UP DELED 3rd Semester Samaaveshee Shiksha Question Paper 2025 आप यहां से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नही लिया जाएगा, आप आसानी से इसे हल कर सकेंगे । आइए विस्तार से सभी प्रश्नो को जानें –
प्रश्न-पुस्तिका
तृतीय सेमेस्टर – 2025
द्वितीय प्रश्न-पत्र
(समावेशी शिक्षा)
1. सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित अंक प्रश्न के सम्मुख दिये गये हैं।
2. इस प्रश्न-पत्र में तीन प्रकार के (वस्तुनिष्ठ, अतिलघु उत्तरीय तथा लघु उत्तरीय) प्रश्न हैं। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के सही विकल्प छाँटकर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखें। अति लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर लगभग तीस (30) शब्दों में, लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर लगभग पचास (50) शब्दों में लिखिए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
Q1) निर्देशन में माध्यमों का प्रयोग किया जाता है-
1) औपचारिक 2) अनौपचारिक
3) उपर्युक्त दोनों 4) इनमें से कोई नहीं
Ans. 3) उपर्युक्त दोनों
Q2) राष्ट्रीय न्यास अधिनियम कब पारित हुआ-
1) 1999 2) 1988
3) 1998 4) 2000
Ans. 1) 1999
Q3) समावेशी आवासीय संस्थाएं पायी जाती है-
1) अमेरिका एवं ब्रिटेन 2) भारत एवं पाकिस्तान
3) रूस एवं फ्रांस 4) जापान एवं चीन
Ans. 1) अमेरिका एवं ब्रिटेन
Q4) साइको गैलवनिक स्किन रेजिस्टेन्स आडियोमीटर का प्रयोग करते है-
1) श्रवण बाधित पर 2) अस्थि बाधित पर
3) दृष्टि बाधित पर 4) उपरोक्त सभी
Ans. 1) श्रवण बाधित पर
Q5) पुनर्वास प्रशिक्षण एवं शोध राष्ट्रीय संस्थान स्थित है-
1) उत्तर प्रदेश 2) बिहार
3) उड़ीसा 4) लखनऊ
Ans. 3) उड़ीसा
Q6) डिस्ग्राफिया (Dysgraphia) सम्बन्धित है-
1) पढ़ने से सम्बन्धित अयोग्यता 2) लिखने से सम्बन्धित अयोग्यता
3) बोलने से सम्बन्धित अयोग्यता 4) चलने से सम्बन्धित अयोग्यता
Ans. 2) लिखने से सम्बन्धित अयोग्यता
Q7) सही दृष्टि कहलाती है-
1) 6/6 2) 6/9
3) 6/12 4) 0.6/18
Ans. 1) 6/6
Q8) “वंचित होना बाल्य जीवन की उद्दीपको की दशाओं की न्यूनता है।” कथन है-
1) वॉकमैन 2) गार्डन
3) आंटो 4) जिसबर्ट
Ans. 2) गार्डन
Q9) प्रतिभाशाली बालकों की इन्द्रियां होती है-
1) अविकसित 2) सामान्य
3) तीव्र 4) इनमें से कोई नहीं
Ans. 3) तीव्र
Q10) संगणक का सम्बन्ध है-
1) अनुदेशन 2) शिक्षण
3) दोनों 4) कोई नही
Ans. 3) दोनों
Q11) प्रारम्भिक अवस्था में मन्द बुद्धि बालकों की पहचान हो सकती है-
1) अवलोकन से 2) परीक्षण से
3) साक्षात्कार से 4) प्रक्षेपी प्रविधि से
Ans. 1) अवलोकन से
Q12) परामर्श से सम्बन्धित उपकरण है-
1) संचित अभिलेख 2) साक्षात्कार
3) आत्म कथाएँ एवं निरीक्षण 4) उपर्युक्त सभी
Ans. 4) उपर्युक्त सभी
Q13) ब्लैक बोर्ड किस उपकरण की श्रेणी में है-
1) कठोर 2) मृदु
3) दोनों 4) कोई नहीं
Ans. 1) कठोर
Q14) मन्द बाधित बच्चे का डेसीबल स्तर होता है-
1) 31-51 DB 2) 55-69 DB
3) 72-89 DB 4) 90-100 DB
Ans. 1) 31-51 DB
Q15) टेलर-फ्रेम का उपयोग किया जाता है-
1) दृष्टि बाधित 2) श्रवण बाधित
3) मानसिक मंदता 4) विशिष्ट अधिगम अक्षमता
Ans. 1) दृष्टि बाधित
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
Q16) बुद्धि लब्धि का सूत्र लिखिए।
Ans. बुद्धि लब्धि (IQ) = (मांचान आयु ÷ वास्तविक आयु) × 100
Q17) सांकेतिक भाषा किसके लिए प्रयुक्त होती है?
