नीलकंठ : अध्याय 11
उस दिन एक अतिथि को स्टेशन पहुँचाकर मैं लौट रही थी कि चिड़ियों और खरगोशों की दुकान का ध्यान आ गया और मैंने ड्राइवर को …
उस दिन एक अतिथि को स्टेशन पहुँचाकर मैं लौट रही थी कि चिड़ियों और खरगोशों की दुकान का ध्यान आ गया और मैंने ड्राइवर को …
पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हमारी खानपान की संस्कृति में एक बड़ा बदलाव आया है। इडली-डोसा-बड़ा-साँभर रसम अब केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं हैं। ये …
मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,एक तिनका आँख में मेरी पड़ा। मैं झिझक उठा, …
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।।।।। जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।रहिमन मछरी नीर …
सभागार में शिविर लगने के दो दिन बाद तोत्तो-चान के लिए एक स बड़ा साहस करने का दिन आया। इस दिन उसे यासुकी-चान से मिलना …
आकाश का साफ़ा बाँधकरसूरज की चिलम खींचताबैठा है पहाड़,घुटनों पर पड़ी है नदी चादर-सी,पास ही दहक रही हैपलाश के जंगल की अँगीठीअँधकार दूर पूर्व मेंसिमटा …
सड़क। रात का समय। समुद्र के सामने फुटपाथ। वहीं पर एक स बिजली का खंभा। एक पेड़। एक लैटरबक्स। दूसरी ओर धीमे प्रकाश में एक …
बहुत ही मीठे स्वरों के साथ वह गलियों में घूमता हुआ कहता- “बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।” इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र, किंतु मादक …
कठपुतलीगुस्से से उबलीबोली-ये धागेक्यों हैं मेरे पीछे-आगे?इन्हें तोड़ दो;मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो। सुनकर बोलीं और-औरकठपुतलियाँकि हाँ,बहुत दिन हुएहमें अपने मन के छंद छुए। …
अभी तक मैंने उन्हें दूर से देखा था। बड़ी गंभीर, शांत, अपने आप में अ खोई हुई लगती थीं। संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत …