U.P Board Class 12 Economics 329(FG) Question Paper 2024 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।
सत्र – 2024
अर्थशास्त्र
समयः तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांकः 100
नोट : प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
निर्देश :
(i) प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
(ii) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(iii) प्रश्न संख्या 1 से 10 तक बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, जिनका केवल सही उत्तर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखना है। प्रश्न संख्या 11 से 18 तक अति लघु-उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 50 शब्दों में, प्रश्न संख्या 19 से 24 तक लघु-उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येके लगभग 150 शब्दों में तथा प्रश्न संख्या 25 से 27 तक विस्तृत-उत्तरीय प्रश्न हैं, जिनका उत्तर प्रत्येक लगभग 300 शब्दों में दीजिए ।
(iv) प्रत्येक प्रश्न के लिए निर्धारित अंक उनके सामने दिए गए हैं।
(बहुविकल्पीय प्रश्न)
निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए :
1. माँग वक्र सम्बन्ध व्यक्त करता है:
(अ) लागत एवं मूल्य के बीच
(ब) मूल्य एवं विक्रय के बीच
(स) लागत एवं आय के बीच
(द) माँग एवं कीमत के बीच
Ans. (द) माँग एवं कीमत के बीच
2. अनधिमान वक्र की ढाल होती है :
(अ) धनात्मक
(ब) ऋणात्मक
(स) समानान्तर
(द) लम्बवत्
Ans. (ब) ऋणात्मक
3. निम्नलिखित में से कौन-से वक्र का आकार आयताकार अतिपरवलय के प्रकार का होता है ?
(अ) औसत स्थिर लागत वक्र
(ब) कुल स्थिर लागत वक्र
(स) कुल परिवर्तनशील लागत वक्र
(द) औसत परिवर्तनशील लागत वक्र
Ans. (अ) औसत स्थिर लागत वक्र
4. पैमाने का प्रतिफल संबंधित है :
(अ) अल्पकाल से
(स) अति अल्पकाल से
(ब) दीर्घकाल से
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Ans. (ब) दीर्घकाल से
5. निम्नलिखित में से कौन-सा पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत कीमत निश्चित करता है ?
(अ) प्रतिनिधि फर्म
(ब) सामान्य फर्म
(स) उद्योग
(द) सरकार
Ans. (स) उद्योग
6. निम्नलिखित में से कौन-सा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया का कार्य नहीं है ?
(अ) व्यापारिक बैंक के कार्य
(स) सरकार का बैंक
(ब) साख नियंत्रण
(द) मौद्रिक नीति का निर्धारण
Ans. (अ) व्यापारिक बैंक के कार्य
7. भुगतान संतुलन एक वार्षिक लेखा विवरण है एक राष्ट्र के :
(अ) निर्यात व आयात का
(ब) आयात व निर्यात के कारण उत्पन्न अवशेष का
(स) सोने एवं विदेशी मुद्रा की स्थिति का
(द) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वित्तीय सौदों का
Ans. (द) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वित्तीय सौदों का
8. कुल पूर्ति वक्र एवं कुल माँग वक्र के आपसी सम्मिलन के बिन्दु को निम्न रूप से जाना जाता है :
(अ) माँग अतिरेक
(ब) माँग में कमी
(स) प्रभावी माँग
(द) समग्र माँग
Ans. (स) प्रभावी माँग
9. मुद्रा की पूर्ति के निम्नलिखित प्रत्ययों में से किसे भारत में ‘विस्तृत मुद्रा’ कहा जाता है ?
(अ) M1
(स) M3
(ब) M2
(द) M4
Ans. (स) M3
10. यदि सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) 0.5 है, तो आय गुणक होगा :
(अ) 2.0
(ब) 5.0
(स) 1.0
(द) 1.5
Ans. (अ) 2.0
(अति लघु-उत्तरीय प्रश्न)
11. केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था क्या है ?
Ans. केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों पर मुख्यतः सरकार का स्वामित्व एवं नियंत्रण होता है। इसमें क्या, कितना और कैसे उत्पादन किया जाए, इसका निर्णय सरकार द्वारा बनाई गई आर्थिक योजना के अनुसार किया जाता है। इसमें निजी लाभ की अपेक्षा सामाजिक कल्याण को अधिक महत्व दिया जाता है।
12. कुल उपयोगिता से आप क्या समझते हैं ?
