U.P Board Class 12 Sanskrit 303(HQ) Question Paper 2025

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सत्र – 2025
संस्कृत
समयः तीन घण्टे 15 मिनट            पूर्णांकः 100

नोट : प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं ।

1. अधोलिखित गद्य खण्ड पर आधारित प्रश्नों के उत्तर हिन्दी अथवा संस्कृत में दीजिए : 5 x 2 = 10

गते च तस्मिन् गन्धर्वराजपुत्री, विसृज्य सकलं सखीजनम् परिजनं च प्रासादम् आरुरोह । तत्र च शयनीये
निपत्य एकाकिनी एवं चिन्तयामास – “अहो ! किमिदम् आरब्धं चपलया मया । न परीक्षिता अस्य चित्तवृत्तिः ।
परित्यक्तः कुलकन्यकानां क्रमः । गुरुजनात् न त्रस्तम् । लोकापवादात् नोद्विग्नम् । आसन्नवर्ती सखीजनोऽपि
उपलक्षयतीति मन्दया मया न लक्षितम् । तथा महाश्वेताव्यतिरेकेण प्रतिज्ञा कृता श्रुत्वैतं वृत्तान्तं किं वक्ष्यति
अम्बा तातो वा ? किं करोमि ? केनोपायेन स्खलितम् इदं प्रच्छादयामि ? पूर्वकृतपुण्यसंचयेनैवायम् आनीतो
मम विप्रलम्भकः चन्द्रापीडः” इति संचिन्त्य गुर्वीम् लज्जाम् उवाह ।

(i) उपर्युक्त गद्यांश किस पुस्तक से लिया गया है ?
Ans. यह गद्यांश बाणभट्ट रचित ‘कादम्बरी’ से लिया गया है।

(ii) “आसन्नवर्ती, सखीजनोऽपि उपलक्षयतीति मन्दया न लक्षितम् ।” रेखांकित (बोल्ड) अंश का अनुवाद कीजिए ।
Ans. पास रहने वाली सखियाँ भी इस बात को समझ रही थीं, परन्तु मेरी मूर्खता के कारण मुझे इसका पता नहीं चला।

(iii) गन्धर्वराजपुत्री, विसृज्य सकलं सखीजनं परिजनं च कुत्र आरुरोह ?
Ans. गन्धर्वराजपुत्री ने सभी सखियों और परिजनों को छोड़कर प्रासादम् पर आरोहण किया।

(iv) ‘विप्रलम्भकः’ का शाब्दिक अर्थ लिखिए ।
Ans. वियोग कराने वाला अथवा विरह उत्पन्न करने वाला।

(v) ‘शयनीये’ में कौन सी विभक्ति है ?
Ans. सप्तमी विभक्ति, एकवचन।

अथवा

अथ क्रीडापर्वतकस्य प्राभागे मनोहारिणि मरकतशिलातले समुपविष्टः दृष्टवान् महता धवलेनालोकेन
विराजमानम् अम्बाजलम् श्रद्धांश्च मदलेखाम् आगच्छन्तीम् तस्याश्च धर्माधिकारिणीं तथा च
सितांशुकोपच्छदं पटलकं गृहीतं शरच्चन्द्रम् इव चन्द्रातपमण्डलम् अतितरां हारम् । दृष्ट्वा च इदम् अस्य
कोपस्य कारणम् इति निश्चित्य, प्रत्युत्थानादिना समुचितेन उपचारेण मदलेखां प्रति जग्राह ।

(i) उपर्युक्त गद्यांश किस पुस्तक से लिया गया है ?
Ans. यह गद्यांश बाणभट्ट रचित ‘कादम्बरी’ से लिया गया है।

(ii) कः मदलेखां प्रति जग्राह ?
Ans. चन्द्रापीडः मदलेखां प्रति जग्राह।

(iii) अथ क्रीडापर्वतकस्य प्राभागे मनोहारिणि मरकतशिलातले समुपविष्टः दृष्टवान् रेखांकित अंश का अनुवाद कीजिए ।
Ans. इसके बाद क्रीड़ा-पर्वत के पूर्वी भाग में मनोहर हरे रंग की मरकत-मणि जैसी शिला पर बैठे हुए उसने देखा।

