U.P Board Class 12 Hindi 301(DB) Question Paper 2024

U.P Board Class 12 Hindi 301(DB) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2024
हिंदी
समयः तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांकः 100

निर्देश :

(i) प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।

(ii) इस प्रश्न पत्र में दो खण्ड हैं। दोनों खण्डों के सभी प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य है।

खण्ड क

(क) खड़ीबोली की प्रथम रचना मानी जाती है:

(i) ‘साहित्यालोचन’
(ii) ‘गोरा बादल की कथा’
(iii) ‘पद्मावत’
(iv) ‘साहित्य लहरी’

Ans. (ii) ‘गोरा बादल की कथा’

(ख) ‘तिब्बत यात्रा’ के लेखक हैं:

(i) अध्यापक पूर्ण सिंह
(ii) बालकृष्ण भट्ट
(iii) राहुल सांकृत्यायन
(iv) नंद दुलारे वाजपेयी

Ans. (iii) राहुल सांकृत्यायन

(ग) कौन-सी रचना नाटक नहीं है ?

(i) ‘गरुड़ध्वज’
(ii) ‘अपना-अपना भाग्य’
(iii) ‘आन का मान’
(iv) ‘राजमुकुट’

Ans. (ii) ‘अपना-अपना भाग्य’

(घ) ‘माटी की मूरतें’ के लेखक हैं :

(i) बालकृष्ण भट्ट
(ii) महावीर प्रसाद त्रिवेदी
(iii) रामवृक्ष बेनीपुरी
(iv) हजारी प्रसाद द्विवेदी

Ans. (iii) रामवृक्ष बेनीपुरी

(ङ) ‘चिन्तामणि’ किस विधा की रचना है?

(i) कहानी
(ii) निबंध
(iii) नाटक
(iv) उपन्यास

Ans. (ii) निबंध

2. (क) ज्ञानपीठ पुरस्कार निम्नलिखित में से किस रचना पर मिला है ?

(i) ‘लोकायतन’
(ii) ‘चिदम्बरा’
(iii) ‘कला और बूढ़ा चाँद’
(iv) ‘ग्राम्या’

Ans. (ii) ‘चिदम्बरा

(ख) ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक रचना किस ग्रंथ से संकलित है ?

(i) ‘आँसू’
(ii). ‘लहर’
(iii) ‘कामायनी’
(iv) ‘झरना’

Ans. (iii) ‘कामायनी’

(ग) सूर्यकान्त त्रिपाठी की रचना है:

(i) ‘बापू के प्रति’
(ii) ‘पल्लव’
(iii) ‘अँधेरे में’
(iv) ‘राम की शक्ति पूजा’

Ans. (iv) ‘राम की शक्ति पूजा’

(घ) ‘महादेवी वर्मा’ को ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार किस सन् में प्राप्त हुआ ?

(i) सन् 1976
(ii) सन् 1980
(iii) सन् 1983
(iv) सन् 1985

Ans. प्रश्नपत्र में 1976, 1980, 1983 और 1985 विकल्प दिए गए हैं, लेकिन सही वर्ष 1982 है।

(ङ) ‘इन्दु’ पत्रिका के प्रकाशक हैं:

(i) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ii) चन्द्र धर शर्मा ‘गुलेरी’
(iii) अम्बिका प्रसाद गुप्त
(iv) बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

Ans. (iii) अम्बिका प्रसाद गुप्त

3. निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्य ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंधमात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि संभव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
Ans.
प्रस्तुत गद्यांश ‘राष्ट्र का स्वरूप’ नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

(ख) रेखांकित (बोल्ड) अंश की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
लेखक का आशय है कि संस्कृति किसी राष्ट्र के जन-जीवन को दिशा और पहचान प्रदान करती है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर को मस्तिष्क नियंत्रित करता है, उसी प्रकार संस्कृति राष्ट्र के लोगों के विचारों, आचार-विचार, परम्पराओं और जीवन-पद्धति को दिशा देती है। इसलिए संस्कृति के बिना जन-जीवन अधूरा है।

(ग) राष्ट्र का तीसरा अंग क्या है ?
Ans.
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है।

(घ) मनुष्य के जीवन की श्वास-प्रश्वास क्या है ?
Ans.
मनुष्य ने युगों-युगों में जिस सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है।

(ङ) राष्ट्र की वृद्धि कैसे संभव है ?
Ans.
राष्ट्र की वृद्धि संस्कृति के विकास और अभ्युदय से संभव है।

अथवा

भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा लेकर चलने वाले भी कुछ राजनीतिक दल हैं। किन्तु वे भारतीय संस्कृति की समानता को उसकी गतिहीनता समझ बैठे हैं और इसलिए बीते युग की रूढ़ियों अथवा यथास्थिति का समर्थन करते हैं। संस्कृति के क्रांतिकारी तत्त्व की ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती ।