Ans. किसी वस्तु की विभिन्न इकाइयों के उपभोग से प्राप्त उपयोगिताओं के योग को कुल उपयोगिता (Total Utility) कहते हैं। अर्थात् किसी वस्तु की सभी उपभोग की गई इकाइयों से प्राप्त सीमांत उपयोगिताओं का योग कुल उपयोगिता के बराबर होता है।
13. उत्पादन फलन की व्याख्या कीजिए ।
Ans. उत्पादन फलन उत्पादन के साधनों और उनसे प्राप्त उत्पादन के बीच तकनीकी संबंध को बताता है। यह बताता है कि दिए हुए तकनीकी ज्ञान तथा साधनों की मात्रा के आधार पर अधिकतम कितना उत्पादन किया जा सकता है।
जहाँ उत्पादन, श्रम तथा पूँजी है।
14. पूर्ण प्रतियोगिता की मान्यताओं को बताइए ।
Ans. पूर्ण प्रतियोगिता की प्रमुख मान्यताएँ हैं—
- क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है।
- सभी फर्में समरूप वस्तु का उत्पादन करती हैं।
- बाजार में प्रवेश एवं निकास की स्वतंत्रता होती है।
- क्रेताओं एवं विक्रेताओं को बाजार की पूर्ण जानकारी होती है।
- उत्पादन के साधनों की पूर्ण गतिशीलता होती है।
- कोई भी एक फर्म बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती।
15. सकल घरेलू उत्पाद से आप क्या समझते हैं ?
Ans. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से आशय एक देश की घरेलू सीमा के भीतर एक निश्चित अवधि, सामान्यतः एक वर्ष, में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य से है। इसमें देश के भीतर विदेशी नागरिकों द्वारा किया गया उत्पादन भी शामिल होता है।
16. उपभोग फलन क्या है?
Ans. उपभोग फलन आय और उपभोग के बीच कार्यात्मक संबंध को दर्शाता है। यह बताता है कि आय में परिवर्तन होने पर उपभोग में किस प्रकार परिवर्तन होता है।
जहाँ उपभोग तथा आय है।
17. नकद आरक्षित अनुपात से आप क्या समझते हैं?
Ans. नकद आरक्षित अनुपात (CRR) वह अनुपात है जिसमें प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित भाग नकद रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास रखना पड़ता है। इसका उपयोग केंद्रीय बैंक द्वारा साख एवं मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
18. राजकोषीय घाटे से आप क्या समझते हैं ?
Ans. सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) के बीच के अंतर को राजकोषीय घाटा कहते हैं। यह सरकार की कुल उधारी की आवश्यकता को दर्शाता है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − कुल प्राप्तियाँ (उधार रहित)
(लघु-उत्तरीय प्रश्न)
19. औसत लागत (AC) और सीमांत लागत (MC) से आप क्या समझते हैं? इन वक्रों के बीच आपसी संबंध को बताइए ।
Ans. औसत लागत (AC) से आशय प्रति इकाई उत्पादन पर आने वाली लागत से है।
जहाँ कुल लागत तथा उत्पादन है।
सीमांत लागत (MC) से आशय एक अतिरिक्त इकाई उत्पादन करने पर कुल लागत में होने वाली वृद्धि से है।
AC और MC का संबंध:
- जब MC < AC होता है, तब AC घटती है।
- जब MC > AC होता है, तब AC बढ़ती है।
- जब MC = AC होता है, तब AC न्यूनतम होती है।
- MC वक्र, AC वक्र को उसके न्यूनतम बिन्दु पर काटता है।
20. माँग की कीमत लोच से क्या तात्पर्य है? इसको प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए ।
Ans. वस्तु की कीमत में परिवर्तन के कारण उसकी माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन की संवेदनशीलता को माँग की कीमत लोच कहते हैं।
इसे प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं—
- वस्तु की प्रकृति — आवश्यक वस्तुओं की माँग सामान्यतः कम लोचदार होती है।
- प्रतिस्थापन वस्तुओं की उपलब्धता — अधिक विकल्प होने पर माँग अधिक लोचदार होती है।
- आय का अनुपात — आय का बड़ा भाग खर्च होने वाली वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है।
- समय अवधि — लंबी अवधि में माँग अधिक लोचदार हो सकती है।
- आदत — आदत वाली वस्तुओं की माँग अपेक्षाकृत कम लोचदार होती है।
- वस्तु के अनेक उपयोग — अनेक उपयोग वाली वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है।
21. उत्पादन में अल्पकाल और दीर्घकाल में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
Ans.