(iv) ‘अतितराम्’ का शाब्दिक अर्थ लिखिए ।
Ans. अत्यन्त, बहुत अधिक।

(v) ‘क्रीडापर्वतकस्य’ यहाँ कौन सी विभक्ति एवं वचन है ?
Ans. षष्ठी विभक्ति, एकवचन।

2. अपनी पाठ्यपुस्तक के आधार पर किसी एक पात्र का हिन्दी में चरित्र-चित्रण कीजिए : (अधिकतम 100 शब्द)

(i) पत्रलेखा
Ans.
पत्रलेखा चन्द्रापीड की अत्यन्त विश्वासपात्र सखी थी। वह बुद्धिमती, विनम्र, कर्तव्यनिष्ठ तथा सेवाभावी थी। वह चन्द्रापीड के प्रति पूर्ण समर्पित थी और उसके सुख-दुःख में सदैव साथ रहती थी। वह कुशल परिचारिका होने के साथ-साथ विवेकशील भी थी। उसके व्यवहार में प्रेम, निष्ठा और त्याग की भावना दिखाई देती है। इस प्रकार पत्रलेखा का चरित्र आदर्श सखी एवं सेविका के रूप में प्रस्तुत हुआ है।

(ii) वैशम्पायन
Ans.
वैशम्पायन ‘कादम्बरी’ का प्रमुख पात्र है। वह चन्द्रापीड का घनिष्ठ मित्र और अत्यन्त बुद्धिमान युवक था। वह विद्वान, विनम्र, वीर तथा कर्तव्यनिष्ठ था। उसके हृदय में मित्र के प्रति गहरा प्रेम और निष्ठा थी। महाश्वेता के प्रति आकर्षित होने के कारण उसके जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। वह भावुक होने के साथ-साथ दृढ़ निश्चयी भी था। अपने कर्मों और प्रेम के कारण उसे अनेक कष्ट सहने पड़े। इस प्रकार वैशम्पायन का चरित्र प्रेम, मित्रता, त्याग और निष्ठा का सुंदर उदाहरण है।

(iii) महाश्वेता
Ans.
महाश्वेता ‘कादम्बरी’ की प्रमुख नायिकाओं में से एक है। वह अत्यन्त सुन्दर, बुद्धिमती, प्रेमनिष्ठ और दृढ़ चरित्र वाली युवती थी। उसका हृदय पुण्डरीक के प्रति सच्चे प्रेम से भरा था। पुण्डरीक के वियोग में उसने सांसारिक सुखों का त्याग कर तपस्विनी का जीवन स्वीकार किया। वह अपने प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित और दृढ़ थी। उसके चरित्र में त्याग, धैर्य, करुणा और पतिव्रता-भावना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इस प्रकार महाश्वेता भारतीय नारी के प्रेम, त्याग और निष्ठा की आदर्श प्रतिमूर्ति है।

3. बाणभट्ट के जीवनवृत्त पर प्रकाश डालते हुए उनके कृतियों की विवेचना कीजिए : (अधिकतम 100 शब्द)
Ans.
बाणभट्ट संस्कृत के प्रसिद्ध गद्यकार थे। वे सम्राट हर्षवर्धन के आश्रित कवि थे। उनका जन्म सातवीं शताब्दी में हुआ था। उनकी भाषा अत्यन्त अलंकारपूर्ण, प्रभावशाली और वर्णनप्रधान है। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ हैं। ‘हर्षचरित’ में सम्राट हर्षवर्धन के जीवन का वर्णन है, जबकि ‘कादम्बरी’ एक प्रसिद्ध गद्यकाव्य है। संस्कृत गद्य साहित्य में बाणभट्ट का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

4. (अ) मदलेखा केन दृष्टा ?

