U.P Board Class 12 Physics 346(JS) Question Paper 2025 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।
सत्र – 2025
भौतिक विज्ञान
समयः तीन घण्टे 15 मिनट पूर्णांकः 70
निर्देश :
(i) प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
(ii) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(iii) इस प्रश्न-पत्र में पाँच खण्ड हैं: खण्ड ‘अ’, खण्ड ‘ब’, खण्ड ‘स’, खण्ड ‘द’ तथा खण्ड-‘य’
(iv) खण्ड ‘अ’ बहुविकल्पीय हैं तथा प्रत्येक प्रश्न का 1 अंक है।
(v) खण्ड ‘ब’ अति लघु-उत्तरीय हैं तथा प्रत्येक प्रश्न का 1 अंक है।
(vi) खण्ड ‘स’ लघु-उत्तरीय प्रकार-I का है तथा प्रत्येक प्रश्न के 2 अंक हैं।
(vii) खण्ड ‘द’ लघु-उत्तरीय प्रकार-II का है तथा प्रत्येक प्रश्न के 3 अंक हैं।
(viii) खण्ड ‘य’ विस्तृत उत्तरीय है। प्रत्येक प्रश्न के 5 अंक हैं। इस खण्ड के सभी चारों प्रश्नों में आन्तरिक विकल्प का चयन प्रदान किया गया है। ऐसे प्रश्नों में आपको दिये गये चयन में से केवल एक प्रश्न ही करना है।
(ix) प्रश्न-पत्र में प्रयुक्त प्रतीकों के सामान्य अर्थ हैं।
खण्ड ‘अ’
1. (क) विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के संचरण में संचरण की दिशा तथा ध्रुवण तल के बीच कोण होता है :
(A) 0°
(B) 45°
(C) 90°
(D) 180°
Ans. (C) 90°
(ख) जब m₁ तथा m₁ द्रव्यमान के दो नाभिक परस्पर संलयित होकर m द्रव्यमान का नाभिक बनाते हैं तो ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इस प्रक्रिया में:
(A) (m1 + m2)<m
(B) (m1 + m2) >m
(C) (m1 + m2) = m
(D) m1m2 > m²
Ans. (B) (m1 + m2) >m
अर्थात् प्रारम्भिक नाभिकों का कुल द्रव्यमान, बने हुए नाभिक के द्रव्यमान से अधिक होता है। द्रव्यमान की यह कमी ऊर्जा में बदल जाती है।
(ग) एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में ४ ओम का प्रतिरोध तथा 6 ओम का प्रेरकत्व प्रतिघात श्रेणी क्रम में लगे हैं। परिपथ की प्रतिबाधा होगी :
(A) 2 ओम
(B) 14 ओम
(C) 14√2 ओम
(D) 10 ओम
Ans. (C) 14√2 ओम
(घ) निर्वात की विद्युतशीलता का मात्रक है।
(A) न्यूटन मी2 / कूलॉम2
(B) कूलॉम2 /न्यूटन मी2
(C) न्यूटन /कूलॉम
(D) न्यूटन बोल्ट/मी2
Ans. (B) कूलॉम2 /न्यूटन मी2
(ङ) न्यूनतम आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंग है:
(A) पराबैंगनी किरणें
(B) X-किरणें
(C) गामा किरणें
(D) सूक्ष्म तरंगें
Ans. (D) सूक्ष्म तरंगें
(च) अनुचुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति (χ ) परम ताप (T) के साथ किस प्रकार बदलती है?
(Α) χ α τ
(Β) χ α Τ-1
(C) χ = नियतांक
(D) χ α eT
Ans. (Β) χ α Τ-1
खण्ड ‘ब’
2. (क) पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से क्या तात्पर्य है? किरण आरेख बनाकर दिखाइये ।
Ans. जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है और आपतन कोण, क्रान्तिक कोण से अधिक हो जाता है, तब प्रकाश की किरण दूसरे माध्यम में अपवर्तित न होकर पूर्णतः पहले माध्यम में ही परावर्तित हो जाती है। इस घटना को पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते हैं।
इसकी दो आवश्यक शर्तें हैं:
- प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए।
- आपतन कोण क्रान्तिक कोण से अधिक होना चाहिए।

(ख) समस्थानिक एवं समभारिक नाभिकों में अन्तर समझाइये ।
Ans.
