मक उपायों से कैसे पूरा किया जा सकता है। जब व्यक्ति ईर्ष्या करने के स्थान पर आत्मचिन्तन करके सुधार की दिशा में प्रयास करता है, तब उसके मन में जिज्ञासा और विकास की भावना जाग्रत होती है। यही जिज्ञासा उसे प्रगति के मार्ग पर ले जाती है और धीरे-धीरे ईर्ष्या की भावना स्वतः समाप्त होने लगती है।
22. निम्नलिखित में से किसी एक पद्यांश पर आधारित सभी प्रश्नों के उनर दीजिए
(क) अबिगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौं गूंगे मीठे फल कौ रस अंतरगत ही भावे ।
परम स्वाद सबही सु निरन्तर, अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी कौ अगम-अगोचर, सो जानै जो पावै ।
रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु, निरालम्ब कित धावै ।
सब विध अगम बिचारहिं तातै, सूर सगुन-पद गावै ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans. प्रस्तुत पद्यांश सूरदास द्वारा रचित भक्तिकाव्य से लिया गया है। इसमें कवि ने ईश्वर के निर्गुण स्वरूप और उसकी अनुभूति की कठिनता का वर्णन किया है। ईश्वर की अनुभूति वही कर सकता है जिसने उसे प्राप्त किया हो।
(ii) ‘अगम-अगोचर’ से क्या तात्पर्य है ?
Ans. ‘अगम-अगोचर’ से तात्पर्य है—जो मन, वाणी और इन्द्रियों की पहुँच से परे हो, अर्थात जिसे शब्दों में व्यक्त या सामान्य ज्ञान से समझा नहीं जा सकता।
(iii) पद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. कवि सूरदास इन पंक्तियों में ईश्वर की अनुभूति की अवस्था का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर की अद्भुत और अलौकिक गति का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद अनुभव तो करता है, पर उसे बोलकर व्यक्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार ईश्वर की अनुभूति भी केवल अनुभव का विषय है, उसे वाणी से पूरी तरह प्रकट नहीं किया जा सकता। यह अनुभूति भीतर ही भीतर मन को आनंद और संतोष प्रदान करती है।
अथवा
(ख) चल अंचल में झर-झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण फूल,
दीपक से देता बार-बार
तेरा उज्वल चितवन-विलास ।
रूपसि तेरा घन-केश-पाश !
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
Ans. प्रस्तुत पद्यांश महादेवी वर्मा द्वारा रचित छायावादी काव्य से लिया गया है। इसमें कवयित्री ने नायिका के सौन्दर्य, विशेषतः उसके केशों और उज्ज्वल दृष्टि के आकर्षण का सजीव एवं कोमल चित्रण किया है।
(ii) रेखांकित पद्यांश की व्याख्या कीजिए ।
Ans. इस पंक्ति में कवयित्री नायिका के अत्यन्त आकर्षक और मनोहर सौन्दर्य का वर्णन करती है। ‘घन-केश-पाश’ से तात्पर्य है—घने, काले और लहराते हुए केश, जो बादलों के समान सुन्दर प्रतीत होते हैं। कवयित्री नायिका को ‘रूपसि’ कहकर उसके सम्पूर्ण सौन्दर्य की प्रशंसा करती है और बताती है कि उसके केश-पाश इतने मोहक हैं कि वे देखने वाले को बाँध लेते हैं। इस प्रकार इस पंक्ति में नायिका के केशों के सौन्दर्य और आकर्षण को काव्यात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश में प्रयुक्त रस और अलंकार का नाम लिखिए ।
Ans.