(i) चन्द्रापीडेन
(ii) वैशम्पायनेन
(iii) तारापीडेन
(iv) चित्ररथेन

Ans. (i) चन्द्रापीडेन

(आ) महाश्वेतायाः माता का आसीत् ? 1

(i) पत्रलेखा
(ii) गौरी
(iii) मदिरा
(iv) विलासवती

Ans. (ii) गौरी

5. अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की हिन्दी में सन्दर्भ-सहित व्याख्या कीजिए :

(अ) एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन ।
       शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेवार्थमभाषतेव ।।

Ans. सन्दर्भ— प्रस्तुत श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशम्’ महाकाव्य से उद्धृत है। इसमें राजा दिलीप और सिंह के संवाद का वर्णन किया गया है।

व्याख्या— सिंह ने राजा दिलीप से इतना कहकर अपनी बात समाप्त कर दी। उसके बोलना बन्द करने के बाद उसकी आवाज गुफा में गूँज उठी। उस प्रतिध्वनि के कारण ऐसा प्रतीत हुआ मानो ऊँचा पर्वत भी प्रसन्न होकर राजा दिलीप से उसी बात को जोर से कह रहा हो। कवि ने यहाँ प्रतिध्वनि को पर्वत के बोलने के रूप में कल्पित करके अत्यन्त सुन्दर प्रकृति-चित्रण किया है।

(आ) पुरन्दरश्रीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमानः ।
         भुजे भुजङ्गेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमेर्धुरमाससञ्ज ।।
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत श्लोक महाकवि कालिदास रचित ‘रघुवंशम्’ महाकाव्य से लिया गया है। इसमें राजा रघु के विजय प्राप्त करके राजधानी लौटने का वर्णन किया गया है।

व्याख्या— राजा रघु इन्द्र के समान वैभव और तेज से सम्पन्न होकर पताकाओं से सजी हुई अपनी राजधानी में प्रवेश करते हैं। नगर के निवासी उनका हर्षपूर्वक अभिनन्दन करते हैं। अत्यन्त शक्तिशाली और सर्पराज के समान दृढ़ भुजाओं वाले राजा रघु ने पुनः पृथ्वी के शासन का भार अपने कन्धों पर धारण कर लिया। इस प्रकार कवि ने राजा रघु की वीरता, शक्ति, यश और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व का सुन्दर वर्णन किया है।

6. अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की सन्दर्भ-सहित संस्कृत में व्याख्या कीजिए :

(अ) एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं, नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च ।
        अल्पस्य हेतोः बहु हातुमिच्छन् विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम् ।।
Ans.
सन्दर्भः— अयं श्लोकः महाकविकालिदासस्य ‘रघुवंशम्’ महाकाव्यात् उद्धृतः अस्ति। अत्र सिंहः राजानं दिलीपं प्रति स्वविचारं प्रकटयति।

व्याख्या— सिंहः कथयति— हे राजन्! त्वं सम्पूर्णस्य जगतः एकच्छत्रं प्रभुत्वं, नवीनं यौवनं तथा अतीव सुन्दरं शरीरं च प्राप्य अपि अल्पस्य कारणस्य कृते एतान् बहुमूल्यान् पदार्थान् त्यक्तुम् इच्छसि। अतः त्वं विचारशून्यः इव मे प्रतिभाससे।

भावार्थः— सिंह के अनुसार राजा दिलीप छोटी-सी वस्तु के लिए अपना राज्य, यौवन और शरीर जैसे महान् सुखों को छोड़ना चाहते हैं, इसलिए सिंह को उनका निर्णय अविवेकपूर्ण प्रतीत होता है।

(आ) तस्मिन् क्षणे पालयितुः प्रजानाम् उत्पश्यतः सिंहनिपातमुग्रम् ।
अवाङ्मुखस्योपरि पुष्पवृष्टिः पपात विद्याधरहस्तमुक्ता ।।
Ans.
सन्दर्भः— अयं श्लोकः महाकविकालिदासस्य ‘रघुवंशम्’ महाकाव्यात् उद्धृतः अस्ति। अत्र राजा दिलीपस्य धैर्यस्य एवं साहसस्य वर्णनम् अस्ति।

व्याख्या— तस्मिन् समये प्रजानां पालकः राजा दिलीपः सिंहस्य भयंकरं आक्रमणं दृष्टवान्। सिंहस्य सम्मुखे सः अधोमुखः अभवत्। तदा विद्याधराणां हस्तेभ्यः मुक्ताः पुष्पाः तस्य उपरि वर्षिताः।

भावार्थः— जब राजा दिलीप ने सिंह के भयंकर आक्रमण को देखा और उसके सामने विनम्र होकर खड़े रहे, तब उनकी वीरता एवं त्याग से प्रसन्न होकर विद्याधरों ने आकाश से उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा की। यह राजा दिलीप के महान् साहस और त्याग का प्रतीक है।

7. कालिदास का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए कालिदास की काव्यशैली की विवेचना कीजिए । (अधिकतम 100 शब्द)
Ans.
महाकवि कालिदास संस्कृत साहित्य के महानतम कवियों में माने जाते हैं। उनके जीवन के विषय में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्हें गुप्तकाल का कवि माना जाता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा मालविकाग्निमित्रम् हैं। उनकी काव्यशैली सरल, मधुर, प्रसादपूर्ण तथा भावपूर्ण है। प्रकृति-चित्रण, उपमा, मानवीय भावनाओं और सौन्दर्य का चित्रण उनकी विशेषता है।

8. (अ) महाराज-दिलीपस्य भार्या का ?

(i) सुदक्षिणा
(ii) भानुमती
(iii) इन्दुमती
(iv) सविता

Ans. (i) सुदक्षिणा

(आ) नन्दिनी कस्य धेनुः आसीत् ?

(i) वशिष्ठस्य
(ii) दिलीपस्य
(iii) विश्वामित्रस्य
(iv) कण्वस्य

Ans. (i) वशिष्ठस्य

9. अधोलिखित में से किसी एक अंश की हिन्दी में सन्दर्भ-सहित व्याख्या कीजिए :

(अ) उद्गलित-दर्भकवला मृग्यः परित्यक्तनर्तना मयूराः ।
        अपसृत पाण्डुपत्रा मुग्धन्त्यश्रुणीव लताः ।।
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत अंश महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक से उद्धृत है। इसमें कण्व ऋषि द्वारा शकुन्तला की विदाई के समय आश्रम के वातावरण का मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या— शकुन्तला के आश्रम से विदा होने के कारण वहाँ का पूरा वातावरण दुःखमय हो गया है। हिरनियाँ अपने मुँह में रखे हुए दर्भ के तिनकों को छोड़ देती हैं। मोर नृत्य करना छोड़ देते हैं। पीले पत्तों से रहित लताएँ ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो आँसुओं से रो रही हों। इस प्रकार आश्रम के पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ भी शकुन्तला के वियोग से दुःखी दिखाई देती हैं।

(आ) शममेष्यति मम शोकः कथं नु वत्से त्वया रचितपूर्वम् ।
         उटजद्वारविरूढं नीवारबलिं विलोकयतः ।।
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत अंश महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक के चतुर्थ अंक से उद्धृत है। इसमें महर्षि कण्व शकुन्तला की विदाई के समय अपने दुःख को व्यक्त करते हैं।

व्याख्या— महर्षि कण्व कहते हैं— हे पुत्री शकुन्तले! जब मैं कुटिया के द्वार पर तुम्हारे द्वारा पहले चढ़ाई गई नीवार-अन्न की बलि को देखूँगा, तब मेरा यह शोक कैसे शांत होगा? अर्थात् तुम्हारे चले जाने के बाद तुम्हारी स्मृतियाँ मुझे निरन्तर दुःखी करती रहेंगी। तुम्हारे द्वारा की गई छोटी-छोटी सेवाएँ और कार्य मुझे तुम्हारी याद दिलाते रहेंगे।

भावार्थ— इस अंश में पिता कण्व का अपनी पुत्री शकुन्तला के प्रति गहरा स्नेह और उसके वियोग का दुःख अत्यन्त मार्मिक रूप से व्यक्त हुआ है।

10. निम्नलिखित में से किसी एक सूक्ति की सन्दर्भ-सहित हिन्दी में व्याख्या कीजिए :

(i) स्नेहप्रवृत्तिरेव दर्शनी
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत सूक्ति महाकवि कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ से ली गई है। इसमें स्नेह की महत्ता को व्यक्त किया गया है।

व्याख्या— इस सूक्ति का अर्थ है कि स्नेह से प्रेरित होकर किया गया व्यवहार ही देखने योग्य और प्रशंसनीय होता है। सच्चे प्रेम में स्वार्थ नहीं होता। जब मनुष्य किसी के प्रति स्नेह रखता है तो उसके प्रति स्वाभाविक रूप से प्रेम, सहानुभूति और अपनापन प्रकट करता है। अतः स्नेहपूर्ण व्यवहार मनुष्य के चरित्र की सुंदरता को प्रकट करता है।