वास्तव में समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियाँ जैसे छुआछूत, जाति-भेद, दहेज, मृत्युभोज, नारी-अवमानना आदि भारतीय संस्कृति और समाज के स्वास्थ्य के सूचक नहीं बल्कि रोग के लक्षण हैं। भारत के अनेक महापुरुष, जिनकी भारतीय परम्परा और संस्कृति के प्रति अनन्य निष्ठा थी, इन बुराइयों के विरुद्ध लड़े हैं।

(क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक के नाम का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
प्रस्तुत गद्यांश ‘राष्ट्र का स्वरूप’ नामक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

(ख) भारतीय संस्कृति के प्रति किसे निष्ठा है ?
Ans.
भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा रखने वाले कुछ राजनीतिक दलों तथा अनेक महापुरुषों का उल्लेख किया गया है।

(ग) बीते युग की रूढ़ियों का समर्थन कौन करता है?
Ans.
भारतीय संस्कृति की समानता को उसकी गतिहीनता समझने वाले कुछ राजनीतिक दल बीते युग की रूढ़ियों और यथास्थिति का समर्थन करते हैं।

(घ) समाज में प्रचलित किन-किन कुरीतियों का उल्लेख किया गया है ?
Ans.
गद्यांश में छुआछूत, जाति-भेद, दहेज, मृत्युभोज और नारी-अवमानना जैसी कुरीतियों का उल्लेख किया गया है।

(ङ) कौन-से तत्त्व स्वस्थ समाज के सूचक नहीं हैं ?
Ans.
छुआछूत, जाति-भेद, दहेज, मृत्युभोज और नारी-अवमानना जैसी सामाजिक कुरीतियाँ स्वस्थ समाज की सूचक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक रोग के लक्षण हैं।

4. निम्नलिखित पद्यांशों पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये ।
होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को ।
जो थोड़ी भी श्रमित वह हो, गोद ले श्रांति खोना ।
होठों की औ कमल-मुख की म्लानताएँ मिटाना ।
कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे ।
धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना ।।

(क) प्रस्तुत पद्यांश की कविता का शीर्षक और कवि के नाम का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
कविता का शीर्षक ‘पवन-दूतिका’ और कवि का नाम अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ है।

(ख) लज्जाशीला महिला के लिए कवि ने क्या करने को कहा है ?
Ans.
कवि पवन से कहते हैं कि यदि मार्ग में कोई लज्जाशील महिला दिखाई दे तो उसकी मर्यादा का ध्यान रखना। उसके वस्त्रों को अस्त-व्यस्त न करना और उसकी लज्जा तथा शील की रक्षा करना।

(ग) विकृत-वसना का भाव स्पष्ट कीजिए ।
Ans.
‘विकृत-वसना’ का अर्थ है जिसके वस्त्र अस्त-व्यस्त या बिगड़े हुए हों। कवि पवन से कहते हैं कि वह अपने वेग से किसी महिला के वस्त्रों को अस्त-व्यस्त न करे।

(घ) कवि ने किसकी म्लानताओं को मिटाने को कहा है?
Ans.
कवि ने पथिक महिला के होंठों तथा कमल के समान मुख की म्लानता मिटाने को कहा है।

(ङ) रेखांकित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए ।
Ans.
कवि पवन से कहता है कि यदि मार्ग में कोई थकी हुई कृषक-स्त्री दिखाई दे तो उसके पास धीरे-धीरे जाकर उसके शरीर की थकान दूर कर देना। अपने शीतल स्पर्श से उसे आराम पहुँचाना। इस प्रकार कवि ने पवन को मानव-सेवा और सहानुभूति का संदेश दिया है।

अथवा

बनो संसृति मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी यह बेल विश्व वन सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुन्दर खेल । और यह क्या तुम सुनते नहीं विधाता का मंगल वरदान, शक्तिशाली हो विजयी बनो विश्व में गूंज रहा जय गान ।।

(क) प्रस्तुत पद्यांश के कविता के शीर्षक और कवि के नाम का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
कविता का शीर्षक ‘श्रद्धा-मनु’ तथा कवि जयशंकर प्रसाद हैं।

(ख) कवि ने किससे बेल फैलने की बात कही है ?
Ans.
कवि ने श्रद्धा से संसार की विकास-बेल फैलने की बात कही है।

(ग) ‘विश्व वन सौरभ से भर जाय’ का भाव स्पष्ट कीजिए ?
Ans.
इसका भाव है कि श्रद्धा, प्रेम, सद्भावना और मानवता के कारण पूरा संसार सुगंधित वन के समान सुंदर और आनंदमय हो जाए तथा मानव-जीवन में सुख, शांति और प्रेम का विस्तार हो।

(घ) ‘शक्तिशाली और विजयी बनो’ का संदेश कहाँ गूँज रहा है?
Ans.
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’ का संदेश संपूर्ण विश्व में विधाता के मंगल वरदान के रूप में गूँज रहा है।

(ङ) विधाता का मंगल वरदान क्या है ?
Ans.
विधाता का मंगल वरदान है—मनुष्य शक्तिशाली बने, विजयी बने, जीवन में निरंतर आगे बढ़े और संसार में सुख-समृद्धि का विस्तार करे।

