नगर प्रशासन : अध्याय -6

इतवार की एक अलसायी हुई दोपहर थी जब माला और उसके साथी शंकर, जहाँगीर और रेहाना गली में क्रिकेट खेल रहे थे। शंकर ने बड़ा अच्छा ओवर फेंका था और रेहाना आउट होते-होते बची थी। रेहाना के आउट न होने से शंकर हताश हो रहा था। इसीलिए उसने इस उम्मीद से कि वह कैच आउट हो जाएगी एक शार्ट बॉल फेंक दी। हुआ उल्टा ही। रेहाना ने इतनी तेज़ी से बल्ला घुमाया कि गेंद ऊपर गई और गली की ट्यूबलाइट टूट गई। रेहाना चिल्लाई, “अरे! यह मैंने क्या कर दिया?” तो शंकर तपाक से बोला, “अरे हम यह नियम बनाना भूल गए थे कि अगर तुम्हारी गेंद से गली की ट्यूबलाइट टूट जाएगी तो तुम आउट मानी जाओगी।” तीनों ने ही तब शंकर को विकेट की चिंता छोड़ने के लिए कहा क्योंकि जो हुआ वे उस बारे में ज़्यादा चिंतित और परेशान हो रहे थे।

पिछले हफ़्ते उनसे निर्मला मौसी की खिड़की टूट गई थी जिसको बदलने के लिए अपने जेब-खर्च में से पैसे देने पड़े थे। क्या अब दोबारा जेब खर्च में से पैसे देने पड़ेंगे? और ये पैसे देंगे किसको? गली की ट्यूबलाइट बदलता कौन है?

माला का घर सबसे पास था। चारों भाग कर माला के घर गए और उसकी माँ को सब कुछ बता दिया। सारी बात सुनकर माला की माँ ने कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ खास तो पता नहीं, बस यही मालूम है कि यह नगर निगम की ज़िम्मेदारी होती है। उन्होंने सुझाया, “यास्मीन खाला से पूछना चाहिए, वे हाल ही में नगर निगम से सेवानिवृत्त हुई हैं। जाओ उनसे पूछ लो और माला, तुम जल्दी घर वापस आना।”

यास्मीन खाला उसी गली में रहती थीं और माला की माँ से उनकी बहुत अच्छी दोस्ती भी थी। चारों दौड़कर खाला के घर पहुँचे और जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला वे एक साथ पूरा किस्सा सुनाने लगे। उनका सवाल सुनकर यास्मीन खाला बड़े ज़ोर से हँस पड़ीं और बोलीं, “कोई एक व्यक्ति नहीं है जिसको तुम पैसा दे सकते हो। एक बहुत बड़ी संस्था होती है जिसको नगर निगम कहते हैं। यह सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था, कूड़ा इकट्ठा करने, पानी की सुविधा उपलब्ध कराने और सड़कों व बाज़ारों की सफाई का काम करती है।”

माला बोली, “हाँ-हाँ, मैंने नगर निगम के बारे में सुना है। मैंने शहर में बोर्ड देखे हैं जो नगर निगम द्वारा लोगों को मलेरिया के बारे में बताने के लिए लगाए जाते हैं।”

खाला बोलीं, “तुम बिल्कुल सही कह रही हो। नगर निगम का काम यह सुनिश्चित करना भी है कि शहर में बीमारियाँ न फैलें। यह स्कूल स्थापित करता है और उन्हें चलाता है। शहर में दवाखाने और अस्पताल चलाता है। यह बाग-बगीचों का रख-रखाव भी करता है।” उन्होंने आगे जोड़ा, “हमारा पुणे शहर बहुत ही बड़ा शहर है और यहाँ नगर प्रशासन चलाने वाले संस्थान को नगर निगम कहते हैं। छोटे कस्बों में इसे नगर पालिका कहते हैं।”

निगम पार्षद एवं प्रशासनिक कर्मचारी

“यास्मीन खाला, मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है कि यह फैसला लेता कौन है कि पार्क कहाँ बनाया जाए? जब आप नगर निगम में काम करती थीं तो क्या ऐसे मज़ेदार निर्णय भी लेने पड़ते थे?” रेहाना ने पूछा।