(ii) गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्धः साहयति ।
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत सूक्ति महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक से उद्धृत है। इसमें वियोग के समय आशा की शक्ति का वर्णन किया गया है।

व्याख्या— इसका अर्थ है कि आशा का सहारा अत्यन्त बड़े वियोग के दुःख को भी सहन करा देता है। मनुष्य जब किसी प्रिय व्यक्ति से दूर हो जाता है, तब उसे बहुत दुःख होता है। परन्तु यदि उसके मन में पुनः मिलन की आशा बनी रहती है, तो वह उस दुःख को धैर्यपूर्वक सहन कर लेता है। इसलिए आशा मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी साहस और धैर्य प्रदान करती है।

(iii) अतिस्नेहः पापशंकी
Ans.
सन्दर्भ— प्रस्तुत सूक्ति महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ नाटक से ली गई है। इसमें अत्यधिक स्नेह के प्रभाव को बताया गया है।

व्याख्या— इसका अर्थ है कि अत्यधिक स्नेह करने वाला व्यक्ति छोटी-सी बात में भी अनिष्ट की आशंका करने लगता है। जिस व्यक्ति से हमें बहुत अधिक प्रेम होता है, उसके प्रति हम अधिक चिन्तित रहते हैं। उसके सम्बन्ध में कोई छोटी-सी विपरीत बात भी हमें बड़ी शंका उत्पन्न कर देती है। अतः अत्यधिक स्नेह के कारण मनुष्य अनिष्ट की आशंका से भयभीत हो जाता है।

11. कालिदास की कृतियों का संक्षिप्त परिचय देते हुए अभिज्ञानशाकुन्तल के चतुर्थ अंक का सारांश लिखिए: (अधिकतम 100 शब्द)
Ans.
कालिदास की प्रमुख रचनाओं में रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम् प्रमुख हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के चतुर्थ अंक में शकुन्तला के विदा होने का मार्मिक वर्णन है। दुर्वासा के शाप के कारण वह राजा दुष्यन्त को भूलने वाली है। कण्व ऋषि शकुन्तला को पति के घर भेजते हैं। आश्रम के सभी जीव-जंतु और सखियाँ उसके वियोग से दुःखी होते हैं। कण्व उसे पतिगृह में सदाचारपूर्वक रहने का उपदेश देते हैं।

12. (अ) कालिदास की रचना नहीं है –

(i) स्वप्नवासवदत्तम्
(ii) विक्रमोर्वशीयम्
(iii) मालविकाग्निमित्रम्
(iv) अभिज्ञानशाकुन्तलम्

Ans. (i) स्वप्नवासवदत्तम्

(आ) ‘शिवास्ते पन्थानः सन्तु’ इति शुभकामनां प्रकटितवान् ।

(i) काश्यपः
(ii) मारीचः
(iii) गौतमी
(iv) शिष्यः

Ans. (i) काश्यपः

13. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर 10 पंक्तियों का संस्कृत में निबन्ध लिखिए :

(i) पर्यावरण-सुरक्षा

Ans. पर्यावरणम् अस्माकं जीवनस्य आधारः अस्ति। वायुः, जलम्, भूमिः, वनानि च पर्यावरणस्य प्रमुखाणि अङ्गानि सन्ति। अद्य मानवस्य विविधाभिः क्रियाभिः पर्यावरणं प्रदूषितं भवति। वायुप्रदूषणेन, जलप्रदूषणेन च अनेकाः समस्याः उत्पद्यन्ते। वृक्षाः अस्मभ्यं प्राणवायुम् ददति, अतः अधिकाधिकाः वृक्षाः रोपणीयाः। नदीनां जलं स्वच्छं रक्षणीयम् तथा प्लास्टिकस्य प्रयोगः न्यूनः करणीयः। अस्माभिः पर्यावरणस्य संरक्षणाय सर्वदा प्रयत्नः करणीयः। स्वच्छं पर्यावरणमेव स्वस्थजीवनस्य आधारः अस्ति।