5. (क) निम्नलिखित में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए (अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)

(i) वासुदेवशरण अग्रवाल
Ans.
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल प्रसिद्ध इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, संस्कृतिविद् एवं निबंधकार थे। उनका जन्म 1904 ई. में हुआ। भारतीय संस्कृति और इतिहास के अध्ययन में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘पृथ्वीपुत्र’, ‘भारत की एकता’, ‘कला और संस्कृति’ तथा ‘राष्ट्र का स्वरूप’ हैं। उनकी भाषा सरल, संस्कृतनिष्ठ और विचारप्रधान है। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला और राष्ट्रीय चेतना का सुंदर समन्वय मिलता है।

(ii) प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी
Ans.
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी हिन्दी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के विद्वान तथा प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक थे। उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं में भाषा की प्रकृति, प्रयोग और अभिव्यक्ति पर विशेष विचार मिलता है। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार तथा हिन्दी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के संबंधों को समझाने में उनका विशेष योगदान रहा।

(iii) डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
Ans.
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 ई. में हुआ। वे महान निबंधकार, आलोचक, इतिहासकार और साहित्यकार थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘अनामदास का पोथा’, ‘कबीर’ और ‘सूर-साहित्य’ हैं। उनकी भाषा सरल, सरस, विद्वत्तापूर्ण और प्रभावशाली है। भारतीय संस्कृति, इतिहास, मानवतावाद और लोकमंगल उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

(ख) निम्नलिखित में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए : (अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)

(i) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
Ans.
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 1865 ई. में हुआ। वे हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। वे द्विवेदी युग के प्रमुख रचनाकार माने जाते हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘प्रियप्रवास’, ‘वैदेही वनवास’, ‘पद्य-प्रसून’, ‘चुभते चौपदे’ आदि हैं। ‘प्रियप्रवास’ उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है। उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम, प्रकृति-चित्रण, मानवता तथा आदर्शवाद की भावना मिलती है। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिमार्जित और प्रभावशाली है।

(ii) जयशंकर प्रसाद
Ans.
जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई. में काशी में हुआ। वे छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘लहर’, ‘झरना’, ‘स्कन्दगुप्त’, ‘चन्द्रगुप्त’ और ‘ध्रुवस्वामिनी’ हैं। उनकी कविता में प्रकृति, प्रेम, दर्शन, मानवता और राष्ट्रीय चेतना का सुंदर समन्वय मिलता है। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, भावपूर्ण, चित्रात्मक और अत्यंत प्रभावशाली है।

(iii) महादेवी वर्मा
Ans.
महादेवी वर्मा का जन्म 1907 ई. में हुआ। वे छायावाद की प्रमुख कवयित्री तथा आधुनिक हिन्दी साहित्य की महान लेखिका थीं। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’ और ‘यामा’ हैं। उनकी कविता में वेदना, करुणा, प्रेम, रहस्यवाद और प्रकृति-सौंदर्य की प्रधानता है। उनकी भाषा कोमल, संगीतात्मक और भावपूर्ण है। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार 1982 में मिला।

6. कहानी कला के आधार पर ‘पंचलाइट’ कहानी की समीक्षा कीजिए । (अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)
Ans.
‘पंचलाइट’ फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी है। इसका कथानक ग्रामीण जीवन की एक छोटी घटना पर आधारित है। महतो टोली के लोग पंचलाइट खरीदते हैं, लेकिन उसे जलाना नहीं जानते। गोधन उसे जलाना जानता है, पर सामाजिक बहिष्कार के कारण उससे सहायता नहीं लेते। अंत में आवश्यकता के कारण गोधन को बुलाया जाता है और वह पंचलाइट जला देता है। कहानी में ग्रामीण जीवन, जातिगत संकीर्णता, प्रेम, हास्य और सामाजिक रूढ़ियों का सजीव चित्रण है।

अथवा

ध्रुवयात्रा के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए । (अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)
Ans.
‘ध्रुवयात्रा’ के प्रमुख पात्र में साहस, कर्तव्यनिष्ठा, दृढ़ संकल्प और त्याग की भावना दिखाई देती है। वह कठिन परिस्थितियों से घबराता नहीं बल्कि धैर्य और विवेक से उनका सामना करता है। उसके चरित्र में आदर्शवाद और मानवीय संवेदना का सुंदर समन्वय है। वह अपने उद्देश्य के प्रति पूरी तरह समर्पित रहता है। उसके कार्य पाठक को साहस, संघर्ष और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देते हैं।

7. स्वपठित खण्डकाव्य के आधार पर किसी एक खण्डकाव्य के एक प्रश्न का उत्तर लिखिए : (अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)