- रस – श्रृंगार रस
- अलंकार – उपमा अलंकार
23. दिए गए संस्कृत गद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
(क) ‘विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एवं’ इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते। अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति। तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यन्ते । अतः सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः ।
Ans. सन्दर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश भारतीय संस्कृति की एकेश्वरवादी भावना पर आधारित है। इसमें यह बताया गया है कि विभिन्न मतों और धर्मों में ईश्वर के नाम भले ही अलग-अलग हों, परन्तु ईश्वर एक ही है और सभी मतों का समान आदर करना हमारी संस्कृति का संदेश है।
हिन्दी अनुवाद :
“संपूर्ण विश्व का सृष्टिकर्ता ईश्वर एक ही है”—यह भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धान्त है। विभिन्न मतों को मानने वाले लोग भिन्न-भिन्न नामों से उसी एक ईश्वर की उपासना करते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ख्रिस्त, अल्लाह आदि नाम उसी एक परमात्मा के हैं। लोग उसी ईश्वर को गुरु भी मानते हैं। इसलिए सभी मतों के प्रति समान भाव और सम्मान रखना हमारी संस्कृति का संदेश है।
अथवा
(ख) एकदा बहवः जनाः धूप्रयानम् आरुह्य नगरं प्रति गच्छन्ति स्म। तेषु केचित् ग्रामीणः केचिच्च नागरिकाः आसन् । मौनं स्थितं तेषु एकः नागरिकः ग्रामीणान् उपहसन् अकथयत् । “ग्रामीणाः अद्यापि पूर्ववत् अशिक्षिताः अज्ञाश्च सन्ति। न तेषां विकासः अभवत् न च भवितुं शक्नोति ।” तस्य तादृशं जल्पनं श्रुत्वा कोऽपि चतुरः ग्रामीणः अब्रवीत्, भद्र नागरिक भवान् एव किञ्चित् ब्रवीतु यतो हि भवान् शिक्षितः बहुज्ञः चः अस्ति ।
Ans. सन्दर्भ :
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश सामाजिक जीवन से संबंधित है। इसमें एक घटना के माध्यम से यह बताया गया है कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ व्यवहारिक बुद्धि और विवेक है, न कि केवल घमण्ड। लेखक ने ग्रामीणों की बुद्धिमत्ता और नागरिक के अहंकार पर व्यंग्य किया है।
हिन्दी अनुवाद :
एक बार बहुत से लोग धुआँ-चालित गाड़ी (रेलगाड़ी) में बैठकर नगर की ओर जा रहे थे। उनमें कुछ ग्रामीण थे और कुछ नगर के निवासी। उन सबमें से एक नगरवासी चुप बैठे ग्रामीणों का उपहास करते हुए बोला— “ग्रामीण आज भी पहले की तरह अशिक्षित और अज्ञानी हैं। न उनका विकास हुआ है और न ही हो सकता है।” उसकी ऐसी बात सुनकर एक चतुर ग्रामीण बोला— “हे भद्र नगरवासी! आप ही कुछ बोलिए, क्योंकि आप शिक्षित और बहुत ज्ञानी हैं।”
24. दिए गए श्लोकों में से किसी एक श्लोक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
(क) धान्यानाम् उत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् ।
लाभानां श्रेय आरोम्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ।।
Ans. सन्दर्भ :
प्रस्तुत श्लोक नीति-विषयक है। इसमें मानव जीवन में श्रेष्ठ माने जाने वाले गुणों और मूल्यों का उल्लेख किया गया है तथा यह बताया गया है कि वास्तविक सुख और लाभ किन बातों में निहित हैं।
हिन्दी अनुवाद :
अन्नों में उत्तम दक्षता (कौशल) है, धन में उत्तम विद्या (श्रुत) है, लाभों में श्रेष्ठ स्वास्थ्य (आरोग्य) है और सुखों में सबसे उत्तम संतोष है।
अथवा
(ख) कोकिल ! यापय दिवसान् तावद् विरसान् करीलविटपेषु ।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ।।
Ans. सन्दर्भ :
प्रस्तुत श्लोक नीति एवं प्रकृति-विषयक है। इसमें कवि ने कोयल को उपदेश देते हुए धैर्य और उचित समय की प्रतीक्षा का भाव व्यक्त किया है।
हिन्दी अनुवाद :
हे कोकिल! तब तक करील के सूखे वृक्षों पर रहकर नीरस दिनों को बिताओ, जब तक फूलों और कोमल पत्तों से युक्त कोई आम का वृक्ष आनंदपूर्वक लहलहाने न लगे।
25. अपने पठित खण्डकाव्य के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए:
(क) (i) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी को भारत की आत्मा और स्वतंत्रता के अग्रदूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे सत्य और अहिंसा के परम उपासक हैं। उनके जीवन का मूल मंत्र सत्य, प्रेम, त्याग और करुणा है। गाँधीजी का विश्वास था कि अहिंसक संघर्ष द्वारा ही देश को स्वतंत्रता मिल सकती है।
वे सरल जीवन और उच्च विचारों के प्रतीक हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों का त्याग कर राष्ट्रसेवा को अपना धर्म बनाया। वे निर्भीक, आत्मबल से परिपूर्ण और नैतिक शक्ति से युक्त नेता थे। जनसामान्य में उनके प्रति अपार श्रद्धा थी क्योंकि वे जो कहते थे, वही करते थे। इस प्रकार ‘मुक्तिदूत’ में गाँधीजी को मानवता, नैतिकता और राष्ट्रीय चेतना के महान प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।