(ii) श्रम एव विजयते

Ans. श्रमः मानवजीवनस्य आधारः अस्ति। श्रमेण एव मनुष्यः जीवनस्य लक्ष्यं प्राप्तुं शक्नोति। आलस्यं मनुष्यस्य महान् शत्रुः अस्ति। परिश्रमी मनुष्यः कठिनानि कार्याणि अपि सफलतया करोति। विद्यार्थी श्रमेण विद्यां प्राप्नोति तथा कृषकः परिश्रमेण अन्नम् उत्पादयति। श्रमेण कठिनं कार्यमपि सरलम् भवति। परिश्रमस्य फलं सदा मधुरं भवति। अतः अस्माभिः आलस्यं त्यक्त्वा निरन्तरं परिश्रमः करणीयः। वास्तवतः श्रम एव विजयस्य मूलमन्त्रः अस्ति।


(iii) जनसंख्या समस्या

Ans. भारतदेशे जनसंख्या अत्यधिकं वर्धते। जनसंख्यावृद्धिः अस्माकं देशस्य प्रमुखा समस्या अस्ति। अधिकजनसंख्यया अन्नस्य, जलस्य, आवासस्य च आवश्यकता वर्धते। जनसंख्यावृद्ध्या बेरोजगारी, निर्धनता तथा प्रदूषणम् अपि वर्धते। प्राकृतिकसंसाधनानाम् अधिकं शोषणं भवति। जनसंख्यायाः नियन्त्रणाय जनजागरणम् आवश्यकम् अस्ति। सर्वेषां कृते शिक्षायाः प्रसारः करणीयः तथा परिवारनियोजनस्य महत्त्वं जनैः ज्ञातव्यम्। जनसंख्यायाः नियन्त्रणेन देशस्य विकासः शीघ्रं भवितुम् अर्हति।


(iv) यातायात-सुरक्षा

Ans. आधुनिकजीवने यातायातस्य महत्त्वं वर्तते। मार्गेषु प्रतिदिनं बहवः जनाः वाहनैः गच्छन्ति। अतः सर्वैः यातायातनियमाः पालनीयाः। वाहनचालकैः वाहनस्य वेगः नियन्त्रितः करणीयः। द्विचक्रिकायानचालकैः शिरस्त्राणं धारणीयम्। वाहनचालने समये चलदूरभाषस्य प्रयोगः न करणीयः। मार्गं पारयितुं पादचारिमार्गस्य प्रयोगः करणीयः। यातायातसंकेताः सावधानतया पालनीयाः। यातायातनियमपालनेन दुर्घटनाः न्यूनीकर्तुं शक्यन्ते। अतः यातायात-सुरक्षा सर्वेषां दायित्वम् अस्ति।

14. ‘उपमा’ अलंकार की परिभाषा हिन्दी या संस्कृत में लिखिए ।
Ans.
जिस अलंकार में दो समान वस्तुओं या व्यक्तियों के बीच समानता बताई जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। इसमें प्रायः इव, यथा, सदृश, समान आदि शब्दों का प्रयोग होता है।

अथवा

‘रूपक’ अलंकार का उदाहरण संस्कृत में लिखिए ।
Ans.
चन्द्रः मुखकमलम्।

व्याख्या: यहाँ मुख में कमल का आरोप किया गया है। मुख और कमल में भेद न दिखाकर दोनों को एक ही माना गया है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।

15. निम्नलिखित में से किन्हीं चार वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए :

(i) हम दोनों खाना खाते हैं ।
Ans.
आवां भोजनं खादावः।

(ii) तुम लोग राम और श्याम पढ़ते हो ।
Ans.
यूयं रामं श्यामं च पठथ।

(iii) मोहन कुर्सी पर बैठता है ।
Ans.
मोहनः आसन्दिकायाम् उपविशति।

(iv) विद्यालय के चारों ओर वृक्ष हैं ।
Ans.
विद्यालयस्य परितः वृक्षाः सन्ति।

(v) वह बड़े भाई से ईर्ष्या करता है ।
Ans.
सः अग्रजं प्रति ईर्ष्यति।

(vi) वह पिता से पढ़ता है ।
Ans.
सः पितुः समीपे पठति।

16. (अ) अधोलिखित रेखांकित (बोल्ड) पदों में से किसी एक में नियम-निर्देश का उल्लेख कीजिए :