(क) ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथानक की प्रमुख विशेषताएँ बताइए ।
Ans.
‘रश्मिरथी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का प्रसिद्ध खण्डकाव्य है। इसका कथानक महाभारत के महान योद्धा कर्ण के जीवन पर आधारित है। इसमें कर्ण के जन्म, पालन-पोषण, शिक्षा, दानशीलता, मित्रता, संघर्ष तथा युद्ध का वर्णन है। कर्ण के माध्यम से जातिगत भेदभाव, सामाजिक विषमता, वीरता, दान और स्वाभिमान को प्रस्तुत किया गया है। कथानक रोचक, भावपूर्ण, वीरतापूर्ण और प्रेरणादायक है।

अथवा

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताएँ बताइए ।
Ans.
‘रश्मिरथी’ में कुन्ती ममतामयी, भावुक और पश्चात्ताप से पीड़ित माता के रूप में चित्रित हैं। उन्होंने सामाजिक भय के कारण कर्ण को जन्म के बाद त्याग दिया था। बाद में जब कर्ण महान योद्धा बनता है, तो कुन्ती उसे अपना पुत्र बताकर पाण्डवों के पक्ष में लाने का प्रयास करती हैं। उनके चरित्र में मातृत्व, ममता, विवशता और पश्चात्ताप का सुंदर चित्रण है।

(ख) ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में श्रवण कुमार की माता-पिता के प्रति भक्ति का वर्णन है। वह अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थयात्रा कराने ले जाता है। मार्ग में वह उनके लिए जल लेने जाता है। राजा दशरथ के बाण से उसकी मृत्यु हो जाती है। उसके माता-पिता को जब पुत्र की मृत्यु का पता चलता है तो वे अत्यंत दुखी होकर दशरथ को पुत्र-वियोग का शाप देते हैं। यह कथा मातृ-पितृ भक्ति और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करती है।

अथवा

‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
श्रवणकुमार आदर्श पुत्र के रूप में चित्रित हैं। वह अपने नेत्रहीन माता-पिता की सेवा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानता है। वह उन्हें काँवर में बैठाकर तीर्थयात्रा कराता है और उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखता है। वह कर्तव्यनिष्ठ, आज्ञाकारी, त्यागी, सेवाभावी और सहनशील है। उसका जीवन माता-पिता की सेवा तथा भारतीय पारिवारिक आदर्शों की प्रेरणा देता है।

(ग) ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए ।
Ans.
‘आलोकवृत्त’ में महात्मा बुद्ध के जीवन और उनके विचारों को आधार बनाकर मानवता, करुणा, अहिंसा और सत्य का संदेश दिया गया है। इसमें सांसारिक मोह से मुक्ति, आत्मज्ञान तथा मानव-कल्याण की भावना प्रमुख है। खण्डकाव्य की भाषा भावपूर्ण और प्रभावशाली है। इसमें बुद्ध के जीवन-संघर्ष और उनके आदर्शों के माध्यम से मनुष्य को सत्य तथा शांति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है।

अथवा

‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
‘आलोकवृत्त’ के नायक गौतम बुद्ध त्याग, करुणा, सत्य और मानवता के प्रतीक हैं। उन्होंने राजसी सुखों को त्यागकर संसार के दुःखों का कारण जानने का प्रयास किया। कठोर साधना के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने अपना जीवन मानव-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उनका चरित्र त्याग, आत्मसंयम, अहिंसा और करुणा की प्रेरणा देता है।

(घ) ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘मुक्तियज्ञ’ में भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की भावना को प्रमुखता दी गई है। इसमें देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना का चित्रण है। रचनाकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के साहस तथा देशभक्ति को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। खण्डकाव्य में राष्ट्रप्रेम, स्वतंत्रता की आकांक्षा, अन्याय के विरोध और बलिदान की भावना प्रमुख है।

अथवा

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के किसी प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए ।
Ans.
‘मुक्तियज्ञ’ का प्रमुख पात्र देशभक्ति, साहस और त्याग की भावना से ओत-प्रोत है। वह व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा देश की स्वतंत्रता को अधिक महत्व देता है। कठिनाइयों और संकटों के सामने वह दृढ़ रहता है। उसके चरित्र में राष्ट्रप्रेम, संघर्षशीलता, साहस और आत्मबलिदान की भावना दिखाई देती है।

(ङ) ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ संक्षेप में लिखिए ।
Ans.
‘सत्य की जीत’ में सत्य और न्याय की शक्ति को प्रमुखता दी गई है। कथानक में अन्याय और असत्य के सामने सत्य का संघर्ष दिखाया गया है। प्रमुख पात्र अनेक कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है, फिर भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता। अंततः सत्य की विजय होती है और असत्य पराजित होता है। खण्डकाव्य का मुख्य संदेश है कि कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को सत्य और न्याय का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

अथवा

‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पुरुष पात्र के चरित्र की विशेषताएँ बताइए ।
Ans.
‘सत्य की जीत’ का प्रमुख पुरुष पात्र सत्यवादी, साहसी, न्यायप्रिय और दृढ़ चरित्र वाला है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता। उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, फिर भी वह अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहता है। उसका चरित्र सत्य, न्याय, साहस और आत्मविश्वास की प्रेरणा देता है।