खाला ने जवाब दिया, “नहीं रेहाना, मैं तो निगम के लेखा विभाग (एकाउंट) में थी, बस लोगों की मासिक तनख्वाह की पर्चियाँ बनाती थी। चूँकि शहर का आकार बहुत बड़ा होता है, इसलिए नगर निगम को कई निर्णय लेने होते हैं। इसी तरह शहर को साफ़ रखने के लिए बहुत काम करना पड़ता है। ज़्यादातर निगम पार्षद ही यह निर्णय लेते हैं कि अस्पताल या पार्क कहाँ बनेगा।”

शहर को अलग-अलग वार्डों में बाँटा जाता है और हर वार्ड से एक पार्षद का चुनाव होता है। नगर निगम के कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जो सारे शहर को प्रभावित करते हैं। ऐसे जटिल निर्णय पार्षदों के समूह द्वारा लिए जाते हैं। कुछ पार्षद मिलकर समितियाँ बनाते हैं जो विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करके निर्णय लेती हैं – उदाहरणस्वरूप एक बस स्टैंड को बेहतर बनाना है या किसी भीड़भाड़ वाले बाज़ार का कचरा ज़्यादा नियमित रूप से साफ़ करना है या फिर शहर के मुख्य नाले की सफ़ाई होनी है। पार्षदों की समितियाँ ही पानी, कचरा जमा करने और सड़कों पर रोशनी आदि की व्यवस्था करती हैं।

जब एक वार्ड के अंदर की समस्या होती है तो वार्ड के लोग पार्षद से संपर्क कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर बिजली के खतरनाक तार लटक कर नीचे आ जाएँ तो स्थानीय पार्षद बिजली विभाग के अधिकारियों से बात करने में मदद कर सकते हैं।

जहाँ पार्षदों की समितियाँ एवं पार्षद विभिन्न मुद्दों पर निर्णय लेने का काम करते हैं। वहीं उन्हें लागू करने का काम आयुक्त (कमिश्नर) और प्रशासनिक कर्मचारी करते हैं। आयुक्त और प्रशासनिक कर्मचारियों की सरकार द्वारा नियुक्ति की जाती है, जबकि पार्षद निर्वाचित होते हैं।

“तो नगर निगम में ये निर्णय लिए कैसे जाते हैं?” रेहाना ने पूछा। वह कभी सोचना बंद ही नहीं करती।

बच्चों के सवालों से खुश होते हुए यास्मीन खाला ने जवाब दिया, “सारे वार्डों के पार्षद मिलते हैं और सबकी सम्मिलित राय से एक बजट बनाया जाता है। उसी बजट के अनुसार पैसा खर्च किया जाता है।

पार्षद यह प्रयास करते हैं कि उनके वार्ड की विशिष्ट ज़रूरतें परिषद् के सामने रखी जा सकें। फिर ये निर्णय प्रशासनिक कर्मचारियों द्वारा क्रियान्वित किए जाते हैं।” खाला बड़ी खुश थीं क्योंकि किसी बड़े व्यक्ति ने तो आज तक उनके काम के बारे में पूछा नहीं था। बच्चों के सवालों ने उन्हें अपने अनुभव बाँटने का एक मौका दिया था।

नगर निगम को पैसा कहाँ से मिलता है?

इतने सारे काम करने के लिए बहुत सारा पैसा चाहिए। निगम यह राशि अलग-अलग तरीकों से इकट्ठा करता है। इस राशि का बड़ा भाग लोगों द्वारा दिए गए कर (टैक्स) से आता है। कर वह राशि है जो लोग सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के लिए सरकार को देते हैं।

जिन लोगों के अपने घर होते हैं उन्हें संपत्ति कर देना होता है और साथ ही पानी एवं अन्य सुविधाओं के लिए भी कर देना होता है। जितना बड़ा घर उतना ज़्यादा कर। निगम के पास जितना पैसा आता है उसमें संपत्ति कर से केवल 25-30 प्रतिशत पैसा ही आता है।

शिक्षा पर भी कर लगता है। अगर आप किसी दुकान या होटल के मालिक हैं तो उस पर भी कर देना पड़ता है। अगली बार जब आप सिनेमा देखने जाइएगा तो टिकट पर ध्यान से देखिएगा, हमें मनोरंजन के लिए भी कर देना पड़ता है।

इस तरह अमीर लोग संपत्ति कर देते हैं, वहीं जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा सामान्य तरह के कर अधिक देता है।