(ii) ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘मुक्तिदूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सजीव चित्रण किया गया है। इस सर्ग में अंग्रेजी शासन के अत्याचारों और भारतीय जनता की दयनीय स्थिति का वर्णन है।
गाँधीजी जनता को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं और उन्हें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं। देशवासियों में नवचेतना जागृत होती है और वे स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संगठित होते हैं। इस सर्ग में गाँधीजी को राष्ट्र के मार्गदर्शक और मुक्ति के दूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जनमानस में आशा और आत्मविश्वास का संचार करते हैं।
(ख) (i) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रभावशाली घटना का वर्णन कीजिए ।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रभावशाली और करुण घटना वह है जब कुन्ती युद्ध से पूर्व कर्ण को अपना पुत्र होने का सत्य बताती है। यह सत्य जानकर कर्ण के जीवन में भीषण मानसिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। एक ओर मातृस्नेह और पाण्डवों से सम्बन्ध, दूसरी ओर दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता और मित्रता—इन दोनों के बीच कर्ण दुविधा में पड़ जाता है।
अन्ततः कर्ण अपने त्याग और कर्तव्यबोध का परिचय देते हुए दुर्योधन का साथ न छोड़ने का निर्णय करता है। वह जानता है कि यह निर्णय उसे मृत्यु की ओर ले जाएगा, फिर भी वह अपने वचन और मित्रधर्म की रक्षा करता है। यह घटना कर्ण के त्याग, वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और महान चरित्र को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
(ii) ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कुन्ती को वात्सल्य और करुणा से युक्त, परन्तु आत्मग्लानि से पीड़ित माता के रूप में चित्रित किया गया है। युवावस्था में सामाजिक भय के कारण कर्ण का त्याग करना उनके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बन जाता है।
युद्ध से पूर्व कुन्ती कर्ण के पास जाकर अपने मातृत्व का रहस्य प्रकट करती है, जिससे उसके हृदय में छिपा हुआ मातृस्नेह स्पष्ट होता है। वह कर्ण को पाण्डवों से मिल जाने का आग्रह करती है, जिससे उसका जीवन सुरक्षित रह सके। इससे उसका मातृत्व, संवेदनशीलता और पश्चाताप प्रकट होता है।
इस प्रकार कुन्ती एक ऐसी नारी के रूप में उभरती है जो परिस्थितियों की शिकार है, किन्तु अन्ततः अपने पुत्र के प्रति सच्चे प्रेम और करुणा का परिचय देती है।
(ग) (i) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘मेघनाद’ की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में मेघनाद (इन्द्रजित) को असाधारण वीर, पराक्रमी और रणकौशल में निपुण योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। वह रावण का पुत्र होते हुए भी केवल वंश पर नहीं, बल्कि अपने अद्भुत पराक्रम पर गर्व करता है। देवताओं को पराजित करने के कारण उसे इन्द्रजित कहा गया।
मेघनाद युद्धनीति का ज्ञाता, शस्त्र–अस्त्रों में प्रवीण तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण योद्धा है। वह अपने कुल, पिता और राष्ट्र के प्रति अत्यन्त निष्ठावान है। युद्ध में वह निर्भीकता, साहस और रणनीति का परिचय देता है। साथ ही, उसमें स्वाभिमान और आत्मसम्मान की भावना प्रबल है। इस प्रकार ‘तुमुल’ में मेघनाद को एक महान, तेजस्वी और कर्तव्यनिष्ठ वीर के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘युद्धासन्न सौमित्रि’ सर्ग का कथानक लिखिए ।
Ans. ‘युद्धासन्न सौमित्रि’ सर्ग में युद्ध की निकटता और उससे उत्पन्न तनावपूर्ण वातावरण का सजीव चित्रण किया गया है। इस सर्ग में लक्ष्मण (सौमित्रि) को युद्ध के लिए पूर्णतः सजग और तत्पर दिखाया गया है।
राम–रावण युद्ध के निर्णायक क्षण समीप हैं। लक्ष्मण अपने कर्तव्य और वीरता के प्रति सजग होकर युद्धभूमि में उतरने के लिए तैयार होते हैं। उनके मन में उत्साह, वीररस और राष्ट्रधर्म की भावना प्रबल है। यह सर्ग लक्ष्मण के शौर्य, निष्ठा और रणसज्जा को उजागर करता है तथा युद्ध की भीषणता का प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करता है।
(घ) (i) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ‘कौशल्या-सुमित्रा मिलन’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. तृतीय सर्ग में कौशल्या और सुमित्रा का मिलन दर्शाया गया है। इस सर्ग में भरत अपनी माताओं के प्रति सम्मान और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देता है। दोनों माताओं से मिलकर वह राज्य और परिवार की जिम्मेदारियों को समझता है। सर्ग में मातृस्नेह, परिवारिक समरसता और भरत के नैतिक मूल्य प्रमुख रूप से प्रदर्शित होते हैं। यह सर्ग नायक भरत के आदर्श पुत्र और राष्ट्रभक्त के रूप में व्यक्तित्व को उजागर करता है।
(ii) ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. भरत खण्डकाव्य का नायक कर्तव्यपरायण, धर्मनिष्ठ और साहसी राजकुमार है। उसका जीवन कर्तव्य, त्याग और नैतिकता का आदर्श प्रस्तुत करता है।
- वह अपने परिवार और माताओं के प्रति सद्भाव और सम्मान रखता है।
- राज्य की जिम्मेदारियों को समझकर सदैव जनता और राष्ट्र के कल्याण की चिंता करता है।
- भरत साहसी होने के साथ-साथ विवेकी और धैर्यशील भी है।
- उसके व्यक्तित्व में धर्म, पराक्रम और नैतिकता का मेल दिखाई देता है।
इस प्रकार ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में भरत को एक आदर्श पुत्र, राजा और राष्ट्रसेवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
(ङ) (i) ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर जवाहर लाल नेहरू की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहर लाल नेहरू को उदार विचारक, दूरदर्शी और राष्ट्रभक्त नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- देशभक्ति और राष्ट्रसेवा – नेहरू ने स्वतंत्र भारत की सेवा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य माना।
- ज्ञान और दूरदर्शिता – वे सच्चे विद्वान और नीति-निर्धारक थे, जो भविष्य की योजनाओं और विकास के लिए सोचते थे।
- मानवता और करुणा – जनता के प्रति उनका व्यवहार करुणामयी और सहानुभूतिपूर्ण था।
- साहस और संघर्षशीलता – उन्होंने देश की आज़ादी और सामाजिक न्याय के लिए अनेक कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी।
- संवाद और शिक्षा का महत्त्व – नेहरू शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के प्रसार में विश्वास रखते थे।
इस प्रकार खण्डकाव्य में नेहरू को उदार, विद्वान, राष्ट्रभक्त और प्रेरक नेता के रूप में चित्रित किया गया है।
(ii) ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य में जवाहर लाल नेहरू के जीवन, विचार और योगदान का चित्र प्रस्तुत किया गया है। कथावस्तु इस प्रकार है—
- नेहरू का बाल्य और शिक्षा काल, उनके व्यक्तित्व के विकास की कहानी।
- स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका और नेतृत्व।
- समाज और राष्ट्र के प्रति उनकी संवेदनशीलता और मानवतावादी दृष्टिकोण।
- देश की स्वतंत्रता और आधुनिक भारत के निर्माण में उनके प्रयास।
संपूर्ण खण्डकाव्य में नेहरू की सत्यनिष्ठा, उदारता, नेतृत्व क्षमता और देशभक्ति को प्रमुख रूप से उजागर किया गया है।
( च) (i) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य का नायक सुदर्शन, कर्तव्यपरायण और साहसी है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- कर्तव्यनिष्ठा – नायक अपने धर्म और उत्तरदायित्व के प्रति अत्यन्त सजग और प्रतिबद्ध है।
- साहस और वीरता – संकट और कठिन परिस्थितियों में भी नायक साहसपूर्वक कार्य करता है।
- संगठन और नेतृत्व क्षमता – वह अपने समूह या समाज को संगठित कर महत्वपूर्ण कार्यों को संपन्न कराता है।
- सामाजिक चेतना और न्यायप्रियता – नायक समाज के हित के लिए निर्णय लेता है और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है।
इस प्रकार नायक सच्चे आदर्श और प्रेरणास्रोत के रूप में खण्डकाव्य में प्रस्तुत किया गया है।
(ii) ‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘आयोजन’ सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘आयोजन’ सर्ग में अग्रपूजा समारोह की तैयारी और आयोजन का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में—
- समाज और नायक दोनों मिलकर पूजा और कार्यक्रम की तैयारी करते हैं।
- आयोजन के लिए आवश्यक सामग्री, व्यवस्था और उत्सव की सुसज्जा का विवरण प्रस्तुत किया गया है।
- इस सर्ग के माध्यम से नायक की संगठन क्षमता, परिश्रम और नेतृत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- आयोजन में सहभागिता और उत्सव की गरिमा से समाज में एकता और आनंद का भाव उत्पन्न होता है।
इस प्रकार ‘आयोजन’ सर्ग नायक के कार्यसिद्धि, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व को प्रमुखता देता है।
(छ) (i) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Ans. ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में सुभाषचन्द्र बोस को वीर, साहसी और देशभक्त नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- देशभक्ति – उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए अपने जीवन का समर्पण किया।
- साहस और निडरता – कठिन परिस्थितियों और अंग्रेजों के विरोध के बावजूद उन्होंने साहस नहीं खोया।
- नेतृत्व और प्रेरणा शक्ति – जनता और सैनिकों को अपने विचारों से संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेरित किया।
- संघर्षशील और दृढ़संकल्पी – उन्होंने किसी भी बाधा के सामने अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटा।
- सामाजिक और नैतिक दृष्टि – उनके जीवन में सत्य, न्याय और अनुशासन का विशेष स्थान था।
इस प्रकार खण्डकाव्य में सुभाषचन्द्र बोस को एक आदर्श नायक और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चित्रित किया गया है।
(ii) ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans. द्वितीय सर्ग में सुभाषचन्द्र बोस की देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका का चित्रण किया गया है। इस सर्ग में—
- सुभाषचन्द्र बोस युवा अवस्था में देश की आज़ादी के लिए प्रेरित होते हैं।
- ब्रिटिश शासन के अत्याचारों और जनता की पीड़ा को देखकर वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान देने का निश्चय करते हैं।
- अपने नेतृत्व और साहस से लोगों को संगठित कर स्वतंत्रता की ओर मार्गदर्शन करते हैं।
- इस सर्ग में उनके साहस, प्रेरक नेतृत्व और देशभक्ति की झलक प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
इस प्रकार द्वितीय सर्ग सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व, साहस और स्वतंत्रता के प्रति उनके दृढ़ संकल्प को उजागर करता है।
(ज) (i) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।
Ans. ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और वीरों के बलिदान का वर्णन है। इस सर्ग में—
- स्वतंत्रता के लिए युवाओं की प्रेरणा और उनके साहस का चित्रण किया गया है।
- देश की रक्षा और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए उनके संघर्ष और संघर्षशीलता का वर्णन है।
- समाज में जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का संचार दिखाया गया है।
- विशेष रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों और वीरों के समर्पण के माध्यम से मातृभूमि के प्रति गहन प्रेम और त्याग को उजागर किया गया है।
इस सर्ग में मातृभूमि के प्रति समर्पण और देशभक्ति का सशक्त संदेश मिलता है।
(ii) ‘मातृ-भूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चन्द्रशेखर आज़ाद’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आज़ाद को अद्भुत साहस, निडरता और देशभक्ति का प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- साहस और निडरता – वे कभी भी अंग्रेजों के भय से नहीं डरते और स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।
- देशभक्ति और त्याग – अपनी जान की परवाह किए बिना मातृभूमि की सेवा और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं।
- संगठन और नेतृत्व क्षमता – अन्य क्रांतिकारियों को मार्गदर्शन देते हैं और संगठन में अनुशासन बनाए रखते हैं।
- दृढ़ निश्चय और समर्पण – अपने लक्ष्य के प्रति हमेशा अडिग रहते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
इस प्रकार चन्द्रशेखर आज़ाद खण्डकाव्य में स्वतंत्रता सेनानी, साहसी और प्रेरक नायक के रूप में उभरते हैं।
(झ ) (i) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर राणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans. ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य में राणा प्रताप को वीर, साहसी और निडर राष्ट्रभक्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- देशभक्ति और मातृभूमि प्रेम – राणा प्रताप ने कभी अपने राज्य और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समझौता नहीं किया।
- साहस और वीरता – युद्ध में उन्होंने अद्वितीय शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन किया।
- कर्तव्यनिष्ठा और सम्मान – अपने परिवार और प्रजा के प्रति जिम्मेदार और न्यायप्रिय थे।
- दृढ़ निश्चय और आत्मनिर्भरता – कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी स्वतंत्रता और सम्मान को बनाए रखा।
इस प्रकार खण्डकाव्य में राणा प्रताप एक आदर्श नायक और प्रेरणादायक वीर के रूप में उभरते हैं।
(ii) ‘मेवाड़ मुकुट’ खण्डकाव्य के ‘अरावली’ सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
Ans. ‘अरावली’ सर्ग में राणा प्रताप का संघर्ष और रणभूमि की तैयारी का चित्रण है। इस सर्ग में—
- राणा प्रताप और उनकी सेना अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित कठिन भूदृश्यों का लाभ उठाकर युद्ध के लिए तैयार होते हैं।
- वे मर्यादा, साहस और रणनीति के साथ अंग्रेजों या शत्रुओं का सामना करने के लिए योजना बनाते हैं।