| आधार | अल्पकाल | दीर्घकाल |
|---|---|---|
| समय | अपेक्षाकृत कम अवधि | पर्याप्त लम्बी अवधि |
| साधन | कुछ साधन स्थिर रहते हैं | सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं |
| उत्पादन | उत्पादन क्षमता सीमित रूप से बदली जा सकती है | उत्पादन क्षमता बदली जा सकती है |
| पैमाने का प्रतिफल | लागू नहीं होता | लागू होता है |
| संयंत्र | संयंत्र का आकार स्थिर माना जाता है | संयंत्र का आकार बदला जा सकता है |
अतः अल्पकाल में कुछ उत्पादन साधन स्थिर रहते हैं, जबकि दीर्घकाल में सभी साधनों को परिवर्तित किया जा सकता है।
22. राष्ट्रीय आय की अवधारणा की व्याख्या कीजिए ।
Ans. राष्ट्रीय आय से आशय किसी देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक वर्ष की अवधि में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं से प्राप्त शुद्ध कारक आय के मौद्रिक मूल्य से है। इसमें देश के सामान्य निवासियों द्वारा देश के भीतर तथा विदेशों से अर्जित कारक आय शामिल होती है और विदेशों को दी गई कारक आय घटाई जाती है।
राष्ट्रीय आय को सामान्यतः शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद साधन लागत पर (NNP at Factor Cost) के रूप में व्यक्त किया जाता है।
23. प्राथमिक घाटे से आप क्या समझते हैं ?
Ans. राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान को घटाने पर प्राप्त राशि को प्राथमिक घाटा कहते हैं।
यह सरकार की वर्तमान वित्तीय स्थिति को समझने में सहायता करता है। यदि प्राथमिक घाटा शून्य हो, तो सरकार की उधारी की आवश्यकता मुख्यतः पुराने ऋणों पर ब्याज भुगतान के कारण होती है।
24. मुद्रा की पूर्ति को परिभाषित कीजिए ।
Ans. किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समय पर जनता के पास उपलब्ध मुद्रा की कुल मात्रा को मुद्रा की पूर्ति कहते हैं। इसमें मुख्यतः जनता के पास मौजूद करेंसी तथा वाणिज्यिक बैंकों में जनता की माँग जमा को शामिल किया जाता है।
सरल रूप में—
जहाँ करेंसी, माँग जमा तथा अन्य जमा हैं।
(विस्तृत-उत्तरीय प्रश्न)
25. माँग की लोच से आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न मापन की विधियों को लिखिए ।
Ans. किसी वस्तु की कीमत, आय अथवा संबंधित वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन के कारण उसकी माँग में होने वाले परिवर्तन की मात्रा को माँग की लोच कहते हैं। सामान्यतः जब केवल कीमत में परिवर्तन के कारण माँग में परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है, तो इसे माँग की कीमत लोच कहते हैं।
माँग की कीमत लोच का सूत्र है—
माँग की लोच मापने की प्रमुख विधियाँ
1. प्रतिशत विधि:
इसमें माँग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से विभाजित किया जाता है।
2. कुल व्यय विधि:
इस विधि में कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप उपभोक्ता के कुल व्यय में होने वाले परिवर्तन को देखा जाता है।
- कीमत घटने पर कुल व्यय बढ़े → माँग लोचदार।
- कीमत घटने पर कुल व्यय समान रहे → इकाई लोच।
- कीमत घटने पर कुल व्यय घटे → माँग बेलोचदार।
3. बिन्दु लोच विधि:
माँग वक्र के किसी निश्चित बिन्दु पर लोच ज्ञात करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
4. चाप लोच विधि:
माँग वक्र के दो बिन्दुओं के बीच माँग की लोच मापने को चाप लोच कहते हैं।
इस प्रकार विभिन्न परिस्थितियों में माँग की लोच मापने के लिए उपर्युक्त विधियों का प्रयोग किया जाता है।
अथवा
अनधिमान वक्र से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताओं की व्याख्या कीजिए ।
Ans. अनधिमान वक्र वह वक्र है जो दो वस्तुओं के ऐसे विभिन्न संयोजनों को प्रदर्शित करता है जिनसे उपभोक्ता को समान संतुष्टि प्राप्त होती है। इसलिए इस वक्र के प्रत्येक बिन्दु पर उपभोक्ता समान रूप से संतुष्ट रहता है।