शंकर ने बड़ी उत्सुकता से पूछा, “अपना शहर तो इतना बड़ा है। इसकी देखभाल के लिए बहुत लोगों की ज़रूरत पड़ती होगी! खाला, तब तो नगर निगम में ढेर सारे लोग काम करते होंगे?” वह अब तक क्रिकेट के मैच और अपने अधूरे ओवर की बात बिल्कुल भूल चुका था।

“दरअसल शहर में काम को अलग-अलग विभागों में बाँट देते हैं। जैसे जल विभाग होता है, कचरा जमा करने का विभाग, उद्यानों की देखभाल का विभाग, सड़क व्यवस्था का विभाग इत्यादि। मैं नगर-निगम के सफ़ाई विभाग में थी, उसी के लेखा विभाग में हिसाब-किताब का काम करती थी।” खाला बड़े इत्मीनान से बता रहीं थीं। फिर बच्चों के खाने के लिए रसोई से कबाब लाने चल पड़ीं।

जहाँगीर ने रसोई में खड़े-खड़े तेज़ी से अपने कबाब खा लिए, फिर ऊँची आवाज़ में वहीं से बोला, “यास्मीन खाला, नगर निगम जिस कूड़े-कचरे को इकट्ठा करता है वह जाता कहाँ है?” बाकी बच्चे अभी कबाब खा ही रहे थे। यास्मीन खाला ने बताना शुरू किया, “इस सवाल का जवाब बड़ा मज़ेदार है। जैसा कि तुम जानते हो कचरा लगभग हर गली में ही फैला रहता है। पहले हमारे पड़ोस का भी यही हाल था, चारों तरफ कूड़ा फैला रहता था। अगर कूड़े को इकट्ठा करके हटाया न जाए तो मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं और आसपास कुत्तों, चूहों का जमावड़ा हो जाता है। लोग इसकी बदबू से बीमार भी पड़ जाते हैं। एक और बुरी बात यह थी कि बच्चों ने गली में क्रिकेट खेलना छोड़ दिया था क्योंकि उनके घरवालों को यही डर लगा रहता था कि गली में अधिक समय रहने से बच्चे बीमार न पड़ जाएँ।

लोगों का विरोध

यास्मीन खाला ने अपनी बात जारी रखी, “मोहल्ले की औरतें इन सबसे बड़ी नाराज़ थीं। वे सलाह लेने मेरे पास भी आईं। मैंने उन्हें कहा कि मैं विभाग के किसी अधिकारी से इस मामले में बात करने की कोशिश करूँगी। मगर मैं भी निश्चित तौर पर यह बात नहीं कह सकती थी कि इसमें कितना समय लगेगा। इस पर गंगाबाई ने बताया कि हमें अपने वार्ड के पार्षद के पास इस समस्या को लेकर जाना चाहिए, आखिर वोट देकर उसे हमने चु चुना है। उसके सामने हमें विरोध प्रदर्शन करना चाहिए।

गंगाबाई ने महिलाओं के एक छोटे समूह को इकट्ठा किया और पार्षद के घर पहुँच गई। सभी औरतें घर के सामने जाकर नारे लगाने लगीं तब पार्षद घर के बाहर निकले और उन्होंने उनकी समस्या के बारे में पूछा। गंगाबाई ने अपने मोहल्ले की खराब हालत बयान की। पार्षद ने उन महिलाओं से वादा किया कि वे अगले दिन उनके साथ आयुक्त से मिलने जाएँगे। साथ ही उन्होंने गंगाबाई को मोहल्ले के सारे वयस्कों से एक अर्जी पर दस्तखत करवाने के लिए कहा।

अर्जी यह थी यह थी कि उनके मोहल्ले से कचरा उठाने की नियमित व्यवस्था की जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि कल आयुक्त से मिलने जाते समय स्थानीय सफ़ाई अभियंता यानी इंजीनियर को भी साथ ले जाना अच्छा रहेगा। इससे फ़ायदा होगा क्योंकि सफ़ाई अभियंता भी – आयुक्त को बता सकेगा कि हालत कितनी ख़राब है।