- समस्थानिक: जिन परमाणुओं की परमाणु संख्या समान, लेकिन द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती है, वे समस्थानिक कहलाते हैं। उदाहरण: 1H1 , 1H2
- समभारिक: जिन परमाणुओं की द्रव्यमान संख्या समान, लेकिन परमाणु संख्या अलग-अलग होती है, वे समभारिक कहलाते हैं। उदाहरण: 18Ar40 , 20Ca40
(ग) ओमीय एवं अन्-ओमीय प्रतिरोधों के लिये वोल्टता (V) एवं धारा (I) के बीच ग्राफ खींचिये ।
Ans.
ओमीय चालक:
वोल्टता (V), धारा (I) के समानुपाती होती है।
V= IR

ग्राफ मूलबिन्दु से गुजरने वाली सीधी रेखा होता है।
अन-ओमीय चालक:

वोल्टता और धारा में सीधा समानुपाती सम्बन्ध नहीं होता। इसका (V-I) ग्राफ वक्र होता है।
(घ) एक चालक पर 2.4 * 10-18 कूलॉम धनात्मक आवेश है। बताइये कि चालक पर कितने इलेक्ट्रॉनों की कमी या अधिकता है।
Ans. दिया है:
एक इलेक्ट्रॉन का आवेश,
इलेक्ट्रॉनों की संख्या में कमी,
चालक पर 15 इलेक्ट्रॉनों की कमी है।
(ङ) किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में एक बोल्टेज (V) समीकरण V = 40 sin (100 rt) बोल्ट द्वारा प्रदर्शित होता है। यहाँ । सेकण्ड में है। समय-बोल्टता ग्राफ उचित पैमाने पर पूरे चक्र के लिये बनाइये।
Ans. दिया है,
अधिकतम वोल्टता तथा कोणीय आवृत्ति है।
ग्राफ बनाने के लिए प्रमुख बिन्दु:
| समय (सेकण्ड) | वोल्टता |
|---|---|
| 0 | 0 V |
| 0.005 | +40 V |
| 0.010 | 0 V |
| 0.015 | −40 V |
| 0.020 | 0 V |
इन बिन्दुओं को चिकने साइन वक्र से मिलाने पर एक पूर्ण चक्र का ग्राफ प्राप्त होगा।
(च) हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर प्रति सेकण्ड चक्कर लगाता है। वृत्तीय पथ के किसी बिन्दु पर धारा का मान क्या होगा ?
Ans. यदि इलेक्ट्रॉन प्रति सेकण्ड चक्कर लगाता है, तो एक चक्कर में प्रवाहित आवेश होगा।
अतः धारा का परिमाण,
जहाँ इलेक्ट्रॉन के आवेश का परिमाण तथा प्रति सेकण्ड चक्करों की संख्या है। इलेक्ट्रॉन की गति के कारण परम्परागत धारा की दिशा उसकी गति के विपरीत होती है।
खण्ड – ‘स’
3. (क) परमाणु के रदरफोर्ड मॉडल की मुख्य कमियाँ क्या है ?
Ans. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं—
- परमाणु की स्थिरता की व्याख्या नहीं: परिक्रमा करता हुआ इलेक्ट्रॉन त्वरित आवेश है। विद्युत-चुम्बकीय सिद्धान्त के अनुसार उसे ऊर्जा विकिरित करनी चाहिए और अन्ततः नाभिक में गिर जाना चाहिए। लेकिन वास्तविक परमाणु स्थिर होते हैं।
- रेखीय वर्णक्रम की व्याख्या नहीं: यह मॉडल परमाणुओं द्वारा उत्सर्जित या अवशोषित प्रकाश के निश्चित वर्णक्रम का कारण नहीं बता सका।
- इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था स्पष्ट नहीं: यह मॉडल परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की निश्चित कक्षाओं और ऊर्जा-स्तरों की व्याख्या नहीं करता।
(ख) एक उत्तल लेंस पर प्रकाश की किरणें चित्र के अनुसार पड़ रही हैं। यदि लेंस की फोकस दूरी 20 सेमी है तो प्रतिबिम्ब की स्थिति ज्ञात कीजिये। किरण का मार्ग भी दिखाइये ।
Ans. इस प्रश्न में वस्तु की स्थिति तथा आपतित किरणों वाला चित्र आपके संदेश में दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए प्रतिबिम्ब की निश्चित स्थिति निकालने के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
उत्तल लेंस के लिए लेंस सूत्र है—
जहाँ सेमी, वस्तु की दूरी तथा प्रतिबिम्ब की दूरी है।
कार्तीय चिह्न परिपाटी के अनुसार वस्तु की दूरी रखने पर प्रतिबिम्ब की स्थिति निकाली जा सकती है। प्रश्न के साथ दिया गया चित्र मिल जाए तो इसका पूरा संख्यात्मक हल और किरण आरेख बनाया जा सकता है।
ग) विद्युत चुम्बकीय तरंगें क्या होती हैं? इनके संचरण आरेख खींचकर विद्युत क्षेत्र एवं चुम्बकीय क्षेत्र अवयव दिखाइये ।
Ans. वे तरंगें जिनमें विद्युत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र एक-दूसरे के लम्बवत् दोलन करते हैं तथा तरंग के संचरण की दिशा के भी लम्बवत् होते हैं, विद्युत-चुम्बकीय तरंगें कहलाती हैं।
इनके प्रमुख गुण हैं—
- ये निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं।
- निर्वात में इनकी चाल होती है।
- विद्युत क्षेत्र , चुम्बकीय क्षेत्र तथा संचरण दिशा परस्पर लम्बवत् होते हैं।
- ये अनुप्रस्थ तरंगें होती हैं।

योजनात्मक चित्र: विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र के दोलन परस्पर लम्बवत् होते हैं।
इनके बीच सम्बन्ध है—
(घ) चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का सूत्र स्थापित कीजिये ।
Ans. मान लीजिए कि धारा वाली एक समतलीय कुण्डली में फेरे हैं और प्रत्येक फेरे का क्षेत्रफल है।
एक फेरे का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण,
यदि कुण्डली में फेरे हों, तो कुल चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण—
यदि कुण्डली वृत्ताकार है, जिसकी त्रिज्या है, तो
अतः,
इसकी दिशा कुण्डली के तल के लम्बवत् होती है तथा दाहिने हाथ के अंगूठे के नियम से ज्ञात की जाती है। SI मात्रक एम्पियर-मीटर² है।
खण्ड – ‘द’
4. (क) गाँस के नियम का उपयोग करते हुये एक अनन्त लम्बाई के एकसमान आवेशित सीधे तार के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र का सूत्र व्युत्पन्न कीजिये ।
Ans. गॉस का नियम कहता है कि किसी बन्द पृष्ठ से गुजरने वाला कुल विद्युत फ्लक्स, उस पृष्ठ के भीतर स्थित कुल आवेश का गुना होता है।
मान लीजिए कि अनन्त लम्बाई के सीधे तार पर प्रति इकाई लम्बाई आवेश λ है। तार के चारों ओर त्रिज्या तथा l लम्बाई का एक बेलनाकार गॉसीय पृष्ठ लेते हैं।
सममिति के कारण विद्युत क्षेत्र E बेलन के वक्र पृष्ठ पर समान होगा तथा उसके लम्बवत् होगा। बेलन के दोनों सिरों से विद्युत फ्लक्स शून्य होगा।
अतः कुल फ्लक्स,
गॉसीय पृष्ठ के भीतर आवेश,
गॉस के नियम से,
अतः,
यही अनन्त लम्बाई के एकसमान आवेशित सीधे तार के कारण विद्युत क्षेत्र का सूत्र है। धनात्मक तार के लिए क्षेत्र बाहर की ओर तथा ऋणात्मक तार के लिए तार की ओर होता है।
(ख) परावर्ती दूरदर्शी का किरण-आरेख खींचिये। इसकी कार्यविधि स्पष्ट कीजिये ।
Ans. जिस दूरदर्शी में प्रकाश को अपवर्तित करने के स्थान पर अवतल दर्पण द्वारा परावर्तित करके प्रतिबिम्ब बनाया जाता है, उसे परावर्ती दूरदर्शी कहते हैं।

कार्यविधि:
- दूर स्थित वस्तु से आने वाली समान्तर प्रकाश किरणें बड़े अवतल दर्पण पर पड़ती हैं।
- अवतल दर्पण इन किरणों को परावर्तित करके अपने फोकस के निकट एक वास्तविक, उल्टा तथा छोटा प्रतिबिम्ब बनाता है।
- न्यूटनियन परावर्ती दूरदर्शी में एक छोटा समतल दर्पण किरणों को नेत्रिका की ओर मोड़ देता है।
- नेत्रिका प्रतिबिम्ब का आवर्धन करती है, जिससे वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है।
लाभ: इसमें वर्ण-विपथन नहीं होता, क्योंकि दर्पण प्रकाश का परावर्तन करता है। बड़े आकार के दर्पण द्वारा अधिक प्रकाश एकत्र किया जा सकता है।
(ग) अनुचुम्बकीय, प्रतिचुम्बकीय तथा लौह-चुम्बकीय पदार्थों में विभेद कीजिए तथा प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए ।
Ans.
| गुण | अनुचुम्बकीय | प्रतिचुम्बकीय | लौह-चुम्बकीय |
|---|---|---|---|
| चुम्बकीय क्षेत्र में व्यवहार | कमजोर आकर्षण | कमजोर प्रतिकर्षण | प्रबल आकर्षण |
| चुम्बकीय प्रवृत्ति χ | छोटी धनात्मक | छोटी ऋणात्मक | बहुत बड़ी धनात्मक |
| बाहरी क्षेत्र हटाने पर | चुम्बकत्व लगभग समाप्त | चुम्बकत्व लगभग समाप्त | कुछ पदार्थों में चुम्बकत्व बना रह सकता है |
| उदाहरण | ऐलुमिनियम, प्लैटिनम | बिस्मथ, ताँबा | लोहा, कोबाल्ट, निकेल |
(घ) ऊर्जा बैण्ड के आधार पर चालकों, कुचालकों एवं अर्द्धचालकों के वर्गीकरण की व्याख्या कीजिये ।
Ans. ठोस पदार्थों में इलेक्ट्रॉनों की अनुमत ऊर्जाओं के समूह ऊर्जा-बैण्ड कहलाते हैं। प्रमुख रूप से संयोजकता बैण्ड और चालन बैण्ड होते हैं। इनके बीच के ऊर्जा अन्तर को वर्जित ऊर्जा अन्तराल कहते हैं।
1. चालक: संयोजकता बैण्ड और चालन बैण्ड एक-दूसरे से मिलते हैं या उनमें पर्याप्त अतिव्यापन होता है। इसलिए इलेक्ट्रॉन आसानी से गति कर सकते हैं। उदाहरण—ताँबा, चाँदी।

2. कुचालक: दोनों बैण्डों के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल बहुत बड़ा होता है। सामान्य परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉन चालन बैण्ड में नहीं पहुँच पाते। उदाहरण—काँच, अभ्रक।

3. अर्द्धचालक: दोनों बैण्डों के बीच ऊर्जा अन्तराल छोटा होता है। ताप बढ़ाने पर कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैण्ड में पहुँच जाते हैं। उदाहरण—सिलिकॉन, जर्मेनियम।

(ङ) स्व-प्रेरकत्व से क्या तात्पर्य है? एक कुण्डली का स्व-प्रेरकत्व 0.4 मिली हेनरी है। इसमें बहने वाली धारा का मान 0.1 सेकण्ड में 1 एम्पीयर से परिवर्तित हो जाता है। प्रेरित विद्युत वाहक बल की गणना कीजिये ।
Ans. किसी कुण्डली में धारा बदलने पर उसी कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल की घटना स्व-प्रेरण कहलाती है। स्व-प्रेरित विद्युत वाहक बल धारा में परिवर्तन का विरोध करता है।
जहाँ स्व-प्रेरकत्व है।
प्रश्न में दिया है,
इसलिए,
यहाँ ऐम्पियर में धारा का परिवर्तन है। प्रश्न में धारा कितने ऐम्पियर से कितने ऐम्पियर तक बदली, यह संख्या स्पष्ट नहीं है। यदि धारा में परिवर्तन ऐम्पियर है, तो प्रेरित विद्युत वाहक बल वोल्ट होगा।
5 (क) ट्रांसफॉर्मर का सिद्धान्त क्या है? उच्चवायी ट्रांसफॉर्मर का परिपथ चित्र बनाकर उसकी कार्यविधि समझाइये ।
Ans. ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है। इसका उपयोग प्रत्यावर्ती वोल्टता को बढ़ाने या घटाने के लिए किया जाता है।

कार्यविधि:
- प्राथमिक कुण्डली में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित करने पर लौह क्रोड में परिवर्ती चुम्बकीय फ्लक्स उत्पन्न होता है।
- यह फ्लक्स द्वितीयक कुण्डली से सम्बद्ध होता है।
- फैराडे के विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण नियम के अनुसार द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।
- उच्चवायी ट्रांसफॉर्मर में द्वितीयक कुण्डली के फेरों की संख्या प्राथमिक कुण्डली से अधिक होती है।
आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए,
उच्चवायी ट्रांसफॉर्मर में , अतः होता है। आदर्श स्थिति में धारा का अनुपात वोल्टता के अनुपात का व्युत्क्रम होता है।
(ख) समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता पर क्या प्रभाव पड़ता है, जब
Ans. समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता का सूत्र है—
जहाँ प्लेटों का क्षेत्रफल तथा उनके बीच की दूरी है।
(i) प्लेटों के बीच की दूरी दो गुनी कर दी जाए ।
Ans.
धारिता आधी हो जाएगी।
(ii) प्लेटों का क्षेत्रफल आधा कर दिया जाए।
Ans. प्लेटों का क्षेत्रफल आधा करने पर
धारिता आधी हो जाएगी।
(iii) प्लेटों के बीच परावैद्युत माध्यम भर दिया जाए।
Ans. प्लेटों के बीच परावैद्युत माध्यम भरने पर
यदि परावैद्युतांक है, तो
धारिता गुनी हो जाएगी।
(ग) प्रकाश के व्यतिकरण तथा विवर्तन से क्या अभिप्राय है? व्यतिकरण की आवश्यक शर्तें लिखिये ।
Ans. व्यतिकरण: जब समान आवृत्ति की दो प्रकाश तरंगें अध्यारोपित होकर कुछ स्थानों पर तीव्रता बढ़ाती हैं तथा कुछ स्थानों पर घटाती हैं, तो इस घटना को प्रकाश का व्यतिकरण कहते हैं।
विवर्तन: प्रकाश का किसी अवरोध के किनारे या बहुत संकीर्ण छिद्र से गुजरने पर मुड़कर ज्यामितीय छाया वाले क्षेत्र में फैलना विवर्तन कहलाता है।
व्यतिकरण की आवश्यक शर्तें:
- दोनों प्रकाश स्रोत कला-सम्बद्ध होने चाहिए, अर्थात् उनके बीच कलान्तर नियत रहना चाहिए।
- प्रकाश की आवृत्ति या तरंगदैर्ध्य समान होना चाहिए।
- दोनों तरंगों के कम्पनों की दिशाएँ समान या समान्तर होनी चाहिए।
- स्पष्ट फ्रिंज प्राप्त करने के लिए दोनों तरंगों की तीव्रताएँ लगभग समान होना लाभदायक है।
(घ) डीटस्टोन सेतु की सन्तुलन अवस्था में उसकी भुजाओं के प्रतिरोधों में सम्बन्ध स्थापित कीजिये ।
Ans. डीटस्टोन सेतु में चार प्रतिरोध चतुर्भुज की चार भुजाओं में जुड़े होते हैं। सन्तुलन की स्थिति में गैल्वेनोमीटर में धारा शून्य होती है।
यदि दोनों शाखाओं में धाराएँ क्रमशः तथा हैं, तो सन्तुलन पर,
और
दोनों समीकरणों को भाग देने पर,
अतः,
या
यही डीटस्टोन सेतु की सन्तुलन अवस्था की शर्त है।
अथवा
एक ही धातु के तीन तारों की लम्बाइयों का अनुपात 3:2:1 तथा द्रव्यमानों का अनुपात 1:2:3 है। उन तारों के प्रतिरोधों का अनुपात ज्ञात कीजिये ।
Ans. एक ही धातु के तारों के लिए घनत्व और विशिष्ट प्रतिरोध समान होंगे।
तार का द्रव्यमान,
अतः,
इसलिए,
अर्थात्
अब,
तीनों पदों को 3 से गुणा करने पर,
(ङ) परस्पर सम्पर्क में रखे दो पतले लेंसों के संयोजन की फोकस दूरी के लिये सूत्र स्थापित कीजिये ।
Ans. मान लीजिए कि दो पतले लेंसों की फोकस दूरियाँ तथा हैं। दोनों लेंस एक-दूसरे के सम्पर्क में रखे हैं।
पहले लेंस के लिए,
दूसरे लेंस के लिए, पहले लेंस द्वारा बना प्रतिबिम्ब दूसरे लेंस के लिए वस्तु का कार्य करता है। अतः,
दोनों समीकरण जोड़ने पर,
यदि संयोजन की तुल्य फोकस दूरी है, तो
अतः,
या,
यह सूत्र पतले लेंसों के सम्पर्क में रखे जाने पर लागू होता है।
6. p-n संधि डायोड पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप मैं कैसे प्रयुक्त किया जाता है ? सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्य-विधि समझाइये ।
Ans. पूर्ण तरंग दिष्टकारी वह युक्ति है जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) के दोनों अर्द्धचक्रों को स्पंदित एकदिश धारा (DC) में बदल देती है। इसके लिए सामान्यतः दो p-n संधि डायोड तथा मध्य-टैप वाला ट्रांसफॉर्मर प्रयोग किया जाता है।

कार्यविधि:
- धनात्मक अर्द्धचक्र: जब ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली का ऊपरी सिरा मध्य-टैप के सापेक्ष धनात्मक होता है, तब डायोड अग्र अभिनत तथा पश्च अभिनत होता है। धारा और लोड प्रतिरोध से होकर बहती है।
- ऋणात्मक अर्द्धचक्र: अगले अर्द्धचक्र में निचला सिरा मध्य-टैप के सापेक्ष धनात्मक होता है। अब अग्र अभिनत तथा पश्च अभिनत होता है। धारा लोड में पहले वाली दिशा में ही बहती है।
- इस प्रकार दोनों अर्द्धचक्रों में लोड से धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है।
निष्कर्ष: पूर्ण तरंग दिष्टकारी की निर्गत धारा स्पंदित DC होती है। इसकी निर्गत आवृत्ति निवेश AC की आवृत्ति की दोगुनी होती है।
अथवा
α-प्रकीर्णन के प्रयोग का संक्षिप्त वर्णन कीजिये। इस प्रयोग से प्राप्त प्रेक्षण से परमाणु संरचना के बारे में लिखिये ।
Ans. रदरफोर्ड ने परमाणु की संरचना का अध्ययन करने के लिए पतली सोने की पन्नी पर तीव्र गति वाले α-कणों की बौछार की। प्रकीर्णित कणों को जिंक सल्फाइड की प्रतिदीप्त स्क्रीन द्वारा देखा गया।

प्रमुख प्रेक्षण:
- अधिकांश α-कण बिना विचलित हुए सोने की पन्नी से निकल गए।
- कुछ α-कण छोटे कोण से विचलित हुए।
- बहुत कम α-कण बड़े कोण से विचलित हुए तथा कुछ वापस लौट आए।
निष्कर्ष:
- परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
- परमाणु का लगभग सम्पूर्ण धनात्मक आवेश तथा अधिकांश द्रव्यमान एक अत्यन्त छोटे केन्द्रक में केन्द्रित होता है, जिसे नाभिक कहते हैं।
- नाभिक धनावेशित होता है और इलेक्ट्रॉन उसके चारों ओर रहते हैं।
7. परिनालिका क्या होती है? एक लम्बी धारावाही परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र के मान का व्यंजक प्राप्त कीजिये ।
Ans. किसी बेलनाकार नलिका के आकार में पास-पास लपेटे गए विद्युतरोधी तार की अनेक वृत्ताकार फेरों वाली कुण्डली को परिनालिका कहते हैं।
मान लीजिए कि एक लम्बी परिनालिका में प्रति इकाई लम्बाई फेरों की संख्या है तथा उसमें धारा प्रवाहित हो रही है।
परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एकसमान तथा उसकी अक्ष के समान्तर होता है। बाहर का क्षेत्र आदर्श लम्बी परिनालिका के लिए लगभग शून्य होता है।
एम्पियर के परिपथीय नियम के अनुसार,
लम्बाई के एक आयताकार एम्पियरियन पथ के लिए,
अतः,
चूँकि , इसलिए,
जहाँ कुल फेरों की संख्या, परिनालिका की लम्बाई तथा निर्वात की चुम्बकशीलता है।
यदि परिनालिका के भीतर सापेक्ष चुम्बकशीलता वाला माध्यम हो, तो
अथवा
एक प्रकाश-वैद्युत तल का कार्य फलन 4.0 eV है। इस पर 3 × 1015 हर्ट्ज आवृत्ति का विकिरण आपतित होता है। उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन का अधिकतम वेग ज्ञात कीजिये ।
Ans. दिया है,
प्लांक नियतांक,
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान,
आइंस्टीन के प्रकाश-वैद्युत समीकरण से,
फोटॉन की ऊर्जा इलेक्ट्रॉन-वोल्ट में,
अतः,
जूल में,
अब,
अतः अधिकतम वेग,