Ans. सांकेतिक भाषा श्रवण बाधित एवं मूक-बधिर व्यक्तियों के संप्रेषण हेतु प्रयोग की जाती है।
Q18) संयुक्त राष्ट्र ने निःशक्त जन अधिकार की घाषणा कब की?
Ans. संयुक्त राष्ट्र ने निःशक्त जन अधिकार घोषणा 1975 में की।
Q19) निर्देशन के दो उपकरण बताइए।
Ans. अवलोकन, साक्षात्कार।
Q20) AAMD का पूरा नाम लिखिए।
Ans. American Association on Mental Deficiency.
Q21) सृजनात्मकता के प्रमुख तत्त्व बताइए।
Ans. द्रुतता, प्रवाह, मौलिकता, लचीलापन सृजनात्मकता के प्रमुख तत्त्व हैं।
Q22) अपवचन से आप क्या समझते है?
Ans. अपवचन का अर्थ अनुचित व्यवहारों एवं आदतों का क्रमिक रूप से हटाया जाना है।
Q23) शैक्षिक समावेशन से क्या तात्पर्य है?
Ans. सभी बच्चों को उनकी विविध क्षमताओं सहित सामान्य विद्यालय में समान अवसर प्रदान करना समावेशन है।
Q24) विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस कब मनाया जाता है?
Ans. 10 अक्टूबर को।
Q25) DSM का पूरा नाम बताइए।
Ans. Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders.
Q26) मनोविज्ञानशाला उ.प्र. में कहाँ स्थित है?
Ans. इलाहाबाद (प्रयागराज) में स्थित है।
Q27) पर्यवेक्षण और निरीक्षण में अन्तर बताइए।
Ans. पर्यवेक्षण वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध अध्ययन है, जबकि निरीक्षण केवल सामान्य देखने या जाँचने की क्रिया है।
Q28) पिछड़ापन मापने की इकाई क्या होती है?
Ans. बुद्धिलब्धि (IQ) इकाई प्रयोग होती है।
Q29) पर्यवेक्षण के कोई दो प्रकार लिखिए।
Ans. संरचित पर्यवेक्षण, असंरचित पर्यवेक्षण।
Q30) हॉलिग वर्थ की एक पुस्तक का नाम लिखिए-
Ans. “Psychology of Functional Neuroses”.
