प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के 3 स्त्रोत निम्नलिखित हैं।

A. पुरातात्त्विक स्रोत
B. साहित्यिक स्रोत
C. विदेशी यात्रियों के विवरण

A. पुरातात्त्विक स्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के लिए पुरातात्विक सामग्रियाँ सर्वाधिक प्रामाणिक हैं। पुरातात्त्विक स्रोत के मुख्यतः 6 भाग हैं।

① अभिलेख : ये अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों, दीवारों, मुद्राओं एवं प्रतिमाओं पर उत्खनित हैं।

सर्वाधिक प्राचीन पठनीय अभिलेख अशोक के हैं, जो प्राकृत भाषा में हैं। पूर्व हैदराबाद राज्य में स्थित मास्की एवं गुर्जरा (मध्यप्रदेश) से प्राप्त अभिलेखों में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है, उसे प्राय: देवताओं का प्रिय ‘प्रियदर्शी’ राजा कहा गया है

अशोक के अधिकांश अभिलेख ‘ब्राह्मी लिपि’ में हैं, जो बायें से दायें लिखी जाती थी।

पश्चिमोत्तर प्रान्त से प्राप्त उसके अभिलेख ‘खरोष्ठी लिपि’ में हैं जो दायें से बायें लिखी जाती थी।

पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान से प्राप्त अशोक के शिलालेखों में यूनानी एवं आर्मेइक लिपियों का प्रयोग हुआ है।

अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप को 1837 ई. में सफलता मिली।

सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख 2500 ई०पू० के हड़प्पा कालीन हैं जो मुहरों पर भावचित्रात्मक लिपि में अंकित हैं। जिनका प्रामाणिक पाठ अभी तक असंभव बना हुआ है।

प्रथम श्रेणी के अभिलेखों में अधिकारों और जनता के लिए जारी किए गये सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचना रहती है-जैसे अशोक के अभिलेख।

द्वितीय श्रेणी के वे अनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों के मतानुयायियों ने स्तम्भों, प्रस्तर फलकों मंदिरों एवं प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण कराया।
तृतीय श्रेणी के वे अभिलेख हैं, जिसमें राजाओं की विजय प्रशस्तियों का आख्यान तो है, लेकिन उनके दोषों का उल्लेख नहीं है।

महत्वपूर्ण अभिलेख

अभिलेखशासक एवं अभिलेख की विशेषताएँ
1. हाथी गुम्फा अभिलेख (तिथि रहित अभिलेख)कलिंग राज खारवेल
2. जूनागढ़ (गिरनार अभिलेख)रुद्रदामन। (सुदर्शन झील के बारे में जानकारी)
3. नासिक अभिलेख(गौतमी बलश्री तथा सातवाहनों की उपलब्धियाँ)
4. प्रयाग स्तम्भ अभिलेखसमुद्रगुप्त (इनकी दिग्विजयों की जानकारी)
5. ऐहोल अभिलेखपुलकेशिन द्वितीय
6. मन्दसौर अभिलेखमालवा नरेश यशोवर्मन
7. ग्वालियर अभिलेखप्रतिहार नरेश भोज
8. भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेखस्कन्दगुप्त। (हूणों पर विजय का विवरण)
9. देवपाड़ा अभिलेखबंगाल शासक विजयसेन
10. बांसखेड़ा और मधुबन अभिलेखहर्षवर्द्धन की उपलब्धियों पर प्रकाश।
11. बालाघाट, कालें अभिलेखसातवाहनों की उपलब्धियाँ
12. अयोध्या अभिलेखशुंगों की उपलब्धियाँ
13. भरहुत प्रकार अभिलेखसुंगनरेण शब्द खुदे होने से शुंगों द्वारा निर्मित
14. देवपाड़ा अभिलेखबंगाल शासक विजयसेन

गैर-राजकीय अभिलेखों में यवन राजदूत हेलियोडोरस का बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गरुड़ स्तम्भ लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिससे द्वितीय शताब्दी ई०पू० के मध्य भारत में भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण मिलता है।

एरण (मध्यप्रदेश) से प्राप्त वराह भगवान पर हूणराज तोरमाण का लेख अंकित है।

• भूमि अनुदान पत्र : ये प्रायः ताँबे की चादरों पर उत्कीर्ण हैं। इनमें राजाओं और सामन्तों द्वारा भिक्षुओं, ब्राह्मणों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों और अधिकारियों को दिए गए गाँवों, भूमियों और राजस्व सम्बन्धी, दानों का विवरण है। जो प्राकृत, संस्कृत, तमिल एवं तेलुगू भाषाओं में लिखे गये हैं।

» विदेशी अभिलेख

(i) विदेशों से प्राप्त अभिलेखों में एशिया माइनर में बोगजकोई नामक स्थल से लगभग ई०पू० 1400 का संधिपत्र अभिलेख मिला है, जिसमें मित्र, वरुण, इंद्र एवं नासत्य नामक वैदिक देवताओं के नाम उत्कीर्ण हैं।

(ii) मिस्र के तेलूअल-अमनों में मिट्टी की कुछ तख्तियाँ मिली हैं, जिन पर बेबीलोनिया के कुछ शासकों के नाम उत्कीर्ण हैं, जो ईरान व भारत के आर्य शासकों के नामों जैसे हैं।

(iii) पार्सिपोलिल एवं बेहिस्तून अभिलेखों से ज्ञात होता है कि ईरानी सम्राट दारा प्रथम ने सिंधु नदी घटी पर अधिकार कर लिया था।

② मुद्रायें : 206 ई०पू० से लेकर 300 ई. तक के भारतीय इतिहास का ज्ञान हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही प्राप्त हो पाता है। इसके पूर्व के सिक्कों पर लेख नहीं है और उन पर जो चिह्न बने हैं उनका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है। ये सिक्के ‘आहत सिक्के’ (Punch Marked) कहलाते हैं।

मुद्राओं का उपयोग दान-दक्षिणा, क्रय-विक्रय तथा वेतन-मजदूरी के भुगतान में होता था। शासकों की अनुमति से व्यापारिक संघों (श्रेणियों) ने भी अपने सिक्के चलाये थे।

सर्वाधिक मात्रा में मुद्रायें मौर्योत्तर काल की मिलती हैं, जो सीसा, पोटीन, ताँबा, कांसे, चाँदी तथा सोने से बनी हैं।

कुषाण शासकों द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों में जहाँ सर्वाधिक शुद्धता थी, वहीं गुप्तों ने सबसे अधिक मात्रा में स्वर्ण सिक्के जारी किये।

धातु के टुकड़ों पर ठप्पा मारकर बनायी गयी बुद्धकालीन आहत मुद्राओं पर पेड़, मछली, सांड़, हाथी, अर्द्धचंद्र आदि वस्तुओं की आकृति होती थी मुद्राओं से तत्कालीन आर्थिक दशा तथा सम्बन्धित राजाओं की साम्राज्य सीमा का भी ज्ञान हो जाता है। कनिष्क के सिक्कों से उसका बौद्ध धर्म का अनुयायी होना प्रमाणित होता है।

समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों पर ‘यूप’ बना है जबकि कुछ पर ‘अश्वमेध पराक्रमः’ शब्द उत्कीर्ण है, जिसमें उसे ‘वीणा’ बजाते हुए भी दिखाया गया है।

इण्डो-यूनानी तथा इण्डो-सीथियन शासकों के इतिहास के प्रमुख स्रोत सिक्के हैं।

सातवाहन राजा शातकर्णी की एक मुद्रा पर जलपोत उत्कीर्ण होने से उसके द्वारा समुद्र विजय का अनुमान लगाया गया है।

• चंद्रगुप्त द्वितीय की व्याघ्र शैली (चाँदी) की मुद्राओं से उसके द्वारा पश्चिम भारत के शकों पर विजय सूचित होती है।

③ स्मारक एवं भवन

उत्तर भारतीय मंदिरों की कला शैली ‘नागर शैली’ कहलाती है।

दक्षिण भारतीय मंदिरों की कला शैली ‘द्रविड़ शैली’ कहलाती है।

जबकि दक्षिणापथ के वे मंदिर जिनमें नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का प्रयोग हुआ है, ‘बेसर शैली’ के मंदिर कहलाते हैं।

• जावा के ‘बोरोबुदुर मंदिर’ से वहाँ नवीं शताब्दी में महायान बौद्ध धर्म की लोकप्रियता प्रमाणित होती है।

④ मूर्तिकला : कुषाण काल, गुप्त काल और गुप्तोत्तर काल में जो मूर्तियाँ निर्मित की गयीं, उनसे जन-साधारण की धार्मिक आस्थाओं और मूर्तिकला का ज्ञान मिलता है।

कुषाण कालीन मूर्तिकला में जहाँ विदेशी प्रभाव अधिक है, वहीं गुप्तकालीन मूर्तिकला में स्वभाविकता परिलक्षित होती है जबकि गुप्तोत्तर कला में सांकेतिकता अधिक है।

भरहुत, बोधगया, साँची और अमरावती की मूर्तिकला में जन-सामान्य के जीवन की यथार्थ झांकी मिलती है।

⑤ चित्रकला : अजन्ता गुफा में उत्कीर्ण ‘माता और शिशु’ तथा ‘मरणासन्न राजकुमारी’ जैसे चित्रों की शाश्वता सर्वकालिक है, जिससे गुप्तकालीन कलात्मक और तत्कालीन जीवन की झलक मिलती है।

⑥ अवशेष : पाकिस्तान में सोहन नदी घाटी में उत्खनन द्वारा प्राप्त पुरापाषाण युग के पत्थर के खुरदुरे हथियारों औजारों से अनुमान लगाया गया है कि भारत में 4 लाख से 2 लाख वर्ष ईसा पूर्व मानव रहता था। 10 से 6 हजार वर्ष ई०पू० वह कृषि कार्य, पशुपालन, कपड़ा बुनना, मिट्टी के बर्तन बनाना तथा पत्थर के चिकने औजार बनाना सीख गया था।

• गंगा-यमुना के दोआब में पहले काले और लाल मृद्भांड और फिर चित्रित भूरे रंग के मृद्मांड प्राप्त हुए हैं।

मोहनजोदड़ो में 500 से अधिक मुहरें प्राप्त हुई हैं जो हड़प्पा संस्कृति के निवासियों के धार्मिक विश्वासों की ओर इंगित करती हैं।

बसाढ़ (प्रारम्भिक वैशाली) से 274 मिट्टी की मुहरें मिली हैं।

अब पुरातत्त्ववेता वैदिक साहित्य, महाभारत और रामायण में उल्लिखित स्थानों का उत्खनन करके उनकी भौतिक संस्कृति का चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

कौशाम्बी में व्यापक स्तर पर किए गये उत्खनन कार्य में उदयन का राजप्रासाद तथा घोषिताराम नामक एक विहार मिला है।

अतरंजीखेड़ा आदि की खुदाइयों से ज्ञात होता है कि देश में लोहे का प्रयोग ई०पू० 1000 के लगभग आरम्भ हो गया था।

रोमिला थापर के अनुसार लोहे का उपयोग 800 ई०पू० में आरम्भ हुआ।

• दक्षिण भारत में अरिकमेड नामक स्थल की खुदाई से रोमन सिक्के, दीप का टुकड़ा तथा बर्तन आदि मिले हैं, जिससे यह पुष्ट हुआ है कि ईसा की आरम्भिक शताब्दियों में रोम तथा दक्षिण भारत के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध था।

B. साहित्यिक स्त्रोत (Literary Source)

साहित्यिक स्त्रोत के मुख्यतः 2 भाग हैं।

(i) धार्मिक साहित्य (ii) लौकिक साहित्य

धार्मिक साहित्यके 2 भाग हैं। () ब्राह्मण या वैदिक साहित्य (ख) ब्राह्मणेत्तर या अवैदिक साहित्य

() वैदिक साहित्य : इसके अंतर्गत वेद तथा उससे सम्बन्धित ग्रंथ, पुराण, महाकाव्य, स्मृति आदि हैं। भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘वेद’ का शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान’ है। श्रवण परम्परा में सुरक्षित होने के कारण इसे ‘श्रुति’ भी कहा जाता है। कालान्तर में वेदव्यास ने ‘वेदों’ को संकलित कर दिया। वेद कुल चार हैं-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद।

ऋग्वेद ( 1500-1000 ई०पू०) : भारत की सर्वाधिक प्राचीन रचना ऋग्वेद में ‘ऋक्’ का अर्थ ‘छन्दों तथा चरणों से युक्त मंत्र’ होता है। ऋग्वेद मंत्रों का एक संकलन (संहिता) है, जिन्हें यज्ञों के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए ‘होतृ या होता’ ऋषियों द्वारा उच्चरित किया जाता था। ऋग्वेद की अनेक संहिताओं में से ‘शाकल संहिता’ ही उपलब्ध है। ‘संहिता’ का अर्थ संग्रह या संकलन है।

• सम्पूर्ण संहिता में दस मंडल तथा 1028 सूक्त हैं।

• ऋग्वेद की पाँच शाखायें हैं शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन तथा मांडूक्य।

• ऋग्वेद के कुल मंत्रों (ऋचाओं) की संख्या लगभग 10,600 है।

• ऋग्वेद में इंद्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं (मंत्रों) की रचना की गई है।

• ऋग्वेद का दो से सातवाँ मंडल प्रामाणिक और शेष प्रक्षिप्त माना जाता है।

• बाद में जोड़े गये दसवें मंडल में पहली बार ‘शूद्रों’ का उल्लेख किया गया है; जिसे ‘पुरुषसूक्त’ के नाम से जाना जाता है।

देवता ‘सोम’ का उल्लेख नवें मंडल में है।

लोकप्रिय ‘गायत्रीमंत्र (सावित्री) का उल्लेख भी ऋग्वेद में ही है। यह तीसरे मंडल में है।

सामवेद (1000-500 ई०पू०) : ‘साम’ का अर्थ ‘संगीत’ या ‘गान’ होता है। इसमें यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। इन मंत्रों को गाने वाला ‘उद्‌गाता’ कहालता था। सामवेद के दो मुख्य भाग हैं-आर्चिक एवं गान।

सामवेद के प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।

सामवेद की प्रमुख शाखायें हैं-कौथुमीय, जैमिनीय तथा राणायनीय ।

सामवेद में कुल 1549 ऋचायें हैं। जिसमें मात्र 78 ही नयी हैं, शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं।

सामवेद को भारतीय संगीत का जनक माना जा सकता है।

यजुर्वेद : ‘यजुष’ शब्द का अर्थ यज्ञ है। यजुर्वेद संहिता में यज्ञों को सम्पन्न कराने में सहायक मंत्रों का संग्रह है, जिसका उच्चारण ‘अध्वर्यु’ नामक पुरोहित द्वारा किया जाता था। यह गद्य एवं पद्य दोनों शैली में है। यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान वेद है। इसके दो भाग हैं-(क) कृष्ण यजुर्वेद (ख) शुक्ल यजुर्वेद

• (क) कृष्ण यजुर्वेद : इसमें छन्दबद्ध मंत्र तथा गद्यात्मक वाक्य हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखायें हैं-तैत्तिरीय, काठक, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल।

• (ख) शुक्ल यजुर्वेद : इसमें केवल मंत्र ही हैं। इसकी मुख्य शाखायें हैं- माध्यन्दिन अ तथा काण्व। इसकी संहिताओं को ‘वाजसनेय’ भी कहा गया है, क्योंकि वाजसेनी के पुत्र याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा थे। इसमें कुल 40 अध्याय हैं।

अथर्ववेद : उपर्युक्त तीनों संहितायें जहाँ परलोक सम्बन्धी विषयों का प्रतिपादन करती हैं, वहीं अथर्ववेद संहिता लौकिक फल प्रदान करने वाली है। ‘अथर्वा’ नामक ऋषि इसके प्रथम द्रष्टा हैं, अतः उन्हीं के नाम पर इसे ‘अथर्ववेद’ कहा गया। इसके दूसरे द्रष्टा आंगिरस ऋषि के नाम पर इसे ‘अथर्वांगिङसवेद’ भी कहा जाता है।

• अथर्ववेद में उस समय के समाज का चित्र मिलता है, जब आर्यों ने अनार्यों के अनेक धार्मिक विश्वासों को अपना लिया था।

• अथर्ववेद की दो शाखायें हैं-पिप्पलाद एवं शौनक। इस संहिता में कुल 20 कांड 731 सूक्त तथा 5987 मंत्रों का संग्रह है। इसमें लगभग 1200 मंत्र ऋग्वेद से उद्धृत हैं।

इसकी कुछ ऋचायें यज्ञ सम्बन्धी तथा ब्रह्म विद्या विषयक होने के कारण इसे ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा जाता है। लेकिन इसके अधिकांश मंत्र लौकिक जीवन से सम्बन्धित हैं।

रोग निवारण, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, शाप, वशीकरण, आशीर्वाद, स्तुति, प्रायश्चित, औषधि, अनुसंधान, विवाह, प्रेम, राजकर्म, मातृभूमि महात्म्य आदि विविध विषयों से सम्बद्ध मंत्र तथा सामान्य मनुष्यों के विचारों, विश्वासों अंधविश्वासों इत्यादि का वर्णन अथर्ववेद से प्राप्त होता है। आयुर्वेद के सिद्धांत तथा व्यवहार जगत की अनेक बातें भी इसमें हैं।

ब्राह्मण ग्रंथ

• ब्राह्मण ग्रंथों की रचना यज्ञादि विधानों का प्रतिपादन तथा उसकी क्रिया को समझाने के उद्देश्य से की गयी। ‘ब्रह्म’ का शब्दार्थ ‘यज्ञ’ है, अतः यज्ञीय विषयों के प्रतिपादक ग्रंथ ‘ब्राह्मण’ कहे गये। ग्रंथ जहाँ स्तुति प्रधान हैं, वहीं ब्राह्मण ग्रंथ विधि प्रधान हैं, जो अधिकांशतः गद्य में लिखे गये हैं। प्रत्येक वेद हेतु पृथक ब्राह्मण ग्रंथ लिखे गये।

आरण्यक ग्रंथ

• इनकी रचना अरण्यों अर्थात् वनों में पढ़ाये जाने के निमित्त होने के कारण इन्हें ‘आरण्यक’ कहा गया है। इनमें ज्ञान एवं चिंतन को प्रधानता दी गयी है। इन दार्शनिक रचनाओं से ही कालान्तर में उपनिषदों का विकास हुआ।

उपनिषद् (108)

उपनिषदों को ‘वेदांत’ भी कहा जाता है। उपनिषद् मुख्यतः ज्ञानमार्गी रचनायें हैं। इनका मुख्य विषय ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है।

‘उपनिषद्’ का शाब्दिक है-उप-समीप, नि-निष्ठापूर्वक, सद्-बैठना; अर्थात् (रहस्य ज्ञान हेतु) गुरु के समीप निष्ठापूर्वक बैठना। वैसे तो मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों का उल्लेख मिलता है, लेकिन सर्वाधिक प्राचीन और प्रामाणिक 12 उपनिषद् माने जाते हैं।

(1) ईश (2) केन(3) कठ (4) प्रश्न
(5) मुण्डक (6) माण्डूक्य(7) तैत्तिरीय (8) ऐतरेय
(9) छान्दोग्य(10) वृहदारण्यक(11) श्वेताश्वर और कौषीतकी(12) शंकराचार्य ने आरम्भिक दस
उपनिषदों पर भाष्य लिखा है।

भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” ‘मुण्डकोपनिषद्’ से उद्धृत है।

उपनिषदों के विकास में गार्गी और मैत्रेयी के साथ दीर्घकाल तक ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य मनीषियों ने बौद्धिक योगदान दिया। उपनिषदों में सर्वत्र सत्य को खोजने की सच्ची उत्कंठा परिलक्षित होती है।

वेदांग

वेदों (संहिता के अर्थ को सरलता से समझने तथा वैदिक कर्मकांडों के प्रतिपादन में सहायतार्थ ‘वेदांग’ नामक नवीन साहित्य की रचना की गयी, जिसकी संख्या 6 है-

• 1. शिक्षा (उच्चारण विधि): वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण एवं शुद्ध स्वर क्रिया की विधियों के ज्ञानार्थ लिखित साहित्य ‘शिक्षा’ कहा जाता है। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य प्रतिशाख्य है।

• 2. कल्पसूत्र (कर्मकाण्ड): कल्प नामक वेदांग में छोटे-छोटे वाक्यों में सूत्र (Formula) बनाकर महत्त्वपूर्ण वैदिक विधि-विधानों को प्रस्तुत किया गया। सूत्र ग्रंथों को ही कल्प कहा जाता है। कल्पसूत्र चार प्रकार के हैं।

• 3. व्याकरण : शब्दों की मीमांसा करने वाला शास्त्र व्याकरण कहा गया, जिसका सम्बन्ध भाषा सम्बन्धी नियमों से है। व्याकरण की सर्वप्रमुख रचना पाणिनी कृत ‘अष्टाध्यायी’ (5वीं शती ई०पू०) है, जिसमें 8 अध्याय व  400 सूत्र हैं। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में कात्यायन ने संस्कृत में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की व्याख्या के लिए ‘वार्तिक’ लिखे। ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी में पतंजलि ने पाणिनी के सूत्रों पर ‘महाभाष्य’ लिखा।

• 4. निरुक्त (भाषा विज्ञान): क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघण्टु’ की व्याख्या हेतु यास्क ने ‘निरुक्त’ की रचना की, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।

• 5. छन्द: वैदिक मंत्र प्रायः छंदबद्ध हैं। छंदों के नाम संहिताओं व ब्राह्मण ग्रंथों में मिलते हैं। छंदशास्त्र पर पिङ्गलमुनि का ग्रंथ ‘छन्द सूत्र’ उपलब्ध है।

• 6. ज्योतिष : शुभ मुहूर्त में याज्ञिक अनुष्ठान करने के लिए ग्रहों तथा नक्षत्रों का अध्ययन करके सही समय ज्ञात करने की विधि को वेदांग ज्योतिष की उत्पत्ति की सर्व प्राचीन रचना लगधमुनि कृत ‘वेदांग ज्योतिष’ है। ज्योतिष के सबसे प्राचीनतम आचार्य लगथ मुनि हैं। इसमें कुल 44 श्लोक हैं। वेदांग ज्योतिष के ऋग्वेद व यजुर्वेद से सम्बन्धित दो ग्रंथ हैं-आचार्य ज्योतिष एवं याजुष ज्योतिष।

पुराण

• ‘पुराण’ का शाब्दिक अर्थ ‘प्राचीन आख्यान’ होता है। पांचवीं से चौथी शताब्दी ई०पू० में पुराण ग्रंथ अस्तित्व में आ चुके थे। वर्तमान उपलब्ध पुराण गुप्तकाल के आसपास के हैं। मुख्य पुराणों की संख्या 18 हैं- मत्स्य, मार्कण्डेय, भविष्य, भागवत, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त्त, ब्रह्म, वामन, वराह, विष्णु, वायु, अग्नि, नारद, पद्म, लिंग, गरुड़, कूर्म एवं स्कन्द। ये सभी महापुराण कहलाते हैं।

• पुराणों के अंतर्गत हम प्राचीन शासकों की वंशावलियाँ पाते हैं। इनके संकलनकर्त्ता महर्षि लोमहर्ष अथवा उनके सुपुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। पुराण सरल व व्यावहारिक भाषा में लिखे गये जनता के ग्रंथ हैं। जिनमें प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, पशु-पक्षी, वनस्पति विज्ञान, आयुर्वेद इत्यादि का वृहद् वर्णन मिलता है।

स्मृतियाँ या धर्मशास्त्र

धर्मसूत्र साहित्य के कालान्तर में स्मृति ग्रंथों का विकास होने के कारण इन्हें ‘धर्मशास्त्र’ की संज्ञा भी दी जाती है। ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से लेकर पूर्व मध्यकाल तक विभिन्न स्मृति ग्रंथों की रचना की गयी।

कुछ प्रमुख स्मृतिग्रंथों का नाम निम्नवत है : : मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु स्मृति, कात्यायन स्मृति, बृहस्पति स्मृति, पाराशर स्मृति, गौतम स्मृति, वशिष्ठ स्मृति, नारद स्मृति, देवल स्मृति आदि। इनमें मनुस्मृति (शुंगकालई०पू० द्वितीय शती) सर्वाधिक प्राचीन तथा प्रामाणिक है, शेष गुप्तकालीन (पाँचवीं शती ई.) हैं।

• विष्णु स्मृति के अतिरिक्त शेष स्मृतियाँ श्लोकों में लिखी गयी हैं और इनकी भाषा लौकिक संस्कृत है।

मनुस्मृति के प्रसिद्ध भाष्यकार मेघातिथि, गोविन्दराज तथा कुल्लूक भट्ट हैं और याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार विश्वरूप, विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा), अपरार्क इत्यादि हैं।

स्मृतियों में विभिन्न वर्णों, राजाओं और पदाधिकारियों के नियम भी दिए गये हैं।

कल्पसूत्र

• (ई०पू० 600 से 300 ई०) के मध्य रचित

(क) श्रौत सूत्र : वेदों में वर्णित यज्ञ भागों का क्रमबद्ध विवरण उस काल की परम्पराओं तथा धार्मिक रूढ़ियों का ज्ञान ऋग्वेद के दो श्रौत सूत्र-आश्वलायन, शांखायन, यजुर्वेद-कात्यायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, बोधायन, भारद्वाज, मानव तथा वैखानस। सामवेद-लाट्यायन, द्राह्मायण व आर्षेय। अथर्ववेद-वैतान।

(ख) गृह्म सूत्र : गृहस्थाश्रम से सम्बद्ध धार्मिक अनुष्ठान (कर्तव्य) प्रमुख गृह सूत्र- शांखायन आश्वलायन, बोधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, भारद्वाज, पारस्कर गोभिल, खादिर एवं कौशिक।

( ग) धर्म सूत्र : वर्णधर्म, राजा के कर्तव्य, प्रायश्चित विधान, न्यायालयों की स्थापना, कराधान, नियोग नियम तथा गृहस्थ कर्तव्यों का विवरण। प्रमुख धर्मसूत्र- वशिष्ठ, मानव, आपस्तम्ब, बोधायन, गौतम। धर्मसूत्रों से ही कालान्तर में स्मृति ग्रंथों का विकास हुआ।

(घ) शुल्व सूत्र : ‘शुल्व’ का तात्पर्य है-नापने की डोरी। इनमें यज्ञीय वेदियों को नापने, स्थान चयन एवं निर्माणादि का वर्णन है। ये आर्यों के ज्यामिति ज्ञान के परिचायक है।

बौद्ध साहित्य

• गौतमबुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षाओं को विभिन्न बौद्ध संगीतियों में संकलित कर तीन पिटकों (पिटारियों) में विभाजित किया गया- (1) विनय पिटक (2) सूत्त पिटक (3) अभिधम्म पिटक हैं, जिन्हें ‘त्रिपिटक’ की संज्ञा दी गयी। त्रिपिटक पालि भाषा में रचित हैं।

① विनय पिटक : इसमें संघ सम्बन्धी नियमों, दैनिक आचार-विचार व विधि-निषेधों का संग्रह है, जिसके निम्न भाग हैं-

(क ) पातिमोक्ख (प्रतिमोक्ष) : इसमें अनुशासन सम्बन्धी विधानों तथा उनके उल्लंघन पर किए जाने वाले प्रायश्चितों का संकलन है।

( ख) सुत्ताविभंग : इसमें पातिमोक्ख के नियमों पर भाष्य प्रस्तुत किए गये हैं। इसके दो भाग हैं-महाविभंग तथा भिक्खुनी विभंग। प्रथम में बौद्ध भिक्षुओं तथा द्वितीय में भिक्षुणियों हेतु विधि एवं निषेध वर्णित हैं।

(ग) खन्ध्रक : इसमें संघीय जीवन सम्बन्धी विधि निषेधों का विस्तृत वर्णन है, जिसके – महावग्ग और चुल्लवग्ग नामक दो भाग हैं।

(घ) परिवार

② सूत्त पिटक : इसमें बौद्धधर्म के सिद्धांत तथा उपदेशों का संग्रह हैं इसमें पांच निकाय आते हैं- दीघ्य निकाय, मञ्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय तथा खुद्दक निकाय। प्रथम चार में बुद्ध के उपदेश वार्तालाप रूप में दिये गये हैं और पाँचवां पद्यात्मक है। खुद्दक निकाय में कई ग्रंथ आते हैं, जैसे-खुद्दक पाठ, धम्मपद, उदान सुत्तनिपात, विमान वत्थु, पंतवत्थु, थेरगाथा, थेरीगाथा व जातक आदि। जातकों में बुद्ध के पूर्व जन्मों (550) की कहानियाँ संग्रहीत हैं।

③ अभिधम्म पिटक : यह प्रश्नोत्तर क्रम में है और इसमें दार्शनिक सिद्धांतों का संग्रह है। इसमें सात ग्रंथ सम्मिलित हैं-धम्मसंगणि, विभंग, धातुकथा, पुग्गल पंचति, कथावत्थु, यमक तथा पट्ठानं। अभिधम्म पिटक सबसे बाद की रचना है, जो कुषाण काल में हुई चौथी बौद्ध संगीति में संकलित की गयी।

त्रिपिटकों के अतिरिक्त पालि भाषा में लिखित अन्य बौद्ध ग्रंथों में नागसेन कृत ‘मिलिन्दपन्हो’ तथा सिंहली अनुश्रुतियाँ-दीपवंशमहावंश (सिंहल या लंका का इतिहास) उल्लेखनीय हैं।

संस्कृत बौद्ध ग्रंथ : संस्कृत बौद्ध लेखकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम कवि एवं नाटककार अश्वघोष का है। सर्वास्तिवादी सम्प्रदाय के चिंतक अश्वघोष कनिष्क (प्रथम शती ई.) की राजसभा में थे। उनकी तीन प्रसिद्ध रचनायें हैं- बुद्धचरित, सौन्दरानन्द तथा सारिपुत्र प्रकरण। इसमें प्रथम दो रचनायें महाकाव्य तथा अंतिम रचना नाटक ग्रंथ है।

संस्कृत में ही लिखित महावस्तु तथा ललितविस्तार में महात्मा बुद्ध के जीवन तथा दिव्यावदान में परवर्ती मौर्य शासकों एवं शुंग राजा पुष्यमित्र शुंग का उल्लेख मिलता है।

जैन साहित्य

जैन साहित्य को ‘आगम’ कहा जाता है, जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, अनुयोग सूत्र एवं नन्दि सूत्र की गणना की जाती है। इनकी रचना महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद विभिन्न संगीतियों में ई०पू० चौथी शती से छठीं शती ई. के मध्य हुई।

1. अंग (12) :

1. आचारांग सूत्त 2. सूय कंडग सूत्त (सूत्र कृतांग)3. थावंग (स्थानांग) 4. समवायंग सूत्त
5. भगवती सूत्त6. नवधम्मकहा सूत्त (ज्ञाताधर्मकथा)7. उवासगदसाओ सूत्त (उपासकदशा)8. अंत गडदसाओ
9. अणुत्तरोववाइय दसाओ10. पठहावागरणाइ (प्रश्न व्याकरण)11. विवाग सुयम्12. दिट्टिवाय (दृष्टिवाद)

2. उपांग (12) :

1. औपपातिक 2. राजप्रश्नीय3. जीवाभिगम4. प्रजापना
5. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति6. चंद्र प्रज्ञप्ति7. सूर्य प्रवरित8. निरयावलि
9. कल्पावसंतिका10. पुष्पिका11. पुष्प चूलिका 12. वृष्णि दशा।

3. प्रकीर्ण (10) :

1. चतुः शरण 2. आतुर प्रत्याख्यान3. भक्तिपरिज्ञा4. संस्तार 5. तंदुल वैतालिक
6. चंद्रवैध्यक 7. गणिविद्या8. देवेन्द्रस्तव9. वीरस्तव10. महाप्रत्याख्यान

4. छेदसूत्र (6) :

1. निशीथ2. महानिशीथ3. व्यवहार
4. आचार दशा 5. कल्प6. पंचकल्प।

5. मूलसूत्र : इसमें जैन धर्म के उपदेश, भिक्षुओं के कर्तव्य, विहार जीवन पथ नियम आदि का वर्णन है। इनकी संख्या चार है- उत्तराध्ययन, षडावशयक, दशवैकालिक, पिण्डनिर्युक्ति या पाक्षिक सूत्र।

6. नन्दि सूत्र एवं अनुयोग द्वार : ये जैनियों के स्वतंत्र ग्रंथ तथा विश्वकोश हैं।

• उपर्युक्त सभी ग्रंथ श्वेताम्बर सम्प्रदाय के जैनों के लिए हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय के मतावलम्बी इन्हें प्रामाणिक नहीं मानते हैं।

• श्वेताम्बर अनुश्रुति के अनुसार महावीर की मृत्यु के 140 वर्ष बाद वलभी में देवधि क्षमा श्रमण की अध्यक्षता में एक सभा हुई जिसमें धार्मिक साहित्य को संकलित किया गया। इसके बाद हुई पाटलिपुत्र सभा में भी कुछ ग्रंथों का संकलन हुआ।

• दिगम्बर मतावलम्बी भद्रबाहु की शिक्षाओं को ही प्रामाणिक मानते हैं।

लौकिक साहित्य (धर्मेत्तर)

• रामायण : वाल्मीकि कृत महाकाव्य रामायण में मूलतः 60000 श्लोक थे, जो कालान्तर में 12000 हुए और फिर 24000 हो गये। इसे ‘चतुर्विंशति साहस्री संहिता’ भी कहा गया है। इसकी रचना संभवतः ई०पू० पांचवीं शती में आरम्भ हुई। इसकी पांचवीं अवस्था ईसा की बारहवीं शती में सामने आयी है। कुल मिलाकर इसकी रचना महाभारत के बाद की गयी प्रतीत होती है। यह सात काण्डों में विभक्त है-बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के अधिकांश भागों को प्रक्षिप्त माना जाता है।

• महाभारत : वेदव्यास कृत ‘महाभारत’ महाकाव्य संभवतः 10वीं सदी ई०पू० से चौथी सदी ई. तक की स्थिति का आभास देता है। पहले इसमें मात्र 8800 श्लोक थे, और इसका नाम ‘जयसंहिता’ (विजय संबंधी ग्रंथ) था। बाद में श्लोक संख्या बढ़कर 24000 हो जाने पर यह ‘भारत’ नाम से प्रसिद्ध हुआ, क्योंकि इसमें वैदिक जन भरत के वंशजों की कथा है। कालान्तर में इसमें एक लाख श्लोक हो गये और यह ‘शतसाहस्री संहिता’ या ‘महाभारत’ कहलाने लगा। इसमें कथोपकथायें, वर्णन और उपदेश हैं। मूलकथा कौरवों-पांडवों के युद्ध की है-जो उत्तर वैदिक काल की हो सकती है। वर्णनांश का सम्बन्ध वेदोत्तर काल से तथा उपदेशात्मक अंश का सम्बन्ध मौर्योत्तर और गुप्तकाल से हो सकता है।

महाभारत में कुल 18 पर्व हैं : 1. आदि पर्व 2. सभा पर्व 3. वन पर्व 4. विराम पर्व 5. उद्योग पर्व 6. भीष्म पर्व 7. द्रोण पर्व 8. कर्ण पर्व 9. शल्य पर्व 10. सौप्तिक पर्व 11. स्त्री पर्व 12. शांति पर्व 13. अनुशासन पर्व 14. अश्वमेध पर्व 15. आश्रमवासी पर्व 16. मौसल पर्व 17. महाप्रस्थानिक पर्व 18. स्वर्गारोहण पर्व। इसके अलावा हरिवंश इसका परिशिष्ट (खिल्य पर्व) है, जिसमें कृष्ण वंश की कथा वर्णित है।

• अर्थशास्त्र : कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र महत्त्वपूर्ण मौर्यकालीन विधि ग्रंथ है। कौटिल्य को विष्णुगुप्त तथा चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है, जो चंद्रगुप्त मौर्य का गुरु था। अर्थशास्त्र 15 अधिकरणों में विभाजित है, जिसमें द्वितीय और तृतीय सर्वाधिक प्राचीन हैं। इस ग्रंथ को वर्तमान स्वरूप ईसवी सन् के आरम्भ में दिया गया, लेकिन इसके प्राचीनतम अंश मौर्यकालीन समाज और अर्थतंत्र पर प्रकाश डालते हैं। इससे प्राचीन भारतीय राज्यतंत्र और अर्थ-व्यवस्था के अध्ययन की महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होती है।

प्रमुख संस्कृत साहित्य

कालिदास : शैव मतावलम्बी कालिदास गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबारी कवि थे। कालिदास द्वारा विरचित सात पद्य और नाट्य ग्रंथों की प्रामाणिकता सुविदित है। इनके नाटक निम्नलिखित हैं-

कालिदास के पद्म और ग्रंथ

(1) ऋतुसंहार : यह कालिदास की प्रथम काव्य रचना है, जो छ: सगर्गों (छ: ऋतुओं) का एक खंड काव्य है-ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर एवं वसंत ।

(2) मेघदूत : पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ में विभक्त खंडकाव्य, वियोग श्रृंगार की उत्कृष्ट रचना।

(3) कुमारसंभव : 17 सर्गों का महाकाव्य, जिसमें शिव एवं पार्वती के पुत्र कुमार (कार्तिकेय) के जन्म की कथा वर्णित है।

(4) रघुवंश : 19 सर्गों में विभक्त महाकाव्य, जिसमें राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक चालीस इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की चरित्र चित्रण है।

(5) मालविकाग्निमित्र : पाँच अंकों में बंटी कालिदास की प्रथम नाट्य रचना, जिसमें शुंग राजा अग्निमित्र और मालविका की प्रणय कथा वर्णित है।

(6) विक्रमोर्वशीय : कालिदास का द्वितीय नाट्य ग्रंथ, पांच अंकों में पुरूरवा एवं उर्वशी की प्रणय कथा।

(7) अभिज्ञानशाकुंतलम् : कालिदास की सर्वोत्कृष्ट नाट्य रचना, सात अंकों में हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त व कण्व ऋषि की पालिता पुत्री शकुन्तला के संयोग व वियोग श्रृंगार का वर्णन।

भारवि : 18 सर्गों में विभाजित ‘किरातार्जुनीयम’ नामक महाकाव्य के रचयिता।

• माघ (675 ई०) : महाकाव्य ‘शिशुपाल वध’ के रचयिता।

श्रीहर्ष (12वीं शती गहड़वाल जयचंद) : नैषधीयमचरित (महाकाव्य), खण्डनखण्डखाद्य (अद्वैतवाद का प्रणयन) के रचनाकार।

भास (ई०पू० पांचवीं-चौथी शती) : कालिदास के पूर्ववर्ती प्रथम नाटककार, 13 नाटकों के प्रणेता- 1. स्वप्नवासवदत्ता 2. उरूभंग 3. प्रतिमका 4. अभिषेक 5. पंचरात्र 6. मध्यम व्यायोम 7. दूतघटोत्कच 8. कर्णभार 9. दूतवाक्य 10. बालचरित 11. दरिद्र चारूदत्त 12. अविमारक 13. प्रतिज्ञायौगन्धरायण।

विशाखदत्त (गुप्तकालीन) : मुद्राराक्षस, देवीचंद्रगुप्तम्। शूद्रक ने ही अपनी रचनाओं का पात्र राज परिवार के स्थान पर समाज के मध्यम वर्ग के लोगों को बनाया।

• हर्षवर्धन (606-647 ई०) : तीन नाटक- रत्नावली, प्रियदर्शिका तथा नागानन्द का लेखक।

• भवभूति (700 ई०-यशोवर्मन, कन्नौज) : तीन नाटक मालतीमाधव, उत्तररामचरित, महावीर चरित।

• राजशेखर : कन्नौज के प्रतिहार राजाओं महेन्द्रपाल (890-908 ई.) तथा महिपाल (910-940ई.) की राजसभा में निवास करने वाले प्रसिद्ध संस्कृत कवि/नाटककार। चार नाटकों तथा एक अलंकार शास्त्र का प्रणयन-बाल रामायण, बाल भारत (प्रचण्ड पांडव), विद्धशालभंजिका, कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा।

गद्य साहित्य

बाणभट्ट (हर्ष काल) : हर्षचरित एवं कादम्बरी।

दण्डी (पल्लव नरसिंह वर्मन-690-715 ई.) : काव्यादर्श, दशकुमार चरित, अरन्ति सुन्दरी कथा।

ऐतिहासिक साहित्य

पद्मगुप्त ‘परिमल’ [(परमार शासक मुंज) (992-998ई.)] : नवसहसांकचरित

• बिल्हण (कल्याणी के चचुलक्य विक्रमादित्य VI-1076-1127 ई.) विक्रमांकदेव चरित

• कल्हण : कल्हण ने अपने प्रमुख ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ की रचना कश्मीर नरेश जयसिंह (1127-1159 ई.) के काल में की, जिसमें 8 तरंगों में कश्मीर का 12वीं शती तक का इतिहास वर्णित है। राजतरंगिणी संस्कृत भाषा में ऐतिहासिक घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रथम प्रयास है।

हेमचंद्र : (12वीं शती) : कुमार पाल चरित (द्वया-श्रममहाकाव्य)।

• नयचंद सूरि : हम्मीर काव्य

• जयानक : पृथ्वीराज विजय

• वाक्यप्रति राज : गौडवहो

• संध्याकर नन्दी : रामपालचरित

कथा साहित्य

• गुणाढ्य : प्रसिद्ध रचना ‘वृहत्कथा’ (पैशाची भाषा) : सातवाहन नरेश हाल (प्रथम-द्वितीय शती) का दरबारी कवि ।
• क्षेमेन्द्र : वृहत्कथामंजरी
• सोमदेव : कथासरित्सागर
• विष्णुशर्मा : पंचतत्र (संकलन)
• नारायण भट्ट : हितोपदेश (संस्कृत शिक्षक का प्रथम ग्रंथ
• अमरसिंह : अमरकोश (शब्दकोष)।

C. विदेशी यात्रियों के विवरण

भारत आने वाले विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास को जानने में सहायता मिलती है, जिनमें अनेक यूनानी, रोमन, अरबी और चीनी यात्री सम्मिलित हैं।

यूनानी-रोमन (परम्परागत) लेखक

भारतीय स्त्रोत से सिकन्दर के आक्रमण (325ई०पू०) की कोई जानकारी नहीं मिलती, इसके लिए हमें यूनानी स्रोतों पर ही आश्रित रहना पड़ता है।

• सिकन्दर महान के आक्रमण के समय एक समकालीन भारतीय राजा ‘सैण्ड्रोकोट्टस’ का नामोल्लेख यूनानी लेखकों स्ट्रैबोजस्टिन ने किया है, विलियम जोंस ने जिसकी पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में की है।

एरियन तथा प्लूटार्क ने उसे ‘एण्ड्रोकोट्टस’ तथा फिलार्कस ने ‘सैण्ड्रोकोट्टस’ के नाम से उल्लिखित किया है।

स्ट्रैबो, डायोडोरस, प्लिनी और एरियन नामक यूनानी विद्वान ‘क्लासिकल’ लेखक के रूप में जाने जाते हैं।

• ट्रेसियस : ईरानी राजवैद्य, जिसने मात्र ईरानी अधिकारयों से ही भारत विषयक ज्ञान प्राप्त करके अपना विवरण लिखा था।

हेरोडोटस : ‘इतिहास का पिता’ कहलाने (1 वाले हेरोडोटस ने अपने ग्रंथ ‘हिस्टोरिका’ में पाँचवीं शताब्दी ई०पू० के भारत-फारस सम्बन्ध का वर्णन अनुश्रुतियों के आधार पर किया है।

नियार्कस, आनेसिक्रिटस एवं आरिस्टोबुलस : सिकन्दर के साथ भारत आने वाले इन लेखकों के विवरण अधिक प्रामाणिक हैं, जिनका उद्देश्य अपने देशवासियों को भारतीयों के विषय में बताना था।

मेगस्थनीज : सेल्युकस ‘निकेटर’ के राजदूत के रूप में चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में 14 वर्षों तक रहा। उसने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में मौर्य युगीन समाज व संस्कृति के बारे में लिखा, लेकिन ‘इण्डिका’ अब उपलब्ध नहीं है, इसके सम्बन्ध में जानकारी उत्तर कालीन यूनानी लेखकों के उद्धरण के रूप में प्राप्त होती है।

डाइमेकस : सीरियाई राजा अन्तियोकस के राजदूत के रूप में बिन्दुसार के दरबार में रहा था।

डायोनिसियस : मिस्र नरेश टालेमी फिलाडेल्फस के राजदूत के रूप में अशोक के दरबार में आया था।

टालेमी की ‘ज्योग्राफी’ और पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ : ज्योग्राफी लगभग 150 ई. के आसपास लिखी गयी थी, जिसमें प्राचीन भारतीय भूगोल और वाणिज्य का वर्णन है। ‘पेरीप्लस’ का अज्ञात लेखक 80-115 ई. के मध्य हिन्द महासागर की यात्रा पर आया था। उसने बंदरगाहों और व्यापारिक वस्तुओं का विवरण दिया है।

प्लिनी : पुस्तक नेचुरल हिस्टोरिका (ईसा की प्रथम सदी) : यह लैटिन भाषा में है, जिसमें भारत एवं इटली के मध्य होने वाले व्यापार तथा भारतीय पशुओं, वनस्पतियों, खनिजों का विवरण है। प्लिनी ने रोम से भारत आने वाले धन के लिए दुःख प्रकट किया है।

चीनी लेखक

भारत आने वाले अधिकांश चीनी यात्री बौद्ध तीर्थस्थानों तथा बौद्ध धर्म के विषय में ज्ञान प्राप्त करने आये थे।

इनमें प्रमुख हैं –

(1) फाह्यान : यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (375-415 ई.) के दरबार में भारत आया था। 399 से 414 ई. तक उसने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया। उसने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति का विवरण दिया है।

(2) ह्वेनसांग : ह्वेनसांग कन्नौज के शासक हर्ष वर्धन (606 ई-647 ई.) के शासन काल में भारत आया। 16 वर्ष तक विभिन्न स्थानों की यात्रा की, 6 वर्ष तक ‘नालन्दा विश्वविद्यालय’ में रहकर शिक्षा प्राप्त की। उसका यात्रा विवरण ‘सी-यू-की’ नाम से प्रसिद्ध है, जो हर्षकालीन भारत की स्थिति जानने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

(3) ह्वी ली : इसके द्वारा लिखित ह्वेनसांग की जीवनी से भी हर्षकालीन इतिहास की बातें ज्ञात होती हैं।

(4) इत्सिंग : सातवीं शताब्दी के अन्त में भारत आने वाले इस चीनी यात्री ने नालंदा तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय की भारत की स्थिति का वर्णन किया है।

(5) मा त्वान लिन : हर्ष के पूर्वी अभियान का विवरण।

(6) चाऊ-जू-कुआ : चोल इतिहास का विवरण।

अरबी लेखक

अलबरुनी (अबूरिहान) तहकीक-ए-हिन्द (किताबुल हिन्द अर्थात् ‘भारत की खोज’; कानून-अल-मसूदी) : महमूद गजनवी के आक्रमण (1000 ई.) के समय भारत आने वाले इस अरबी विद्वान ने राजपूत कालीन भारत की वर्ण-व्यवस्था, रीति-रिवाज तथा राजनीति इत्यादि का प्रशंसात्मक वर्णन किया है।

• सुलेमान : नवीं शती ईस्वी में भारत आने वाले अरबी यात्री सुलेमान ने प्रतिहार और पाल राजाओं के विषय में लिखा है। उसने पाल साम्राज्य को ‘रूहमा’ (धर्म या धर्मपाल) कहा है।

• अलमसूदी : (915-916 ई.) में बगदाद से आने वाले अलमसूदी ने प्रतिहार राजाओं का वर्णन किया है।

उपर्युक्त लेखकों के अतिरिक्त तिब्बती बौद्ध लेखक तारानाथ (12वीं शती) के ग्रंथों- ‘कंग्यूर’ और ‘तंग्यूर’ से भी भारतीय इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। वेनिस (इटली) का प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो तेरहवीं शताब्दी के अंत में पांड्य राज्य की यात्रा पर आया था, इसलिए उसका यात्रा विवरण मूलतः दक्षिण भारत से ही सम्बन्धित है।

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निष्कर्ष:

हम आशा करते हैं कि आपको यह पोस्ट प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोतजरुर अच्छी लगी होगी। प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत के बारें में काफी अच्छी तरह से सरल भाषा में उदाहरण देकर समझाया गया है। अगर इस पोस्ट से सम्बंधित आपके पास कुछ सुझाव या सवाल हो तो आप हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताये। धन्यवाद!

मेरा नाम सुनीत कुमार सिंह है। मैं कुशीनगर, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं।

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