पूँजीवाद का विकास

पूँजीवाद का विकास: भारतीय अर्थव्यवस्था का सफलता की कुंजी

पूँजीवाद, जिसे आमतौर से “बाजार वाद” भी कहा जाता है, भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे परिवर्तन का स्रोत रहा है। इस आर्थिक मॉडल का विकास भारत को एक मजबूत और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की दिशा में मुख्य योगदान देने में सफल रहा है। इस विकास की प्रक्रिया में कुछ कुंजी तत्वों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।

1. उद्यमिता की प्रोत्साहना: पूँजीवाद के विकास में उद्यमिता एक महत्वपूर्ण क्रियात्मक भूमिका निभाती है। भारत ने अपने उद्यमियों को समर्थ बनाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई हैं और उन्हें वित्तीय संजीवनी प्रदान की है। स्टार्टअप्स को समर्थन करने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नई विचारशीलता को प्रोत्साहित करने के उपायों ने नए उद्यमियों को उत्साही बनाया है।

2. विदेशी निवेश: पूँजीवाद के साथ, विदेशी निवेश की वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आई है। भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी निवेशकों को खींचने के लिए अनुकूल नीतियों की शुरुआत की है, जिससे नए और उन्नत तकनीकी और उत्पादों का परिचय हुआ है। यह भारत को एक ग्लोबल आर्थिक खिलाड़ी बनाने की क्षमता प्रदान करता है।

3. बाजारीय सुधार: पूँजीवाद ने बाजारों की सुधारणा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। नए नियम, और सरल व्यावसायिक प्रक्रियाएं व्यापारिक गतिविधियों को अधिक शानदार और सुविधाजनक बना रही हैं। उत्पादों और सेवाओं को बाजार में अधिक सामर्थ्यपूर्ण बनाने के लिए उन्नति हुई है, जिससे ग्राहकों को अधिक विकल्प और बेहतर सेवाएं मिल रही हैं।

4. सामाजिक सुरक्षा: पूँजीवाद ने आम जनता को सामाजिक सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया है। सार्वजनिक सेवाओं और योजनाओं की प्रदान में सुधार होने से गरीबों और वर्गीय असमानता को कम करने का प्रयास हुआ है। सरकार ने गरीबों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में योजनाएं शुरू की हैं, जो उन्हें आर्थिक सुरक्षा और उन्नत जीवन शैली की सुविधा प्रदान कर रही हैं।

पूँजीवाद का विकास


• आधुनिक युग की एक प्रमुख विशेषता पूँजीवाद का उदय है।

• पूँजीवाद को परिभाषित करते हुए जे० एन० हॉव्सन ने कहा है कि पूँजीवाद एक औद्योगिक सगंठन है जिसमें नियोक्ताओं की एक कंपनी या एक नियोक्ता जिसके पास धन है, और वह उस धन से वह कच्चे मालों एवं उपकरणों को प्राप्त करता है तथा श्रम लगाता है, मुनाफा के लिए वृहद् पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन करता है।

• कुलीनवर्ग के शहरों में रहने से शहरी क्षेत्रों में जमीन के मूल्य में वृद्धि इसका एक अनिवार्य परिणाम हुई । इससे जमीन के मालिकों की आय में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और इस प्रकार ‘अर्जित आय’ से पूँजी बनने लगी ।

• धर्मयुद्ध के समय तथा उसके शीघ्र बाद होनेवाले वाणिज्य के अप्रत्यक्ष प्रसार के फलस्वरूप इटली के नगर इससे अधिक लाभान्वित होते थे। इस कारण इटली के नगरों में ही आधुनिक पूँजीवाद के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपकरण-महाजनी प्रथा या बैकिंग का पहले-पहले उदय हुआ । इस प्रकार महाजनी एक पेशा बनता गया और साथ ही आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था का एक अभिन्न अंग भी ।

पूँजीवाद का परिणाम

• पूँजीवाद के उदय के पश्चात उत्पादन के तरीके में परिवर्तन होने लगा । इस प्रणाली के अन्तर्गत कुछ नए उद्योग धंधे आरंभ हो रहे थे, क्योंकि गिल्ड प्रणाली इन उद्योग धंधों को नहीं चला सकती थी । खनिज उद्योग, मुद्रण तथा पुस्तक व्यवसाय, जहाजों का निर्माण आदि ऐसे ही उद्योग थे।

• मध्यकालीन कृषि प्रणाली या मैनौरियल व्यवस्था पर पूँजीवाद का प्रभाव पड़ा। अपनी जागीरों को अधिक लाभकर बनाने के उद्देश्य से अधिकतर जमींदार नगरों में रहने लगे थे तथा वाणिज्य-व्यापार या अपने कार्यों में अपना अधिकांश समय बिताने लगे थे । अपनी रैयतों से उन्हें जो सेवाएँ या सामग्री आदि मिलती थीं उनके बदले नकदी मालगुजारी निर्धारित कर दी गई।

पूँजीवाद का प्रभाव एवं इसकी प्रतिक्रिया

पूँजीवाद का प्रभाव: भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर

① प्रस्तावना:

पूँजीवाद, जो आर्थिक विकास की दिशा में हुआ है, विभिन्न सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को लेकर एक महत्वपूर्ण रूप से विचार किया जा रहा है। भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर पूँजीवाद के प्रभाव की समझ के लिए हमें इसकी प्रतिक्रिया और संभावित प्रतिष्ठान दोनों को विचार करना होगा।

② प्रभाव:

● आर्थिक वृद्धि और नौकरी सृजन: पूँजीवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वृद्धि की दिशा में मजबूत किया है। यह नौकरियों की सृजना में मदद करता है और व्यापार के माध्यम से आर्थिक सकारात्मकता बढ़ाता है।

● विदेशी निवेश और टेक्नोलॉजी का साझा: पूँजीवाद ने विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के माध्यम से भारत को विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी टेक्नोलॉजी और अनुभव का साझा करने का मौका प्रदान किया है।

● सामाजिक सुधार: पूँजीवाद ने वृद्धि की दिशा में सामाजिक सुधार करने का प्रयास किया है, जैसे कि गरीबों और वर्गीय असमानता को कम करने के लिए अनेक सामाजिक योजनाएं।

● उद्यमिता और स्वावलंबन: पूँजीवाद ने उद्यमिता और स्वावलंबन को बढ़ावा देने का काम किया है, जिससे लोग अपने व्यवसाय में सकारात्मक रूप से शामिल हो रहे हैं।

● सामरिक विसंगति: हालांकि पूँजीवाद ने आर्थिक विकास में सहायक होने के साथ ही सामाजिक विसंगतियों को बढ़ावा भी दिया है। धन के असमान वितरण, और विशेषज्ञता से एक प्रभावित श्रेणी के लाभ की कमी इसमें शामिल हैं।

③ प्रतिक्रिया:

● आर्थिक असमानता: पूँजीवाद के विकास से आर्थिक असमानता में वृद्धि हो रही है। धन का अधिकार कुछ विशेष वर्गों में सीमित हो रहा है, जिससे सामाजिक समृद्धि का सही सामर्थ्यपूर्ण बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।

● प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग: पूँजीवाद के कुछ प्रोत्साहनों ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग किया है, जिससे पर्यावरणीय समस्याएं बढ़ गई हैं।

● स्थानीय उत्पादों की हानि: पूँजीवाद ने विशेष रूप से स्थानीय उत्पादों को प्रभावित किया है, क्योंकि विदेशी वस्तुएं अधिक पसंद की जा रही हैं, जिससे स्थानीय उत्पादों का बाजार में कमी हो रही है।

● सामाजिक संबंधों का विघटन: आर्थिक बदलावों के कारण, परिवार और समाज में संबंधों में भी बदलाव आया है, जिससे एकाधिकारवाद और असमान समाज में बढ़ रहा है।

वाणिज्यवाद

• वाणिज्यवाद एक विशेष प्रकार की नीति थी। मोटे तौर पर वाणिज्यवाद का अर्थ होता है आर्थिक राष्ट्रवाद अर्थात् राज्य के आर्थिक जीवन तथा उद्योग धंधों संबंधी कार्य एवं व्यापारिक कार्यकलापों का सरकार द्वारा नियमन । वाणिज्यवाद का उदयकाल 1600-1700 ई० तक माना जाता है। इसकी कुछ विशेषताएँ 1800 ई० तक कायम रही । सिर्फ डच सरकार ने वाणिज्यवाद को नहीं अपनाया । वाणिज्यवाद के सिद्धांत का सबसे अधिक पालन फ्रांस में चौदहवें लुई (1643-1715) के शासन काल में हुआ। •

• वाणिज्यवाद का एक पहलू राज्यों द्वारा सोना-चाँदी के संचय की अनवरत कोशिश था। इसे बुलियनवाद भी कहा जाता था । इसका अभिप्राय यह था कि किसी राष्ट्र की संपन्नता देश के अन्दर जमा सोना-चाँदी पर निर्भर करती है, जिस देश के पास जितना अधिक सोना-चाँदी का खजाना होगा, वह देश उतना ही अधिक संपन्न होगा ।

•इसके द्वारा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ और लोगों ने पूँजी का संचय आरंभ किया।

• 1600 ई० के बाद तो समुद्र पार के व्यापार के लिए अंग्रेजी, डच तथा फ्रांसीसी कंपनियों का तांता लग गया । इसमें सबसे सौभाग्यशाली तथा प्रख्यात हुई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी । इसकी स्थापना 1600 ई० में हुई थी ।

यह भी पढ़ें: फ्रांस की राज्यक्रांति

निष्कर्ष:

हम आशा करते हैं कि आपको यह पोस्ट पूँजीवाद का विकास जरुर अच्छी लगी होगी। पूँजीवाद का विकास के बारें में काफी अच्छी तरह से सरल भाषा में समझाया गया है। अगर इस पोस्ट से सम्बंधित आपके पास कुछ सुझाव या सवाल हो तो आप हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताये। धन्यवाद!

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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