लघु उत्तरीय प्रश्न
Q31) बालकों के शैक्षणिक पिछडेपन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
Ans. बालकों के शैक्षणिक पिछड़ेपन के अनेक कारण हो सकते हैं, जिन्हें मुख्यतः निम्न प्रकार से समझा जा सकता है—
• भावनात्मक एवं व्यवहारिक कारण – डर, तनाव, आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, अनुशासनहीनता आदि बच्चे की प्रगति को बाधित करते हैं।
• बौद्धिक कारण – कम बुद्धिलब्धि, सीखने में कठिनाई, विशिष्ट अधिगम अक्षमता (डिस्लेक्सिया आदि) के कारण बच्चा पढ़ाई में पीछे रह जाता है।
• शारीरिक एवं स्वास्थ्य संबंधी कारण – बार-बार बीमार होना, सुनने-देखने में कमी, कुपोषण आदि से अधिगम प्रभावित होता है।
• पारिवारिक कारण – परिवार में तनाव, अशिक्षा, अभाव, माता-पिता का सहयोग न मिलना, अनुचित वातावरण आदि से बच्चा पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाता।
• विद्यालय संबंधी कारण – अनुचित शिक्षण विधियाँ, शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों में कमी, भीड़भाड़ वाले कक्षाएँ, कम संसाधन, नीरस वातावरण भी पिछड़ापन बढ़ाते हैं।
• सामाजिक-आर्थिक कारण – गरीबी, पिछड़ा परिवेश, सामाजिक भेदभाव, शिक्षण के अवसरों की कमी आदि से बच्चा पढ़ाई में पीछे रह जाता है।
Q32) विद्यालय में समाबेसी शिक्षा प्रदान किये जाने में अध्यापक की भूमिका बताइए।
Ans. विद्यालय में समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) को सफल बनाने में अध्यापक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अध्यापक निम्न प्रकार से योगदान देते हैं—
• निरंतर मूल्यांकन – शिक्षक निरंतर एवं व्यापक मूल्यांकन द्वारा बच्चों की सीखने की प्रगति पर निगरानी रखता है और आवश्यकतानुसार सुधार करता है।
• सभी बच्चों को समान अवसर देना – शिक्षक बिना भेदभाव के सामान्य, दिव्यांग, प्रतिभाशाली, धीमी गति से सीखने वाले सभी बच्चों को एक ही कक्षा में सीखने का अवसर प्रदान करता है।
• व्यक्तिगत अंतर को समझना – शिक्षक बच्चों की विभिन्न आवश्यकताओं, क्षमताओं, गति तथा सीखने की शैली को पहचानकर उसी अनुसार शिक्षण की योजना बनाता है।
• उपयुक्त शिक्षण रणनीतियाँ अपनाना – गतिविधि-आधारित शिक्षण, बहु-संवेदी विधि, सहपाठी सहयोग, सरल भाषा, दृश्य-सामग्री, छोटे समूहों में कार्य आदि का प्रयोग करता है।
• सकारात्मक एवं सहयोगी वातावरण बनाना – शिक्षक कक्षा में मित्रवत, सुरक्षित और प्रेरक वातावरण तैयार करता है, जहाँ सभी बच्चे सहज महसूस करें।
• सहायक उपकरणों का उपयोग – श्रवण यंत्र, ब्रेल लिपि, बड़े अक्षरों वाली पुस्तकें, विशेष शिक्षण सामग्री जैसे उपकरणों का उपयोग कर दिव्यांग बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाता है।
• अभिभावकों और विशेषज्ञों से समन्वय – विशेष शिक्षकों, चिकित्सकों, काउंसलरों एवं अभिभावकों के साथ मिलकर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उचित योजना तैयार करता है।
• संवेदनशीलता एवं सहानुभूति विकसित करना – शिक्षक छात्रों में सहयोग, सहिष्णुता तथा विविधता के प्रति सम्मान की भावना विकसित करता है।
Q33) अपराधी बालकों की उपचार विधियों पर प्रकाश डालिए।