- इस सर्ग में रणभूमि की भीषणता, वीरता और नायक की पराक्रमशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- युद्ध की तैयारी और युद्ध के लिए मानसिक और शारीरिक सजगता पर विशेष जोर दिया गया है।
इस प्रकार ‘अरावली’ सर्ग राणा प्रताप के वीरता, रणनीति और साहस को प्रमुख रूप से दर्शाता है।
26. (क) निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:
(i) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
Ans. जीवन परिचय:
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता और स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को झारखंड के जीरादेई में हुआ था। वे शिक्षा में निपुण और विद्वान् थे। उन्होंने कानून और संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनका जीवन सादगी, ईमानदारी, राष्ट्रभक्ति और सेवा में समर्पित रहा। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और देशवासियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बने। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद न केवल राजनीतिज्ञ थे, बल्कि समाज, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी गहन चिंतक रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और मानव मूल्यों पर अनेक लेख और भाषण दिए। उनका निधन 28 फरवरी 1963 को हुआ।
प्रमुख रचना: ‘भारत की खोज’ – जिसमें उन्होंने भारत के इतिहास, संस्कृति और सामाजिक जीवन का विस्तृत विवेचन किया है।
(ii) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
Ans. जीवन परिचय:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य के महान आलोचक, समीक्षक और इतिहासकार थे। उनका जन्म 30 नवंबर 1899 को उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे बचपन से ही साहित्य और संस्कृति में रुचि रखते थे। उन्होंने हिंदी साहित्य के विकास और विभिन्न युगों का गहन अध्ययन किया। आचार्य शुक्ल ने साहित्य को समाज और संस्कृति के संदर्भ में समझने की दृष्टि अपनाई और हिंदी साहित्य का विस्तृत, वैज्ञानिक और तार्किक इतिहास लिखा। उनका लेखन हमेशा वस्तुनिष्ठ, गहन और शिक्षाप्रद रहा। उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका निधन 15 जनवरी 1961 को हुआ।
प्रमुख रचना: ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ – जिसमें हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल से आधुनिक युग तक के विकास, प्रवृत्तियों और प्रमुख रचनाकारों का व्यवस्थित विवरण है।
(iii) भगवतभरण उपाध्याय
Ans. जीवन परिचय:
भगवतभरण उपाध्याय आधुनिक हिंदी के प्रमुख लेखक और निबंधकार थे। उनका जन्म 1884 में हुआ। वे समाज, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के गहन विचारक थे। उनका लेखन सरल, प्रभावशाली और विचारोत्तेजक था। उन्होंने समाज के नैतिक और सांस्कृतिक पक्षों पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया और पाठकों के मन में सकारात्मक चेतना और नैतिक जागरूकता पैदा की। उनके निबंधों में जीवन और समाज के वास्तविक अनुभवों का सुंदर संयोजन देखने को मिलता है। उनका निधन 1968 में हुआ।
प्रमुख रचना: ‘संस्कृति और सभ्यता’ – जिसमें समाज, संस्कृति और मानव मूल्यों पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
(ख) निलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:
(i) सूरदास
Ans. जीवन परिचय:
सूरदास भक्ति काल के महान संत और कवि थे। उनका जन्म सन् 1478 में उत्तर भारत के हरियाणा या ब्रज क्षेत्र में हुआ था। वे दृष्टिहीन थे, लेकिन उनकी आध्यात्मिक दृष्टि अत्यंत तीक्ष्ण और जीवनदर्शन में अद्भुत थी। सूरदास ने अपने जीवन में कृष्ण भक्ति, मानवता और नैतिकता को सर्वोच्च स्थान दिया। उनका काव्य सरल, प्रवाहपूर्ण और अत्यंत भावपूर्ण है। उन्होंने अपने पदों और भजनों के माध्यम से भगवान कृष्ण के बाल्यकाल, रासलीला और भक्तों के प्रेम का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया। उनके काव्य में प्रेम, भक्ति, करुणा और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर संगम देखने को मिलता है। सूरदास ने आम लोगों के हृदय में भक्ति और प्रेम की गहरी प्रेरणा जगाई और हिंदी साहित्य को अत्यधिक समृद्ध किया। उनका लेखन समाज और संस्कृति के प्रति सजग दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रमुख रचना: ‘सूरसागर’ – इसमें कृष्ण के बाल्यकाल, रासलीला और भक्तों के प्रेम का सुंदर वर्णन है।
निधन: 1583
(ii) मंथिलीशरण गुम
Ans. जीवन परिचय:
मंथिलीशरण गुम आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि और लेखक थे। उनका जन्म 1886 में बिहार के पटना जिले में हुआ। वे स्वतंत्रता संग्राम के समय में साहित्य के माध्यम से राष्ट्रभक्ति और समाज सुधार के विचार फैलाने वाले कवि माने जाते हैं। उनके काव्य में देशभक्ति, सामाजिक चेतना, मानव मूल्यों और नैतिक शिक्षा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मंथिलीशरण गुम की रचनाएँ सरल भाषा में हैं, जिससे आम पाठक भी उन्हें सहजता से समझ सके। उन्होंने अपने काव्य में जीवन की वास्तविकताओं को प्रस्तुत किया और समाज को नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से जागरूक किया। उनकी रचनाएँ आज भी समाज, मानवता और देशभक्ति के प्रेरक स्रोत के रूप में पढ़ी जाती हैं।
प्रमुख रचना: ‘राग दरबारी’ – यह उनकी प्रमुख रचना है, जिसमें उन्होंने समाज और संस्कृति के विविध पहलुओं का विश्लेषण किया।
निधन: 1961
(iii) महादेवी वर्मा
Ans. जीवन परिचय:
महादेवी वर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्री और छायावाद की प्रतिष्ठित हस्ती थीं। उनका जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फ़तेहगढ़ जिले में हुआ। वे अत्यंत संवेदनशील, सृजनशील और भावपूर्ण कवयित्री थीं। उनके जीवन और लेखन में मानव पीड़ा, प्रकृति प्रेम, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिकता और स्त्री मनोविज्ञान की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। महादेवी वर्मा का लेखन सरल, सहज और अत्यंत प्रभावशाली है, जो पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है। उन्होंने समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए भी कई प्रेरक लेख लिखे और महिला सशक्तिकरण के लिए अपनी आवाज़ उठाई। उनके काव्य में भावनाओं की गहराई, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का उत्कृष्ट मिश्रण देखने को मिलता है।
प्रमुख रचना: ‘नीरज’ – यह उनका प्रमुख कविता संग्रह है, जिसमें जीवन, प्रकृति, मानव और सामाजिक मूल्यों का सुंदर और मार्मिक चित्रण है।
निधन: 11 अक्टूबर 1987
27. अपनी पाठ्य-पुस्तक के संस्कृत खण्ड की पाठ्यवस्तु से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो ।
Ans. श्लोक:
सर्वे भवन्तु सुखिनः,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,
माकश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।
अर्थ:
सभी लोग सुखी हों, सभी लोग निरोगी हों, सभी लोग शुभ देखकर आनंदित हों, और किसी को भी दुःख का भाग न मिले।
28. छात्रावास की जीवन-गली विषय पर अपने मित्र को पत्र लिखिए।
Ans. प्रेषक: राम कुमार
स्थान: जवाहर छात्रावास, लखनऊ
दिनांक: 18 जनवरी 2026
प्रिय मित्र,
सप्रेम नमस्कार।
मैं तुम्हें यह पत्र लिखते हुए बहुत खुश हूँ। यहाँ छात्रावास का जीवन बहुत ही रोचक और अनुशासित है। हमारे जीवन-गली में हर दिन एक नया अनुभव लेकर आता है। सुबह की समय-सारणी से लेकर अध्ययन और खेलकूद तक सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से चलता है। हम साथ में पढ़ाई करते हैं, खेलकूद में भाग लेते हैं और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।
छात्रावास की जीवन-गली में मित्रता का भी बहुत महत्व है। यहाँ के साथी हमेशा एक-दूसरे का सहयोग करते हैं और अच्छे संबंध बनाए रखते हैं। रात में हम किताबें पढ़ते हैं, एक-दूसरे से ज्ञान साझा करते हैं और कभी-कभी खेल या गीत-संगीत में समय बिताते हैं। छात्रावास का वातावरण अनुशासन, सहयोग और आत्मनिर्भरता सिखाता है।
मित्र, मुझे आशा है कि तुम्हारा समय भी इसी प्रकार अच्छा बीत रहा होगा। अगले अवसर पर हम साथ मिलकर छात्रावास की इन मजेदार गतिविधियों का आनंद जरूर लेंगे।
तुम्हारा स्नेही मित्र,
राम कुमार
अथवा
विद्यालय में खेल-कूद की सामग्री की ओर ध्यान दिलाते हुए प्रधानाचार्य को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए ।
Ans. प्रति,
प्रधानाचार्य,
[विद्यालय का नाम],
[शहर का नाम]
विषय: विद्यालय में खेल-कूद की सामग्री की व्यवस्था हेतु प्रार्थना
मान्यवर,
सविनय निवेदन है कि हमारे विद्यालय में खेल-कूद की गतिविधियाँ विद्यार्थियों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में खेल-कूद की सामग्री जैसे फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, बैडमिंटन, घुड़सवारी सामग्री, और अन्य उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। इस कारण हमारे खेल और प्रतियोगिताएँ पूर्ण रूप से आयोजित नहीं हो पा रही हैं।
अतः आपसे सादर निवेदन है कि हमारे विद्यालय में आवश्यक खेल-कूद सामग्री की व्यवस्था की जाए, जिससे सभी विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग ले सकें और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकें। यह न केवल हमारे शारीरिक विकास के लिए उपयोगी होगा, बल्कि हमें टीम भावना और अनुशासन की सीख भी देगा।
आपकी कृपा और सहयोग के लिए हम सदैव आभारी रहेंगे।
धन्यवाद।
भवदीय,
[आपका नाम]
कक्षा – [अपनी कक्षा]
[दिनांक]
29. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए :
(i) श्वेतकेतुः कः आसीत् ?