(च) ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में वर्णित किसी प्रेरणास्पद घटना का उल्लेख कीजिए ।
Ans.
‘त्यागपथी’ में हर्षवर्धन के त्याग और लोककल्याण की भावना अत्यंत प्रेरणास्पद है। हर्षवर्धन ने व्यक्तिगत सुख और राजसी वैभव की अपेक्षा प्रजा के कल्याण को अधिक महत्व दिया। उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की और अपने धन-संपत्ति को लोकहित में समर्पित किया। उनका यह त्याग बताता है कि सच्चा जीवन वही है जिसमें मनुष्य अपने सुख से ऊपर उठकर समाज और मानवता के लिए कार्य करे।

अथवा

‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र ‘हर्षवर्धन’ का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
Ans.
हर्षवर्धन ‘त्यागपथी’ के प्रमुख पात्र हैं। वे उदार, दयालु, त्यागी, प्रजावत्सल और कर्तव्यनिष्ठ शासक थे। उन्होंने राजसी वैभव को व्यक्तिगत सुख का साधन न बनाकर लोककल्याण का माध्यम माना। गरीबों और असहायों के प्रति उनके हृदय में गहरी करुणा थी। उनका जीवन त्याग, सेवा, दान और मानवता का आदर्श प्रस्तुत करता है।

खण्ड ख

8. (क) निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

संस्कृतस्य साहित्यं सरसं व्याकरणञ्च सुनिश्चितम् । तस्य गद्ये पद्ये च लालित्यं, भावबोध सामर्थ्यम् अद्वितीयं श्रुतिमाधुर्यञ्च वर्तते । किं बहुना चरित्रनिर्माणार्थं यादृशीं सत्प्रेरणां संस्कृतवाङ्‌मयं ददाति न तादृशीं किञ्चिदन्यत् (मूलभूतानां मानवीयगुणानां यादृशी विवेचना संस्कृतसाहित्ये वर्तते नान्यत्र तादृशी । दया, दानं, शौचम्, औदर्यम् अनसूया, क्षमा, अन्ये चानेके गुणाः अस्य साहित्यस्य अनुशीलनेन सञ्जायन्ते ।
Ans.
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत साहित्य की विशेषताओं और उसके मानवीय मूल्यों को बताता है।

संस्कृत का साहित्य सरस है और उसका व्याकरण सुव्यवस्थित है। उसके गद्य और पद्य में लालित्य, भावों को समझने की शक्ति तथा अद्वितीय श्रुतिमाधुर्य विद्यमान है। इतना ही नहीं, चरित्र-निर्माण के लिए संस्कृत वाङ्मय जैसी श्रेष्ठ प्रेरणा अन्यत्र मिलना कठिन है। मूलभूत मानवीय गुणों का जैसा विवेचन संस्कृत साहित्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। दया, दान, पवित्रता, उदारता, दोष-दर्शन से रहित होना, क्षमा तथा ऐसे अनेक गुणों का विकास इस साहित्य के अध्ययन से होता है।

अथवा

हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु अस्य समानः अधिकारः आसीत् । हिन्दी-हिन्दुहिन्दुस्थानानामुत्थानाय अयं निरंतरं प्रयत्नमकरोत् । शिक्षयैव देशे समाजे च नवीनः प्रकाशः उदेति । अतः श्रीमालवीयः वाराणस्यां काशीहिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत् । अस्य निर्माणाय अयं जनान् धनम् अयाचत जनाश्च महत्यस्मिन् ज्ञानयज्ञे प्रभूतं धनमस्मै प्रायच्छन्, तेन निर्मितोऽयं विशालः विश्वविद्यालयः भारतीयानां दानशीलतायाः श्रीमालवीयस्य यशसः च प्रतिमूर्तिरिव विभाति ।
Ans.
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश महामना मदनमोहन मालवीय के शिक्षा एवं राष्ट्र-सेवा संबंधी कार्यों का वर्णन करता है।

हिन्दी अनुवाद:
उन्हें हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त था। उन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान के उत्थान के लिए निरन्तर प्रयत्न किया। शिक्षा से ही देश और समाज में नया प्रकाश उत्पन्न होता है। इसलिए श्री मालवीय ने वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसके निर्माण के लिए उन्होंने लोगों से धन माँगा और लोगों ने इस महान ज्ञान-यज्ञ में उन्हें बहुत-सा धन प्रदान किया। इस प्रकार निर्मित यह विशाल विश्वविद्यालय भारतीयों की दानशीलता और श्री मालवीय के यश की प्रतिमूर्ति के समान दिखाई देता है।