Ans. अपराधी बालक (Delinquent Children) वे होते हैं जिनका व्यवहार सामाजिक नियमों, नैतिक मूल्यों और विधिक मानकों के विपरीत होता है। ऐसे बालकों के पुनर्वास और सुधार हेतु विभिन्न उपचारात्मक विधियाँ अपनाई जाती हैं। मुख्य उपचार विधियाँ इस प्रकार हैं—
1. मनोचिकित्सीय उपचार (Psychotherapy)
• इसमें प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक बालकों को व्यक्तिगत या समूह परामर्श देते हैं।
• उनके तनाव, कुंठा, भय, आक्रोश तथा असामाजिक प्रवृत्तियों को समझकर उचित व्यवहारिक परिवर्तन लाया जाता है।
2. व्यवहार संशोधन (Behaviour Modification)
• अच्छी आदतों को बढ़ाने और नकारात्मक व्यवहार को कम करने के लिए रिवॉर्ड (अच्छे कार्य पर प्रशंसा/पुरस्कार) तथा पनिशमेंट (गलत कार्य पर सुधारात्मक प्रतिक्रिया) का उपयोग किया जाता है।
• सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement) विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।
3. परामर्श विधि (Counselling Method)
• अपराधी बालकों की भावनात्मक समस्याओं, परिवारिक तनाव, विद्यालयिक कठिनाइयों और सामाजिक संघर्षों के समाधान हेतु व्यक्तिगत एवं समूह परामर्श दिया जाता है।
• इससे बच्चों में आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण तथा सही निर्णय की क्षमता विकसित होती है।
4. परिवार-चिकित्सा (Family Therapy)
• कई बार बाल अपराध का मूल कारण परिवारिक तनाव, उपेक्षा, झगड़े या गलत वातावरण होता है।
• इसलिए परिवार को भी उपचार की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है ताकि घर का वातावरण सहयोगपूर्ण और प्रेरक बनाया जा सके।
5. खेल एवं श्रम-चिकित्सा (Play and Occupational Therapy)
• खेल-कूद, चित्रकारी, शिल्प, हस्तकला, उद्यान-कार्य जैसे रचनात्मक कार्य उन्हें ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करने में मदद करते हैं।
• यह विधि तनाव कम करती है और अनुशासन, टीमवर्क, जिम्मेदारी और आत्मसंयम विकसित करती है।
6. शैक्षिक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण
• उपयुक्त शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण (जैसे– कंप्यूटर, सिलाई, बढ़ईगीरी, पेंटिंग आदि) से बालक आत्मनिर्भर बनते हैं और गलत गतिविधियों से दूरी रखते हैं।
7. सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम (Social Rehabilitation)
• समाज में पुनः स्वीकार्यता के लिए विशेष कार्यक्रम, सामुदायिक सेवा, सकारात्मक समूहों से संबंध आदि शामिल किए जाते हैं।
• यह बच्चों में सामाजिक उत्तरदायित्व और सहानुभूति उत्पन्न करते हैं।
Q34) बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श का महत्व बताइए।
Ans. बाल अधिगम में निर्देशन (Guidance) और परामर्श (Counselling) अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, क्योंकि ये दोनों बच्चों को सही दिशा, प्रेरणा और आवश्यक सहयोग प्रदान करते हैं। इनके महत्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है—
1. अधिगम में आने वाली कठिनाइयों का समाधान
• कई बार बच्चों को विषय समझने, याद रखने या लिखने में कठिनाई होती है। निर्देशन एवं परामर्श उनके सीखने की समस्याओं को पहचानकर उनका उचित समाधान प्रदान करते हैं।
2. भावनात्मक संतुलन विकसित करना