अनधिमान वक्र की प्रमुख विशेषताएँ
- यह बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुका होता है।
एक वस्तु की मात्रा बढ़ने पर समान संतुष्टि बनाए रखने के लिए दूसरी वस्तु की मात्रा घटानी पड़ती है। - यह मूल बिन्दु की ओर उत्तल होता है।
इसका कारण सीमांत प्रतिस्थापन दर का घटते जाना है। - दो अनधिमान वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते।
यदि वे काटें तो उपभोक्ता की पसंद में तार्किक विरोधाभास उत्पन्न होगा। - ऊँचा अनधिमान वक्र अधिक संतुष्टि दर्शाता है।
- अनधिमान वक्र सामान्यतः मोटा नहीं होता।
प्रत्येक वक्र समान संतुष्टि के एक स्तर को दर्शाता है। - यह अक्षों को सामान्यतः स्पर्श नहीं करता।
क्योंकि उपभोक्ता दोनों वस्तुओं का कुछ-न-कुछ उपभोग करना पसंद करता है।
26. पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत दीर्घकाल में फर्म के संतुलन की विवेचना कीजिए ।
Ans. पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल वह अवधि है जिसमें फर्म अपने सभी उत्पादन साधनों में परिवर्तन कर सकती है। इस अवधि में नई फर्में उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं तथा पुरानी फर्में उद्योग से बाहर जा सकती हैं।
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म कीमत को स्वीकार करती है, इसलिए—
फर्म का संतुलन उस बिन्दु पर होता है जहाँ—
और MC वक्र MR को नीचे से काटता है।
दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त होता है। यदि फर्मों को असामान्य लाभ मिलता है, तो नई फर्में उद्योग में प्रवेश करेंगी। इससे बाजार पूर्ति बढ़ेगी और कीमत कम होगी। अंततः असामान्य लाभ समाप्त होकर सामान्य लाभ रह जाएगा।
इसके विपरीत, यदि फर्मों को हानि होती है, तो कुछ फर्में उद्योग से बाहर निकलेंगी। इससे बाजार पूर्ति घटेगी और कीमत बढ़ेगी। अंततः हानि समाप्त होकर फर्मों को सामान्य लाभ प्राप्त होगा।
दीर्घकालीन संतुलन में—
और दीर्घकालीन औसत लागत न्यूनतम होती है।
अतः पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकालीन संतुलन की प्रमुख विशेषता यह है कि फर्म न्यूनतम औसत लागत पर सामान्य लाभ अर्जित करती है।
अथवा
राष्ट्रीय आय की गणना की उत्पाद, आय तथा व्यय विधियों की व्याख्या कीजिए ।
Ans. राष्ट्रीय आय की गणना मुख्यतः तीन विधियों से की जाती है—
1. उत्पाद विधि
इस विधि में एक वर्ष के दौरान देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य की गणना की जाती है। इसमें दोहरी गणना से बचने के लिए केवल अंतिम वस्तुओं का मूल्य लिया जाता है अथवा प्रत्येक उत्पादन चरण में जोड़े गए मूल्यवर्धन को जोड़ा जाता है।
इस विधि को उत्पादन या मूल्यवर्धित विधि भी कहते हैं।
2. आय विधि
इस विधि में उत्पादन के साधनों को प्राप्त होने वाली सभी कारक आयों को जोड़ा जाता है। इनमें मुख्यतः—
- मजदूरी एवं वेतन,
- किराया,
- ब्याज,
- लाभ,
- मिश्रित आय
शामिल हैं।
इस प्रकार,
3. व्यय विधि
इस विधि में एक वर्ष में अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर किए गए कुल व्यय को जोड़ा जाता है। इसके प्रमुख घटक हैं—
- निजी अंतिम उपभोग व्यय,
- सरकारी अंतिम उपभोग व्यय,
- निवेश व्यय,
- शुद्ध निर्यात।
सूत्र—
जहाँ उपभोग, निवेश, सरकारी व्यय तथा शुद्ध निर्यात है।
इस प्रकार तीनों विधियों से प्राप्त राष्ट्रीय आय का परिणाम सैद्धांतिक रूप से समान होना चाहिए।
27. केन्द्रीय बैंक की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। भारतीय रिज़र्व बैंक के मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