8. ध्रुवित प्रकाश से आप क्या समझते हैं? जब दो क्रॉसित पोलेरॉइडों के बीच एक तीसरा पोलेरॉइड घुमाया जाता है तब पारगमित प्रकाश की तीव्रता में होने वाले परिवर्तन की विवेचना कीजिए ।
Ans. वह प्रकाश जिसमें विद्युत क्षेत्र के कम्पन, संचरण दिशा के लम्बवत् केवल एक निश्चित दिशा में होते हैं, समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है।
ध्रुवण प्राप्त करने के लिए पोलेरॉइड का प्रयोग किया जाता है।
मान लीजिए कि पहले और तीसरे पोलेरॉइड के पारगमन अक्ष के बीच कोण है। पहला और दूसरा पोलेरॉइड क्रॉसित हैं, अर्थात् उनके अक्षों के बीच कोण है।
यदि पहले पोलेरॉइड से निकलने वाले प्रकाश की तीव्रता है, तो तीसरे पोलेरॉइड से निकलने वाली तीव्रता मालुस के नियम के अनुसार,
तीसरे और अन्तिम पोलेरॉइड के बीच कोण होगा। अतः अन्तिम पोलेरॉइड से पारगमित तीव्रता,
चूँकि,
इसलिए,
या,
विवेचना:
- जब तीव्रता शून्य होती है।
- जब तीव्रता अधिकतम होती है।
- जब तीव्रता फिर शून्य हो जाती है।
इस प्रकार तीसरे पोलेरॉइड को घुमाने पर पारगमित प्रकाश की तीव्रता पहले बढ़ती है, फिर घटती है।
अथवा
एक “50 वाट 100 वोल्ट” लैम्प को 200 वोल्ट 50 हर्ट्ज की प्रत्यावर्ती धारा विद्युत मेन्स में जोड़ना है। लैम्प के श्रेणी क्रम में आवश्यक संधारित्र की धारिता ज्ञात कीजिये ।
Ans. दिया है,
लैम्प का प्रतिरोध,
लैम्प में प्रवाहित धारा,
श्रेणीक्रम के RC परिपथ में,
अतः,
संधारित्र का प्रतिघात,
अब,
अतः,
अतः आवश्यक धारिता,
9. दी ब्रोग्ली के द्रव्य-तरंग अवधारणा से क्या तात्पर्य है? दी ब्रोग्ली तरंगदैर्ध्य का गतिज ऊर्जा से सम्बन्ध का सूत्र स्थापित कीजिये ।
Ans. डी-ब्रॉग्ली के अनुसार प्रत्येक गतिशील पदार्थ-कण के साथ एक तरंग सम्बद्ध होती है। इसे द्रव्य तरंग कहते हैं। इसकी तरंगदैर्ध्य को डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य कहते हैं।
डी-ब्रॉग्ली समीकरण है,
जहाँ प्लांक नियतांक तथा कण का संवेग है।
यदि कण का द्रव्यमान और वेग है, तो
अतः,
कण की गतिज ऊर्जा,
इससे,
अब का मान डी-ब्रॉग्ली समीकरण में रखने पर,
सरलीकरण करने पर,
यही डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य और गतिज ऊर्जा के बीच सम्बन्ध है।
निष्कर्ष: समान द्रव्यमान के लिए गतिज ऊर्जा बढ़ने पर द्रव्य तरंग की तरंगदैर्ध्य घटती है।
अथवा
बन्धन ऊर्जा की व्याख्या कीजिये। यदि एक नाभिकीय संलयन क्रिया में द्रव्यमान क्षति 0.3% हो तो । किग्रा द्रव्यमान की संलयन क्रिया में कितनी ऊर्जा मुक्त होगी ?
Ans. किसी नाभिक को उसके सभी प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों में अलग-अलग विभाजित करने के लिए जितनी न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे उस नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं। यही ऊर्जा नाभिक के निर्माण के समय मुक्त होती है।
द्रव्यमान क्षति और बन्धन ऊर्जा का सम्बन्ध आइंस्टीन के समीकरण से है—
दिया है:
कुल द्रव्यमान किग्रा
द्रव्यमान क्षति
प्रकाश की चाल
द्रव्यमान क्षति,
अब मुक्त ऊर्जा,
अतः,
संलयन क्रिया में मुक्त ऊर्जा जूल होगी।