• बच्चे अक्सर तनाव, डर, असुरक्षा, आत्मविश्वास की कमी जैसे भावनात्मक दबाव से गुजरते हैं। परामर्श उनकी भावनाओं को संतुलित करता है और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है।
3. उचित अध्ययन आदतों का विकास
• निर्देशन बच्चों को समय प्रबंधन, अध्ययन तकनीक, नोट्स बनाने तथा नियमित अभ्यास करने जैसी सही आदतें सिखाता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता बढ़ती है।
4. व्यक्तित्व एवं सामाजिक विकास में सहायता
• परामर्श बच्चों को व्यवहार, अनुशासन, सहयोग, सहानुभूति और नैतिक मूल्यों की दिशा में सुधार लाता है।
• इससे उनका व्यक्तित्व सर्वांगीण रूप से विकसित होता है।
5. रुचि एवं क्षमताओं की पहचान
• निर्देशन के माध्यम से शिक्षक बच्चे की रुचि, योग्यता और उनकी विशेष क्षमताओं को पहचानते हैं और उसी दिशा में उसे आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।
6. अनुशासनहीन व्यवहार में सुधार
• परामर्श बच्चों के नकारात्मक व्यवहार (आक्रोश, चिड़चिड़ापन, उदासीनता) को समझकर उनमें सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
7. करियर और भविष्य की दिशा
• बड़े बच्चों के लिए अध्ययन एवं कैरियर से संबंधित सही मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है, ताकि वे सही निर्णय ले सकें।
8. अभिभावकों और विद्यालय के बीच समन्वय
• निर्देशन-अनुदेशन शिक्षक, छात्र और अभिभावक के बीच संवाद स्थापित करता है, जिससे बच्चों का विकास अधिक प्रभावी रूप से हो पाता है।
Q35) भारतीय पुनर्वास परिषद् के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
Ans. भारतीय पुनर्वास परिषद् (Rehabilitation Council of India–RCI) दिव्यांगजन से संबंधित सेवाओं को व्यवस्थित, मानकीकृत और नियंत्रित करने वाली प्रमुख राष्ट्रीय संस्था है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं—
1. पुनर्वास पेशेवरों का पंजीकरण
• विशेष शिक्षकों, पुनर्वास कार्यकर्ताओं, चिकित्सीय विशेषज्ञों आदि का पंजीकरण करना तथा उन्हें वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान करना।
2. पाठ्यक्रमों का मानकीकरण
• दिव्यांग शिक्षा, फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच थेरेपी आदि से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मानकीकृत करना।
3. शिक्षण संस्थानों का मान्यता प्रदान करना
• विशेष शिक्षा एवं पुनर्वास सेवाएँ चलाने वाले विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों तथा संस्थानों का निरीक्षण करके उन्हें मान्यता प्रदान करना।
4. पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना
• प्रशिक्षित एवं योग्य पेशेवरों द्वारा ही सेवाएँ प्रदान हों, यह सुनिश्चित करना।
• सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने हेतु समय-समय पर निरीक्षण करना।
5. सिलेबस एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विकास
• विशेष शिक्षा, पुनर्वास तथा दिव्यांगजन से संबंधित नए कोर्स तैयार करना तथा पुरानों में आवश्यक संशोधन करना।
6. शोध एवं विकास को बढ़ावा देना
• दिव्यांगजन की शिक्षा, पुनर्वास और समावेशन से संबंधित शोध कार्यों को प्रोत्साहित एवं समर्थन करना।
7. जागरूकता एवं संवेदनशीलता
• समाज में दिव्यांगजन के अधिकारों, पुनर्वास सेवाओं और समावेशन के बारे में जागरूकता फैलाना।
8. व्यावसायिक नैतिकता का पालन