Ans. केन्द्रीय बैंक वह सर्वोच्च बैंकिंग संस्था है जो देश की बैंकिंग एवं मौद्रिक व्यवस्था को नियंत्रित और संचालित करती है। यह सामान्य जनता के साथ सामान्य बैंकिंग व्यवसाय करने के बजाय देश की मुद्रा, साख और बैंकिंग व्यवस्था को नियंत्रित करने का कार्य करता है।
भारत का केन्द्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है। इसकी स्थापना 1935 में हुई तथा 1949 में इसका राष्ट्रीयकरण किया गया।
भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रमुख कार्य
1. नोट निर्गमन:
RBI देश में मुद्रा-नोटों के निर्गमन एवं प्रचलन की व्यवस्था करता है। एक रुपये के नोट तथा सिक्कों का निर्गमन भारत सरकार द्वारा किया जाता है।
2. सरकार का बैंक:
RBI केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों के बैंक के रूप में कार्य करता है। यह सरकार के खाते रखता है तथा आवश्यकता पड़ने पर सरकार को ऋण देता है।
3. बैंकों का बैंक:
वाणिज्यिक बैंकों को आवश्यकता पड़ने पर RBI से सहायता मिलती है। बैंक अपनी नकद आरक्षित राशि का एक भाग RBI के पास रखते हैं।
4. साख नियंत्रण:
RBI देश में साख की मात्रा को नियंत्रित करता है। इसके लिए बैंक दर, रेपो दर, CRR, खुले बाजार की क्रियाएँ आदि साधनों का प्रयोग किया जाता है।
5. अंतिम ऋणदाता:
जब किसी वाणिज्यिक बैंक को वित्तीय कठिनाई होती है और उसे अन्य स्रोतों से ऋण नहीं मिलता, तब RBI अंतिम ऋणदाता के रूप में सहायता करता है।
6. विदेशी मुद्रा का प्रबंधन:
RBI देश के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करता है तथा विदेशी विनिमय बाजार में स्थिरता बनाए रखने में भूमिका निभाता है।
7. मौद्रिक नीति का संचालन:
RBI देश की मौद्रिक नीति का संचालन करता है तथा मुद्रा एवं साख की मात्रा को आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित करता है।
अतः भारतीय रिज़र्व बैंक देश की मौद्रिक एवं बैंकिंग व्यवस्था का सर्वोच्च नियंत्रक है।
अथवा
स्थिर एवं लचीली विनिमय दरों से क्या आशय है? इसके पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए ।
Ans. स्थिर विनिमय दर
जब किसी देश की मुद्रा की विदेशी मुद्रा के संबंध में विनिमय दर सरकार अथवा केंद्रीय बैंक द्वारा एक निश्चित स्तर पर निर्धारित या बनाए रखी जाती है, तो उसे स्थिर विनिमय दर कहते हैं।
स्थिर विनिमय दर के पक्ष में तर्क—
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में निश्चितता रहती है।
- विदेशी व्यापारियों के लिए जोखिम कम होता है।
- विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता।
विपक्ष में तर्क—
- इसे बनाए रखने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार आवश्यक होता है।
- केंद्रीय बैंक को बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
- भुगतान संतुलन में असंतुलन होने पर कठिनाई हो सकती है।
- स्वतंत्र मौद्रिक नीति की गुंजाइश सीमित हो सकती है।
लचीली विनिमय दर
जब विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति के आधार पर विनिमय दर बाजार में निर्धारित होती है और इसमें परिवर्तन की स्वतंत्रता होती है, तो उसे लचीली विनिमय दर कहते हैं।
लचीली विनिमय दर के पक्ष में तर्क—
- विनिमय दर बाजार की शक्तियों से निर्धारित होती है।
- विदेशी मुद्रा भंडार पर अपेक्षाकृत कम दबाव पड़ता है।
- भुगतान संतुलन के समायोजन में सहायता मिलती है।
- सरकार एवं केंद्रीय बैंक को अधिक स्वतंत्र मौद्रिक नीति अपनाने का अवसर मिल सकता है।
विपक्ष में तर्क—
- विनिमय दर में अधिक उतार-चढ़ाव हो सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
- आयात की लागत में तेजी से परिवर्तन हो सकता है।
- सट्टेबाजी के कारण विनिमय दर में अस्थिरता आ सकती है।
इस प्रकार स्थिर एवं लचीली दोनों विनिमय दर प्रणालियों की अपनी-अपनी विशेषताएँ, लाभ तथा सीमाएँ हैं।