U.P Board Class 12 Physics 346(JT) Question Paper 2025

U.P Board Class 12 Physics 346(JT) Question Paper 2025 का उत्तर आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। जिसका कोई भी शुल्क आपसे नहीं लिया जायेगा। आइये विस्तार से सभी प्रश्नो को जानते हैं।

सत्र – 2025
भौतिक विज्ञान
समयः तीन घण्टे 15 मिनट            पूर्णांकः 70

निर्देश :

(i) प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।

(ii) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

(iii) इस प्रश्न-पत्र में पाँच खण्ड हैं: खण्ड ‘अ’, खण्ड ‘ब’, खण्ड ‘स’, खण्ड ‘द’ तथा खण्ड-‘य’

(iv) खण्ड ‘अ’ बहुविकल्पीय हैं तथा प्रत्येक प्रश्न का 1 अंक है।

(v) खण्ड ‘ब’ अति लघु-उत्तरीय हैं तथा प्रत्येक प्रश्न का 1 अंक है।

(vi) खण्ड ‘स’ लघु-उत्तरीय प्रकार-I का है तथा प्रत्येक प्रश्न के 2 अंक हैं।

(vii) खण्ड ‘द’ लघु-उत्तरीय प्रकार-II का है तथा प्रत्येक प्रश्न के 3 अंक हैं।

(viii) खण्ड ‘य’ विस्तृत उत्तरीय है। प्रत्येक प्रश्न के 5 अंक हैं। इस खण्ड के सभी चारों प्रश्नों में आन्तरिक विकल्प का चयन प्रदान किया गया है। ऐसे प्रश्नों में आपको दिये गये चयन में से केवल एक प्रश्न ही करना है।

(ix) प्रश्न-पत्र में प्रयुक्त प्रतीकों के सामान्य अर्थ हैं।

खण्ड – ‘अ’

1 (क) दो बिन्दु आवेशों के बीच 80 न्यूटन का विद्युत बल कार्य करता है। जब इन्हीं आवेशों को एक परावैद्युत माध्यम में रखते हैं तब विद्युत बल 8 न्यूटन हो जाता है। माध्यम का परावैद्युतांक होगा

(A) 0.1
(B) 10
(C) 16
(D) 640

Ans. दिया है: निर्वात में बल F=80 N, माध्यम में बल Fm=8 N

K=FFm=808=10

(ख) निम्न नाभिकीय प्रक्रिया में X है:

2He4 + 7N14  → 8O17 + X

(A) प्रोटॉन
(B) न्यूट्रॉन
(C) इलेक्ट्रॉन
(D) ड्यूटेरॉन

Ans. (A) प्रोटॉन

(ग) हाइड्रोजन परमाणु की दो उत्तरोत्तर कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन के कोणीय संवेग में अन्तर होता है:

(A) h/2π
(B) h/π
(C) h/2
(D) 2h

Ans. बोहर के अनुसार,

Ln=nh2π​

दो क्रमागत कक्षाओं के लिए,

ΔL=(n+1)h2π−nh2π=h2π​

(घ) α-कण के प्रकीर्णन के रदरफोर्ड प्रयोग में जिस बल के कारण α -कण प्रकीर्णित होते हैं, वह बल है:

(A) गुरुत्वीय बल
(B) कूलॉमीय बल
(C) नाभिकीय बल
(D) चुम्बकीय बल

Ans. (B) कूलॉमीय बल

ङ) विद्युत-चुम्बकीय विकिरण स्पेक्ट्रम में पराबैंगनी विकिरण का आवृत्ति परास है :

(A) 3 * 1010 – 3*1012 हर्ट्ज
(B) 3 * 1012 -3*1014 हर्ट्ज
(C) 3 * 1014 – 3*1016 हर्ट्ज
(D) 3 * 1016 और इसके ऊपर

Ans. (C) 3 * 1014 – 3*1016 हर्ट्ज

च) सूर्य पृथ्वी की सतह पर 0.5° का कोण बनाता है। इसका प्रतिबिम्ब 50 सेमी फोकस दूरी वाले उत्तल लेन्स से बनाया जाता है। प्रतिबिम्ब का व्यास होगा:

(A) 1.0 सेमी
(B) 5.0 सेमी
(C) 0.76 सेमी
(D) 0.43 सेमी

Ans. दिया है:

θ=0.5∘,f=50 cm

छोटे कोण के लिए प्रतिबिम्ब का व्यास:

d=fθ

जहाँ θ रेडियन में होगा।

θ=0.5×π180=0.00873 rad

d=50×0.00873=0.4365 cm

खण्ड – ‘ब’

2. (क) दी ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य को गतिज ऊर्जा के पदों में व्यक्त कीजिये ।
Ans.
डी-ब्रॉग्ली के अनुसार,

λ=hp​

यदि कण का द्रव्यमान m, वेग v तथा गतिज ऊर्जा Ek​ हो, तो

Ek=12mv2

अतः p=2mEk​​

इसलिए,

λ=h2mEk​​​

(ख) सिद्ध कीजिये कि अपवर्तक तल से प्रकाश-किरण का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन तभी सम्भव है जब प्रिज्म कोण A का मान sin-1(1/n ) से अधिक हो, जहाँ ‘n’ प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक है।
Ans.
मान लीजिए प्रिज्म का अपवर्तनांक nn तथा प्रिज्म कोण AA है। प्रिज्म के भीतर अपवर्तन कोण r1,r2r1​,r2​ हैं।

प्रिज्म के लिए,

r1+r2=A

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के लिए दूसरे तल पर आपतन कोण क्रान्तिक कोण C से अधिक होना चाहिए।

r2>C

चूँकि r1>0, इसलिए A>r2>C, अर्थात

A>C

वायु के सापेक्ष,

sin⁡C=1n​

अतः

A>sin⁡−1(1n)

यही सिद्ध करना था।

(ग) समान लम्बाई के ताँबे के दो तारों के व्यासों का अनुपात 2: 1 है। इनके प्रतिरोधों की तुलना कीजिये ।
Ans.
दिया है कि दोनों तारों की लम्बाई समान है तथा व्यासों का अनुपात 2:12:1 है।

प्रतिरोध का सूत्र:

R=ρlA=4ρlπd2​

अतः R∝1d2

इसलिए,

R1R2=d22d12=1222

R1:R2=1:4

(घ) प्रकाश-वैद्युत प्रभाव में देहली तरंगदैर्ध्य से क्या तात्पर्य है ?
Ans.
देहली तरंगदैर्ध्य वह अधिकतम तरंगदैर्ध्य है, जिस पर या जिससे कम तरंगदैर्ध्य का प्रकाश किसी धातु की सतह पर पड़ने से प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन कर सकता है। इससे अधिक तरंगदैर्ध्य पर प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन नहीं होता।

(ङ) निम्न चित्र में प्रदर्शित तार में i धारा प्रवाहित हो रही है। अर्ध वृत्त के केन्द्र O पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान क्या होगा ?

(i) प्रत्येक l लम्बाई के सीधे भाग के कारण
Ans.

(ii) त्रिज्या R के अर्ध वृत्त के कारण।
Ans.
वृत्ताकार चाप के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र:

B=μ0Iϕ4πR​

अर्धवृत्त के लिए ϕ=π, इसलिए

B=μ0I4R​​

(च) कलासम्बद्ध स्रोत से आप क्या समझते हैं ?
Ans.
वे दो प्रकाश स्रोत जिनसे निकलने वाली तरंगों की आवृत्ति समान तथा उनके बीच कलान्तर समय के साथ नियत रहता है, कलासम्बद्ध स्रोत कहलाते हैं। ऐसे स्रोतों से स्थायी व्यतिकरण प्रतिरूप प्राप्त होता है।

खण्ड- ‘स’

3. (क) विद्युत-चुम्बकीय तरंगें क्या होती हैं? इसकी विशेषतायें लिखिये ।
Ans.
वे तरंगें जिनमें विद्युत क्षेत्र तथा चुम्बकीय क्षेत्र एक-दूसरे के लम्बवत् दोलन करते हैं और प्रकाश के वेग से संचरित होते हैं, विद्युत-चुम्बकीय तरंगें कहलाती हैं।

विशेषताएँ:

  1. इन्हें संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
  2. ये अनुप्रस्थ तरंगें होती हैं।
  3. विद्युत क्षेत्र, चुम्बकीय क्षेत्र तथा संचरण की दिशा परस्पर लम्बवत् होते हैं।
  4. निर्वात में इनका वेग 3×108 m/s होता है।
  5. ये ऊर्जा तथा संवेग का परिवहन करती हैं।

(ख) किसी उत्तेजित हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा -3.4 eV है। इस इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग ज्ञात कीजिये ।
Ans.
दिया है:

E=−3.4 eV

हाइड्रोजन परमाणु में ऊर्जा का सूत्र है:

En=−13.6n2 eV

−3.4=−13.6n2

n2=4⇒n=2

बोहर के अनुसार कोणीय संवेग:

L=nh2π​

L=2×6.626×10−342π

अतः

L=2.11×10−34 J s​

(ग) पोलेरॉइड से समतल ध्रुवित प्रकाश का संसूचन् कैसे करेंगे ?
Ans.
एक पोलेरॉइड को विश्लेषक के रूप में लेकर उस पर आपतित प्रकाश की तीव्रता देखते हैं। पोलेरॉइड को धीरे-धीरे घुमाने पर यदि प्रकाश की तीव्रता अधिकतम से न्यूनतम होती है और फिर अधिकतम हो जाती है, तो प्रकाश समतल ध्रुवित है। पूर्ण अन्धकार की स्थिति आदर्श समतल ध्रुवित प्रकाश के लिए प्राप्त होती है।

(घ) हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन 5.0 × 10-11 मीटर त्रिज्या की कक्षा में 2 × 106 मी/सेकण्ड की चाल से 10 गति करता है। इलेक्ट्रॉन-घूर्णन का चुम्बकीस आघूर्ण ज्ञात कीजिये ।
Ans.
दिया है:

r=5.0×10−11 m

v=2×106 m/s

इलेक्ट्रॉन के कक्षीय चुम्बकीय आघूर्ण का परिमाण:

μ=IA=ev2πr×πr2

अर्थात,

μ=evr2​

मान रखने पर,

μ=1.6×10−19×2×106×5×10−112

अतः

μ=8×10−24 A m2

यह इलेक्ट्रॉन के कक्षीय चुम्बकीय आघूर्ण का परिमाण है।

खण्ड – ‘द’

4. (क) समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता के लिये व्यंजक प्राप्त कीजिये। इसकी धारिता कैसे बढ़ायेंगे ?
Ans.
मान लीजिए समान्तर प्लेट संधारित्र की प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल A, प्लेटों के बीच की दूरी d तथा प्लेटों पर आवेश +Q और −Q है।

पृष्ठीय आवेश घनत्व:

σ=QA​

वायु या निर्वात में विद्युत क्षेत्र:

E=σε0=Qε0A​

प्लेटों के बीच विभवान्तर:

V=Ed=Qdε0A​

धारिता C=Q/V होती है। अतः

C=ε0Ad​​

धारिता बढ़ाने के उपाय:

  1. प्लेटों का क्षेत्रफल A बढ़ाकर।
  2. प्लेटों के बीच की दूरी d घटाकर।
  3. प्लेटों के बीच उच्च परावैद्युतांक वाला पदार्थ रखकर।

परावैद्युतांक K वाले पदार्थ के लिए:

C=Kε0Ad​​

(ख) रेल की दो पटरियाँ आपस में तथा जमीन से पृथक्कृत हैं। इन्हें एक मिली बोल्टमीटर से जोड़ा गया है। जब इन पर एक ट्रेन 180 किमी प्रति घण्टा की चाल से दौड़ती है तो मिली वोल्टमीटर का पाठ्यांक क्या होगा ? दिया गया है कि पृथ्वी के क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर अवयव 0.2 × 10-4 वेबर/मी है तथा पटरियों परस्पर 1 मीटर की दूरी पर हैं।
Ans.
दिया है:

  • ट्रेन की चाल v=180 km/h=50 m/s
  • पटरियों के बीच दूरी l=1 m
  • पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर अवयव B=0.2×10−4 T (प्रश्न में प्रयुक्त मान का अभिप्राय)

गतिज विद्युत वाहक बल:

ε=Blv

मान रखने पर,

ε=0.2×10−4×1×50

ε=10−3 V

अतः मिलीवोल्टमीटर का पाठ्यांक:

ε=1 mV​

नोट: यदि प्रश्न में चुम्बकीय क्षेत्र का घातांक वास्तव में 104 धनात्मक दिया गया है, तो पाठ्यांक अलग होगा। पृथ्वी के क्षेत्र के लिए सामान्यतः यहाँ 0.2×10−4 T अभिप्रेत होता है।

(ग) तरंगाग्र से क्या अभिप्राय है? हाईगन के तरंग सिद्धान्त से प्रकाश के परावर्तन की व्याख्या कीजिए।
Ans.
किसी प्रकाश तरंग के उन सभी बिन्दुओं का पृष्ठ, जो समान कला में कम्पन करते हैं, तरंगाग्र कहलाता है।

हाइगेंस का सिद्धान्त: तरंगाग्र का प्रत्येक बिन्दु द्वितीयक तरंगिकाओं के स्रोत की तरह कार्य करता है। कुछ समय बाद इन तरंगिकाओं को स्पर्श करने वाला अग्र पृष्ठ नया तरंगाग्र बनाता है।

परावर्तन की व्याख्या: मान लीजिए समतल तरंगाग्र परावर्तक सतह पर तिरछा आपतित होता है। तरंगाग्र का एक बिन्दु सतह को पहले स्पर्श करता है। उसी समय में तरंगाग्र का दूसरा बिन्दु आगे बढ़ता है और पहले बिन्दु से उत्पन्न द्वितीयक तरंगिका का स्पर्शी नया तरंगाग्र बनाता है।

ज्यामितीय रचना से सिद्ध होता है कि:

i=r​

अर्थात आपतन कोण, परावर्तन कोण के बराबर होता है। साथ ही आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलम्ब एक ही तल में होते हैं।

(घ) p-n सन्धि डायोड का अग्र अभिनति में प्रतिरोध 25 ओम है। अग्र-अभिनति बोल्टेज में कितना परिवर्तन किया जाय कि धारा में 2 mA का परिवर्तन हो जाय ?
Ans.
दिया है:

R=25 Ω,ΔI=2 mA

ओम के नियम के अनुसार,

ΔV=RΔI

ΔV=25×2×10−3

ΔV=0.05 V​

अतः अग्र अभिनति वोल्टेज में 0.05 V, अर्थात 50 mV, का परिवर्तन करना होगा।

(ङ) वाटहीन धारा से क्या अभिप्राय है ? 15 µF का एक संधारित्र 220 बोल्ट, 50 Hz के AC स्रोत से जोड़ा गया है। परिपथ का प्रतिघात तथा प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान ज्ञात कीजिए ।
Ans.
ऐसी प्रत्यावर्ती धारा जिसके परिपथ में औसत शक्ति की खपत शून्य होती है, वाटहीन धारा कहलाती है। आदर्श संधारित्र में धारा, वोल्टेज से 90∘ आगे रहती है, इसलिए औसत शक्ति शून्य होती है।

दिया है:

C=15 μF=15×10−6 F

V=220 V,f=50 Hz

संधारित्रीय प्रतिघात:

XC=12πfC

XC=12π×50×15×10−6

XC≈212.2 Ω

वर्ग माध्य मूल धारा:

Irms=VrmsXC

Irms=220212.2

Irms≈1.04 A​

5. क) प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धान्त एवं कार्यविधि लिखिये ।
Ans.
सिद्धान्त: प्रत्यावर्ती धारा जनित्र विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है। जब किसी कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उसमें प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।

रचना: इसमें शक्तिशाली चुम्बक के ध्रुवों के बीच एक आयताकार कुण्डली रखी जाती है। कुण्डली के दोनों सिरे दो अलग-अलग स्लिप रिंगों से जुड़े रहते हैं। ब्रशों द्वारा बाहरी परिपथ से सम्पर्क बनाया जाता है।

कार्यविधि: जब कुण्डली को बाहरी बल से घुमाया जाता है, तो उससे सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स बदलता है। फैराडे के नियम के अनुसार कुण्डली में विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। प्रत्येक आधे चक्कर के बाद प्रेरित धारा की दिशा बदल जाती है। इस प्रकार बाहरी परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा प्राप्त होती है।

प्रेरित विद्युत वाहक बल:

e=E0sin⁡ωt​

जहाँ E0अधिकतम विद्युत वाहक बल है।

(ख) f फोकस दूरी का एक उत्तल लेन्स एक वस्तु तथा एक पर्दे के बीच कहीं रखा जाता है। पर्दे तथा वस्तु के बीच की दूरी x है। यदि लेन्स का आवर्धन m हो, तो सिद्ध कीजिये कि :

f = (mx)/(m + 1)2
Ans.
मान लीजिए वस्तु तथा पर्दे के बीच दूरी x है। उत्तल लेन्स वस्तु और पर्दे के बीच रखा है।

वस्तु की लेन्स से दूरी u तथा प्रतिबिम्ब की लेन्स से दूरी v है।

u+v=x

आवर्धन का परिमाण:

m=vu​

अतः v=mu

अब,

u+mu=x

u=xm+1​

और

v=mxm+1​

लेन्स सूत्र के परिमाण वाले रूप से:

f=uvu+v​

मान रखने पर,

f=xm+1×mxm+1x​​

अतः

f=mx(m+1)2​​

यही सिद्ध करना था।

(ग) प्रकाश के ध्रुवण से क्या तात्पर्य है? परावर्तन के द्वारा समतल धुवित प्रकाश उत्पन्न करने की किसी विधि का वर्णन कीजिये ।
Ans.
वह घटना जिसमें प्रकाश तरंग के विद्युत क्षेत्र के कम्पन संचरण की दिशा के लम्बवत् केवल एक निश्चित दिशा में सीमित हो जाते हैं, प्रकाश का ध्रुवण कहलाती है। यह प्रकाश की अनुप्रस्थ प्रकृति को सिद्ध करता है।

परावर्तन द्वारा ध्रुवण: किसी पारदर्शी माध्यम, जैसे काँच, की सतह पर अध्रुवित प्रकाश को एक विशेष कोण पर आपतित कराया जाता है। जब आपतन कोण का मान ब्रूस्टर कोण के बराबर होता है, तब परावर्तित प्रकाश समतल ध्रुवित हो जाता है।

ब्रूस्टर का नियम:

tan⁡ip=n​

जहाँ ip​ ध्रुवण कोण तथा n दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक है।

इस स्थिति में परावर्तित और अपवर्तित किरणें परस्पर 90∘ का कोण बनाती हैं।

(घ) किसी वैद्युत द्विध्रुव को एकसमान विद्युत क्षेत्र में सन्तुलन की स्थिति से कोण से घूमाने में किये गये कार्य के लिये सूत्र प्राप्त कीजिये ।
Ans.
मान लीजिए विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण p है तथा एकसमान विद्युत क्षेत्र E के साथ द्विध्रुव का कोण θ है।

द्विध्रुव पर लगने वाला बल-आघूर्ण:

τ=pEsin⁡θ

द्विध्रुव को 0 से θ कोण तक धीरे-धीरे घुमाने में बाहरी बल द्वारा किया गया कार्य:

W=∫0θpEsin⁡θ dθ

W=pE[−cos⁡θ]0θ​

अतः

W=pE(1−cos⁡θ)

यह कार्य द्विध्रुव को प्रारम्भिक सन्तुलन स्थिति से θ कोण तक घुमाने के लिए किया जाता है।

अथवा

हाइड्रोजन परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर 5 × 10-11 मीटर त्रिज्या की कक्षा में  2.2 ×106 मी/सेकण्ड की चाल से चक्कर लगाता है। इसके समतुल्य वैद्युत धारा का मान ज्ञात कीजिये ।
Ans.
दिया है:

r=5×10−11 m,v=2.2×106 m/s

एक चक्कर लगाने में लगा समय:

T=2πrv​

समतुल्य धारा:

I=eT=ev2πr​

I=1.6×10−19×2.2×1062π×5×10−11

I≈1.12×10−3 A​

अर्थात लगभग 1.12 mA

(ङ) किरचॉफ का धारा एवं वोल्टेज सम्बन्धी नियम लिखिये ।
Ans.
प्रथम नियम — धारा नियम: किसी विद्युत परिपथ के सन्धि बिन्दु पर आने वाली धाराओं का योग, वहाँ से जाने वाली धाराओं के योग के बराबर होता है।

∑I=0

द्वितीय नियम — वोल्टेज नियम: किसी बन्द विद्युत परिपथ में सभी विद्युत वाहक बलों तथा विभव-पतनों का बीजगणितीय योग शून्य होता है।

∑E−∑IR=0

प्रथम नियम आवेश संरक्षण तथा द्वितीय नियम ऊर्जा संरक्षण पर आधारित है।

खण्ड – ‘य’

6. p-n सन्धि डायोड अर्द्ध तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइये ।
Ans.
अर्द्ध तरंग दिष्टकारी वह युक्ति है, जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) को स्पंदित एकदिश धारा (DC) में बदलती है। इसमें एक p-n सन्धि डायोड का उपयोग किया जाता है।

कार्यविधि:

  1. धनात्मक अर्द्धचक्र: जब डायोड अग्र अभिनति में होता है, तब वह धारा प्रवाहित करता है। लोड प्रतिरोध में वोल्टेज प्राप्त होता है।
  2. ऋणात्मक अर्द्धचक्र: जब डायोड उत्क्रम अभिनति में होता है, तब वह धारा को लगभग रोक देता है। इसलिए लोड में धारा लगभग शून्य रहती है।
  3. इस प्रकार आउटपुट में केवल एक अर्द्धचक्र प्राप्त होता है और स्पंदित एकदिश धारा मिलती है।

निष्कर्ष: p-n सन्धि डायोड प्रत्यावर्ती धारा के केवल एक अर्द्धचक्र को प्रवाहित करके अर्द्ध तरंग दिष्टकारी का कार्य करता है।

अथवा

एक α-कण V वोल्ट के विभवान्तर से त्वरित होकर एक नाभिक (परमाणु क्रमांक 2) से टकराता है। यदि कण की नाभिक के निकटतम पहुँचने की दूरी हो, तो सिद्ध कीजिये कि :
Ans.
मान लीजिए V वोल्ट के विभवान्तर से त्वरित अल्फा कण परमाणु क्रमांक Z वाले नाभिक की ओर बढ़ता है। अल्फा कण का आवेश +2e तथा नाभिक का आवेश +Ze है।

अल्फा कण की प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा:

Ek=2eV

निकटतम दूरी r पर उसकी गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है और उसकी सम्पूर्ण ऊर्जा विद्युत स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है।

ऊर्जा संरक्षण से,

2eV=14πε0(2e)(Ze)r

सरलीकरण करने पर,

2eV=Ze22πε0r

अतः

r=Ze4πε0V​​

यही निकटतम पहुँच की दूरी का व्यंजक है।

7. प्रकाश-वैद्युत प्रभाव क्या है? इसके नियम लिखिये। आइन्स्टीन के प्रकाश-वैद्युत प्रभाव समीकरण mv² = h(v – vo) की स्थापना कीजिये ।
Ans.
जब किसी उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश किसी धातु की स्वच्छ सतह पर पड़ता है और उससे इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं, तो इस घटना को प्रकाश-वैद्युत प्रभाव कहते हैं। उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन प्रकाश-इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।

प्रकाश-वैद्युत प्रभाव के नियम:

  1. प्रत्येक धातु के लिए एक न्यूनतम आवृत्ति होती है, जिसे देहली आवृत्ति कहते हैं। इससे कम आवृत्ति पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन नहीं होता।
  2. देहली आवृत्ति से अधिक आवृत्ति पर प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती है।
  3. उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है, तीव्रता पर नहीं।
  4. उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश पड़ते ही इलेक्ट्रॉन लगभग तत्काल उत्सर्जित होते हैं।

आइन्स्टीन के प्रकाश-वैद्युत समीकरण की स्थापना:

आइन्स्टीन के अनुसार प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों, जिन्हें फोटॉन कहते हैं, से बना है। प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा:

E=hνE=hν

जहाँ h प्लांक नियतांक तथा ν प्रकाश की आवृत्ति है।

जब एक फोटॉन धातु के एक इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा देता है, तो ऊर्जा का एक भाग इलेक्ट्रॉन को धातु से बाहर निकालने में खर्च होता है। इस न्यूनतम ऊर्जा को कार्यफलन W0​ कहते हैं।

W0=hν0

शेष ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा बन जाती है। ऊर्जा संरक्षण से,

hν=W0+12mvmax⁡2

अतः

12mvmax⁡2=h(ν−ν0)

यही आइन्स्टीन का प्रकाश-वैद्युत समीकरण है।

यदि निरोधी विभव V0​ हो, तो:

eV0=h(ν−ν0)

अथवा

दो समान्तर तारों में, जिनकी पारस्परिक दूरी 0.06 मीटर है, समान धारा एक ही दिशा में बह रही है। दोनों के मध्य प्रति मीटर लम्बाई पर लगने वाला आकर्षी बल 3 × 10-3 न्यूटन है। प्रत्येक तार में बहने वाली धारा का मान ज्ञात कीजिये ।
Ans.
दिया है:

d=0.06 m

FL=3×10−3 N/m

दो समान्तर तारों में समान दिशा में धारा बहने पर प्रति इकाई लम्बाई बल:

FL=μ0I1I22πd

चूँकि दोनों धाराएँ समान हैं, I1=I2=I, इसलिए

FL=μ0I22πd

अतः

I2=(F/L) 2πdμ0​

I2=3×10−3×2π×0.064π×10−7

I2=900

I=30 A​

अतः प्रत्येक तार में 30 A धारा प्रवाहित होती है।

8. यंग के द्विझिरी प्रयोग में,  λ तरंग दैर्ध्य का एकवर्णीय प्रकाश का उपयोग करने पर पट्टे के एक बिंदु पर जहाँ दो तरंगों के बीच पथांत्तर λ है, प्रकाश की तीलता K इकाई है। पट्टे के उस बिन्दु पर प्रकाश की तीव्रता कितनी होगी जहाँ पथांत्तर λ/3 है ?
Ans.
दिया है कि पथान्तर λ होने पर प्रकाश की तीव्रता K है।

दो समान तीव्रता वाली तरंगों के लिए परिणामी तीव्रता:

I=4I0cos⁡2ϕ2​

जहाँ I0​ एक झिरी से प्राप्त तीव्रता तथा ϕ कलान्तर है।

पथान्तर λ होने पर:

ϕ=2πλ×λ=2π

इसलिए,

K=4I0cos⁡2π=4I0

अर्थात

I0=K4​

अब पथान्तर λ/3 होने पर:

ϕ=2πλ×λ3=2π3​

अतः

I=4I0cos⁡2π3​

I=4I0×14=I0

चूँकि I0=K/4, इसलिए

I=K4​​

अतः अभीष्ट तीव्रता K/4 होगी।

अथवा

एक पतली झिरीं द्वारा एकवर्णीय प्रकाश के विवर्तन की विवेचना कीजिये। केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई का व्यंजक ज्ञात कीजिये ।
Ans.
विवर्तन: जब प्रकाश किसी पतली झिरी या बाधा के किनारे से गुजरते समय मुड़कर ज्यामितीय छाया वाले क्षेत्र में फैलता है, तो इस घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।

जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण चौड़ाई aa वाली पतली झिरी पर पड़ती है, तो झिरी के विभिन्न भागों से निकलने वाली तरंगें परस्पर व्यतिकरण करती हैं। इससे पर्दे पर उज्ज्वल तथा अदीप्त पट्टियाँ बनती हैं।

केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई का व्यंजक:

यदि झिरी की चौड़ाई a, प्रकाश की तरंगदैर्ध्य λ तथा विवर्तन कोण θ है, तो अदीप्त पट्टियों के लिए शर्त है:

asin⁡θ=nλ

प्रथम अदीप्त पट्टी के लिए n=1, इसलिए

asin⁡θ=λ

छोटे कोण के लिए,

sin⁡θ≈θ

अतः

θ=λa​

केन्द्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर प्रथम अदीप्त पट्टियाँ −θ तथा +θ पर बनती हैं। इसलिए केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई:

Δθ=2θ

Δθ=2λa​​

यदि पर्दे की दूरी D हो, तो रैखिक चौड़ाई:

W=2Dλa​​

केन्द्रीय उच्चिष्ठ सबसे अधिक चौड़ा तथा सबसे अधिक तीव्र होता है।

9. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल का वर्णन कीजिये। इस मॉडल की कमियों को बोहर मॉडल ने कैसे दूर किया ?
Ans.
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल:

रदरफोर्ड ने स्वर्ण-पत्र पर अल्फा कणों की बौछार करके परमाणु की संरचना का अध्ययन किया। इस प्रयोग के आधार पर उन्होंने परमाणु का नाभिकीय मॉडल प्रस्तुत किया।

मुख्य विशेषताएँ:

  1. परमाणु के केन्द्र में एक अत्यन्त छोटा, सघन तथा धनावेशित नाभिक होता है।
  2. परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान नाभिक में केन्द्रित होता है।
  3. इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।
  4. परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
  5. सामान्य अवस्था में परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनों का कुल ऋणावेश नाभिक के धनावेश के बराबर होता है।

रदरफोर्ड मॉडल की कमियाँ:

  1. परिक्रमा करता हुआ इलेक्ट्रॉन त्वरण के कारण विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा का विकिरण करना चाहिए। इस कारण वह ऊर्जा खोकर नाभिक में गिर जाना चाहिए। अतः यह मॉडल परमाणु की स्थिरता नहीं समझा सका।
  2. यह हाइड्रोजन परमाणु के रेखीय स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।
  3. यह इलेक्ट्रॉनों की निश्चित ऊर्जा वाले स्तरों की व्याख्या नहीं करता था।

बोहर मॉडल ने इन कमियों को कैसे दूर किया?

बोहर ने परमाणु के लिए निम्नलिखित अभिधारणाएँ दीं:

  1. इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कुछ निश्चित स्थिर कक्षाओं में घूमते हैं। इन कक्षाओं में रहते हुए वे ऊर्जा का विकिरण नहीं करते।
  2. अनुमत कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग क्वांटीकृत होता है:

mvr=nh2π​​

जहाँ n=1,2,3,…

3. इलेक्ट्रॉन एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाने पर ही ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण करता है।

hν=∣E2−E1∣

इस प्रकार बोहर मॉडल ने हाइड्रोजन परमाणु की स्थिरता तथा उसके रेखीय स्पेक्ट्रम की सफल व्याख्या की।

अथवा

नाभिकों का वर्गीकरण कीजिये । प्रत्येक का उदाहरण देते हुये विशेषतायें लिखिये ।
Ans.
नाभिकों का वर्गीकरण प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की संख्या के आधार पर किया जाता है।

1. समस्थानिक (Isotopes): जिन नाभिकों की परमाणु संख्या समान, परन्तु द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है, वे समस्थानिक कहलाते हैं। इनमें प्रोटॉनों की संख्या समान तथा न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है।

उदाहरण:

11H,12H,13H

इनमें सभी की परमाणु संख्या 1 है, पर द्रव्यमान संख्याएँ 1, 2 और 3 हैं।

2. समभारिक (Isobars): जिन नाभिकों की द्रव्यमान संख्या समान, परन्तु परमाणु संख्या भिन्न होती है, वे समभारिक कहलाते हैं।

उदाहरण:

1840Ar,2040Ca

दोनों की द्रव्यमान संख्या 40 है, पर परमाणु संख्या अलग-अलग है।

3. समन्यूट्रॉनिक (Isotones): जिन नाभिकों में न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है, लेकिन परमाणु संख्या भिन्न होती है, वे समन्यूट्रॉनिक कहलाते हैं।

उदाहरण:

614C,715N

कार्बन में न्यूट्रॉन =14−6=8 तथा नाइट्रोजन में न्यूट्रॉन =15−7=8 हैं।

4. समावयवी नाभिक (Nuclear isomers): जिन नाभिकों की परमाणु संख्या तथा द्रव्यमान संख्या समान होती है, लेकिन ऊर्जा अवस्था अलग होती है, वे समावयवी नाभिक कहलाते हैं।

उदाहरण:

4399mTc,4399Tc

यहाँ 99mTc9 उत्तेजित मेटास्टेबल अवस्था को दर्शाता है।

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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