• पुनर्वास क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों के आचरण, नियमों और नैतिक मानकों को निर्धारित एवं नियंत्रित करना।
9. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग
• पुनर्वास सेवाओं के विकास हेतु अन्य संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करना।
Q36) शाब्दिक एवं अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण में अन्तर को समझाइए।
Ans. बुद्धि परीक्षण दो मुख्य प्रकार के होते हैं— शाब्दिक (Verbal) और अशाब्दिक (Non-verbal)। दोनों ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमताओं को मापते हैं, परन्तु इनके आधार एवं परीक्षण-पद्धति भिन्न होती है।
1. शाब्दिक बुद्धि परीक्षण (Verbal Intelligence Test)
यह ऐसे परीक्षण होते हैं जिनमें भाषा का प्रयोग अनिवार्य होता है।
विशेषताएँ:
- प्रश्न शब्दों, वाक्यों, भाषा पर आधारित होते हैं।
- भाषा समझ, शब्दावली, स्मृति, तर्कशक्ति का मूल्यांकन करते हैं।
- पढ़ने-लिखने की क्षमता आवश्यक होती है।
- साक्षर बच्चों/व्यक्तियों के लिए उपयुक्त।
उदाहरण:
- समानार्थी–विलोम शब्द
- वाक्य पूर्ण करना
- सामान्य ज्ञान आधारित प्रश्न
- गणितीय शब्द समस्याएँ
2. अशाब्दिक बुद्धि परीक्षण (Non-verbal Intelligence Test)
इन परीक्षणों में भाषा का प्रयोग नहीं होता, बल्कि चित्रों, रेखाओं, आकृतियों या प्रतीकों की सहायता से बुद्धि मापी जाती है।
विशेषताएँ:
- भाषा या साक्षरता पर निर्भर नहीं, इसलिए सभी के लिए उपयुक्त।
- तर्कशक्ति, पैटर्न पहचानने की क्षमता, विश्लेषण शक्ति को आँकते हैं।
- दृष्टि-आधारित तथा स्थानिक (Spatial) बुद्धि का मूल्यांकन।
उदाहरण:
- चित्र पूर्ण करना
- पैटर्न या आकृति क्रम पूरा करना
- मैट्रिसेस टेस्ट (जैसे Raven’s Progressive Matrices)
शाब्दिक और अशाब्दिक परीक्षणों में मुख्य अन्तर
| आधार | शाब्दिक परीक्षण | अशाब्दिक परीक्षण |
|---|---|---|
| भाषा पर निर्भरता | भाषा आवश्यक | भाषा आवश्यक नहीं |
| योग्यता का प्रकार | शब्द समझ, भाषा ज्ञान, तर्क | दृश्य तर्क, पैटर्न पहचान |
| उपयुक्तता | साक्षर व्यक्तियों के लिए | सभी के लिए (साक्षर/असाक्षर) |
| सांस्कृतिक प्रभाव | अधिक | कम |
| प्रश्नों का रूप | लिखित या मौखिक भाषा | चित्र, आकृतियाँ, प्रतीक |
Q37) छात्रो को निर्देशन प्रदान करने वाली दो विधियों का वर्णन कीजिए।
Ans. निर्देशन (Guidance) वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से छात्रों को उनकी व्यक्तिगत, शैक्षणिक एवं व्यावसायिक समस्याओं के समाधान हेतु उचित मार्गदर्शन दिया जाता है। छात्रों को निर्देशन प्रदान करने की कई विधियाँ हैं, जिनमें से दो प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं—
1. व्यक्तिगत निर्देशन विधि (Individual Guidance Method)
इस विधि में छात्र को व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन दिया जाता है।
यह तब उपयोगी होती है जब समस्या व्यक्तिगत, गुप्त या गंभीर हो।
विशेषताएँ:
- परामर्शदाता और छात्र आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं।
- छात्र की व्यक्तिगत समस्याएँ जैसे—भावनात्मक, पारिवारिक, स्वास्थ्य, शैक्षणिक कठिनाइयाँ—पर चर्चा की जाती है।
- निदान, विश्लेषण और समाधान छात्र की जरूरतों के अनुसार किया जाता है।