(ख) निम्नलिखित संस्कृत श्लोकों में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः ।
गुणा गुणानुबन्धित्वात् तस्य सप्रसवा इव ।।
Ans.
सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक में श्रेष्ठ व्यक्ति के गुणों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद:
श्रेष्ठ व्यक्ति ज्ञान प्राप्त होने पर मौन रहता है, शक्ति होने पर क्षमा करता है और त्याग करने पर उसका यश नहीं चाहता। उसके गुण दूसरे गुणों से जुड़े होने के कारण एक-दूसरे को उत्पन्न करने वाले होते हैं।

अथवा

प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्य हेतवः ।।
Ans.
अनुवाद:
जो राजा अपनी प्रजा को शिक्षा और विनय प्रदान करता है, उनकी रक्षा करता है तथा उनका पालन-पोषण करता है, वही उनका पिता कहलाता है। केवल जन्म देने वाले व्यक्ति ही प्रजा के वास्तविक पिता नहीं होते।

9. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए:

(क) कस्य साहित्यं सरसं मधुरं च अस्ति ?
Ans.
संस्कृतस्य साहित्यं सरसं मधुरं च अस्ति।

(ख) मैत्रेयी कस्य पत्नी आसीत् ?
Ans.
मैत्रेयी याज्ञवल्क्यस्य पत्नी आसीत्।

(ग) देशस्य प्रगतये किम् आवश्यकम् अस्ति ?
Ans.
देशस्य प्रगतये शिक्षा आवश्यकम् अस्ति।

(घ) मूर्खाणां कालः कथं गच्छति ?
Ans.
मूर्खाणां कालः निद्रया कलहेन च गच्छति।

10. (क) करुण रस अथवा शान्त रस का लक्षण के साथ उदाहरण लिखिए ।
Ans.
परिभाषा: जहाँ किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के वियोग, मृत्यु अथवा दुःख के कारण हृदय में शोक का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ करुण रस होता है।

स्थायी भाव: शोक।

उदाहरण:
“राम-राम कहि राम चले, सबके नयन भर आए।”

यहाँ राम के वियोग से उत्पन्न शोक के कारण करुण रस है।

शान्त रस

परिभाषा: जहाँ संसार की नश्वरता को समझकर मन में वैराग्य तथा शम का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ शान्त रस होता है।

स्थायी भाव: निर्वेद।

उदाहरण:
“यह संसार स्वप्न के समान, नश्वर है सबका मान।”

(ख) उपमा अथवा उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए ।
Ans.
परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति की समानता किसी प्रसिद्ध वस्तु से ‘सा’, ‘सी’, ‘समान’, ‘जैसे’ आदि शब्दों द्वारा की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उदाहरण:
“मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है।”

यहाँ मुख की समानता चन्द्रमा से की गई है, इसलिए उपमा अलंकार है।

अथवा—उत्प्रेक्षा अलंकार

परिभाषा: जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

उदाहरण:
“मानो आकाश में चन्द्रमा मुस्करा रहा हो।”

यहाँ चन्द्रमा के मुस्कराने की संभावना की गई है, इसलिए उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(ग) चौपाई अथवा कुण्डलियाँ छन्द की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए ।
Ans.
चौपाई छन्द

परिभाषा: चौपाई एक मात्रिक सम छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं और चार चरण होते हैं।

उदाहरण:
“मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥”

कुण्डलियाँ छन्द

परिभाषा: कुण्डलियाँ छन्द में छह चरण होते हैं। इसमें पहले दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला के होते हैं। इसकी विशेषता यह है कि प्रथम चरण का आरम्भिक शब्द अंतिम चरण के अंत में दोहराया जाता है।

उदाहरण:
“दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान।
चंचल जल की चपलता, जीवन की पहचान॥”

11. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :

(क) विकासशील समाज के लिए इंटरनेट की उपयोगिता
Ans.
आज इंटरनेट आधुनिक जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन बन गया है। विकासशील समाज में इसका महत्व और भी अधिक है। इंटरनेट के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, बैंकिंग, सरकारी सेवाओं और रोजगार से संबंधित जानकारी बहुत आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

विद्यार्थी इंटरनेट की सहायता से देश-विदेश के अच्छे शिक्षकों और अध्ययन-सामग्री तक पहुँच सकते हैं। ऑनलाइन शिक्षा ने दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए भी ज्ञान प्राप्त करने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। किसान मौसम, बाजार भाव और कृषि संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। व्यापारी अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुँचा सकते हैं।

इंटरनेट के माध्यम से सरकारी योजनाओं और सेवाओं की जानकारी भी आसानी से मिलती है। डिजिटल भुगतान तथा ऑनलाइन बैंकिंग ने आर्थिक गतिविधियों को सरल बनाया है।

हालाँकि इंटरनेट का दुरुपयोग समय की बर्बादी, गलत सूचना और गोपनीयता संबंधी समस्याएँ पैदा कर सकता है। इसलिए इसका उपयोग सावधानी और विवेक के साथ होना चाहिए।

निष्कर्षतः, इंटरनेट विकासशील समाज के लिए ज्ञान, रोजगार, व्यापार और संचार का शक्तिशाली माध्यम है।