उस दिन पूरी शाम बच्चे घर-घर का चक्कर लगाते रहे ताकि अर्जी पर ज़्यादा से ज़्यादा परिवारों के लोगों के दस्तखत लिए जा सकें। अगली सुबह बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ, पार्षद और सफ़ाई अभियंता के साथ नगर निगम के दफ़्तर गईं। आयुक्त पूरे समूह से मिले, पर वे बहाना बनाने लगे कि नगर निगम के पास पर्याप्त संख्या में ट्रक उपलब्ध नहीं हैं। गंगाबाई ने तपाक से कहा, “लेकिन लगता है कि आपके पास अमीर इलाकों से कचरा उठाने के लिए पूरे ट्रक हैं।”

जहाँगीर ने झट से कहा, “इससे आयुक्त का तो मुँह ही बंद हो गया होगा।”

“और नहीं तो क्या ! उसने फ़ौरन इंतज़ाम करने के लिए कहा।” यास्मीन खाला ने बताया, “गंगाबाई ने आयुक्त को चेतावनी दी कि अगर दो दिन के अंदर काम नहीं हुआ तो नगर निगम के सामने बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ धरने पर बैठ जाएँगी”।

“तो क्या गलियों की सफ़ाई हो गई?” रेहाना ने झट से पूछा, जो कभी चीज़ों को अधूरा नहीं छोड़ती थी।

“दो दिन तक कुछ भी नहीं हुआ। वो तो जब एक बहुत बड़े समूह ने विरोध प्रदर्शन किया, ज़ोरदार नारे लगाए तब जाकर बात बनी। अब मोहल्ले की सफ़ाई नियमित रूप से होने लगी है।”

“यह तो बिल्कुल बंबड्या सिनेमा की तरह सुखद अंत हुआ”, माला ने कहा। वह अपने आप को नेतृत्व करने वाली गंगाबाई की भूमिका में देखने का सपना देख रही थी।

सभी बच्चों को गंगाबाई की कहानी सुनकर बहुत मज़ा आया। उन्हें इसका आभास तो था ही कि मोहल्ले में गंगाबाई की खासी इज्ज़त थी और लोग उन्हें बहुत मानते थे, मगर उसका कारण उन्हें अब समझ में आया था।

बच्चों ने खाला का शुक्रिया अदा किया और जाने के लिए उठ खड़े हुए। जाते-जाते रेहाना ने कहा, “खाला, बस एक आखिरी सवाल और है! घर पर अभी जो दो कूड़ेदान हैं वो भी क्या गंगाबाई का सुझाव था?”

खाला हँसने लगीं। बोलीं, “अरे नहीं-नहीं! यह तो नगर निगम ने ही सुझाव दिया था कि हम खाने-पीने और गलने वाली चीज़ों को एक कूड़ेदान में डालें और प्लास्टिक, काँच जैसी न गलने वाली चीज़ों को दूसरे कूड़ेदान में। जब हम अपने कचरे की छँटाई कर देते हैं तो निगम वालों का काम थोड़ा आसान हो जाता है।” बच्चों ने इतने सारे सवालों का जवाब देने के लिए खाला का फिर से शुक्रिया अदा किया और टहलते हुए गली की तरफ चल पड़े। बहुत देर हो चुकी थी और – उन्हें जल्दी से जल्दी घर पहुँचना था। आज हमेशा – के मुकाबले गली में अँधेरा थोड़ा ज़्यादा था। उन्होंने – ऊपर देखा, फिर मुस्कराते हुए एक-दूसरे को देखा और वापस खाला के घर की तरफ दौड़ पड़े…

1994 में सूरत शहर में भयंकर प्लेग फैला था। सूरत भारत के सबसे गंदे शहरों में एक था। लोग घरों का और होटलों का भी कूड़ा-कचरा पास की नाली में या सड़क पर ही फेंक देते हैं। इससे सफाई कर्मचारियों को कूड़ा कचरा उठाने तथा उसे ठिकाने लगाने में काफी मुश्किल होती थी। ऊपर से नगर निगम अपना काम नियमित रूप से नहीं कर रही थी जिससे स्थिति और भी बदतर हो गयी थी।

प्लेग हवा के जरिए फैलता है। जिन लोगों को प्लेग हो जाए उन्हें दूसरों से अलग रखना पड़ता है। सूरत में उस साल बहुत से लोगों ने अपनी जान गंवाई। करीब तीन लाख से अधिक लोगों को शहर छोड़ना पड़ा। प्लेग के डर ने यह अनिवार्य कर दिया कि नगर निगम मुस्तैदी से काम करे। सारे शहर की अच्छी तरह से सफाई हुई। आज की तारीख में चंडीगढ़ के बाद भारत के सबसे साफ़ शहरों में दूसरा स्थान सूरत का है।

क्या आप जानती हैं कि आपके मोहल्ले में कब और कितनी बार कूड़ा उठाया जाता है? क्या आपको लगता है कि सभी मोहल्लों में उतनी ही बार कूड़ा उठाया जाता है? यदि नहीं, तो क्यों? चर्चा करें।

यह भी पढ़ें: गांव का प्रशासन : अध्याय -5

अभ्यास

1. बच्चे यास्मीन खाला के घर पर क्यों गए?
Ans.
किक्रेट के खेल के दौरान बच्चों ने गली की ट्यूबलाइट तोड़ दी थी। वे ये जानना चाहते थे कि उस लाइट को बदलने के लिए पैसे किसको देने होंगे। यास्मीन खाला हाल ही में नगर निगम से सेवानिवृत्त हुई थीं, उन्हें इनके बारे में पता होगा यही सोचकर बच्चे उनके घर गए।

2. नगर निगम के कार्य शहर के निवासियों के जीवन को किस तरह प्रभावित करते हैं? ऐसे चार तरीकों के बारे में लिखिए।
Ans.
नगर निगम के कार्य शहर के निवासियों के जीवन में निम्नलिखित प्रभाव डालते हैं:

• यह सड़को पर रोशनी की व्यवस्था करती है।
• कूड़ा इकट्ठा करती है।
• जलपूर्ति का ध्यान रखती है।
• सड़को व बज़ारों की सफाई का काम करती है।

3. नगर निगम पार्षद कौन होता है?
Ans.
यह नगर निगम का निर्वाचित सदस्य होता है इसका चुनाव शहर के पंजीकृत मतदाता पाँच वर्ष के लिए करते हैं।

4. गंगाबाई ने क्या किया और क्यों?
Ans.
गंगाबाई और अन्य महिलाएं विरोध प्रकट करना चाहती थं क्योंकि गलियों से कूड़ नहीं उठाया जा रहा था। तभी बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ, पार्षद और सफाई अभियंता के साथ नगर निगम के दफ़्तर गईं। आयुक्त पूरे समूह से मिले, पर वे बहाना बनाने लगे कि नगर निगम के पास पर्याप्त संख्या में ट्रक उपलब्ध नहीं हैं। गंगाबाई ने तपाक से कहा, “लेकिन लगता है कि आपके पास अमीर इलाकों से कचरा उठाने के लिए पूरे ट्रक हैं।” जहाँगीर ने झट से कहा, “इससे आयुक्त का तो मुँह ही बंद हो गया होगा।” “और नहीं तो क्या! उसने तुरंत इंतज़ाम करने के लिए कहा।” यास्मीन खाला ने बताया, “गंगाबाई ने आयुक्त को चेतावनी दी कि अगर दो दिन के अंदर काम नहीं हुआ तो नगर निगम के सामने बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ धरने पर बैठ जाएँगी”।

5. नगर निगम अपने काम के लिए धन कहाँ से प्राप्त करता है?
Ans.
नगर निगम अपने काम के लिए धन निम्न जगहों से प्राप्त होता है:
• जलकर, संपत्ति कर आदि के रूप में लोगों से एकत्र धन।
• होटलों और दुकानों से कर के रूप में प्राप्त धन।
• सिनेमा जैसे मनोरंजन कर से प्राप्त धन।

6. निम्नलिखित वाक्यों के खाली स्थान भरिए-

* पंचायत के चुने हुए सदस्यों को पंच कहते हैं।

* शहर विभिन्न भागों में बँटा हुआ होता है।

* नगर निगम के चुने हुए सदस्यों को मेयर कहते हैं।

* पार्षदों के समूह उन मुद्दों पर काम करते हैं जो सारे शहर को प्रभावित करते हैं।

* पंचायत और नगर पालिका के चुनाव प्रत्येक 5 वर्ष में होते हैं।

* पार्षद अगर निर्णय लेते हैं तो आयुक्त के नेतृत्व में दफ़्तर के प्रशासनिक कर्मचारी उन निर्णयों का पालन करते हैं

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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