(i) अहं प्रयागराजे पठामि ।
Ans. ‘प्रयागराजे’ पद में सप्तमी विभक्ति है।
नियम: अधिकरणे सप्तमी।
अर्थात् स्थान या आधार का बोध होने पर सप्तमी विभक्ति होती है।

(ii) सः सर्पात् बिभेति ।
Ans. ‘सर्पात्’ पद में पञ्चमी विभक्ति है।
नियम: अपादाने पञ्चमी।
‘भी’ धातु के योग में भय के कारण का बोध कराने वाले पद में पंचमी विभक्ति होती है।

(iii) वृक्षात् पत्रं पतति ।
Ans. ‘वृक्षात्’ पद में पञ्चमी विभक्ति है।
नियम: अपादान का बोध होने पर पञ्चमी विभक्ति होती है।

(आ) ‘राज्ञे स्वस्ति’ में रेखांकित (बोल्ड ) पद में कौन सी विभक्ति है ?

(i) चतुर्थी
(ii) पंचमी
(iii) षष्ठी
(iv) सप्तमी

Ans. (i) चतुर्थी

17. (अ) निम्नलिखित पदों में से किसी एक में विग्रह कीजिए :

(i) अनुज्येष्ठम्
Ans.
ज्येष्ठस्य अनु पश्चात् = अनुज्येष्ठम्।

(ii) द्वियमुनम्
Ans.
यमुनयोः समाहारः = द्वियमुनम्।

(iii) रामसीते
Ans.
रामश्च सीता च = रामसीते।

(आ) ‘नवरात्रम्’ में प्रयुक्त समास है –

(i) द्वन्द्वः
(ii) द्विगुः
(iii) अव्ययीभावः
(iv) कर्मधारयः

Ans. (ii) द्विगुः

18. (अ) ‘गुरोर्धनम्’ का सन्धि विधायक सूत्र लिखिए ।
Ans..
‘गुरोर्धनम्’ का सन्धि-विधायक सूत्र:
गुरोः + धनम् → गुरोर्धनम्।

यहाँ विसर्ग सन्धि है। सूत्र — विसर्जनीयस्य सः।

(आ) ‘उड्डयनम्’ का सन्धि-विच्छेद है-

(i) उड् + अयनम्
(ii) उद् + उयनम्
(iii) उद् + अयनम्
(iv) उत् + डयनम्

Ans. (iii) उद् + अयनम्

19. (अ) ‘वारिणे’ पद वारि प्रातिपदिक के किस विभक्ति एवं वचन का रूप है ?
Ans.
वारि प्रातिपदिक — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन।

(आ) ‘नाम्नी’ पद नामन् प्रातिपदिक के किस विभक्ति एवं वचन का रूप है ?
Ans.

(i) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
(ii) तृतीया विभक्ति, एकवचन
(iii) द्वितीया विभक्ति, द्विवचन
(iv) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन

Ans. (iv) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन

20. (अ) ‘नेष्यथः’ क्रियापद का पुरुष और वचन लिखिए ।
Ans.
मध्यम पुरुष, द्विवचन।

(आ) ‘नी’ धातु के लङ् लकार उत्तम पुरुष एकवचन का रूप होगा ।

(i) अनयः
(ii) अनयत्
(iii) अनयन
(iv) अनयम्

Ans. (iv) अनयम्

21. (अ) ‘हात्वा’ पद में प्रयुक्त प्रकृति एवं प्रत्यय बताइए ।
Ans.

(आ) ‘नी’ धातु से तुमुन् प्रत्यय लगाने पर शब्द बनेगा –

(i) नेतुम्
(ii) नीतुम्
(iii) नयितव्यम्
(iv) नीत्वा

Ans. (i) नेतुम्

22. अधोलिखित वाक्यों में से किसी एक वाक्य का वाच्य परिवर्तन कीजिए :

(i) सः पुस्तकं पठति ।
Ans.
तेन पुस्तकं पठ्यते।
(कर्तृवाच्य → कर्मवाच्य)

(ii) रामः शेते ।
Ans.
रामेण शय्यते।
(कर्तृवाच्य → भाववाच्य)

(iii) छात्राः हसन्ति ।
Ans.
छात्रैः हस्यते।
(कर्तृवाच्य → भाववाच्य)

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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