(ख) नारी सशक्तीकरण
Ans.
नारी समाज की महत्वपूर्ण आधारशिला है। किसी भी देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और अधिकार प्राप्त हों। नारी सशक्तीकरण का अर्थ महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता, निर्णय लेने की क्षमता तथा सामाजिक और कानूनी अधिकार प्रदान करना है।

शिक्षा नारी सशक्तीकरण का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। शिक्षित महिला अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझती है तथा अपने परिवार और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

महिलाओं के प्रति भेदभाव, बाल विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा और शिक्षा से वंचित करना जैसी सामाजिक समस्याएँ नारी सशक्तीकरण में बाधा हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है।

सरकार द्वारा शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए अनेक योजनाएँ चलाई जाती हैं, लेकिन इनका लाभ तभी पूरी तरह मिलेगा जब समाज भी महिलाओं के प्रति समानता और सम्मान का व्यवहार करे।

निष्कर्षतः, नारी का सम्मान और सशक्तीकरण वास्तव में पूरे समाज का सशक्तीकरण है।

(ग) जातिवाद की समस्या: कारण और निवारण
Ans.
जातिवाद भारतीय समाज की एक गंभीर सामाजिक समस्या है। जाति-व्यवस्था का संबंध ऐतिहासिक सामाजिक संरचना से रहा है, लेकिन जब जाति के आधार पर मनुष्य के साथ भेदभाव, अवसरों की असमानता या सामाजिक दूरी की भावना पैदा होती है, तब यह जातिवाद का रूप ले लेती है।

जातिवाद के प्रमुख कारणों में अशिक्षा, सामाजिक रूढ़ियाँ, जातिगत पूर्वाग्रह, राजनीतिक स्वार्थ तथा पीढ़ियों से चली आ रही संकीर्ण मानसिकता प्रमुख हैं। जातिवाद के कारण समाज में विभाजन, असमानता और आपसी तनाव उत्पन्न हो सकता है।

इस समस्या के समाधान के लिए शिक्षा का प्रसार सबसे आवश्यक है। लोगों को संविधान द्वारा दिए गए समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। सभी जातियों के प्रति सम्मान और समान व्यवहार की भावना विकसित करनी चाहिए। सामाजिक और आर्थिक अवसरों में समानता को बढ़ावा देना चाहिए।

निष्कर्षतः, जातिवाद का समाधान कानून के साथ-साथ सामाजिक सोच में परिवर्तन से ही संभव है। हमें व्यक्ति का मूल्य उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके गुण, कर्म और मानवता से निर्धारित करना चाहिए।

(घ) आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के गुण-दोष
Ans.
आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन किए हैं। आज विद्यार्थी पुस्तकों के साथ-साथ कंप्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल सामग्री और विभिन्न शैक्षिक साधनों का उपयोग कर सकते हैं। इससे ज्ञान प्राप्त करने के अवसर बढ़े हैं।

आधुनिक शिक्षा का एक प्रमुख गुण यह है कि इसमें विद्यार्थियों की रचनात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिक ज्ञान को महत्व दिया जाता है। ऑनलाइन शिक्षा से विद्यार्थी घर बैठे विभिन्न विषयों का अध्ययन कर सकते हैं।

इसके साथ कुछ दोष भी हैं। अनेक स्थानों पर शिक्षा अत्यधिक परीक्षा-केंद्रित हो जाती है। अंकों की प्रतिस्पर्धा के कारण विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है। केवल पुस्तकीय ज्ञान पर अधिक जोर होने से व्यावहारिक कौशल की उपेक्षा भी हो सकती है। डिजिटल साधनों की सुविधा सभी विद्यार्थियों को समान रूप से उपलब्ध नहीं होती।

इसलिए आधुनिक शिक्षा-प्रणाली में ज्ञान के साथ चरित्र-निर्माण, व्यावहारिक कौशल, नैतिक शिक्षा, खेल और रचनात्मक गतिविधियों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए।

निष्कर्षतः, आधुनिक शिक्षा तभी प्रभावी होगी जब वह विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास को अपना लक्ष्य बनाए।

12. (क) (i) ‘पवित्रम्’ का सन्धि विच्छेद है :

(अ) पो+ इत्रम्
(ब) पो + त्रम्
(स) पव + इत्रम्
(द) पा + इत्रम्

Ans. (स) पव + इत्रम्

(ii) ‘हरेऽव’ का सन्धि-विच्छेद है :

(अ) हर + अव
(ब) हरे + अव
(स) हरा + व
(द) हरः + आव

Ans. (ब) हरे + अव

(iii) ‘दोग्धा’ का सन्धि-विच्छेद है :

(अ) दोग + धा
(ब) दोक् + धा
(स) दो + ग्धा
(द) दोघ् + धा

Ans. (ब) दोक् + धा

(ख) निम्नलिखित में से किसी एक पद का विग्रह करके समास का नाम लिखिए :

(i) प्रतिदिनम्
Ans. विग्रह: प्रत्येक दिन
समास: अव्ययीभाव समास।

(ii) गदाहस्तः
Ans. विग्रह: गदा है हाथ में जिसके
समास: बहुव्रीहि समास।

(iii) दशाननः
Ans. विग्रह: दस आनन हैं जिसके
समास: बहुव्रीहि समास।

13. (क) (i) ‘लघुता’ में प्रत्यय है :

(अ) तव्यत्
(ब) अनीयर
(स) तल्
(द) त्व

Ans. (स) तल्

(ii) किस शब्द में ‘मतुप्’ प्रत्यय है ?