- छात्र के व्यक्तित्व के गहराई से अध्ययन का अवसर मिलता है।
लाभ:
- व्यक्तिगत समस्या का सही निदान होता है।
- गोपनीयता बनी रहती है।
- व्यक्तिगत विकास व आत्मविश्वास में वृद्धि।
2. समूह निर्देशन विधि (Group Guidance Method)
इस विधि में एक साथ कई छात्रों को निर्देशन दिया जाता है।
यह तब उपयुक्त होती है जब समस्या सामान्य या सामूहिक हो, जैसे—समय प्रबंधन, अध्ययन कौशल, परीक्षा तनाव।
विशेषताएँ:
- समान समस्याओं वाले छात्रों का समूह बनाकर मार्गदर्शन दिया जाता है।
- चर्चा, लेक्चर, कार्यशाला या सेमिनार के माध्यम से जानकारी दी जाती है।
- समूह गतिविधियों से छात्रों के अनुभव साझा होते हैं।
- समय एवं संसाधन की बचत।
लाभ:
- अधिक छात्रों को एक साथ सूचना मिलती है।
- समूह में सीखने का अवसर प्राप्त होता है।
- सहयोगात्मक सीखने को बढ़ावा मिलता है।
Q38) अभिवृत्ति की तीन विशेषताएं लिखिए।
Ans. अभिवृत्ति व्यक्ति का किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति के प्रति झुकाव, सोच या प्रतिक्रिया है। इसकी प्रमुख तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. अभिवृत्ति सीखी जाती है (Learned Behaviour)
• अभिवृत्ति जन्मजात नहीं होती, बल्कि वातावरण, परिवार, विद्यालय, समाज और अनुभवों से विकसित होती है।
2. अभिवृत्ति स्थायी परन्तु परिवर्तनीय होती है (Relatively Stable but Changeable)
• अभिवृत्ति समय के साथ स्थिर रहती है, परंतु नई परिस्थितियों, अनुभवों और शिक्षा से इसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।
3. अभिवृत्ति व्यवहार को प्रभावित करती है (Influences Behaviour)
• व्यक्ति की अभिवृत्ति उसके निर्णय, कार्य, प्रतिक्रिया और सामाजिक व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
Q39) प्रमस्तिष्क पक्षाघात वाले बच्चों हेतु चिकित्सीय विधि का वर्णन कीजिए।
Ans. प्रमस्तिष्क पक्षाघात वाले बच्चों के विकास, गतिशीलता और दैनिक क्रियाओं को सुधारने के लिए विभिन्न चिकित्सीय (Therapeutic) विधियों का उपयोग किया जाता है। इनका उद्देश्य बच्चे की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक क्षमताओं को बढ़ाकर जीवन को अधिक स्वतंत्र बनाना है। प्रमुख चिकित्सीय विधियाँ निम्नलिखित हैं—
1. फिजियोथेरेपी (Physiotherapy)
- यह सबसे महत्वपूर्ण उपचार विधि है।
- इससे मांसपेशियों की जकड़न कम होती है और संतुलन व चलने-फिरने की क्षमता बढ़ती है।
- बच्चे को खड़े होना, चलना, बैठना, पकड़ना आदि गतिविधियाँ सिखाई जाती हैं।
- स्ट्रेचिंग, मांसपेशी मज़बूती और मोबिलिटी अभ्यास शामिल होते हैं।
2. व्यावसायिक चिकित्सा (Occupational Therapy)
- बच्चे को दैनिक जीवन की गतिविधियाँ (ADL) जैसे—खाना, पहनना, पकड़ना, लिखना, खेलना—सही ढंग से करने की प्रशिक्षण दिया जाता है।
- फाइन मोटर स्किल्स (सूक्ष्म कौशल) विकसित किए जाते हैं।
- विशेष उपकरणों (Adaptive Devices) का उपयोग भी किया जाता है।
3. स्पीच थेरेपी (Speech Therapy)
- ऐसे बच्चे अक्सर बोलने, निगलने और संचार में कठिनाई अनुभव करते हैं।
- स्पीच थेरेपिस्ट भाषा, उच्चारण, संचार कौशल और निगलने की क्षमता में सुधार लाते हैं।
4. दवा उपचार (Medication)
- मांसपेशियों की जकड़न, ऐंठन (Spasticity) और दर्द कम करने के लिए