Ans. श्वेतकेतुः एका प्रसिद्धा नक्षत्रिका आसीत्।
(ii) पुरुराजः केन सह युद्धम् अकरोत् ?
Ans. पुरुराजः दुर्योधनस्य सह युद्धम् अकरोत्।
(iii) चन्द्रशेखरः स्वनाम किम् अवदत् ?
Ans. चन्द्रशेखरः स्वनाम “आजाद” इति अवदत्।
(iv) भूमेः गुरुतरं किम् अस्ति ?
Ans. भूमेः गुरुतरं पर्वतः वा पहाडः अस्ति।
30. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :
(i) जीवन में विज्ञान का महत्त्व
Ans. विज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह मानव जीवन को सरल, सुगम और सुविधाजनक बनाने का काम करता है। विज्ञान के कारण हम विभिन्न प्रकार की तकनीकी, चिकित्सा, संचार और परिवहन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, आधुनिक यंत्रों और उपकरणों के माध्यम से हमारी शिक्षा, स्वास्थ्य और कार्यकुशलता में सुधार हुआ है।
विज्ञान ने जीवन को सुगम तो बनाया ही है, साथ ही हमारी सोच और दृष्टिकोण को भी विस्तृत किया है। अंतरिक्ष अन्वेषण, जैविक शोध, कंप्यूटर और इंटरनेट की उपलब्धियाँ मानव सभ्यता के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। विज्ञान ने रोगों का निदान, नई दवाइयाँ और स्वास्थ्य सेवाओं को संभव बनाया।
इस प्रकार, जीवन में विज्ञान का महत्त्व केवल सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव समाज के विकास, प्रगति और सहज जीवन के लिए अनिवार्य है। हमें विज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए और इसे समाज के कल्याण के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।
(ii) भारत में आतंकवादः समस्या और समाधान
Ans. आधुनिक भारत में आतंकवाद एक गंभीर समस्या बन गया है। यह न केवल देश की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि समाज में भय और अस्थिरता भी फैलाता है। आतंकवादी कार्यों में हत्याएँ, बम विस्फोट, अपहरण और सामाजिक विभाजन शामिल हैं। इसका मुख्य कारण असमानता, शिक्षा का अभाव, चरमपंथी विचार और गलत राजनीतिक दृष्टिकोण हैं।
इस समस्या का समाधान केवल सेना और पुलिस पर निर्भर नहीं है। इसके लिए समाज को जागरूक करना, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना, चरमपंथियों के विचारों का विरोध करना और सांस्कृतिक-सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही, सरकार को कड़े कानून, खुफिया तंत्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से आतंकवाद पर नियंत्रण रखना चाहिए।
यदि हम सामूहिक प्रयास करें, तो भारत में आतंकवाद को कम किया जा सकता है और देश को सुरक्षित तथा शांतिपूर्ण बनाया जा सकता है।
(iii) छात्र और अनुशासन
Ans. छात्र जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय होता है। इस समय में छात्र का चरित्र, आदतें और सोच बनती हैं। अनुशासन किसी भी छात्र के सफल जीवन की कुंजी है। अनुशासन का अर्थ है समय का सही उपयोग करना, नियमों का पालन करना, कार्य को समय पर पूरा करना और जिम्मेदार बनना।
अनुशासनित छात्र अपने लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। वे पढ़ाई, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों में संतुलन बनाए रखते हैं। अनुशासन से न केवल ज्ञान प्राप्ति में मदद मिलती है, बल्कि व्यक्तित्व और नैतिक मूल्यों का विकास भी होता है। माता-पिता और शिक्षक द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करना भी अनुशासन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस प्रकार, छात्र और अनुशासन का संबंध सीधे उनके उज्ज्वल भविष्य और समाज के लिए योगदान से जुड़ा है।
(iv) आजादी का अमृत महोत्सव
Ans. आजादी का अमृत महोत्सव स्वतंत्र भारत के 75 वर्षों की उपलब्धियों और स्वतंत्रता संग्राम के वीरों को याद करने का अवसर है। इस अवसर पर हम उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनायकों को सम्मान देते हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें स्वतंत्र भारत दिया।
अमृत महोत्सव का महत्व केवल इतिहास याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें देशभक्ति, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की प्रेरणा भी देता है। विद्यालय, समाज और प्रशासन सभी मिलकर सांस्कृतिक, शैक्षिक और तकनीकी कार्यक्रमों के माध्यम से इस महोत्सव को मनाते हैं।
इस महोत्सव का उद्देश्य युवाओं में स्वतंत्रता के मूल्य, लोकतंत्र की महत्ता और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना जागृत करना है। यह उत्सव हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता की रक्षा और देश के विकास के लिए हमें सतत प्रयास करते रहना चाहिए।