(अ) धीमान्
(ब) पुरुषत्व
(स) दीनता
(द) पठितव्य

Ans. (अ) धीमान्

ख) (i) रेखांकित पदों (बोल्ड) में से किसी एक पद में विभक्ति तथा सम्बन्धित नियम का उल्लेख कीजिए :

(अ) भिक्षुकः पादेन खब्जः अस्ति ।
Ans. ‘पादेन’ में तृतीया विभक्ति है।
नियम: जिस अंग से विकार का ज्ञान होता है, वहाँ तृतीया विभक्ति होती है।

(ब) सुग्रीवः रामस्य सखा आसीत् ।
Ans. ‘रामस्य’ में षष्ठी विभक्ति है।
नियम: सम्बन्ध का बोध कराने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है।

(स) मोहनः गृहात् आगच्छति ।
Ans. ‘गृहात्’ में पञ्चमी विभक्ति है।
नियम: अलग होने या अपादान का बोध होने पर पञ्चमी विभक्ति होती है।

(ii) निम्नलिखित वाक्यों में से येनाङ्गविकारः (अंग से विकार लक्षित होता है) कौन-सा वाक्य है ?

(अ) गृहं परितः वनम् अस्ति ।

(ब) सः शिरसा खल्वाटः ।

(स) देवेभ्यः स्वाहा ।
Ans.
(ब) सः शिरसा खल्वाटः ।

14. निम्नलिखित में से किसी एक पत्र का प्रारूप के साथ उदाहरण लिखिए :

(क) कार्यालयी पत्र
Ans.

सेवा में,
जिला विद्यालय निरीक्षक,
वाराणसी, उत्तर प्रदेश।

विषय—विद्यालय में पुस्तकालय की सुविधा बढ़ाने के सम्बन्ध में।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि हमारे विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, परंतु पुस्तकालय में पर्याप्त पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं, सामान्य ज्ञान, विज्ञान, साहित्य तथा अन्य विषयों की उपयोगी पुस्तकों का भी अभाव है। विद्यार्थियों की अध्ययन-रुचि को बढ़ाने के लिए पुस्तकालय में नई एवं उपयोगी पुस्तकों की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि विद्यालय के पुस्तकालय के लिए आवश्यक पुस्तकों की व्यवस्था कराने हेतु उचित कार्यवाही करने की कृपा करें।

भवदीय
एक विद्यार्थी
दिनांक : ……………………
स्थान : ……………………

(ख) व्यक्तिगत पत्र
Ans.

स्थान : वाराणसी
दिनांक : 18 सितम्बर 2026

प्रिय मित्र राहुल,

सप्रेम नमस्कार।

आशा है कि तुम स्वस्थ और प्रसन्न होगे। मैं भी यहाँ सकुशल हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा निकट है और मैं नियमित रूप से पढ़ाई कर रहा हूँ। मैंने सभी विषयों के लिए समय-सारिणी बना ली है। कठिन विषयों का प्रतिदिन अभ्यास करता हूँ और पुराने प्रश्नपत्र भी हल कर रहा हूँ।

तुम भी अपनी पढ़ाई नियमित रूप से करना। केवल परीक्षा के समय पढ़ने के बजाय प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अध्ययन करना अधिक लाभदायक होता है। अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना।

शेष मिलने पर।

तुम्हारा मित्र
सुमित

(ग) व्यावसायिक पत्र
Ans.

सेवा में,
प्रबन्धक,
श्री गणेश पुस्तक भण्डार,
वाराणसी।

विषय—पाठ्य एवं प्रतियोगी पुस्तकों की आपूर्ति के संबंध में।

महोदय,

हमें अपने विद्यालय के पुस्तकालय के लिए कक्षा 12 की हिन्दी, संस्कृत, विज्ञान तथा अन्य विषयों की पाठ्य-पुस्तकों एवं संदर्भ पुस्तकों की आवश्यकता है। कृपया उपलब्ध पुस्तकों की सूची तथा थोक मूल्य भेजने का कष्ट करें।

हम बड़ी मात्रा में पुस्तकें खरीदना चाहते हैं। अतः पुस्तकों पर उपलब्ध छूट तथा भुगतान एवं आपूर्ति की शर्तों की जानकारी भी भेजें।

धन्यवाद।

भवदीय
प्रधानाचार्य
…………………… विद्यालय
वाराणसी
दिनांक : ……………………

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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