— Muscle relaxants
— Anticonvulsant medicines
का प्रयोग किया जाता है।
5. ऑर्थोटिक उपकरण (Orthotic Devices)
- ब्रेसेस, स्प्लिंट, वॉकर, व्हीलचेयर आदि का उपयोग बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता सुधारने के लिए किया जाता है।
- शरीर की सही आकृति व मुद्रा बनाए रखने में सहायक होते हैं।
6. शल्य चिकित्सा (Surgical Treatment)
- गंभीर स्थिति में मांसपेशियों की जकड़न कम करने, नसों को राहत देने या हड्डियों की स्थिति सुधारने के लिए सर्जरी की जाती है।
- टेंडन लम्बाईकरण (Tendon Lengthening) आदि प्रक्रियाएँ की जाती हैं।
7. विशेष शिक्षा एवं मनोसामाजिक सहयोग (Special Education & Counseling)
- बच्चे की सीखने की गति के अनुसार विशेष शिक्षण तकनीकें अपनाई जाती हैं।
- माता-पिता एवं बच्चों को परामर्श (Counseling) दिया जाता है ताकि भावनात्मक व सामाजिक विकास बेहतर हो सके।
Q40) मन्द बुद्धि बालकों का पाठ्यक्रम कैसा होना चाहिए।
Ans. मन्द बुद्धि (Intellectually Disabled) बालकों के लिए पाठ्यक्रम सामान्य बच्चों से भिन्न होता है, क्योंकि उनकी सीखने की गति धीमी होती है और उन्हें अधिक व्यावहारिक, सरल तथा अनुकूलित शिक्षा की आवश्यकता होती है। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो उनकी दैनिक जीवन क्षमता, सामाजिक व्यवहार, आत्मनिर्भरता तथा बुनियादी शैक्षणिक कौशल को विकसित कर सके। इसका स्वरूप निम्नलिखित है—
1. सरल और अनुकूलित (Simplified & Adapted Curriculum)
- विषयवस्तु को उनकी मानसिक क्षमता के अनुसार सरल बनाया जाए।
- कठिन शब्दावली, जटिल अवधारणाओं को हटा दिया जाए।
- कम मात्रा में, लेकिन बार-बार अभ्यास पर जोर हो।
2. कार्यात्मक (Functional Curriculum)
- पाठ्यक्रम का मुख्य उद्देश्य उन्हें दैनिक जीवन में सक्षम बनाना होना चाहिए।
- जैसे—खाना खाना, कपड़े पहनना, रास्ता पहचानना, सफाई रखना, पैसे पहचानना आदि कौशल सिखाना।
3. व्यावहारिक गतिविधियों पर आधारित (Activity-Based Learning)
- खेल, चित्र, वस्तुओं को छूना, मॉडल आदि के माध्यम से सीखने के अवसर दिए जाएं।
- हाथों से करने पर वे जल्दी सीखते हैं, इसलिए “करते हुए सीखना” (Learning by doing) प्रमुख पद्धति हो।
4. सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन कौशल (Social & Life Skills Training)
- दूसरे बच्चों से मिलना-जुलना, उचित व्यवहार, अपने विचार व्यक्त करना, नियमों का पालन करना जैसे कौशल सिखाए जाएं।
- समूह गतिविधियाँ शामिल की जाएँ।
5. व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Training)
- बड़े बच्चों के लिए छोटे-छोटे कार्यों का प्रशिक्षण—
जैसे—मोमबत्ती बनाना, पैकिंग, बागवानी, सिलाई, कढ़ाई, घरेलू कार्य आदि। - इससे वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
6. व्यक्तिगत शिक्षण योजना (IEP – Individualized Education Plan)
- प्रत्येक बच्चे की क्षमता अलग होती है, इसलिए अलग-अलग लक्ष्य तय किए जाएँ।
- उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार गतिविधियाँ निर्धारित की जाएँ।
7. दोहराव और अभ्यास पर जोर (Repetition & Reinforcement)
- लगातार अभ्यास और पुनरावृत्ति आवश्यक होती है।
- सकारात्मक प्रोत्साहन (Reinforcement) से सीखने में वृद्धि होती है।